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आदमी की औकात

विमला भंडारी

अपनों के घरौंदे
और रेत के महल
दोनों में साम्य देखो
ढ़हना और फिर बनना
आदमी की औकात देखो

गुजरता है आदमी
आपदाओं के बीच
धूमिल होता है
निस्तेज होता है
फिर उठता है
उठने और गिरने
बनने और बिगड़ने का
भूकम्पी दौर से गुजरने का
यह अभ्यास देखो
क्षुद्रताओ के बीच
÷मोती' चुगने का
अनोखा प्रयास देखो
तकदीर और तदबीर से
जूंझते देखो
हर लम्हें पर चस्पा,
बाजुओं पर जमी फौलाद देखो
आदमी की औकात देखो

Comments

ghughutibasuti said…
बस यही गिरना उठना ही तो मनुष्य की कहानी है।
घुघूती बासूती
फिरोज साहब अच्छा लगा, इस कविता से गुजरना