Friday, March 6, 2009

दरकते पल

विमला भंडारी

धुंधला रही है अब याद तुम्हारी
राख के नीचे दब गई चिंगारी
पेड़ों के पत्ते हुए अब पीले
झड़ने लगे है वो फूल
जो कभी थे अधखिले

तुमसे झुठला न पाउंगी इस सच्चाई को
झेलनी होगी तुम्हें मौसम की इस रूसवाई को
तुमसे ही शुरू होकर तुम ही पर खत्म होती थी
उन कहकहों की गूंज अब धूमिल पड़ने लगी है

तकती थी निगाहे सूनी राह को
जिन पथों पर कभी पैर हमने धरा था
चलते है आज भी, खुद-ब-खुद उघड़ आते है
कदमों के निशां, कहो इसमें मेरी क्या खता

गुनगुनाने को बहुत कुछ था बाकी
अभी तो खाली जाम था साकी
रोशन चिराग सब गुल हुए
वज्र से सबके दिल हुए

ऐसे गाफिल जिंदगी से
हम हुए चंद इबादत मे कैद
हम हुए किन्तु इनके बीच
धड़कता है वो प्यार
जो कभी हमारी
रगों में तुमने
रोपा था

तुम बिन न जी पायेंगे
ऐसा भी दौर कभी गुजरा था
पर जी ली तमाम जिंदगी तुम्हारे बिना
अब ये ना पूछो वो जीना कैसा था



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