Tuesday, March 24, 2009

अपेक्षा

 महेंद्रभटनागर 

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कोई तो हमें चाहे
गाहे-ब-गाहे!
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निपट सूनी
अकेली ज़िन्दगी में,
गहरे कूप में बरबस
ढकेली ज़िन्दगी में,
निष्ठुर घात-वार-प्रहार
झेली ज़िन्दगी में,
कोई तो हमें चाहे,
सराहे!
किसी की तो मिले
शुभकामना
सद्भावना!
अभिशाप झुलसे लोक में
सर्वत्र छाये शोक में
हमदर्द हो
कोई
कभी तो!
.
तीव्र विद्युन्मय
दमित वातावरण में
बेतहाशा गूँजती जब
मर्मवेधी
चीख-आह-कराह,
अतिदाह में जलती
विध्वंसित ज़िन्दगी
आबद्व कारागाह!
.
ऐसे तबाही के क्षणों में
चाह जगती है कि
कोई तो हमें चाहे
भले,
गाहे-ब-गाहे!

1 comment:

Science Bloggers Association said...

महेन्‍द्र भटनागर जी की कविता में तत्‍सम प्रधान शब्‍दावली आम पाठक के लिए दिक्‍कततलब है।