Tuesday, March 3, 2009

आदमी की औकात

विमला भंडारी

अपनों के घरौंदे
और रेत के महल
दोनों में साम्य देखो
ढ़हना और फिर बनना
आदमी की औकात देखो

गुजरता है आदमी
आपदाओं के बीच
धूमिल होता है
निस्तेज होता है
फिर उठता है
उठने और गिरने
बनने और बिगड़ने का
भूकम्पी दौर से गुजरने का
यह अभ्यास देखो
क्षुद्रताओ के बीच
÷मोती' चुगने का
अनोखा प्रयास देखो
तकदीर और तदबीर से
जूंझते देखो
हर लम्हें पर चस्पा,
बाजुओं पर जमी फौलाद देखो
आदमी की औकात देखो

2 comments:

Mired Mirage said...

बस यही गिरना उठना ही तो मनुष्य की कहानी है।
घुघूती बासूती

आशीष कुमार 'अंशु' said...

फिरोज साहब अच्छा लगा, इस कविता से गुजरना