Wednesday, February 4, 2009

"एहसास"

SEEMA GUPTA

हर साँस मे जर्रा जर्रा
पलता है कुछ,
यूँ लगे साथ मेरे
चलता है कुछ.
सोच की गागर से
निकल शब्द बन
अधरों पे खामोशी से
मचलता है कुछ.
ये एहसास क्या ...
तुम्हारा है प्रिये ???
जो मोम बनके मुझमे ,
बर्फ़ मानिंद ...
पिघलता है कुछ

4 comments:

रश्मि प्रभा said...

भीने-भीने से एहसास हैं,
बहुत ही अच्छे

seema gupta said...

"@Firoj ji, thankyou for presenting my poem here"

Regards

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर रचना है।

गर्दूं-गाफिल said...

बहुत सुन्दर