Sunday, August 31, 2008

तू रहती है

सीमा गुप्ता

मेरे एहसास में तू रहती है,
मेरे जज्बात में तू रहती है
आँखों मे सपना की जगह
मेरे ख़यालात में तू रहती है
लोग समझते हैं के वीराना है
पर मेरे साथ में तू रहती है
दम घुटता है जब रुसवाई मे ,
मेरी हर साँस मे तू रहती है
दुख का दर्पण , विरहन सा मन
मेरे हर हालात मे तू रहती है

रात

सीमा गुप्ता

"क्या हुआ जो ये रात,
"कुछ"
शिकवो शिकायतों के साथ गुजरी ,
क्या हुआ जो अगर ये रात,
आंसुओ के सैलाब से बह कर गुजरी ,
"गौर -ऐ -तलब" है के ये रात,
आप के ख्यालात के साथ गुजरी

तेरा वजूद

सीमा गुप्ता

मेरी बोजिल आहें,
मेरी तड़पती बाहें,
मेरी बिख्लती ऑंखें,
और मेरी डूबती सांसें

Saturday, August 30, 2008

तेरी वफा

सीमा गुप्ता

"वो झूठे वादे ,
वो टूटती कस्मे ,
वो बेवजह इल्जाम ,
और मेरा अँधा विश्वास "

तेरा साथ

सीमा गुप्ता

ये धुंधला साया ,
ये काली परछाई,
लम्बी तनहाई,
और एक अधूरी आस "

तेरी याद

सीमा गुप्ता

" वो लम्हे ,
वो गुजरे पल ,
वो अधूरा स्पर्श,
और एक अंतहीन इंतजार "

तेरा प्यार

सीमा गुप्ता

"एक दर्द ,
एक वेदना ,
एक कसक , तड़प ,
और बेशुमार आंसू "

लोकतन्त्र के आयाम

कृष्ण कुमार यादव

देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद प्रथम प्रधानमंत्री पं० जवाहर लाल नेहरू इलाहाबाद में कुम्भ मेले में घूम रहे थे। उनके चारों तरफ लोग जय-जयकारे लगाते चल रहे थे। गाँधी जी के राजनैतिक उत्तराधिकारी एवं विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र के मुखिया को देखने हेतु भीड़ उमड़ पड़ी थी। अचानक एक बूढ़ी औरत भीड़ को तेजी से चीरती हुयी नेहरू के समक्ष आ खड़ी हुयी-''नेहरू! तू कहता है देश आजाद हो गया है, क्योंकि तू बड़ी-बड़ी गाड़ियों के काफिले में चलने लगा है। पर मैं कैसे मानूं कि देश आजाद हो गया है? मेरा बेटा अंग्रेजों के समय में भी बेरोजगार था और आज भी है, फिर आजादी का फायदा क्या? मैं कैसे मानूं कि आजादी के बाद हमारा शासन स्थापित हो गया हैं। नेहरू अपने चिरपरिचित अंदाज में मुस्कुराये और बोले-'' माता! आज तुम अपने देश के मुखिया को बीच रास्ते में रोककर और 'तू कहकर बुला रही हो, क्या यह इस बात का परिचायक नहीं है कि देश आजाद हो गया है एवं जनता का शासन स्थापित हो गया है। इतना कहकर नेहरू जी अपनी गाड़ी में बैठे और लोकतंत्र के पहरूओं का काफिला उस बूढ़ी औरत के शरीर पर धूल उड़ाता चला गया।

लोकतंत्र की यही विडंबना है कि हम नेहरू अर्थात लोकतंत्र के पहरूए एवं बूढ़ी औरत अर्थात जनता दोनों में से किसी को भी गलत नहीं कह सकते। दोनों ही अपनी जगहों पर सही हैं, अन्तर मात्र दृष्टिकोण का है। गरीब व भूखे व्यक्ति हेतु लोकतंत्र का वजूद रोटी के एक टुकड़े में छुपा हुआ है तो अमीर व्यक्ति हेतु लोकतंत्र का वजूद चुनावों में अपनी सीट सुनिश्चित करने और अंततः मंत्री या किसी अन्य प्रतिष्ठित संस्था की चेयरमैनशिप पाने में है। यह एक सच्चायी है कि दोनों ही अपनी वजूद को पाने हेतु कुछ भी कर सकते हैं। भूखा और बेरोजगार व्यक्ति रोटी न पाने पर चोरी की राह पकड़ सकता है या समाज के दुश्मनों की सोहबत में आकर आतंकवादी भी बन सकता है। इसी प्रकार अमीर व्यक्ति धन-बल और भुजबल का प्रयोग करके चुनावों में अपनी जीत सुनिश्चित कर सकता है। यह दोनों ही लोकतंत्र के दो विपरीत लेकिन कटु सत्य हैं। परन्तु इन दोनों कटु सत्यों के बीच लोकतंत्र कहाँ है, संभवतः एक राजनीतिशास्त्री या समाज शास्त्री भी व्याख्या करने में अपने को अक्षम पाये।

लोकतंत्र विश्व की सर्वाधिक लोकप्रिय शासन-प्रणाली है। संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने कहा था-''जनता का, जनता के लिये, जनता द्वारा शासन ही लोकतंत्र है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता सम्प्रभुता का जनता के हाथों में होना है। जनता ही चुनावों द्वारा तय करती है कि किन लोगों को अपने ऊपर शासन करने का अधिकार दिया जाय। कुछ देच्चों ने तो इसी आधार पर जनता को अपने प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का भी अधिकार दिया है। यह एक अलग तथ्य है कि आज राजनीतिक दल ही यह निर्धारित करते हैं कि जनता का प्रतिनिधित्व करने की जिम्मेदारी किसे सौंपी जाय। लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व की इस अजूबी व्यवस्था के कारण ही नाजीवादी हिटलर एवं मुसोलिनी ने इसे भेड़ तंत्र कहा। उनका मानना था कि-''लोकतंत्र वास्तविक रूप में एक छुपी हुयी तानाशाही है, जिसमें कुछ व्यक्ति विशेष जन संप्रभुता की आड़ में यह सुनिश्चित करते हैं कि जनता को किस दिशा में जाना है न कि जनता यह निर्धारित करती है कि उसे किस ओर जाना है। इसी कारण उन्होंने लोकतंत्र की जनता को भेड़ कहा, जिसे डंडे के जोर पर जिस ओर हांक दो वह चली जायेगी।

आज लोकतंत्र मात्र एक शासन-प्रणाली नहीं वरन्‌ वैचारिक स्वतंत्रता का पर्याय बन गया है। चाहे वह संयुक्त राष्ट्र संघ का 'मानवाधिकार घोषणा पत्र हो अथवा भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मूलाधिकार हों, ये सभी राज्य के विरूद्ध व्यक्ति की गरिमा की स्वतंत्रता सुनिश्चित करते हैं। यह लोकतंत्र का ही कमाल है कि वाशिंगटन में अमरीकी राष्ट्रपति के मुख्यालय व्हाइट हाउस के सामने स्पेनिश मूल की वृद्ध महिला कोंचिता ने पिछले तीन दच्चकों से अपनी प्लास्टिक की झोपड़पट्टी लगा रखी है। बुच्च के साथ-साथ व्हाइट हाउस और अमेरिकी नीतियों की कट्टर विरोधी कोंचिता को कोई भी वहाँ से हटाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है क्योंकि वह फ्रीडम आफ स्पीच की प्रतीक बन गई है। राष्ट्रपति रीगन के जमाने में व्हाइट हाउस की बाहरी दीवार से लगा उसका ठिकाना थोड़ा दूर ठेल दिया गया क्योंकि यह रीगन की पत्नी को रास नहीं आया पर आज भी लोगों के लिए व्हाइट हाउस के सामने बसी यह बरसाती आकर्षण का केन्द्र बिन्दु है। वस्तुतः लोकतंत्र मात्र चुनावों द्वारा स्थापित राजनीतिक प्रणाली तक ही सीमित नहीं है बल्कि सामाजिक लोकतंत्र, आर्थिक लोकतंत्र जैसे भी इसके कई रूप हैं। यह जरूरी नहीं कि राजनैतिक रूप से घोषित लोकतंत्रात्मक प्रणाली में वास्तविक रूप में सामाजिक एवं आर्थिक लोकतंत्र कायम ही हो। इसी विरोधाभास के चलते सामाजिक न्याय एवं समाजवादी समाज की अवधारणाओं ने जन्म लिया। भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो यहाँ पर एक लम्बे समय से छुआछूत की भावना रही है-स्त्रियों को पुरूषों की तुलना में कमजोर समझा गया है, कुछ जातियों को नीची निगाहों से देखा जाता है, धर्म के आधार पर बँटवारे रहे हैं। निश्चित यह लोकंतत्र की भावना के विपरीत है। लोकतंत्र एक वर्ग विशेष नहीं, वरन्‌ सभी की प्रगति की बात करता है। तराजू के दो पलड़ों की भांति जब तक स्त्री को पुरूष की बराबरी में नहीं खड़ा किया जाता, तब तक लोकतंत्र के वास्तविक मर्म को नहीं समझा जा सकता। भारतीय संविधान में ७३ वें संशोधन द्वारा पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण देना एवं संसद में 'महिला आरक्षण विधेयक का रखा जाना इसी दिच्चा में एक कदम है। यह एक कटु सत्य है कि तमाम विकसित देशों में प्रारम्भिक अवस्थाओं में महिलाओं को मताधिकार योग्य नहीं समझा गया। क्या महिलायें लोकतंत्र का हिस्सा नहीं हैं? इसी प्रकार समाज के पिछड़े वगोर्ं को आरक्षण देकर अन्य वर्गों के बराबर लाने का प्रयास किया गया है। १९९० के दशक में भारतीय राजनीति में पिछड़े वर्गों के नेताओं के तेजी से राष्ट्रीय पटल पर छाने को इसी परिप्रेक्ष्य में समझा जाना चाहिए।


लोकतंत्र जनता का शासन है, पर इन दिनों यह बहुमत का शासन होता जा रहा है। यह सत्य है कि बहुमत ज्यादा से ज्यादा लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, पर इसकी आड़ में अल्पमत के अच्छे विचारों को नहीं दबाया जा सकता। लोकतंत्र बहुमत की मनमर्जी नहीं वरन्‌ बहुमत या अल्पमत दोनों के अच्छे विचारों की मर्जी है। प्रतीकात्मक धार्मिक चिह्नों को लोगों में बाँटकर या बाहुबल के आधार पर किसी भी अल्पमत विचार को नहीं दबाया जा सकता। इन विचारों की रक्षा करने हेतु ही विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और प्रेस को लोकतंत्र के चार स्तम्भों के रूप में खड़ा किया गया है। यह भारत जैसे बहुदलीय लोकतंत्र का कमाल ही है कि एक विधायक या सांसद वाली पार्टी सत्ता सुख भोगती है और ज्यादा विधायकों या सांसदों वाली पार्टियाँ विपक्ष में बैठी रहती हैं। सवाल यह नहीं है कि यह सही है या गलत पर यह लोकतंत्र का विरोधाभास अवश्य है। लोकतंत्र के चारों स्तम्भों में सन्तुलन का सिद्धान्त अवश्य है, एक कमजोर होता है तो दूसरा मजबूत होता जाता है। विधायिका अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं कर पाती है तो 'न्यायिक सक्रियतावाद' के रूप में न्यायपालिका उन्हें निभाने लगती है, कार्यपालिका संविधान के विरूद्ध जाने की कोशिश करती है तो न्यायालय एवं यदि जनभावनाओं के विरूद्ध जाती है तो प्रेस उसे सही रास्ता पकड़ने पर मजबूर कर देता है। निश्चित यह अभिनव सन्तुलन ही लोकतंत्र को अन्य शासन प्रणालियों से अलग करता है। वस्तुतः २१ वीं शताब्दी में लोकतंत्र सिर्फ एक राजनैतिक नियम, शासन की विधि या समाज का ढांचा मात्र नहीं है बल्कि यह समाज के उस ढांचे की खोज करने का प्रयत्न है, जिसके अन्तर्गत सामान्य मूल्यों के द्वारा स्वतंत्र व स्वैच्छिक वृद्धि के आधार पर समाज में एकरूपता और एकीकरण लाने के लिए प्रयोग किया जाता है।


भारत विविधताओं में एकता वाला देश है। जाति, धर्म, भाषा, बोली, त्यौहार, पहनावा, खान-पान सभी कुछ में विविधता है, यही कारण है कि समय-समय पर पृथकतावादी आवाजें भी उठती रही हैं। पर हमने उनका दमन नहीं किया, वरन उनकी भावनाओं को उनके दृष्टिकोण से देखने की कोशिश की एवं अगर यह राष्ट्रीय हित में रहा तो स्वीकारने में संकोच भी नहीं रहा। कश्मीर, भारत-पाक के बीच लम्बे समय से विवाद का विषय बना हुआ है पर हम दमन एवं सैन्य बल द्वारा उसे सुलझाने की बजाय लोकतांत्रिक रास्तों का चुनाव करते हैं। उग्रवादी संगठनों से बातचीत को कुछ लोग कायरता के रूप में देखते हैं, पर यह उनकी भूल है। लोकतंत्र उन्हें हिंसक प्राणी के रूप में नहीं वरन्‌ एक सामान्य व्यक्ति की हैसियत से देखता है, जो कि या तो गुमराह किये गये हैं अथवा उनकी आकांक्षायें पूरी नहीं हुयी हैं। लोकतंत्र उनका तात्कालिक दमन करने की बजाय वार्ताओं द्वारा उनके दूरगामी हल खोजना चाहता है।

आज भारतीय लोकतंत्र एक संक्रमणकालीन दौर से गुजर रहा है। तमाम घटनाओं ने बुद्धिजीवियों को यह सोचने हेतु मजबूर कर दिया है कि क्या भारतीय लोकतंत्र और उसकी धर्मनिरपेक्षता ख़तरे मंष है? क्या विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा भूल गया है..... निश्चित नहीं। भारत में लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की जड़ें इतनी कमजोर नहीं हुयी हैं कि वे छोटे-छोटे झटकों से धराशायी हो जायें। हर व्यवस्था के सकारात्मक एवम्‌ नकारात्मक पक्ष होते हैं, सो लोकतंत्र के भी हैं। लोकतंत्र में प्राप्त स्वतंत्रताओं का कुछ लोग थोड़े समय के लिये दुरूपयोग कर सकते हैं, पर एक लम्बे समय तक नहीं क्योंकि यह लोकतंत्र है। जनता हर गतिविधि को ध्यान से देखती है, पर बर्दाश्त से बाहर हो जाने पर वह व्यवस्थायें भी बदल देती है। यह भी लोकतंत्र का एक कटु सत्य है।

Friday, August 29, 2008

कभी आ कर रुला जाते

सीमा गुप्ता




दिल की उजड़ी हुई बस्ती,कभी आ कर बसा जाते
कुछ बेचैन मेरी हस्ती , कभी आ कर बहला जाते...
युगों का फासला झेला , ऐसे एक उम्मीद को लेकर ,
रात भर आँखें हैं जगती . कभी आ कर सुला जाते ....
दुनिया के सितम ऐसे , उस पर मंजिल नही कोई ,
ख़ुद की बेहाली पे तरसती , कभी आ कर सजा जाते ...
तेरी यादों की खामोशी , और ये बेजार मेरा दामन,
बेजुबानी है मुझको डसती , कभी आ कर बुला जाते...
वीराना, मीलों भर सुखा , मेरी पलकों मे बसता है ,
बनजर हो के राह तकती , कभी आ कर रुला जाते.........

यादों का काफिला

सीमा गुप्ता

आप की यादों का काफिला,

कुछ इस तरह से,

मेरे साथ चलता है,

" की"

आप से हर रोज

मुलाकात हो जाती है

हाइकु

रचना गौड़ भारती

रक्त का दान
हो जनकल्याण
कर्म महान

Thursday, August 28, 2008

दुहाई

रचना गौड़ भारती

ज़मीं आस्मां से पूछती है
मेरे आंचल में सारी कायनाथ रहती है
चांद तो दागी है फिर भी
खूबसूरती की दुहाई
इसी से क्यों दी जाती है

काश

सीमा गुप्ता

तेरे साथ गुजरे,
" लम्हों"
की कसक,
आज भी
दिल मे बाकी है,
"काश "
वो मौसम
वो समा
फ़िर से बंधे

तमन्ना

सीमा गुप्ता


दिल की तमन्ना फ़िर कोई हरकत ना करे,
यूँ न सितम ढा के फ़िर कोई सैलाब रुख करे,
किस अदा से इजहारे जज्बात हम करते,
की एक इशारे से भी जब चेहरा तेरा शिकन करे....

Wednesday, August 27, 2008

असर

रचना गौड़ भारती
पूछे सुबहे विसाल जब हमारा हाल
पसीने से दुपट्टा भीग जाता है
शमां अंधेरो में जलाते है इसका
असर परवानो पे क्यों आता है

हाल-ऐ-दिल

सीमा गुप्ता

पलकों पे आए और भिगाते चले गए,
आंसू तुम्हारे फूल खिलाते चले गए..
तुमने कहा था हाल-ऐ-दिल हम बयाँ करें
हम पूरी रात तुम को बताते चले गए...
मुद्द्त के बाद बोझील पलकें हो जो रही,
हम लोरियों से तुम को सुलाते चले गए...
तुम्ही को सोचते हुए रहने लगे हैं हम,
तुम्ही के अक्स दिल में बसाते चले गए....
अब यूँ सता रहा है हमें एक ख़याल ही,
हम तुम पे अपना बोझ बढाते चले गए .........

Tuesday, August 26, 2008

मेरे पास

सीमा गुप्ता

रूह बेचैन है यूँ अब भी सनम मेरे पास,
तू अभी दूर है बस एक ही ग़म मेरे पास
रात दिन दिल से ये आवाज़ निकलती है के सुन
आ भी जा के है वक्त भी कम मेरे पास
तू जो आ जाए तो आ जाए मेरे दिल को करार,
दूर मुझसे है तू दुनिया के सितम मेरे पास
दिल में है मेरे उदासी, के है दुनिया में
कहकहे गूँज रहे आँख है नम मेरे पास""नहीं"

Monday, August 25, 2008

"कभी कभी"

सीमा गुप्ता

"दिल मे बेकली हो जो,
" कभी कभी"
क्यूँ शै बेजार लगे हमे सभी
कोई तम्मना भी न बहला सकी,
क्यूँ हर शाम गुनाहगार लगे
" कभी कभी..........."

Sunday, August 24, 2008

पुकार

रचना गौड़ भारती
कतरा-कतरा दस्ते दु‌आ पे न्यौछावर न होता
जो तेरे शाने का को‌ई हिस्सा हमारा भी होता
हम तो मस्त सरशार थे अपनी ही मस्ती में
यूं बज़्म में बैठाकर तुमने गर पुकारा न होता

ज़रुरत है हमें

रचना भारती 'गौड़'

भीग भीग कर इतने सीम गए हैं
कल के सूरज की ज़रूरत है हमें

हर रिशते के खौफ़ से बेखौफ़ सोए हैं
एक पहर की नींद की ज़रूरत है हमें

दर्द के बढ़ने से खुद बेदर्दी हो गए
हरज़ाई के कत्ल की ज़रूरत है हमें

ज़िन्दा लोग कफ़न में ज़माने के सोए हैं
बस मुर्दों को बदलने की ज़रूरत है हमें

अनजाने सफ़र पर अपने निकल गए हैं
इसकी सफ़ल साधना की ज़रूरत है हमें

Saturday, August 23, 2008

तलाश

सीमा गुप्ता

जिन्दगी की धुप ने झुलसा दिया
एक शीतल छावं की तलाश है
रंज उल्फ़त नफरत से निबाह किया
एक दर्द-मंद दिल की तलाश है
रास्तों मे मंजिलें भटक गईं ,
एक ठहरे गावं की तलाश है

मानव

रचना भारती 'गौड़'

दुनिया की दह्ललीज़ पर
नागफनी सी अभिलाषाएं
लोक लाज के भय से
डरी प्रेम अग्नि की ज्वालाएं
सुवासित हु‌ए उपवन फिर
खुल गयी प्रकृति की आबन्धनाएं
उग्र अराजकता से दुनिया की
क्रन्दन करती आज दिशा‌एं
पांव ठ्हर ग‌ए पथ भूल
अन्तर्मन में, नया कोई नया स्तम्भ बनाएं
युगों-युगों तक गूंजें नभ में
पिछली भूलें फिर न दोहराएं
भरी गोद चट्टानों से धरती की
या पत्थर की प्रतिमाएं
भावों की संचरित कविता से
सुप्त जीवन का तार झंकृत कर
चलो, हम मानव को मानव बना‌एं

Friday, August 22, 2008

गम- ए-जिन्दगी

सीमा गुप्ता

गम-ए-जिन्दगी है पर गुज़रती है बडे आराम से ,
नहीं है अब कोई शिकवा दिल -ए -नाकाम से...

कारवां -ए -उम्मीद ने सर यूँ झुका लिए,
कोई लुभा सके न तमन्ना -ए - जाम से....

राहों पे धडकनों की पडी मौत की जंजीर ,
गुज़रे कोई जो बा-परवाह निगाह -ए- एहतराम से.....

जख्मी हुआ था दिल जो दगा - ओ -फरेब मे,
कहके क्यूँ लगा रहा है वफा -ए - अंजाम से

दीवानगी

सीमा गुप्ता


ये मेरी दीवानगी ,
और उसकी संगदिली ,
रोज मिलने की सजा भी ,
और अदा भी बेदीली

Thursday, August 21, 2008

नहीं

सीमा गुप्ता

देखा तुम्हें , चाहा तुम्हें ,
सोचा तुम्हें , पूजा तुम्हें,
किस्मत मे मेरी इस खुदा ने ,
क्यों तुम्हें कहीं भी लिखा नहीं .
रखा है दिल के हर तार मे ,
तेरे सिवा कुछ भी नही ,
किस्से जाकर मैं फरियाद करूं,
हमदर्द कोई मुझे दिखता नही.
बनके अश्क मेरी आँखों मे,
तुम बस गए हो उमर भर के लिए ,
कैसे तुम्हें दर्द दिखलाऊं मैं ,
अंदाजे बयान मैंने सीखा नही.
नजरें टिकी हैं हर राह पर ,
तेरा निशान काश मिल जाए कोई,
कैसे मगर यहाँ से गुजरोगे तुम,
मैं तुमाहरी मंजील ही नही,
आती जाती कोई कोई अब साँस है ,
एक बार दिल भर के काश देखूं तुझे,
मगर तू मेरा मुक्कदर नही ,
क्यों दिले नादाँ ये राज समझा नही ..............

प्यार आता है

सीमा गुप्ता

तेरी बातों पे ना जाने मुझे क्यों प्यार आता है,
तुझे देखूं ना मैं जब तक नही करार आता है.

तेरी आँखों से यूं लगता है जैसे कोई जाम पीता हूँ,
खुले होठों से गिरते फूलों को मैं थाम लेता हूँ.

नींद आती नही मुझको तो हर पल ख्वाब आतें हैं,
ख्वाबों मे मैं तुझे हर पल अपनी बाँहों मे पाता हूँ.

मिलन के बाद एक पल बिछड़ने का भी आता है,
वो घडी ऐसी होती है जैसे तूफान आता है.

मेरी चाहत की हद कितनी है ये दिखलाना चाहता हूँ,
जीते जी ही नही मर कर भी तुझको पाना चाहता हूँ...

Sunday, August 17, 2008

जे सहि दुख पर छिद्र दुरावा

डॉ० शुभिका सिंह

घोर निर्जन में परिस्थिति ने दिया है डाल,
याद आता है तुम्हारा सिन्दूर तिलकित भाल,
कौन है वह व्यक्ति जिनको चाहिए न समाज,
कौन है वह एक जिसको नहीं पड़ता दूसरो से काज,
चाहिए किसको नहीं सहयोग,
चाहिए किसको नहीं सहवास.......'(नागार्जुन की चुनी हुई रचनाएं- सिन्दूर तिलकित भाल, पृष्ठ -३०)
संवेदनशील कवि नागार्जुन की यह पंक्तियाँ हमें कुछ सोचने पर विवश कर देती हैं। भारतीय पुरूष प्रधान सामाजिक संरचना में ऐसे विधान किये गये है कि नारी को भोग्या मानकर उसका शोषण आसानी से किया जा सके। उसे घर की चारदीवारी में बन्द करके, शिक्षा से अलग करके, आर्थिक दृष्टि से मजबूर एवं परावलम्बी बनाकर, शुचिता एवं पातिव्रत्य धर्म के आदर्ष का अनुसरण कराकर समाज ने एक तरह से उसके साथ छल ही किया है। परम्परा से चले आ रहे बन्धनों में जकड़कर समाज का शक्तिशाली वर्ग इसी को अपनी हवस का शिकार बनाता है।
पितृात्मक भारतीय समाज में जब नारी अक्षम थी तब भी शोषण का शिकार थी और आज आत्मनिर्भर व शिक्षित होने के बावजूद भी शोषण का शिकार है। इसके पीछे कारण केवल यही है कि नारी को लेकर हमारी मानसिकता में आज भी कोई बदलाव नही आया है। जरूरत है तो सभ्य और शिक्षित समाज की । जीवन देने वाली नारी के प्रति अपने नजरिये को सुसभ्य व सुशिक्षित करने की। समस्या यही समाप्त नही होती है स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब शोषित समाज को यह पता ही न चले कि उसका शोषण किया जा रहा है। बहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश के गाँवो में रहने वाली अधिकांश महिलाएं परम्परागत संस्कारों के बंधन में जकड़ी हैं और उसे अपना कर्तव्य मानकर जी रही है। परिस्थिति व परिवेशगत भिन्नता के आधार पर सभी स्त्रियों की अपनी अलग- अलग समस्याएं है। शहरों में रहने वाली कामकाजी महिलाएं जहाँ अति आधुनिकता के अंधानुकरण से प्रभावित हैं वहीं गांवों व पिछड़े इलाकों की महिलाएं परिवर्तन की शून्य रफ्तार के चलते पुरूष प्रधान समाज के शिकंजे में जकड़ी हैं। मायके की चारदीवारी से जब कोई औरत ससुराल जाती है तो उसे तमाम बदलाव सहने पड़ते हैं। सर्वप्रथम उसे अपने मायके से हर तरह का संबध विच्छेद करना पड़ता है। सम्बन्ध की सीमा दहेज मिलने तक जीवित रहती है। विवाह के पश्चात्‌ वह कड़ी हमेशा के लिए टूट जाती है। यदि लड़की नौकरी पेशे वाली है तो उसका काम छुड़वा दिया जाता है या फिर उसकी आय पर नजर रखी जाती है। उसे प्रताड़ित करने के लिए हर तरह की आर्थिक मदद बन्द कर दी जाती है। देखा जाए तो घरेलू हिंसा की शिकार ज्यादातर वही महिलाएं होती है जिनकी कोई आर्थिक पृष्ठभूमि तथा सोशल स्टेटस नहीं होता।
स्वतंत्रता के पश्चात्‌ बीत दशको में नारी ने अपनी स्थिति में काफी सुधार किया है। किन्तु बावजूद इसके उस पर प्रताड़नाओं का दौर भी काफी बढ है। महिलाओं की सुरक्षा और विकास के मददे्‌नजर चौदह वर्षो तक चली अनवरत वहस के बाद महिला घरेलू हिंसा निवारण कानून २००६ अक्टूबर माह में अस्तित्व में आया लेकिन अनेको अनसुलझे प्रश्न आज भी इसके पीछे जीवन्त हैं। वैसे तो इसकी शुरूआत १९९२ में हुई थी किन्तु इसे राष्ट्रीय स्वीकृति दिलवाने में १४ वर्ष लग गये। १९९४ में जब इस प्रस्ताव को सदन के समक्ष रखा गया तो इसकी व्यापक आलोचना हुई तत्पश्चात लम्बी जददेजहद के बाद केन्द्र सरकार ने कुछ संशोधन करके इस बिल को २००१ में पुनः प्रस्तुत किया। जिसके चलते २००६ में इसे राष्ट्रीय स्वीकृति मिली। भारत की लगभग ६०-७० प्रतिशत घरेलू महिलांए अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नही हैं या यो कहे कि उन्हे अपने अधिकारों का ज्ञान ही नही है। इसके प्रतिफल में उन्हे उन कष्टों को सहना पड़ता है जिसकी वह भागी नही है। यह कानून महिलाओ को शारीरिक, बोलचाल और यौन उत्पीड़न से बचाव के साथ उन्हे निवास और आर्थिक स्वतंत्रता का अधिकार भी प्रदान करता है। राष्ट्रीय अपराध अन्वेषण ब्यूरो'' के मुताबिक भारत में प्रत्येक तीन मिनट में एक महिला उत्पीड़न का शिकार होती है। फिर इसके पीछे कारण चाहे जो भी हो, दहेज, पुत्र कमाना, पुरूष की स्वभावगत हीनता या फिर अर्थ लोभ।
यह दीवानी कानून घरेलू हिंसा की स्पष्ट परिभाषा और प्रकार निर्धारित करता है। इसमें दोषियों के लिए सजा का प्रावधान है। इस कानून की महत्ता स्वतः सिद्ध है क्योंकि इसके बनने के पश्चात्‌ मौन हिंसा, शारीरिक हिंसा, मानसिक प्रताड़ना के अनेक प्रकरण उजागर हुए है। महिलाओं द्वारा इसके दुरूपयोग की संभावना हालांकि इतनी नहीं दिखती। सामाजिक परिवर्तन के फलस्वरूप स्त्री चाहे कितनी ही आधूनिक क्यों न हो बिना परिवार व मातृत्व सुख के उसके स्त्रीत्व के कोई मूल्य नहीं है।
यदि स्त्री वास्तव में मुक्त होना चाहती है, अपनी स्थिति मे सुधार चाहती है तो उसे अपनी शिक्षा के प्रति प्रयासरत होना पड़ेगा। वह जहॉ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होगी वही व्यवस्थित षिक्षा द्वारा उसे दुनिया को देखने समझने का अपना नजरिया प्राप्त होगा। परस्पर भिन्न-भिन्न परिवेष में रहने वाली स्त्रियां परिस्थितिगत विवषता के चलते शोषण की शिकार हैं। उस परिस्थिति से वह आज भी पूरी तरह मुक्त नही हो पा रही हैं।
ज्ञान के प्रकाश के परिणामस्वरूप स्त्रियों ने स्वाधिकार और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष तथा पारिवारिक सामाजिक शोषण के खिलाफ आवाजें उठाना शुरू कर दिया हैं लेकिन चरित्रगत हीनता के चलते इस स्थिति से भी इंकार नही किया जा सकता कि प्रत्येक को अपनी परिस्थितियों के अनुकूल स्वतंत्रता के साथ-साथ अपनी सीमाओं का निर्धारण करना चाहिए।
यदि स्त्री पुरूष आपस में तालमेल से रहकर एक-दूसरे की कमियों को सहृदयता, सौम्यता और मधुरता द्वारा दूर करने का प्रयास करें तो यकीन जानिए ऐसे किसी कानून की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। जो महिला -संरक्षण के लिए बनाया जाए क्योंकि कानून की लीक पर चलकर घर-गृहस्थी के संवेदनशील विषयों को नहीं सुलझाया जा सकता। यदि पुरूष स्त्री को काम करने वाली मशीन न समझकर अपने ही समान एक संवेदनशील इन्सान समझे और उसपर होने वाले पारिवारिक अत्याचारों का सरोकार खुद से जोड़े तो निष्चित ही यह समाज को सोचने पर विवश कर देगा कि सृष्टि के निर्माण में जितना पुरूष का हाथ है उससे कहीं अधिक स्त्री का है, क्योंकि अच्छी परवरिश, संस्कारिक मूल्य व उत्तम शिक्षा सबसे पहले बच्चा अपनी मां से सीखता है और इन्ही जीवन मूल्यों की नींव पर एक श्रेष्ठ समाज का निर्माण होता है। स्त्रियों को चाहिए कि वह प्राप्त स्वतन्त्रता का दुरूपयोग न करें। जिससे उनके अधिकारों की रक्षा के लिए कारगर कदम उठाया जा सकें।

गोस्वामी तुलसीदास और उनकी साहित्य साधना

डॉ० शुभिका सिंह
गोस्वामी तुलसीदास की लेखनी पावन गंगाजल के समान मोक्ष प्रदान करने वाली है। जिन्होने वैदिक व आध्यत्मिक धर्म दर्शन के गूढ विषय को ऐसे सहज लोकग्राह्य रूप मे प्रस्तुत किया कि आज सारा हिन्दू समाज उनके द्वारा स्थापित रामदर्शन को अपनी पहचान व आस्था का प्रतीक मानने लगा है।

‘सियाराम मय सब जग जानी' की अनुभूति करने वाले तुलसीदास ने जीवन और जगत की उपेक्षा न करके ‘भनिति' को ‘सुरसरि सम सब कर हित' करने वाला माना। भारतीय जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले महाकवि तुलसी का आविर्भाव ऐसे विषम वातावरण में हुआ जब सारा समाज विच्छिन्न, विश्रृंखल, लक्ष्यहीन व आदर्श हीन हो रहा था। लोकदर्शी तुलसी ने तत्कालीन समाज की पीड़ा, प्रतारणा से तादात्म्य स्थापित कर उसका सच्चा प्रतिबिम्ब अपनी रचनाओं में उपस्थित किया। साधनहीन, अभावग्रस्त, दीन-हीन जाति का उद्धार असुर संहारक धर्मधुरिन कलि कलुष विभंजन राम का मर्यादित दिव्य लोकानुप्रेरक चरित्र ही कर सकता था इसीलिए उन्होंने तंद्राग्रस्त समाज के उद्बोधन के लिए लोकग्राह्य पद्धति को आधार बनाकर मर्यादा पुरूषोत्तम राम के लोकोपकारी व कल्याणकारी चरित्र का आदर्श प्रस्तुत कर अयात्म और धर्म को जीवन में उतारने का वन्दनीय कार्य किया। करूणायत, सुखमंदिर, गुणधाम श्री राम के ‘मंगलभवन अमंगलहारी ' रूप के सान्निध्य में सृष्टि के प्राणी मात्र, जड़ प्रकृति तथा अमगंलजनक असत्‌ प्रवृत्तियाँ सात्विक व मंगलमयी बन जाती है। ऐसे ‘लोकमंगल के विधान श्री राम से जुड़कर सभी तत्व स्वतः ही मंगलमयी हो जाते है। अतः उनका स्मरण सर्वत्र ही शुभता की सृष्टि करने वाला है और उनकी लोक मंगल विधायिनी कथा भारतीय राष्ट्रीय परम्परा की परम भव्य और मंगलमय गाथा है।

युगदृष्टा कवि तुलसी ने बड़ी निर्भीकता से तत्कालीन शासकों की दुर्नीति, स्वेच्छाचारी प्रवृत्ति, निरंकुश शासन एवं तज्जनित जनता की संत्रस्त दशा तथा आ आर्थिकहीनता का वर्णन कर आर्थिक वैषम्य की आड़ में पनप रहे सामाजिक विद्रोह की ओर संकेत कियाः-
‘ऊँचे नीचे करम धरम अधरम करि,
पेट ही को पचत बेचत बेटा बेटकी
तुलसी बुझाइ एक राम घनष्याम ही ते,
आगि बड़वागि ते बड़ी है आग पेट की॥'

तुलसी की उपरोक्त पंक्ति उस कटु सामाजिक सत्य को उद्घाटित करती है जिसकी भीषणता में आज सारा विष्व भुन रहा है। उनकी मंगलमयी दृष्टि का मूल था- भेदभाव से शून्य साम्यवादी समाज की स्थापना। भीषणता और सरसता, कोमलता और कठोरता, कटुता और मधुरता, प्रचण्डता और मृदुता का सामजस्य ही लोकधर्म का सौन्दर्य है। सौन्दर्य का यह उद्घाटन असौन्दर्य का आवरण हटाकर होता है।

तुलसी ने अपनी इसी लोकमांगलिक दृष्टि द्वारा जनमानस की नैसर्गिक जीवन की अभिव्यक्ति को लोक कल्याणार्थ सहज व आदर्श रूप में प्रस्तुत किया। जनता के गिरते नैतिक स्तर को उठाने के लिए उन्होनें श्री राम के दिव्य चरित्र व शील स्थापना के प्रति अपनी प्रतिबद्धता ज्ञापित की। समाज की आवश्य कतानुसार लोकाराधन के व्रती उपास्य के उपासक तुलसी ने ऐसी संतुलित लोकदृष्टि अपनायी, जिसने समाज में व्याप्त बुध और अबुध दोनों का सामीप्य प्राप्त कर लोकाराधन रूप की प्रतिष्ठा की। सत्य, धर्म, न्याय, मर्यादा, सुनीति, विवेक और आचरण जैसे मूल्यों की प्रतिस्थापना के प्रति तुलसी सदैव सचेत रहे। अपनी विषाल समन्वयकारी बुद्धि का सदुपयोग कर लोकदर्शी तुलसी ने मानस में समन्वय का जो आदर्श प्रस्तुत किया, वह अविस्मरणीय है। सगुण साकार राम में गुण और रूप का, शक्ति, शील और सौन्दर्य का अनुपम समन्वय उनकी लोक कल्याणकारी भावना का ही प्रमाण है। मध्यम मार्ग को अपनाते हुए तुलसी ने वर्णाश्रम धर्म की प्रतिष्ठा को आवश्यक मान ‘केवट प्रसंग' द्वारा भक्ति के क्षेत्र में ब्राह्यण और शूद्र को समान स्थान दिया। भक्ति की रक्षा हेतु उन्होने ‘सरजू नाम सुमंगल मूला, लोकवेद मत मंजुल कूला' वाली सरिता द्वारा आत्मपक्ष और लोकपक्ष में एकात्मकता स्थापित कर समाज के उन्नयन का प्रयास किया। सगुण-निर्गुण, विद्या-अविद्या, माया-प्रकृति, शैव-वैष्णव, प्रवृति-निवृति, भोग और त्याग का समन्वित रूप राम के चरित्र में दिखाकर धर्म के अति सहज मार्ग की नींव रखी।

प्रतिभा शाली कवि तुलसी ने भारतीय संस्कृति एवं युग जीवन का विशद् प्रतिबिम्ब और सर्वोदय रामराज्य की स्थापना का महान संदेश अवधपति राम के माध्यम से प्रस्तुत किया। ‘नहि दरिद्र कोउ दुःखी न दीना' के माध्यम से तुलसी ने रामराज्य का लोक कल्याणकारी रूप वर्णित करके उसे युग-युग के लिए एक प्रेरणास्पद आदर्श बना दिया। ‘जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी, ते नर अवसि नरक अधिकारी' के प्रति वह सदैव सचेत रहे। इस प्रकार सरल स्वभाव वाले सात्विक गुणों के पूंजीभूत रूप श्री राम सृष्टि रूप में शुभ का प्रतीक बन गए।
‘जे चेतन कर जड़ करे, जड़हि करै चैतन्य।'

कृपालु श्री हरि विष्णु के रामावतार के पीछे उनका एकमात्र उद्देश्य जनमानस में भव्य भावों और विचारों की प्रतिष्ठा द्वारा आदर्श समाज की स्थापना था। ब्रह्नानन्द सहोदय श्री राम के प्रत्येक कार्य लोकमंगल की भावना से अनुप्राणित हैं। वह उदात्त ज्ञानात्मक मूल्यों और आचरणगत व्यवहारिक क्रियाकलापों का मणिकांचन योग है। ‘जगमंगल गुनग्राम राम के' कहकर तुलसी ने सम्पूर्ण प्राणी मात्र चर, अचर, सज्जन, दुर्जन के कल्याण की कामना की है।

‘मुखिया मुख सो चाहिए, खान पान कहुँ एक' कहकर उन्होने राजा के आदर्श तथा प्रजातन्त्रीय व्यवस्था के मूल तत्व को प्रस्तुत किया। लोकरंजन और लोकमंगल के सिद्धान्त पर आधारित उनके रामराज्य में दण्डनीति और भेदनीति का पूर्णतः अभाव था। उनका रामराज्य, सामुदायिक कल्याण का आदर्श रूप है। मन, वचन, कर्म से पवित्र भारतीय संस्कृति के साक्षात्‌ स्वरूप श्रीराम ने समस्त भारतवर्ष को इस प्रकार सुश्रृखंलित कर दिया कि आज तक उनके आदर्श रामराज्य की गाथा गायी जाती है। जीवन रूपी संग्राम में सत्‌वृतियों के प्रतीक तुलसी के आराध्य जिस धर्म रथ पर आसीन है उसकी विजय निश्चित है-
‘सौरज धीरज तेहि रथ यात्रा, सत्य शील दृढ़ध्वजा पताका'।

तुलसी साहित्य में शिष्ट संस्कृति व लोक संस्कृति दोनों का श्रेष्ठ सम्मिलन है, जहाँ एक ओर उन्होने शिष्ट संस्कृति द्वारा आदर्श जीवन मूल्यों की स्थापना की, वही लोक संस्कृति द्वारा जीवन को गहराई से समझने का आधार दिया। विराट् भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हुए तुलसी ने मानवीय एकता, समता, विश्व-बन्धुत्व, आपसी भाईचारे की स्थापना कर अभिजात्य पात्रों को प्रकृत रूप में प्रस्तुत किया। मानव जीवन की गहन आस्थाओं व अनुभूतियों के प्रतीक रीतिरिवाजों व पावन संस्कारों के अतिरिक्त तुलसी साहित्य में समाविष्ट विविध देवी-देवताओं की मंगल पूजा, व्रत, उपासना, ज्ञान, कर्म, भाग्य, ज्योतिष आदि विषयों की गूढ चर्चा हमें अपनी भारतीय संस्कृति का बोध कराकर स्थिति शील व विकासशील बनाती है। ‘घाट मनोहर चारि' के माध्यम से उन्होने श्रेष्ठ संवाद रूपी चार घाटों का निर्माण करके राजाराम की अलौकिक कथा को अनुपम कलेवर में बाँधकर पावन गंगा के समान पूज्यनीय बना दिया। उन्होनें सारी समस्याओं का निदान भक्ति में माना है, जिसके सान्निध्य में सब कुछ सत्य शिव और सुन्दर हो जाता है।

नारी की शुचिता व पवित्रता की रक्षा करना उनकी मर्यादावाद का एक अभिन्न अंग है। सम्पूर्ण तुलसी साहित्य में प्रेम भाव के वर्णन में चाहे कितनी रसमयता, गहनता व श्रृंगारिकता क्यों न हो, नारी की गरिमा व रिश्तों की मर्यादा के प्रति पूर्ण सचेतता बरती गयी है।
तुलसी ने दरिद्रता, दुःख, पीड़ा, कष्ट से टूटते समाज की मंगलाशा व भक्ति को आधार बनाकर जीने का शुभ संकल्प दिया। तेजी से बदलते कालचक्र के परिणामस्वरूप अतिआधुनिकता के कारण जहां आज मानव का अस्तित्व ही संकट में पड़ गया है वही ऐसी स्थिति में तुलसी साहित्य जीवन रक्षक संजीवनी के समान निर्जीव प्राणियों में चेतना का संचार कर रहा है। उनके साहित्य में काव्य कौशल और लोकमंगल की चरम परिणति है जो मुक्तामणि के समान सुन्दर और मूल्यवान है। गोस्वामी जी के ईष्वरावतार राम हमारे बीच ईष्वरता दिखाने नही आए थे, मनुष्यता दिखाने आए थे, वह मनुष्यता जिसकी हमारे समाज को आवश्कता थी, है और हमेशा रहेगी।
निष्कर्षतः तुलसी ने लोक में व्याप्त अन्याय, अत्याचार, अनाचार, पाखण्ड की धज्जियाँ उड़ाकर जिस सियाराम के लोकपावन अमृतमयी यश का गान किया, वह मार्तण्ड के समान भटके हुए राहगीरों को राह दिखाने वाला है। भारतीय संस्कृति के संरक्षण तथा सामाजिक मर्यादा का आदर्श स्थापित करने में तुलसीदास का योगदान अप्रतिम है। राम काव्य के एक छत्र सम्राट गोस्वामी जी के काव्य में जो मार्मिकता, भाव प्रवणता, विशदता व्यवस्थापकता, गुरूत्व- गाम्भीर्यता व उदारता है वह अन्यत्र दुर्लभ है।
वाक्य-ज्ञान अत्यन्त निपुन भव पार न पावै कोई।
निसि गृह मध्य दीप की बातन तम निवृत्त नहिं होई॥

मेरी स्मृति के कमलेश्वर

वीरेन्द्र जैन
मैंने कमलेश्वर को कहानीकार की तरह जानने से पहले एक सम्पादक के रूप में जाना।सारिका में उनके सम्पादकीय पढने से पहले मैं उन्हें मोहन राकेश,राजेन्द्रयादव कमलेश्वर नामक त्रिशूल के एक सदस्य के रूप में ही जानता था।और जब मैंने उन्हें जाना तब तक उनका कहानीकार तो पीछे छूट चुका था और रह गया था एक सामाजिक कार्यकर्ता, एक फिल्मकथा-पटकथा लेखक,एक सम्पादक,एक लेखकसंगठन का नेतृत्वकारी साथी दूरदर्शन का महानिदेशक विभिन्न अवसरों पर आंखेंदेखा हाल सुनाने वाला उद्घोषक, डाकूमेंटरी फिल्म निर्माता,स्तंभलेखक, धर्मनिरपेक्षता का सिपहसालार आदि। सच तो यह है कि कमलेश्वर के ये रूप मुझे उनके कहानीकार से भी अधिक आर्कषक लगते थे।एक अकेले आदमी में इतने आयाम देख कर मुझे हैरत होती थी।बामपंथी विचारधारा और साहित्य में कुछ करने का सपना मुझे विरासत में मिला था, इसलिये तार्किक ढंग से अपनी बात कहने वाले बामपंथी विचारक व साहित्यकार मुझे स्वाभाविक रूप से अच्छे लगते थे।

विसंगति यह हुयी कि साहित्य में मुझे जिन लोगों ने प्रारम्भ में स्थान दिया वे बामविरोधी संस्थान थे व इतने चर्चित और उच्चस्तरीय थे कि उनमें स्थान पा लेने पर अच्छा लगना सहज स्वाभाविक था।यह उन्नीस सौ इकहत्तर का वर्ष था जब मुझे किसी बड़ी मानी जाने वाली पत्रिका में पहली बार स्थान मिला था और तब से ही मैं हिन्दी की सभी लोकप्रिय पत्रिकाओं का पाठक हो गया था जिनमें सारिका भी एक थी।किसी व्यावसायिक संस्थान की पत्रिका में आम आदमी की पक्षधरता के तेवर मुझे खूब भाने लगे। मुझे लगता था कि काश मैं भी इस पत्रिका में प्रकाशित होने लायक कुछ लिख सकूं। पर निरन्तर प्रकाशित होते रहने की वासना के वषीभूत मैं गैरबामपंथी पत्रिकाओं मैं प्रकाशित रचनाओं में से ही अपने मानदण्ड खोजता रहा।दूसरी ओर प्रयास के बाद भी मुझे प्रगतिशील जनवादी पत्रिकाओं में वांछित स्थान नहीं मिल सका।भारत भूषण केशशब्द उधार लेकर कहूं तो -बांह में है और कोई चाह में है और कोई- वाला मामला था।फिर इसी बीच गुजरात का छात्र आन्दोलन,जयप्रकाशजी का सम्पूर्णक्रान्ति का नारा,रेल हड़ताल आदि जैसी घटनाएं घटीं तथा श्रीमती इन्दिरा गांधी के खिलाफ हाईकोर्ट के फैसले के बाद तो इमरजैंसी ही लगा दी गयी।इमरजैंसी के साथ सैंसरशिप लागू होते ही धर्मयुग का एक अंक तो रद्द ही कर दिया गया और सारिका की अनेक कहानियों पर कालिख पोत दी गयी। सारिका सम्पादक कमलेश्वर ने अंक को स्थगित करना पसंद नहीं किया था। वे चाहते तो कालिख पोतने की जगह उन अंशों को हटा भी सकते थे, पर उन्होंने कालिख पोत कर एक सन्देश देना अधिक उचित समझा। कमलेश्वर जी का यह ढंग मुझे बहुत भाया।इसी दौरान उनके समांतर कथा आंदोलन से सामने आयी कहानियों व दुष्यंत कुमार की गजलों को सारिका में छाप कर उन्होंने मुझे ही नहीं अपितु देष के असंख्य पाठकों को अपना मुरीद बना लिया था।
इमरजैंसी हटने के बाद लोक सभा के चुनाव हुये व श्रीमती इन्दिरागांधी को हार का सामना करना पड़ा। जो नई सरकार सत्ता में आयी उसमें संघ से जनित जनसंघ भी अपने को विलीन करने का दिखावा करते हुये घुस गयी थी।यद्यपि बुद्धिजीवी और राजनीतिक विश्लेशक यह मान रहे थे कि कि संघ कभी भी जनसंघ को अपना अस्तित्व समाप्त नहीं करने देगा तथा यह संघ की एक चाल मात्र है।केन्द्रीय सरकार में अमेरिका परस्त संघ के होने से सारे बामपंथी, व मजदूर आन्दोलन से जुड़े लोग सषंकित थे क्योंकि अमेरिका ने शीतयुद्ध के दौर में सदैव ही भारत के साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार किया था।सभी देशभक्त चाहते थे कि संघ की इस चाल को जनता के सामने उजागर किया जाये।हिन्दीभाषी क्षेत्र में इस काम को करने का बीड़ा जिन लोगों ने उठाया उनमें हरिषंकर परसाई, कमलेश्वर, डा. राही मासूम रजा समेत बामपंथी विचारों से जुड़े अनेक पत्रकार थे।सारिका के माध्यम से कमलेश्वर जी अपनी सम्पादकीय टिप्पणियों में सरकार और सरकार में शामिल दलों की भरपूर खबर ले रहे थे।वे बड़े अखबारों के उन सम्पादकों को भी नहीं छोड़ रहे थे जिन्होंने इमरजैंसी में तत्कालीन सरकार की पक्षधरता की और इस समय भी नई सरकार को नई आजादी का जनक बतला रहे थे। ऐसे सम्पादकों के खिलाफ वे जो कायर थे वे कायर ही रहैंगे' शीर्षक से लिख रहे थे तथा सम्पादकीय न लिखने वाले सम्पादकों को अवसरवादी सिद्ध कर रहे थे।जनतापार्टी सरकार ने कई जांच कमीशन बैठाये थे और इन्हें दूसरी आजादी का जांच कमीशन' बताया जा रहा था।कमलेश्वर जी ने उसी समय तीसरी आजादी का जांच कमीशन' नाम से लिखना प्रारम्भ किया जिसका सार यह था कि इस सरकार के बाद जो सरकार आयेगी वह इनके खिलाफ तीसरी आजादी का जांच कमीशन बैठायेगी क्योंकि ये भी लगभग सब कुछ वही कर रहे हैं जो पिछली सरकार ने किया था,दूसरे इनके साथ एक जानामाना साम्प्रदायिक संगठन धोखा भी कर रहा है।उनका सन्देश यह था कि लोकतंत्र में सरकारें तो बदलती ही रहती हैं पर ऐसे प्रत्येक परिवर्तन को आजादी की लड़ाई बतलाना हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का अपमान है।

Wednesday, August 13, 2008

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी- जन्म शताब्दी पर स्मरण

साहित्य के स्वाद से साहित्य के मर्म तक
वीरेन्द्र जैन
मैं अपने छात्र जीवन में विज्ञान और अर्थशास्त्र का विद्यार्थी रहा। बैंक में नौकरी की तथ चर्चित लोकप्रिय साहित्य का पाठक रहा इसलिए साहित्य को उसके आलाचकों और आलोचना सिद्धांतों के आधार पर ग्रहण न करके उसे संवेदनात्मक ज्ञान की तरह ही ग्रहण किया। राजनीतिक सोच में वामपंथ विचारधारा से प्रभावित होने के कारण जो साहित्य अच्छा लगता था वह आम तौर पर लघु पत्रिकाओं में ही मिलता था जो साहित्य के साथ साथ आलोचना व साहित्य की बहसों को भी समुचित स्थान देती थीं। समय मिलने पर मैं इन आलोचनाओं और बहसों पर भी निगाह डाल लेता था तथा जो मेरे स्तर की भाषा और प्रतीकों के माध्यम से कही गयी होती थीं वे समझ में भी आने लगीं। कुछ दिनों बाद पसंद आने वाली रचनाओं पर समीक्षाएं पढ कर अपने आप को जॉचने का प्रयास करने लगा कि सन्दर्भित रचना को अकादामिक जगत कैसे देखता है व मेरी पसंदगी में कहॉं खामी खूबी रही। खॅांटी आलोचकों द्वारा चर्चित रचना में कई बार एक नई दृष्टि व नये कोण देखने को मिलते थे जो नव अनुभव स्फुरण की पुलक से भर देते थे।

साहित्य आलोचना के प्रति गैरव्यावसायिक स्वाभाविक रूझान के इस काल में मैं जिन आलाचकों से प्रभावित हुआ उनके बारे में जानने पर पता चला कि कोई उनके भी गुरू हैं जिनका नाम हजारी प्रसाद द्विवेदी है। ...होगा। बात आयी गयी हो गयी। मैं रंगजी की उन पंक्तियों का कायल रहा हूं-
हम तो अपने सनम के शैदा हैं, होंगे सुकरात क्या करे कोई।

१९७९-८० के दौरान मेरी पोस्टिंग गाजियाबाद में थी। एकदिन प्रातःकाल आकाशवाणी पर समाचार सुना कि हिन्दी के वरिष्ठ आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी नहीं रहे। उनका अंतिम संस्कार दिल्ली के निगमबोध घाट पर प्रातः दस बजे होगा। संयोगवंश उस दिन रविवार भी था। समाचार सुनकर मैं सीधा दिल्ली की बस में बैठ गया। आकाशवाणी से उनकी शव यात्रा के प्रारंभ होने के स्थल के बारे में कुछ नहीं बताया गया था इसलिए मैं एक पुष्पहार खरीद कर सीधा निगमबोध घाट पर ही पहुंच गया। मुझे वहॉं अकेले एक डेढ घन्टे तक प्रतीक्षा करनी पड़ी।

शवयात्रा वहॉं पहुंचने के बाद मैंने पहली बार हजारी प्रसाद द्विवेदी के दर्शन किये जिसे कहना चाहिये कि उनकी निर्जीव देह के प्रथम दर्शन किये जो उनके अंतिम दर्शन थे। भरीपूरी बलिष्ठ देह के साथ विषाल ललाट देख कर मैं दंग था। उस दिन मुझे लगा कि किसी की मृत देह भी प्रभाव डाल सकती है। उस दिन मुझे ये भी लगा कि ये निस्सन्देह मेरे प्रिय आलोचकों के गुरू होने का अधिकार रखते होंगें। र्दुसंयोग यह रहा के उनके अंतिम दर्शन के दिन मुझे उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में और अधिक जानने की जिज्ञासा हुयी। पर ना तो मैं साहित्य के शिक्षा जगत का सदस्य था और ना ही किसी शोध की दुनिया का शिल्पकार, इसलिए पूरी तैयारी के साथ कुछ जानने की जगह जब जो उपलब्ध होता गया तब तब वह पढता गया, जो स्मृति में अमिट छाप छोड़ता गया।

हिन्दी आलोचकों की दुनिया के गुरू हजारी प्रसाद द्विवेदी के सच्चे गुरू, गुरूदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर थे जिन्होंने उन्हें शांतिनिकेतन में स्थान दिया। वे पहले अध्यापक थे जिन्होंने शांतिनिकेतन में हिंदी विभाग का निर्माण किया। गुरूदेव के बाद द्विवेदीजी को आचार्य क्षितिमोहनसेन का सान्निध्य मिला जिन्हें आज हम नोबुल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमृत्यसेन के दादा के रूप में ज्यादा जानने लगे हैं। बंगला नवजागरण व उससे उत्पन्न नई व्यवस्था, नये सोच और उससे जनित नये मूल्यों से उनका प्रथम परिचय वहीं हुआ। यह जानना रोचक हो सकता है कि इससे पूर्व उनकी शिक्षादीक्षा संस्कृत पाठशालाओं में हुयी थी व वे ज्योतिषशास्त्र के प्रकांड पंडित होने की ओर अग्रसर थे। वे १९३० में शांतिनिकेतन पहुंचे थे व गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगौर को अपने संवाद से इतना प्रभावित किया कि उन्होंने उनसे कहा कि अब आपको कहीं जाने की जरूरत नहीं है। वे वहॉं दस वर्ष रहे। इन दस वर्षों में उन्होंने जितना पढाया उससे कहीं अधिक सीखा। बनारस के पंडितजी का शांतिनिकेतन में कायाकल्प हो गया था। आमतौर पर लोग पंडितजी हो जाने के बाद जड़ हो जाते हैं और कुछ भी नया सीखने में रूचि नहीं रखते पर द्विवेदीजी ने अपने पूर्व ज्ञान को आधार बनाकर उसे नये के साथ जोड़ा, उसे आगे बढाया व जो छोड़े जाने लायक था उसे छोड़ा।

बनारस लौटने के बाद उन्होंने अपने ज्ञान को बीज की तरह इस्तेमाल किया और ऐसी फसल तैयार की जिसने उनकी परम्परा में विकास करते हुये उसे पूरे देश में बोया। उनके शिष्यों में डा. नामवरसिंह, रमेशकुंतल मेघ, विश्वनाथ त्रिपाठी, काशीनाथसिंह ही नहीं डा. रामदरश मिश्र, मैथलीप्रसाद भारद्वाज और डा. रवीन्द्र भ्रमर भी थे। कालजयी उपन्यासकार डा. शिवप्रसादसिंह भी उनके शिष्य थे तो प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचे चन्द्रशेखर भी उनके शिष्यों में थे।
हिन्दी आलोचना के प्रथम सोपान माने जाने वाले डा. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा कबीर की उपेक्षा की जो भूल की गयी थी उसे उन्होंने न केवल सुधारा अपितु हिन्दी आलोचना को एक नई दृष्टि व दिशा दी जिस पर बाद में पूरा कारवॉं आगे बढा। डा. नामवरसिंह अपने अंदाज में कहते हैं कि शिष्टता पर स्पष्टता को तरजीह देना अक्षम्य नहीं माना जाना चाहिये। वे इतिहास दृष्टि के आकाश पर एक समाजविद् की तरह प्रकट होते हैं। उन्होंने उस दौर में लेखन प्रारम्भ किया जब देष के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन के आधुनिकीकरण के लिए संघर्ष चल रहा था व प्रगतिशीलता के पक्षधर पुरातनपंथियों से टकरा रहे थे। उनमें अनंत जिज्ञासा थी और मनुष्य के प्रति वे वैज्ञानिक दृष्टि से सोचते थे। उनका प्रसिद्ध लेख मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है'' उनकी सोच को स्पष्ट करता है। वे कहते हैं मैं साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हॅूं- जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता, परमुखापेक्षता से न बचा सके, जो उसकी आत्मा को तेजोद्दीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदुःखकातर और संवेदनषील न बना सके उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता है।

उनके अनुसार साहित्य का प्रयोजन है- लोक कल्याण, और लिखने का लक्ष्य है - सामाजिक मनुष्य का मंगलविधान। उनका मनुष्य कुलीनों के मानव और मानवतावाद से भिन्न है। अपने एक ओर प्रसिद्ध लेख अशोक के फूल में वे लिखते हैं - जब हम देखते हैं कि ग्रन्थ पढने के कारण हमारे घरों के निकट जो चमार, धीवर, कोरी, कुम्हार आदि लोग रहते हैं, उनका पूरा परिचय पाने के लिए हमारे हृदय में जरा सी भी उत्सुकता उत्पन्न नहीं होती, तब अच्छी तरह से समझ में आ जाता है कि पुस्तकों के सम्बंध में कितना अंधविश्वास हो गया है। पुस्तकों को हम बड़ा समझते हैं और पुस्तकें जिनकी छाया हैं, उनको हम कितना तुच्छ समझते हैं।

उनके कृतित्व का जो भरापूरा भंडार है उसे पूरा जीवन लगाकर खंगालने वाले हिन्दी के विद्वान भी जीवन के कम होने की शिकायत करते मिलेंगे पर यदि मुझसे अपने सूक्ष्मतम अध्यन के बाद एक वाक्य में अपनी समझ को स्पष्ट करने को कहा जाये तो मैं कहना चाहॅूंगा कि उन्होंने साहित्य को रसास्वादन अर्थात साहित्य के स्वाद से निकाल कर साहित्य के मर्म तक पहुंचाया।

Sunday, August 10, 2008

सरकार काम कर रही है

ई. भारत रत्न गौड़
सीमा पार प्रशिक्षण
चोकियों पर गोलीबारी
देश में आतंकवाद
जगह-जगह बम धमाके
निर्दोषों की मौत
संगठन ले रहे
जिम्मेदारी
पडौसी देश
अच्छे सम्बन्ध
वार्त्ता जारी
सरकार काम कर रही है .............
उठती गिरती
विकलांग सरकार
संसद की गरिमा
सांसदों की बोलियां
आतंकवादी , कातिलों की
मंत्री पद की दरकार
भई वाह ! सरकार
सरकार काम कर रही है .............
जाने माने अर्थशास्त्री
दूसरों से ले उधार
आटा,दाल,चावल
गरीबों का आहार
बढ़ती मंहगाई
गरीबों का संहार
सरकार काम कर रही है .............
सरकारी जमीन
खानों का आवंटन
मंत्रियों-संतरियों का कब्जा
जमा बन्दियों में हेरा-फेरी
सरकार काम कर रही है .............
सरेराह लूटपाट
दिनदहाड़े मारकाट
बेकसूर अन्दर
कसूरवार बाहर
सरकार काम कर रही है .............
नित नए तकनीकि विद्यालय
बढ़ती बेरोजगारी
बेरोजगारी भत्ता
सरकार काम कर रही है .............
बढ़ता आरक्षण
वोट संरक्षण
बुद्धिजीवियों का पलायन
कैसे हो देश का विकास
सरकार काम कर रही है .............
नदी नाले तट
बसते गरीब
बाढ़ पीढ़ित
पुनर्वास योजनाएं
फिर खरीद-फरोक्त
अमीर बनते गरीब
नदी नाले तट
फिर बसते गरीब
चल रहा व्यवसाय
सरकार काम कर रही है .............
कच्ची बस्ती
नल,बिजली,रोड़
अच्छी बस्ती
नियमों की होड़
वोटों की है दौड़
सरकार काम कर रही है .............
खून की बूंद-बूंद
से मिली आजादी
फिर गुलामी
पाने के लिए
सरकार काम कर रही है .............

Friday, August 8, 2008

आरक्षण

ई. भारत रत्न गौड़

जब से देश में आया ये आरक्षण
इस देश का भक्षक बन गया ये आरक्षण
पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण
दिख रहे हैं देश विभाजन के लक्षण
पहले थे सिर्फ हिन्दु,मुस्लिम,सिक्ख और ईसाई
कहते थे हम सब जिनको भाई भाई
आरक्षण से अब ये कहावतें बदल गईं
चार नही चालीस जातियां बन गईं
सीमाएं जातियों से विभाजित हो गईं
नेताओं की भी सीटें आरक्षित हो गईं
जातियों के दम पें जीत सुनिश्चित हो गई
नेता फेंक रहे हैं ये कैसी कैसी गोटियां
आरक्षितों के मुंह में दे रहे हैं बोटियां
आबाद कर दी इनकी पीढ़ियों की पीढ़ियां
बुद्धिजीवियों पर लगा रहे हैं कसोटियां
और फाड़ रहे हैं इनकी लंगोटियां
दुनियां में जाना जाने वाला सोने की चिड़िया
बरबाद कर दी इसकी पीढ़ियों की पीढ़ियां
पहलें सुना था सिर्फ रेल और बस में आरक्षण
आलकल पैदा होते ही सुनिश्चित है आरक्षण
इंजनीयरिंग और डॉक्टरी में आरक्षण
राजनीति और उच्च शिक्षा में आरक्षण
नौकरी और पदोन्नति में भी आरक्षण
यहां वहां सब जगह मिलता है आरक्षण
नहीं है तो केवल जीने मरने में आरक्षण
नेताओं को नहीं दिया गया ऐसा प्रशिक्षण
नहीं तो ये दे दें जीने मरने में भी आरक्षण

Friday, August 1, 2008

आख़िर नहीं माना

रचना गौड़ भारती
मेरी आंखों के कुछ मोती
बिख़र गए हैं थोड़ा रूको
मैं इन्हें समेट लूं
तुम दर्पण हो तो मेरे भी
मन का अक्स ये शरीर है
आंखों की क़ोरें अभी गीली हैं
और पलके बोझल बोझल
धुंधली आंखों की कांपती ज्योति
तुम कुछ साफ़ नजर नहीं आते
ठहरो जरा इन आंखों को पोंछने दो
गम के बादल छंट जाएगें
मैं फिर से ताजा गुलाब हो जाऊंगीं
दो चार पल जो ठहरे से लगते हैं
इन पलों को आगे ख़िसकने दो
तुमसे फिर मुलाकात होगी
फिर दो बात होगी
पहले पिछला हिसाब तो होने दो
मेरे सभी ग़मों को सुनकर
कोई चाहे बेअसर हो
यह दर्पण ही अपना सा लगा
इसे ही थोड़ा चटकने दो
सह नहीं पाया मेरा ग़म
आख़िर चटक ही गया
कितना कहा मुझे अकेले रहने दो
आख़िर नहीं माना चटक ही गया ।