Thursday, March 19, 2009

पूर्वाभास

महेंद्रभटनागर

बहुत पीछे
छोड़ आये हैं
प्रेम-संबंधों
शत्रुताओं के
अधजले शव!
.
खामोश है
बरसों, बरसों से
तड़पता / चीखता
दम तोड़ता रव!
इस समय तक -
सूख कर अवशेष
खो चुके होंगे
हवा में!
बह चुके होंगे
अनगिनत
बारिशों में!
.
जब से छोड़ आया
लौटा नहीं;
फिर, आज यह क्यों
प्रेत छाया
सामने मेरे?
.
शायद,
हश्र अब होना
यही है —
मेरे समूचे
अस्तित्व का!
.
हर ज्वालामुखी को
एक दिन
सुप्त होना है!
सदा को
लुप्त होना है!

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