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राही मासूम रजा की कहानियां: मनुष्य के ख्वाबों की तावीर

राही मासूम रजा की कहानियां: मनुष्य के ख्वाबों की तावीर
(का शेष भाग)

- प्रताप दीक्षित


सपनों की रोटी व्यवस्था के शव विच्छेदन की कहानी हैं । समाज, राजनीति और व्यवस्था के अन्तविरोधों पर व्यंग्य कथा लगती यह कहानी राही की अन्य रचनाओं की भाँति मनुष्यता की तलाश कहानी है। अथवा कहा जाए कि एक प्रकार से मनुष्य के सपनों की अथवा स्वयं की खोज की कहानी है।
कहानी का कथानक छोटा लेकिन इसका फलक बड़ा है। कहानी का मुख्य पात्र एक लेखक है जिसकी एक जेब में पी-एच०डी० की डिग्री और दूसरी में उसके लिखे नए उपन्यास के कुछ पन्ने हैं। वह स्वयं कहीं गुम हो गया है। तलाश उसी को करनी है। लेखक इस खोज के माध्यम से राजनीति, मंहगाई, सरकारी तन्त्र, भ्रष्टाचार, सरकारी नौकरियों की स्थिति और यथार्थ, लोगों की सोच का यथार्थ विश्लेषण करता नजर आता है। अपने को कहीं न पाकर अन्त में वह सोचता है कि शायद वह मर चुका है जिसकी उसे ख़बर नहीं हुई हैं। वह निराश लौट कर पलंग पर अपने को सोए हुए पाता है। उसे इत्मीनान होता है कि यदि वह सो रहा है तो वह सपने भी देख रहा होगा। ग़नीमत है कि उसके सपने तो सुरक्षित हैं।
लेखक इस कहानी में व्यवस्था पर निरन्तर कटाक्ष करता है-अगर मुसलमान अपना घर जलवाने, अपने आपको कत्ल करवाने के लिए दंगा शुरू कर सकते हैं तो, सरकारी नौकरी क्यों नहीं कर सकते।''
ज्ञातव्य है कि मुसलमानों पर इस तरह के आरोप केवल साम्प्रदायिक पार्टियों द्वारा ही नहीं वरन्‌ प्रशासन द्वारा भी लगाए जाते रहे हैं। (संदर्भ-विभूति नारायण राय द्वारा इस विषय पर लिखा गया शोध प्रबंध )
इसी प्रकार जातिवाद पर व्यंग्य है-जातिवाद तो साहब हजारों बरस पुराना है। पुरानी शराब है, छूटती नहीं है मुंह से काफी लगी हुई। लेखक बीसवीं सदी में वैज्ञानिक सोच की जगह धर्म की विडम्बना पर व्यंग्य करता है, नौकरी तो उन्हें मिलेगी तो ब्लैड बोर्ड पर श्री, ऊँ० या बिस्मिल्लाह लिख कर फिजिक्स पढ़ाना शुरू करें।
त्रासदी तो यह है कि आम आदमी ने यह दंद फंद सीखे नहीं हैं। सपने देखने के सिवा। लेकिन अब तो सपनों का बाजार भी मंदा पड़ रहा है। जिंदगी बाजार का उतार चढ़ाव होकर रह गई है। यह विडम्बना ही तो है कि मनुष्य की पहचान के लिए जाति और धर्म ही सबसे बड़े गुण बन गए हैं। उसका सिर्फ़ मनुष्य रहना महत्त्वहीन है। जरूरी है कुछ और होना।
सपने, ख्वाबों की तासीर, आत्मा, चीनी मिठास के लिए आदि राही के प्रिय प्रतीक हैं। अपने अंदर गहरे अर्थ और संदर्भ संजोए हुए ऊपर से साधारण से दिखते शब्द मात्र। चीनी की मिठास आत्मीयता की तलाश है। वह रोटी से ज्+यादा सपनों को मनुष्य के लिए आवश्यक मानते हैं। रोटी के बिना मनुष्य कुछ दिन जिंदा रह सकता है। न मिलने पर वह, अधिक से अधिक मर जाएगा। परन्तु यह मृत्यु मनुष्य की होगी। परन्तु सपनों के बिना मनुष्यता ही मर जाएगी। तभी मनुष्य के लिए सपने ज्यादा जरूरी हैं। सपनों के जिन्दा रहने पर बदलाव की संभावना तो रहेगी।
राही की कहानियों में मानवीय जिजीविषा बरकरार रहती है। कहानी के अंत में कहीं चीनी मीठी हो जाती है, कहीं विषम से विषम स्थिति में वह सपनों में खो जाता है।
कथायात्रा के इस क्रम में लेखक की अगली कहानी जो इसी भावभूमि की है वह है-खुश्की का टुकड़ा। यह कहानी मनुष्य के अकेलेपन, उसकी खो गई हँसी, आत्मा की तनहाई के साथ-साथ पूरी उदास पीढ़ी की कहानी है।
कहानी का कथ्य कुछ यूं है-यह उस अकेले और उदास नायक की कहानी है जिसकी आत्मा की तनहाई उसकी पीढ़ी की तकदीर है। इस अकेलेपन से बचने का एक ही उपाय है-यादों में जो खो जाना। अकेलेपन से उदासी और झुंझलाहट रूप बदल-बदल कर आते हैं। रूप बदलना और चेहरे पर चेहरे लगा लेना तो मनुष्य की नियति हो गई है। वह इतना कृत्रिम हो गया है कि बिना मुखोटों के वास्तविक रूप में तो उसे कोई पहचानता भी नहीं। सबके चेहरे, मुस्कानें, हंसी सब नकली हैं। उस आम आदमी की आत्मा को शायद यह नकलीपन गवारा नहीं। वह अपनी नकली मुस्कान एक कबाड़ी को बेच देता है। फिर एक दिन बेइन्तिहा-सा हंसना शुरू कर देता है। शायद यही उसकी असली हंसी है। एक दिन उसकी पत्नी उसकी वही नकली हंसी कबाड़ी से वापस ले आती है। परन्तु कथानायक को वह नकली, एडेल्ट्रेड, इन्फीरियर हंसी नहीं पसंद है। पत्नी रूठ कर मायके चली जाती है। नायक रूठी पत्नी को मनाने के लिए पत्र लिखने के लिए काग़ज ढूढ़ रहा है तभी उसके हाथ पत्नी के कहकहों का सेट'' लग जाता हैं, जो वह भूल गई है। कहकहों का सेट उसके हाथ से फिसल जाता है और हंसी रोशनी की लकीर की तरह निर्बाध बहती रहती है। वह बचाने के लिए हाथ बढ़ाता है परन्तु हंसी का सेट हाथ नहीं आता परन्तु सड़क उससे टकरा कर टूट जाती है।
लेखक की इस कल्पना ,फैंटेसी में कई आयाम हैं। एक ओर यह आदमी के मौलिक अकेलेपन की गाथा है। परन्तु इसमें नई कहानी आन्दोलन के बाद की कहानियों की तरह अकेलेपन को ग्लोरीफाई नहीं किया गया है। यह परिस्थितियों के कारण उस पीढ़ी की नियति बन गई है। हर पीढ़ी के साथ उसकी उदासी जन्म लेती है। इससे निजात तो यादों में ही मिलेगी। लेखक आज की दुनिया में जिस विडम्बना की ओर इंगित करता है कि उसे उसके वास्वतिक स्वरूप में नहीं पहचाना जाता। लेखक बिटविन दी लाइन्स मानो कहना चाहता है कि जाति,धर्म पद, प्रतिष्ठा आदि उसकी पहचान बन गए हैं। लोग एक दूसरे को चेहरे पर चढ़ाए चेहरों से पहचानते हैं। चेहरे ही नहीं लोगों की हंसी, मुस्कान भी नकली हैं।
इस अकेले और अजनबी व्यक्ति के पास है अपना कहने को तो उसकी यादें और अपना एकांत सुख, अपनी हंसी। अगर वह भी खो जाए तो वह क्या करें। हर एक तो नकली चेहरे और नकली मुस्कान के साथ जिंदा नहीं रह सकता। परन्तु उसकी असली हंसी कहीं न कहीं सुरक्षित तो रहती है। यही लेखक का मंतव्य है। कहानी में रिश्तों की कोमलता बरकरार रखने और उसमें ताजगी के लिए कथानायक की पत्नी का कथन न केवल मौजू है बल्कि दिशा भी देता है-दिल में हाथ डाल कर नया पति तुमसे भी एक दिन पुराना पति निकाल लेती हूँ। शायद पे्रम में ही तासीर है कि जैसे-जैसे पुराना होता है वैसे गहरा होता है। यही कारण है कि हंसी न केवल पति पत्नी के बीच वरन्‌ इस दुनिया में भी रोशनी की लकीर की मानिन्द होती है। इसीलिए उसको तो इस दुनिया में बचाना ही होगा। कहकहों के सेट के लिए चाहे जिस हद तक झुकना पड़े। मनुष्य की हंसी से टकरा कर परिवेश-सड़क-इसमें बाधक ही टूटेगें। मनुष्य की हंसी नहीं। अपने समस्त अकेलेपन, कृत्रिमता, अभावों के बाद भी नायक, उपेक्षित-द्विविधाग्रस्त सही, अपनी मानवीय हंसी के कारण अपराजेय है। कबीर भी कब मरा है। हम न मरिब, मरिहै संसारा
एक जंग हुई थी कर्बला में- प्रकाशन सारिका-जून, १९७० इतिहास का वह कारुणिक प्रसंग जो काल के प्रवाह में पौराणिक आख्यान एवं मनुष्य की श्रद्धा और आस्था का संबल बन चुका है। उसको लेखक ने एक संवेदनशील कथा माध्यम से प्रस्तुत किया है। यह छोटी-सी रचना संसार के तमाम महाकाव्यों की गइराई समेटे हुए है जिनमें शिखर पर आसीन ज्योतिपुंजों के जीवन को इतनी निकट से देखकर रचा गया है।
कहानी का मदीना संसार के कोटि-कोटि जनों की आस्था का केन्द्र जैनब के नाना मुहम्मद का मदीना है। यह मदीना नहीं जैसे बाहें फैलाए खड़ी माँ है। जैनब की आँखें भर आती हैं। पर रोना किस लिए? आँसुओं की नदियों तो सूख चुकी हैं। ऐसी माएँ ही बहादुर संतानो को जन्म देती है। सिर न झुकाने वाले हुसैन, जिनका नाम ही अमृत बन कर रगों में दौड़ने लगा है, वह कभी मर कैसे सकता है? ऐसे ही शहीदों की शहादत मृत्यु से अमृत की ओर गमन करती है। इसमें उस माँ फातिमा की यश गाथा है जिसने बेटे को चक्की पीस-पीस कर पाला है और सिर बुलंद करने का सबक सिखाया है। उस बहन जैनब का त्याग औेर हिम्मत की जिसने अपने पुत्रों का बलिदान कर दिया और चाहती थी यह सब अपनी आँखों से देखें।
इस छोटी-सी रचना में मनुष्यता, उसके संघर्ष, जिजीविषा और अपराजेयता का इतिहास संजोया गया है। रचना का आप्त वचन है-सिर न झुकाना मनुष्य का अधिकार है। मैं केवल इस अधिकार के लिए लड़ना चाहता हूँ।
यह एक ऐसा युग सत्य है जो सदा सदा सृष्टि के अस्तित्व तक मनुष्य को प्रेरणा देता रहेगा। मृत्यु पर विजय का घोषणापत्र बना रहेगा। इसके साथ ही एक करूण त्रासदी भी है कि न्यायपथ पर चलने वाले को अकेला रह जाना पड़ता है। खुद जल कर दूसरों को रोशनी देनी होती है। चाहे वह आसमान में सूरज हो या कर्बला में हुसैन। अन्याय के सामने सिर न झुकाने वाले हुसैन का सिजदे में झुका सिर कटने के बाद भी नीचा नहीं होता। सूरज के मानिंद आसमान पर बुलन्दियों पर दिखाई देता है।
सहज संवेदनशील कहानी न केवल इतिहास पर नए दृष्टिकोण से प्रकाश डालती है वरन्‌ अपराजेयता का संदेश भी देती है।
राही मासूम रजा ने कहा है कि उनकी कहानियों का आधार व्यक्ति होता है। व्यक्ति केन्द्रित कहानियों में लेखक कहानी के पात्र अथवा चरित्र की पहचान उसके परिवेश, जीवन दशाओं और उसके विचारों में आए परिवर्तनों का समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक अध्ययन करके करता है। इस प्रकार की कहानियों में कहानी और रेखाचित्र का अंतर बनाए रखना, रचनाकारों के लिए मुश्किल होता है। कहानी जब पात्र के माध्यम से व्यापक संदभोर्ं से जुड़ती है तब वह कहानी का अस्तित्व लेती है। राही मासूम रजा की खलीक़ अहमद बूआ और एम०एल०ए० साहब ऐसी ही कहानियाँ है।
खलीक़ अहमद बूआ-लीक से हट कर अनोखी -प्रेमकथा कही जा सकती है। लौकिक से इहलौकिक पे्रम तक की पे्रम गाथाओं से विश्व साहित्य भरा हुआ है। परन्तु यह अपने ढंग की अलग कहानी है। समाज के लिखित अलिखित विधानों के अनुसार एक अप्राकृतिक संबंधों की प्रेमकथा। समाज में निषिद्ध होने पर भी ऐसे संबंध कमोबेश हर समाज और युग में रहे हैं। कहानी में मूल प्रश्न नैतिकता का नहीं बल्कि निष्ठा, विश्वास, समर्पण और संबंधों की नैतिकता का है।
कहानी का मुख्य पात्र खलीक़ अहमद एक हिजड़ा है जो एक नवजवान रुस्तम को कहीं से भगा कर लाए हैं। पति-पत्नी संबंधों में खलीक़ एक समर्पित पतिव्रता की तरह संबंध निर्वाह कर रहे हैं। वह पाँचों वक्त की नमाज पढ़ने के साथ ही अपने सुहाग रुस्तम के लिए चौथ का व्रत भी रहते हैं। उनको दो ही भय हैं। एक मौत का, दूसरा रुस्तम की बेवफाई की आशंका। बच्चों द्वारा चिढ़ाए जाने, खलीक़ अहमद बूआ मर गई पर वह बच्चों को कोसते, गाली देते हैं। परन्तु उन्हीं बच्चों का चुप रहना, उनका न चिढ़ाना भी नहीं भाता। रुस्तम के संबंध एक वेश्या से हो जाते हैं। खलीक़ अहमद निराश हो शहर छोड़ने की तैयारी में है। तभी एक दिन वह रुस्तम को पीछे के दरवाजे से वेश्या पुखराज के कोठे पर जाते देखते हैं। वह कोठे पर जाते हैं, रुस्तम की हत्या कर देते हैं। वह पकड़े जाते हैं और उन्हे फाँसी हो जाती है। थोड़े दिन बाद लोग उन्हें भूल जाते हैं।
कहावत है कि प्रेम और जंग में सब कुछ जायज है। ऐसी स्थिति में पे्रम के चरम अथवा नफ़रत में मनोवैज्ञानिकों के अनुसार दोनों के पीछे एक ही भावना होती है। खलीक़ द्वारा रुस्तम को मार दिया जाना अनहोनी नहीं लगता क्योंकि प्रेम विकल्पों के द्वन्द्व में नहीं उलझता।
लेखक ने पात्र का भरपूर मनोवैज्ञानिक अध्ययन किया है। चिढ़ाए जाने पर ख़लीक़ बच्चों को कोसते, बिगड़ते दिखाई देते हैं। परन्तु यह उनका ऊपरी दिखावा है। वीरान सड़क पर किसी की आवाज न सुनाई देने पर वही ख़लीक़ बड़बड़ाते नजर आते हैं,आज कौनों हरामजादे की आवाज नहीं आ रही। मर बिला गए सब। सन्नाटा उन्हें डराता है। क्योंकि वह मौत से जितना नहीं डरते, उतना सन्नाटे, तनहाई से डरते हैं। वास्तव में मौत का डर भी तो उसी तनहाई के कारण ही होता है। सच तो यह है कि बेपनाह मोहब्बत करने वाले खलीक़ के बच्चे अजीज हैं। उन पर उनका गुस्सा एक दिखावा है। रुस्तम की बेवफाई से दुःखी खलीक़ से पूरे शहर को हमदर्दी हैं। खलीक़ ने रुस्तम का पुखराज के कोठे पर जाना सुना है। रुस्तम ने उनके पास आना भी छोड़ दिया है। यह शहर छोड़ने की तैयारी भी कर रहे हैं। परन्तु वह उस वक्त रुस्तम को मारते हैं जब वह स्वयं उसे अपनी आँखों से पुखराज के कोठे पर जाते देखते हैं। पे्रम में शायद ऐसा ही होता है। बात बेपर्दा न होने तक मन के किसी कोने में संदेह बना रहता है। दिल बेवफाई का यक़ीन नहीं करता।
भाषा की खूबसूरती, रवानगी, अप्रतिम प्रयोग यथा सड़क जाग जाती है। धूप मुंह फेर हंसने लगती है। नीम और पीपल के पेड़ मुंह फेर मुस्कराने लगते, मुंडेर पर बैठी वुजू करती मस्जिद आँखें उठा देखने लगती। लेखक परिवेश का मानवीकरण कर देता है। बिंबों को जीवंत कर चित्र उपस्थित कर देता है।
कहानी के अंत में लेखक समय की इस कटु लेकिन अनिवार्य सच्चाई की ओर इंगित करना नहीं भूलता, फिर वह भी खलीक़ अहमद बूआ को भूल गए।
मार्मिक से मार्मिक चरित्र के लिए लोगों द्वारा भूला दिया जाना समय की नियति है। एक लेखक ही है कि पूरे अमृत या विष को पीकर विभिन्न रूपों में इन्हें सृजित करता है।
इसी क्रम की एक और महत्त्वपूर्ण कहानी है-एम०एल०ए० साहब। कहानी राजनीतिक विसंगतियों पर तीखा व्यंग्य है। मतदाताओं को बेवकूफ़ बनाने का सिलसिला चुनावों का अहम्‌ हिस्सा है।
कहानी का मुख्य पात्र एम०एल०ए० साहब कहीं के विधायक नहीं बल्कि मौलाना लतीफ अहमद है, जिन्हें संक्षेप में एम०एल०ए० साहब कहा जाता है। परन्तु इस बात को कोई नहीं जानता। एम०एल०ए० साहब का काम चुनावों में अपने तरीके से प्रचार और तकरीरें करना है। उनके लिए पार्टी महत्त्वपूर्ण नहीं। उम्मीदवार चाहे किसी पार्टी से हो या आजाद, जो उन्हें पैसा/पारिश्रमिक देगा उसके लिए वह हाजिर हैं। भोले मतदाताओं को समझाने और उनके प्रचार करने के तरीके ऐसे अनोखे हैं कि माहिर राजनीतिक भी मात खा जाते हैं। राजनीति का इतिहास ऐसे चरित्रों से भरा हुआ है। यह लेखक की खूबी है कि इस चरित्र के परिपे्रक्ष्य में वह राजनीतिक विसंगतियों को ही नहीं उजागर करता बल्कि ऐसे चरित्र को उसकी विवशता, अभावों और करुणा के साथ प्रस्तुत करता है।
कहानी के अनुसार राजनीतिकों की ओर से आम आदमी का मोहभंग तभी हो गया था, आज एम०एल०ए० होने में क्या बड़ाई है। हर सातवां, आठवां आदमी या तो एम०एल०ए० है या होना चाहता है। इसमें कोई नयापन नहीं रह गया है। लेखक इस राजनीति का कोयले की दलाली मानता है। इसमें मुंह तो ज+रुर काला होता है, लेकिन मुट्ठी गरम रहती है।
विडम्बना तो यह है कि मुंह जो मनुष्य के सम्मान, नैतिकता और मूल्यों का प्रतीक है उसकी क्या सिफत! महत्त्वपूर्ण तो मुट्ठी है। अर्थात्‌ धन के आगे मनुष्य का सम्मान, इंसानियत, मूल्य सब व्यर्थ हैं। इस हम्माम में सभी नंगे हैं। काले लोगों के देश में मुंह की कालिख किसे दिखाई देगी। शायद लेखक का मंतव्य है कि जब लिप्सा और अनैतिकता को सामाजिक स्वीकृति मिल जाती है तब मानवीय मूल्य अपना अस्तित्व खो देते हैं।
जनसंघ और मुस्लिम लीग के प्रति लेखक की नापसंदगी एम०एल०ए०साहब की तकरीर में प्रकट होती है नफ़रत के इन ताजिरों से हमें या आपको क्या लेना देना।लेखक इन दोनों ही को साम्प्रदायिक मानता है। मतदाताओं को बरगलाने के सिलसिले में, पानी की बिजली निकाल लिए जाने'' जैसे विनोदात्मक प्रसंग इस बात का प्रतीक हैं। प्रसंग बदल जाते हैं। अभावों, वायदों से मुकरने के निदान के लिए नए-नए बहाने बनाए जाते हैं। एम०एल०ए० साहब की प्रधानमंत्री से वाकी टाकी पर बात, फ्लोर क्रास करने की बात, चुनाव के टिकट को अस्वीकार करने की गप्प आज के परिदृष्ट में सिफारिस के लिए झूठे फोन, पार्टी बदलने की गीदड़ भभकियां, हाईकमाण्ड पर रोब की कहानियां का पूर्वाभास है। लेखक भारतीय प्रजातंत्र की विडम्बनाओं को कहानी के माध्यम के प्रकट करता हैं। कैसी विडम्बना है जो चुनाव जीतते है धूस खाना शुरू कर देते है और हारने वाले प्रजातंत्र बचाओ आंदोलन चलाने में। जब तक वह खुद न जीत लें और घूस खाने में लग जाएं। भारत में प्रजातंत्र हारने वाले की कोशिशों से ही बचा हुआ है।
राजनीतिक विसंगतियों, भ्रष्टाचार, विद्रूपताओं को कथा प्रसंगों, मुहावरों और भाषा संदर्भों के प्रयोग से उद्घाटित किया गया है-धूल में रस्सी बटना, रंडियों के मुजरे की तरह चुनाव का बीड़ा लेना, एक ही चुनाव क्षेत्र में दो-दो उम्मीदवारों से पैसा ले लेना आदि।
कहानी का मुख्यपात्र एम०एल०ए० साहब आम आदमी की तरह इस भ्रष्ट राजनीतिक परिदृश्य का हिस्सा बनने के लिए अभिशप्त हैं। वह सभी की असलियत जानता है इसीलिए किसी उम्मीदवार को वोट देने लायक नहीं मानता। कहानी में एक जीवन दर्शन है। आदमी जिससे मिलना चाहता है उसी से नहीं मिल पाता और जिससे नहीं मिलना चाहता उससे बार-बार मिलना पड़ता है। अथवा जन्मदिन शायद इसीलिए महत्त्वपूर्ण होता है कि उसके सहारे मरने के लिए दिन गिनने में आसानी होती है।
लेखक कहानी के माध्यम से राजनीति की पुनःव्याख्या कर उसकी पर्त दर पर्त उधाड़ता है, जिसकी देश-काल-वातावरण के अनुसार आज जरूरत है। राजनीति के साथ-साथ उन चरित्रों के रेश-रेशे को उधाड़ती यह कहानी आम आदमी के मोहभंग की कथा है। आजादी के बाद में राजनीतिक का जिस तरह स्वरूप विकृत हुआ उसकी यह पुनःव्याख्या करती है।
राही मासूम रजा की एक लंबी कहानी, उनकी श्रेष्ठ कहानियों में एक, सिकहर पर दही निकाह भया सही है। यह सत्तर के दशक के प्रारंभ में धर्मयुग में धारावाहिक रूप ही प्रकाशित हुई और चर्चित रही है।
राही का साहित्य समाज का आइना है। इनके पात्र समाज के हर वर्ग से उठाए गए हैं। प्रत्येक पात्र अपनी आकांक्षाओं, सपनों, कुण्ठाओं, अभीप्साओं के साथ अपने समय का प्रतिनिधित्व करता दिखाई देता है। यह सामाजिक और मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि यह पात्र अपने-अपने निजी इतिहास से जुड़े रहने को अभिशप्त हैं। भले ही प्रगति अवरुद्ध होती हो, परम्पराओं, सड़ी गली रूढ़ियों से चिपके रहना इनकी नियति है। अतीत से मुक्ति इन्हें असुरक्षा के गहरे अंधेरे में ढ़केल देती है। ऐसे लोगों, स्थितियों और एहसासों की कहानी है-सिकहर पर दही निकाह भया सही।
कहानी की कथावस्तु आजादी के तत्काल बाद की है। एक जमाने में मीर जामिन अली के निराले ठाठबाट थे। जमींदारी बड़ी न होने पर भी सभी सामंती विशेषताएं-संगीतकार, आसामियों की बेदखली, मुश्कें कसवाना, बेगार, गालियां आदि। उन्हें यकीन नहीं था लेकिन जमींदारी चली गई। वह अतीत की परछाईओं के डर से गाँव छोड़ कर शहर में एक छोटा मकान किराए पर लेकर रहने आ गए। साथ थी उनकी पत्नी अमीना, पुत्रियां रुकैय्या और रजिया। पुश्तैनी नौकरानी मत्तों और उसका पुत्र शौकत। उन दिनों के हिसाब से ग्यारह वर्ष की उम्र में ही जवान होती बड़ी बेटी रुकैय्या की शादी की चिंता से उन्हें नींद न आती। ऊंचे खानदान के लड़के बटवारे में पाकिस्तान चले गए हैं। छोटे खानदान में वह बेटी का विवाह करेंगे नहीं। अन्ततः अपने से केवल तीन-चार बरस बड़े शम्सू मियां से रुकैय्या का निकाह हो जाता है। समय काटने के लिए रजिया को स्कूल में पढ़ाया जा रहा है। शौकत को रजि+या बचपन से ही अच्छी लगती है। रजिया का बचपना, अकेलापन और चारों ओर होने वाले परिवर्तन उसे बेचैन करते गए। ऊपर कमरे की खिड़कियों से लाउडस्पीकर पर सिनेमा के एलान सुनती, रात में पानी पीने के बहाने उठकर बेखबर सोए शौकत को देखती। अनजाने ही रजिया और शौकत में प्यार हो जाता है। परन्तु बात खुलने और फैलने पर मत्तों की अपने मालिक के प्रति नमक हलाली और मीर जामिन अली की खानदानी हैसियत की वजह से शादी उनके बीच हो नहीं सकती थी। रजि+या की शादी बासठ साल के रंडुए लड़के से तय होती है। जो रजिया की फोटो देख कर शौकत और रजिया के संबंध में, चार-चार खतों के पहुंचने पर भी लट्टू है। खतों की लिखावट की तहरीर रजिया के हाथों की हैः परन्तु निकाह के पहले ही एक रात रजिया और शौकत परछाई बन कर कहीं चले जाते है। जिसमें पहल रजिया की तरफ से होती है।
कहानी समय के परिवर्तनों को आत्मसात्‌ करने की द्विविधा, बदलते मूल्यों और मान्यताओं एवं रूढ़िग्रस्त मानसिकता के अन्तर्द्वन्द्व को व्यक्त करती है। दरअस्ल परिवर्तन में ध्वंस व टूटने और निर्माण दोनों की प्रक्रियाएं साथ-साथ काम करती हैं। इसके साथ चलने से जो लोग छूट जाते हैं। वे निरन्तर पीछे पड़ते जाते हैं। इस अनिवार्य और निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया में परम्पराओं और सड़ी गली रूढ़ियों में देश-काल-गत बहुत सूक्ष्म अन्तर होता है। जो व्यक्तिपरक आधार पर तय होतां हैं। पूर्वोग्रहो के कारण समायोजन न करने वाले लोग, पीढ़ियों, संस्थाएं कालातीत होने को विवश हो जाती हैं।
राही समय से सीधा साक्षात्कार करते हैं। आजादी के आस-पास का समाज आन्तरिक और वाह्‌य दोनों तरह से एक जटिल समाज था। इसमें बदलाव के दौर में अकेले छूट गए लोग निर्वासन भोगने को विवश थे।
परन्तु यह कहानी अकेले, निर्वासित, टूटे हुए लोगों की ही नहीं हैं। इसमें नई रोशनी के नायकों की कहानी भी है। वे क्रान्ति नायक जो मुखर और सक्रिय नहीं होते बल्कि परछाई बन कर अपनी असहमति और प्रतिरोध व्यक्त करते है। कहानी का शिल्प, भाषा और प्रस्तुतिकारण उसकी रवानगी, मार्मिकता और खूबसूरती का एहसास हर पल कराता रहता हैं। राही अपनी भाषा से कहानी का दृष्टिकरण उपस्थित करते हैं। राही नए मुहावरे गढ़ते हैं। घर में छह शताब्दियां रहती थी।...गलियां रहती थीं...किसानों की सिसकियां रहती थीं।
दीवारें गर्दन झुका-झुका कर उन्हें देख रही है। और आपस में इशारे कर के मुस्करा रही है।/ बेटी की उम्र बड़ी बेहया और बेदर्द होती है।
वह सुबह को शाम और रात को दिन कैसे बनाए सारे बदन में जैसे हजारों हजार दिल धड़कने लगते और इन हजार दिलों में लाखों लाख चिराग जल जाते और उनकी रग-रग में उजाला हो जाता/ छतनार बूढ़े पेड़ की तरह आंधी में टूट गए/ जैसे भाषिक संदर्भ कहानी की वेधकता कर्ई गुना बढ़ा देते हैं। राही की रचनाओं में प्रतीक आरोपित नहीं होते। बल्कि रचना के अंतर से निकलते हैं।
सदा की भांति राही कहानी में व्यंग्य के प्रसंग आने पर नहीं चूकते।-जामिन अली रख रखाव वाले आदमी थे। जिंदगी भर नमाज पढ़ते रहे, गालियां बकते रहे और गुनगुनाते रहे।/हिन्दू सोशल और मुस्लिम सोशल क्या होता है।/ हीरो यदि नवाब नहीं होता तो कवि अवश्य होता है।
कहानी अपने समय, स्थितियों, मानसिकता, और तत्कालीन विवरणों तक सीमित नहीं रहती बल्कि जीवन, उसकी जटिलताओं, मनुष्य की नियति और बदलती मान्यताओं को दस्तावेज बनने में सफल है।
इन कहानियों के विवेचन से विदित होता है कि राही की कहानियों में उनके अंदर का कवि मुखर होता हैं। न केवल कथ्य के अन्दर बहते भाव, पात्रों की मनः स्थिति के निरूपण में वरन्‌ भाषिक अभिव्यक्ति में भी। यद्यपि लेखक का स्वयं कहना है कि कविता की जबान नकली होती है। इसी में इसका हुस्न हैं। जीवन जटिल होता जा रहा है और कविता के माध्यम से इस जीवन को संपूर्णता से व्यक्त नहीं किया जा सकता। कथा भाषा यदि नकली हो जाए तो कहानी मारी जाती है।''
राही के साहित्य के गहन अध्ययन से मालूम होता है कि राही अपने संपूर्ण संघर्ष,असहमति, स्थितियों पर कटाक्ष, समस्त विरोध और युयुत्स भाव के बावजूद अंदर से स्वप्नदर्शी, कोमल सहज और तमाम प्रतिकूलताओं के बीच मानवीय मूल्यों के प्रति आस्थावान नज+र आते है।
कविता की एक विशिष्टता-मानवीय अस्मिता पर अगाध आस्था-ही उसे साहित्य की अन्य विधाओं से अलग पहचान देती है। यही कारण है कि राही के साहित्य पर, आने अनजाने ही, काव्यगत प्रभाव लक्षित होता है।
कथाकार का सरोकार भाषा से भी होता है। हर कथाकार अपनी कथा भाषा अथवा कहा जाय कि हर रचना अपनी भाषा प्रवृत्ति लेकर आती है। राही भाषा को अपनी जमीन की सोच से जोड़ने का काम करते हैं।
राही बहुत स्पष्ट रूप से कहते हैं कि भाषा और धर्म का रिश्ता जोड़ना ही ग़लत है। क्योंकि कुछ लोगों में भाषाओं को धर्म से जोड़ कर देखने की प्रवृत्ति है। वह उर्दू को देवनागरी लिपि में लिखने के समर्थक थे। उर्दू साहित्य की भाषा अपने आलेख में वह स्पष्ट करते हैं-मैं भविष्य में इतनी दूर तो देख ही सकता हूँ कि यह कह सकूँ कि उर्दू लिपि थोड़े दिनों की मेहनत है।
वह अपने संबंध में कहते हैं-मैं भी उर्दू वातावरण में पला बढ़ा हूँ। मैं उर्दू में ही ख्+वाब देखता हूँ। परन्तु मैं इस लिपि को भाषा नहीं मानता। मेरी भाषा वही है जो कबीर, सूर, तुलसी, जायसी, यशपाल, ड्डष्णचन्दर की है।
राही मासूम रजा की भाषा पाठको को न केवल बाधे रहती है बल्कि वह अपनी सादगीपूर्ण, सहज, गुदगुदाने वाली व्यंग्यात्मक और शब्दों के पारदर्शी स्वरूप जो जीवन के अनुभवों को कलात्मक ढंग से व्यक्त करते हैं, भाषा से पाठकों के हृदय पर अमिट छाप छोड़ने में सफल होते हैं।
राही मासूम रजा की कहानियां जीवन की तमाम प्रतिकूलताओं के मध्य जीवन के प्रति आस्था को बनाए रखती हैं। यह कहानियां जीवन के विभिन्न पहलुओं पर ऐसे कोण से प्रकाश डालती है कि वह एक बड़े परिदृश्य का हिस्सा लगती हैं। वह अपनी कहानियों से आज के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक ढांचे में व्याप्त विकृतियों पर करारी चोट करते हैं। यह उन्हीं की हिम्मत थी कि साम्प्रदायिक शक्तियों, उनके नेताओं को नाम लेकर जिम्मेदारों ठहराते रहे। उनका मानना था इन सभी साम्प्रदायिक शक्तियों का मूल चरित्र और उद्देश्य एक है।
राही न केवल साहित्यकार बल्कि एक चिंतक के रूप में सामने आते हैं। राष्ट्रीय, सामाजिक,सांस्कृतिक,राजनीतिक और मानव व्यवहार के विषय में उनका चिंतन वस्तुपरक, निरपेक्ष और संतुलित और निर्भीक दिखाई देता है। साम्प्रदायिकता पर उनके विचार क्रांतिकारी हैं।

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साक्षात्कार

प्रो. रमेश जैन
साक्षात्कार जनसंचार का अनिवार्य अंग है। प्रत्येक जनसंचारकर्मी को समाचार से संबद्ध व्यक्तियों का साक्षात्कार लेना आना चाहिए, चाहे वह टेलीविजन-रेडियो का प्रतिनिधि हो, किसी पत्र-पत्रिका का संपादक, उपसंपादक, संवाददाता। साक्षात्कार लेना एक कला है। इस विधा को जनसंचारकर्मियों के अतिरिक्त साहित्यकारों ने भी अपनाया है। विश्व के प्रत्येक क्षेत्र में, हर भाषा में साक्षात्कार लिए जाते हैं। पत्र-पत्रिका, आकाशवाणी, दूरदर्शन, टेलीविजन के अन्य चैनलों में साक्षात्कार देखे जा सकते हैं। फोन, ई-मेल, इंटरनेट और फैक्स के माध्यम से विश्व के किसी भी स्थान से साक्षात्कार लिया जा सकता है। अंतरिक्ष में संपर्क स्थापित कर सकते हैं। पहली बार पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी ने अंतरिक्ष यात्री कैप्टन राकेश शर्मा से संवाद किया था, जिसे दूरदर्शन ने प्रसारित किया था। इस विधा का दिन पर दिन प्रचलन बढ़ता जा रहा है।
मनुष्य में दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ होती हैं। एक तो यह कि वह दूसरों के विषय में सब कुछ जान लेना चाहता है और दूसरी यह कि वह अपने विषय में या अपने विचार दूसरों को बता देना चाहता है। अपने अनुभ…

समकालीन साहित्य में स्त्री विमर्श

जया सिंह


औरतों की चुप्पी सदियों और युगों से चली आ रही है। इसलिए जब भी औरत बोलती है तो शास्त्र, अनुशासन व समाज उस पर आक्रमण करके उसे खामोश कर देते है। अगर हम स्त्री-पुरुष की तुलना करें तो बचपन से ही समाज में पुरुष का महत्त्व स्त्री से ज्यादा होता है। हमारा समाज स्त्री-पुरुष में भेद करता है।
स्त्री विमर्श जिसे आज देह विमर्श का पर्याय मान लिया गया है। ऐसा लगता है कि स्त्री की सामाजिक स्थिति के केन्द्र में उसकी दैहिक संरचना ही है। उसकी दैहिकता को शील, चरित्रा और नैतिकता के साथ जोड़ा गया किन्तु यह नैतिकता एक पक्षीय है। नैतिकता की यह परिभाषा स्त्रिायों के लिए है पुरुषों के लिए नहीं। एंगिल्स की पुस्तक ÷÷द ओरिजन ऑव फेमिली प्राइवेट प्रापर्टी' के अनुसार दृष्टि के प्रारम्भ से ही पुरुष सत्ता स्त्राी की चेतना और उसकी गति को बाधित करती रही है। दरअसल सारा विधान ही इसी से निमित्त बनाया गया है, इतिहास गवाह है सारे विश्व में पुरुषतंत्रा, स्त्राी अस्मिता और उसकी स्वायत्तता को नृशंसता पूर्वक कुचलता आया है। उसकी शारीरिक सबलता के साथ-साथ न्याय, धर्म, समाज जैसी संस्थायें पुरुष के निजी हितों की रक्षा करती …

स्त्री-विमर्श के दर्पण में स्त्री का चेहरा

- मूलचन्द सोनकर

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अब हम इस बात की चर्चा करेंगे कि स्त्रियाँ अपनी इस निर्मित या आरोपित छवि के बारे में क्या राय रखती हैं। इसको जानने के लिए हम उन्हीं ग्रन्थों का परीक्षण करेंगे जिनकी चर्चा हम पीछे कर आये हैं। लेख के दूसरे भाग में वि.का. राजवाडे की पुस्तक ‘भारतीय विवाह संस्था का इतिहास' के पृष्ठ १२८ से उद्धृत वाक्य को आपने देखा। इसी वाक्य के तारतम्य में ही आगे लिखा है, ‘‘यह नाटक होने के बाद रानी कहती है - महिलाओं, मुझसे कोई भी संभोग नहीं करता। अतएव यह घोड़ा मेरे पास सोता है।....घोड़ा मुझसे संभोग करता है, इसका कारण इतना ही है अन्य कोई भी मुझसे संभोग नहीं करता।....मुझसे कोई पुरुष संभोग नहीं कर रहा है इसलिए मैं घोड़े के पास जाती हूँ।'' इस पर एक तीसरी कहती है - ‘‘तू यह अपना नसीब मान कि तुझे घोड़ा तो मिल गया। तेरी माँ को तो वह भी नहीं मिला।''
ऐसा है संभोग-इच्छा के संताप में जलती एक स्त्री का उद्गार, जिसे राज-पत्नी के मुँह से कहलवाया गया है। इसी पुस्तक के पृष्ठ १२६ पर अंकित यह वाक्य स्त्रियों की कामुक मनोदशा का कितना स्पष्ट विश्लेषण …