Tuesday, June 24, 2008

मैत्रेयी पुष्पा से उजैर खाँ की अंतरंग बातचीत



यद्यपि मेरा प्रश्न परम्परागत ही है फिर भी! आप अपने आरम्भिक जीवन के उन संदर्भों या घटना विशेष पर प्रकाश डाले, जिसने आगे चलकर आप को लेखन के लिए प्रेरित किया?
देखिए, अधिकांश लोग लेखक से यही पूछता है कि आपकी प्रेरणा क्या है? पहले के जो लेखक और कवि थे, वे प्रेरणा झट से बता देते थे, लेकिन मैं आज तक प्ररेणा को खोज नहीं पाई कि कहाँ हैं! कई चीजें हैं मेरी जिन्दगी में, जैसे कि बचपन में कविताएँ मुझे अच्छी लगती थीं पढ़ने में, जब मेरे साथ के बच्चे समझते भी नहीं थे, हम दूसरी या तीसरी क्लास में थे तब जब बच्चे सोचते भी नहीं थे कि हम क्या पढ़ रहे हैं, लेकिन अब जब मुझसे प्रश्न होता है तब मेरे दिमाग में यह प्रश्न उठता है कि मुझे कविता क्यूँ अच्छी लगती थी? बार-बार जिसे साहित्य कहते हैं मेरे बचपन में उसके जो बीज हैं या जो कुछ भी है, मैंने कई जगह लिखा है।
आओ हम सब झुला झुले,
पेंग बढ़ा कर नभ को छुले।
यह कविता मुझको बहुत अच्छी लगती थी। मैं जब तीसरी क्लास में थी तभी से। आज जब मैं उसके अर्थ खोजती हूँ तो मुझे उसका बहुत बड़ा अर्थ मिलता है।
आपने लेखन अपेक्षाकृत देर से आरम्भ किया, क्यों?
ऐसी स्थितियाँ नहीं हुई कि लेखन करती। उन दिनों, जिसमें छोटी कविता ने जन्म लिया उसके बाद मैं गुरूकुल चली गई, गुरूकुल में रही हूँ। अभी एक लेख भी आया है हंस में ‘गाँव में गुरूकुल' तो मैं गुरूकुल चली गयी दो सालों के लिये। वहाँ मुझे और साहित्य में रुचि आयी, जैसे शाम आ रही है, चिड़ियाँ लगीं चहकने। यह उस जमाने की याद है जब मेरी उम्र ८ साल थी। तो वहाँ जो है, पढ़ाई हाई लेविल की थी। उसके बाद जब मैं हाई स्कूल में पढ़ने गयी तो वहाँ मुझे वह माहौल नहीं मिला।
फिर कब मिला?
जब मैं ११वीं कक्षा में आई। ११वीं कक्षा में एक लड़का मेरे साथ पढ़ता था। मैं कोएजूकेशन में पढ़ी नहीं हूँ। मैं हमेशा लड़कों के स्कूल में पढ़ी हूँ, क्योंकि गाँव में लड़कियों के स्कूल नहीं होते थे। लड़कों का हो जाये यही बहुत है। एक लड़का पढ़ता था जब मैं ११वीं में थी वो मुझसे सीनियर था। शायद १२वीं कक्षा में था, शायद नहीं! टीचर के पास जँचने गई कापी में उसने एक कविता लिख दी उस लड़के ने, शायद उससे भी पहले की बात है। ठीक से त्मबंसस नहीं कर पा रही हूँ कि उसने मुझे कब एक पत्रा भी लिखा था। उस समय उम्र मेरी लगभग १४ साल की थी। उसे तुम प्रेम पत्र कह सकते हो और उसे पढ़कर या पाके एक उत्तेजना उत्पन्न हुई। बड़ा अच्छा-सा लगा था। जैसा कि किशोर अवस्था में होता है, वह सब मेरे साथ हुआ। मेरे हाथ भी काँपे उसे पकड़ते हुए। पढ़ते हुए। पढ़ा तो लगा यह प्रेम-व्रेम का चक्कर है। तो मैंने इधर-उधर देखा क्योंकि मैं सड़क पर खड़ी पढ़ रही थी, डर था कोई देख तो नहीं रहा। जबकि किसी को क्या पता मैं क्या पढ़ रही थी? लेकिन मन में एक चोर आया। उसके बाद जब मैंने वो कविता पढ़ी और अपने घर आकर मैंने ठण्डे दिमाग से सोचा कि यह लड़का लिख सकता है तो मैं क्यों नहीं लिख सकती हूँ। मुझे बहुत रुचि थी कविताओं में। अखबारों में से काटकर रख लेती थी कवितायें। उस समय ‘धर्मयुग' तथा ‘नवनीत' पत्रिका हमारे गाँव में आती थी। तो उनमें से काट-काट कर मैं कवितायें पढ़ती थी। हाँ, तो उस लड़के ने प्रेम पत्र लिखा तो मैंने कुछ नहीं कहा उससे, लेकिन मैंने पढ़ना और लिखना शुरू किया वहीं से। मैंने उसे लिखकर दिया भी नहीं कुछ। लेकिन वो बराबर मेरी कापी जहाँ भी मिलती थी कोई कविता लिख देता था और मैं उसे ले आती थी। इसे तुम प्रेम कहोगे या एक सीख कहोगे या इसे एक मुकाबला कहोगे? उससे मुझे बहस पड़ गयी और मैं लिखने लगी। उसको मैंने कुछ नहीं लिखा। अब यह लम्बी कहानी है कि कहाँ तक मेरे संबंध हैं उससे, मेरा रिश्ता है मित्रों का। जो उसने जोड़ा था और मुझे पता भी नहीं था कि क्या होता है, लेकिन आज तक मैं भी निभाती आयी और वो भी निभाते आये और जब ‘इदन्नमम' छपा तो मैंने उन्हें भेजा। आप को याद होगा कि कोई लड़की आप के साथ पढ़ती थी तो उनकी चिट्ठी मिली कि हाँ, मैंने तुम को रोज याद किया है और मैं जब भी झाँसी जाती हूँ तो मुझे स्टेशन लेने वो आते हैं कहते हैं कि कवि तो मैं था तुम लेखिका बन गयी मैं कुछ भी नहीं बना।
कथा साहित्य आप के सृजन के केन्द्र में रहा है इसमें कहानी और उपन्यास दोनों आते हैं दोनों ही में आपने लिखा फिर भी कहानियों की अपेक्षा उपन्यास लेखन के क्षेत्र में आप अधिक सक्रिय दिखाई देती हैं क्यों?
यूँ तो मैं कविता से प्रभावित हुई किन्तु उस लड़के के सारी कंपटीशन स्पर्धा के बाद। मैं कविता अच्छी नहीं लिख सकती थी यह मालूम पड़ गया। मैं कहानी लिखने की कोशिश करने लगी, मुझे लगा कि कहानी में मैं अपनी बात कह सकती हूँ। कहानी से ही शुरू भी किया और कहानी जो है वह पहचान में भी आयी ‘चिन्हार' जब छप के आयी तो काफी अच्छा लगा। फिर ‘ललमनियाँ', ‘गोमा हँसती है', यह सब हुआ। मेरी आदत क्या थी कि मैं विवरण बिना दिये कहानी नहीं लिखती थी। विवरण लम्बे-लम्बे हो जाते थे। ‘गोमा हँसती है' कहानी पढ़ो तो वही आदत थी तो मुझे जो एक आसानी मिली वो उपन्यास लिखने में मिली यहाँ मैं पूरी चीजें मैं अपने मन से कर सकती थी। मैं जिन-जिन चीजों को लेना चाहती थी मैं ले सकती थी। बस इसीलिए उपन्यास लिखे, नहीं तो मैंने ऐसा नहीं सोचा था कि मैं कोई उपन्यास लिखूंगी। ऐसा कभी नहीं सोचा था।
संभवतः वास्तविकता यह है कि आप के उपन्यास और कहानियों के पात्र वास्तविक जीवन से लिए गए हैं। यहाँ तक की उनके नाम भी यथार्थ है। क्या कभी आपको ये नहीं लगा कि इससे इतिहास और साहित्य के अन्तर पर कोई प्रभाव पड़ेगा?
पहले तो मैं यह बताती हूँ कि मैंने क्यों उन्हीं नामों को लिया, मैं बदल भी सकती थी और बदले भी, जैसे मंदा का नाम मंदा नहीं है, लेकिन मंदा है और वो सारे पात्र जो ‘इदन्नमम' के हैं, कुसुमा भाभी बकायदा है, दादा है सब कुछ है। ‘चाक' में नहीं हैं तो यह समझ लो कि नाम बदलने पर मुझे थोड़ी मुश्किल होती है उस पात्रा का चरित्र चित्रण करने में, फिर भी मैंने किया, लेकिन जहाँ नाम नहीं बदले हैं वहाँ बहुत स्वभाविकता आ गयी है। जो आदमी मेरे सामने खड़ा हो जाता है उसके सारे पहलू देखे होते हैं जैसे-डोरीया। ऐसे कई पात्रा हैं उससे मुझे आसानी होती है पता नहीं इतिहास और साहित्य में लोग अन्तर करते हैं । ‘कही ईसूरी फाग' सारा इतिहास है, लेकिन वह उपन्यास हो गया तो उसमें बहुत कम अन्तर है। लोग चाहे कुछ कहें कि उसमें बहुत बड़ा गैप है, वास्तव में बहुत कम अन्तर है। एक दृष्टि की बात है। आप की दृष्टि सृजनात्मक है। तो वह साहित्य हो जाएगा यद्यपि आपकी दृष्टि खाली तथ्यात्मक हो तो वह इतिहास हो जाएगा। इससे क्या फ़र्क पड़ता है, दूरी कितनी होगी, नहीं होगी, इसको मुझे सोचना नहीं है। यह तो समीक्षक सोचेंगे। पाठक सोचेंगे आगे के...।
यथार्थ कथानक और पात्रों के वास्तविक नामकरण के कारण कभी आपको किसी विषम स्थिति का सामना तो नहीं करना पड़ा?
एक दम करना पड़ा है। बहुत-बहुत करना पड़ा है। अभी मेरी जो आत्मकथा आएगी। ‘कस्तूरी कुण्डल बसै' में तो २१ साल तक का ही जीवन है। तब तक मेरा लेखन शुरू नहीं हुआ था। लेकिन अब जो आएगी तो उसमें देखना जरा कि कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है और लिखते वक्त तो मैं बड़ी स्वाभिकता से लिख जाती हूँ, लेकिन बाद में जो बवाल उठते हैं तो फिर मैं सोचती हूँ कि क्या इसके बारे में मैंने सोचा नहीं, लेकिन बच के निकलना मेरी शायद आदत में नहीं, मेरे स्वभाव में नहीं, यह खतरनाक खेल अपने आप कैसे हो जाते हैं यह मेरी समझ में उस वक्त नहीं आता जब मैं लिख रही होती हूँ। लिखता तो जाने कौन है! मैं तो काफी डरने वाली औरत हूँ (हंसती हैं) लिखते वक्त मेरे हाथ में जो कलम आती है तो फिर कुछ नहीं सोचती हूँ, मैं कहाँ हूँ, और मैं कैसे लिख रही हूँ, जब लोग कहते हैं कि आप कहाँ बैठ कर लिखते हैं तो मैं बता देती हूँ कि मैं यहाँ बैठकर लिखती हूँ, लेकिन किस मुद्रा में लिखती हूँ मुझे यह भी पता नहीं होता कि मैं किस मुद्रा में बैठी हूँ तो यह हालत हो जाती है लिखते वक्त!
हालांकि आपके सभी उपन्यास साहित्य जगत्‌ में यथेष्ट रूप से चर्चित और प्रशंसित हुए लेकिन आपको अपना कौन-सा उपन्यास पसन्द है और क्यों? इधर आपके उपन्यास को लेकर के कुछ अजब टिप्पणियाँ हुईं और उन पर आरोप-प्रत्यारोप सीमा से पार होते क्यों दिखे इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
प्रतिक्रिया तो बाद में बताऊँगी, सबसे पहले तो यह बताती हूँ कि प्रिय कौन-कौन-सा है, हालाँकि यह शायद समझ लो कि लोग यह बहुत कोशिश करते हैं कि रचना चर्चित हो। प्रशंसित तो नहीं कहूँगी, मेरा हर उपन्यास चर्चित हुआ। मेरा कोई उपन्यास नहीं गया ऐसा जिसे नजरअन्दाज कर दिया गया हो। लोग कहना नहीं चाहते, वही मैंने कहा जिनको शालीनता के नाम पर ढँका गया। नैतिकता के नाम पर ढँका गया, सामाजिकता के नाम से ढँका गया और परम्परा के नाम पर ढँका गया। नाम तो अच्छे-अच्छे दे दिए लेकिन सब रूढ़ियाँ हैं और इनको ढँकना नहीं चाहिए। हमें अपनी बात खुलकर कहना चाहिए ताकि सबके सामने आए। तुम मुझसे पूछ रहे हो कि कौन-सा प्रिय है तो मुझे यहाँ प्रिय है ‘चाक'। मैं सबसे यही कहती हूँ, जो भी मुझसे पूछता है। ‘चाक' जो है न उसको कोई एवार्ड कभी नहीं मिला ‘इदन्नमम' को बहुत मिले, ‘अल्मा कबूतरी' को मिले। ज्यादातर को मिले, लेकिन ‘चाक' को कुछ नहीं मिला और ‘चाक' ज्यादातर लोगों को अप्रिय है इसलिए मुझे प्रिय है। वह लोगों को डराता रहता है, लेकिन फिर भी दबे स्वर में ‘चाक' ही प्रशंसित होता है। अभी भी एक साहब ने लिखा है कि सारंग जैसी स्त्री नहीं (हँसती हैं) सारंग जैसी अद्भुत स्त्री नहीं। फिर भी लोगों को क्यों पसन्द आ रही है सारंग। मुझे लगता है कि सारंग को मैंने पूरा अपना मन उड़ेल कर लिखा है।
‘विमर्श' स्त्री से संबंधित हो या दलित से, इस पर काफी विचार किया जा चुका है और हो भी रहा है। आपने भी काफी कहा और लिखा सूत्र-रूप में एक बार फिर मैं आपकी विचारधारा जानना चाहता हूँ?
मैं तुमसे पहले कह रही थी ना कि जब मैंने लिखा तो एक सहज भाव से स्त्री की कहानी लिखी। मुझे नहीं पता था कि विमर्श क्या होते हैं? यह भी नहीं पता था कि जनवाद क्या होता है? प्रगतिवाद क्या होता है, यह जितने वाद हैं, क्या हैं? मैं दो समुदायों में रही हूँ। एक किसान दूसरा डॉक्टर, इसको चाहे तुम दो बिल्कुल विरोधी संस्कृतियाँ कह सकते हो, लेकिन अब मैं क्या करूँ संजोग की बात है कि मैं किसानों के बीच रही किसान की बेटी भी पढ़-लिख गयी और एक डॉक्टर से ब्याह दी गयी। पर मैं किसानों के यहाँ से आई और मैं दिल्ली की जो संस्कृति है उसको ज्यादा एडॉप्ट नहीं कर सकी चाह कर भी नहीं कर सकी। मेरे पति भी चाहते थे कि मैं दिल्ली की स्त्री बनू, दिल्ली का ‘स्त्री-विमर्श' सीखूँ, लेकिन मैं नहीं बन सकी, मैंने कोशिश बहुत की थी जब तुम पढ़ोगे ‘गुड़िया भीतर गुड़िया' तब तुम बहुत हंसोगे कि मैंने कितनी- कितनी कोशिशें की थी। अपने को बदले की लेकिन कुछ न हो सका। मैं वही गाँव की रही हूँ। तो विमर्श को मैं क्या जानती। विमर्श नाम मैंने सुना ही नहीं था। मैं जानती भी नहीं थी। मैं सहज भाव से कहानियाँ और उपन्यास लिख रही थी यह तो समीक्षकों ने कहा, दिल्ली के लोगों ने कहा, साहित्य के लोगों ने कहा, कि ये ‘स्त्री विमर्श' है। मैंने कहा अच्छा। अच्छा मेरे ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ा कि ‘स्त्री विमर्श' है या नहीं है। लेकिन हाँ, जब-जब मुझसे पुछा कि आप स्त्री हो के अपने को लेखिका मानती हैं या लेखक मानती हैं या स्त्री मानती हैं या खाली लेखक मानती हैं। मैंने कहा कि, मैं पहले स्त्री हूँ बाद में लेखक हूँ। फिर भी अनुभव और अनुमान में कुछ फ़र्क तो होता है। ‘स्त्री-विमर्श' की हम बात करते हैं तो अनुभव और अनुमान का फ़र्क है, लिखते तो पुरुष भी आये हैं लेकिन हम तो अनुभव को देते हैं। हमारा जीवन अपने हाथ में लिया तो हमें ऐसा लगा कि हम अपना जीवन ऐसा बनाना चाहते हैं हमारी इच्छा यह है। आपने हमारी इच्छा नहीं पूछी। नहीं पूछी तो हम कब तक चुप रहेंगे? अब हम आपको अपनी इच्छा बताते हैं जिस तरह पुरुष की नैसर्गिक इच्छाएँ हैं वो हम स्त्रियों की भी होती हैं। जो आप ने एकदम निष्क्रिय कर रखी है। आप को निष्क्रिय स्त्री अच्छी लगती है उसकी सारी इन्द्रियाँ ज्ञानेन्द्रियाँ हो या कर्मेन्द्रियाँ निष्क्रिय हों। आप को अच्छी लगती है, शालीन लगती हैं, शालीनता, नैतिकता हमारी निष्क्रियता के नाम है ये शालीनता नैतिकता और कुलवधु और फलाने और ढिकाने और सब चीज है ये सब हमारी निष्क्रियता के नाम है। जब हम सक्रियता से आगे आते है तो हम कुलटा होते हैं। हम बदचलन होते हैं। हम उच्छृंखल होते हैं। क्या-क्या नाम नहीं दिये जाते है? ‘चाक' पर टिप्पणियाँ आई हैं वह सब मुझे पता है। सारंग आगे-आगे चलती है, इसलिए बदचलन है वह। उस पुरुषवादी सोच को यह सारंग जिस तरह आयी है पसन्द नहीं आयी है लोगों को, पुरुष तो न जाने कितनी बार सारी नैतिकता फलाँग जाता है, कोई गौर भी नहीं करता है। आज हमारे नेताओं को देखो अफसरों को देखों, यहाँ तक साधारण आदमी है उसको देखो, छोटे से छोटा आदमी है, मजदूर है, उसको देखो सब अपनी नैतिकता तुरन्त खत्म कर देते हैं, लेकिन उसको कोई गौर नहीं करता है सारी नैतिकता स्त्री के गले बधीं है। मतलब यह कि घर की सारी मर्यादा स्त्री ही निभायेगी, वह अपनी निष्क्रियता में शिखर पर होगी तभी निभायेगी! अगर वह जरा भी कुछ बोलती है, उसकी जुबान कुछ बोलती है, उसकी आँखें कुछ देखती हैं, उसके कान कुछ सुनते है, वह कुछ भी प्रतिक्रिया देती है, बस! वह अच्छी औरत नहीं है। अच्छी औरत वह है जो अपने कान बन्द रखे आँखों पर परदा डाले रखे, जुबान बन्द रखे, जवाब न दें, कहते हैं ना लड़कियों से, बेटी जवाब न देना। वह अच्छी औरत है, ऐसी अच्छी औरत मुझे नहीं बनना है। मैंने अपने उपन्यासों में यही कहा है। हम से पूछो कि हम अच्छी औरत कैसे बनेगें। हमसे भी तो पूछो आपने जो नियम बनाए, कानून बनाए, कायदे बनाये, हमारे लिए हम से तो पूछकर तो नहीं बनाए है ना? आप ने ही बनाएँ अब हम मानते ही चले जाएँ जरूरी तो नहीं!
महिलाओं को लेकर साहित्य और समाज की सोच में इतना अंतर क्यों है? मेरा मतलब है कि स्त्रियों को लेकर साहित्य में हम जितने प्रोग्रेसिव हैं समाज में वह नहीं दिखता है ऐसा क्यों? प्रकारांतर से सिद्धांत और व्यवहार की गहरी खाई कब तक पटेगी?
देखो अभी जो साहित्य पुरुषों द्वारा आया है उसमें तो विद्रोह नाम की कोई चीज नहीं है। विरोध भी करते हैं तो बड़ी शान्ति के साथ, शान्त भी नहीं, बड़ा ही माईल्ड्, जिसे कहना चाहिए बहुत ही मुलायम, मुलायम विरोध कोई मानेगा क्या? जो स्त्रियों ने लिखा, वहाँ भी एक झिझक है। दो टूक नहीं, जब तक बेकरारी नहीं आती किसी चीज में तो पारदर्शिता कहाँ से आएगी? तो बात यह है, अब समाज में जम्प आएगा जैसे कि हम तुलसीकृत रामायण को पढ़ते हैं, तो सीता-सी लड़की होनी चाहिए, लक्ष्मण-सा भाई होना चाहिए, भरत-सा भाई होना चाहिए, राम-सा मर्यादा पुरुष होना चाहिए, ऐसा करते हैं कि नहीं और घर-घर उसकी गूँज है न? ऐसे ही यह साहित्य पढ़ा जाएगा। जो आज आ रहा है। अब तो नई लेखिकाओं द्वारा काफी अच्छा आ रहा है। जो आज की युवा पीढ़ी है वह उस तरह नहीं है जैसी पिछली थी। जो यह साहित्य आ रहा है पढ़ा जाएगा। अब तुम कहोगें की पढ़ा कैसे जाएगा? तुम तो आये हो न? ऐसे ही जो नई पीढ़ी है, पढ़कर आएगी और उस पर विचार करेगी। आज की पीढ़ी ऐसी भी नहीं है कि अंधानुकरण करे। वह विचार करती है। यह ही हमारी आशा है। यह युवा पीढ़ी पर लगी हुई है। यह ही जो विचारवान पीढ़ी है। ऐसे हार नहीं मान लेती। जब ये आएगी तो बदलाव आएगा। आ भी रहा है। क्या इतनी लड़कियाँ पहले तुम्हें बाहर दिखती थीं? नहीं! लड़कियों का रूझान ऐसा दिखता था? माना कि पहली-सी परम्पराएँ चल रही हैं आज भी, अगर लड़की अपनी मरजी से शादी करती है तो गाँव में मार दी जाती है। लेकिन ये तो एक गोट है जब जब बदलाव आता है तो विरोध भी तो होता है। बदलाव आता है तो दोनों तरफ। मार-काट होती है। उधर मर्यादाओं, नैतिकताओं और रूढ़ियों में टूटन-फूटन भी होती है। टूटन-फूटन वही करते हैं जो बदलाव लाना चाहते हैं। स्त्री हो या पुरुष? यह सब होता है, तब ही नया समाज बनता है। पुराने जमाने में यानी अंग्रेजों के जमाने में जो समाज था। वह आज नहीं है। ना पुरुष को ले के ना स्त्री को लेके। लेकिन स्त्री में थोड़ा बदलाव आया है, नाम को! और पुरुषों में तो बहुत आया है। जैसे मैं कहती हूँ कि, पुरुषों ने तो पैंट कमीज कोट तभी पहन लिया था जब अंग्रेज थे। स्त्री बिचारी ने कोई स्कर्ट नहीं पहना था, लेकिन अब स्त्री भी अपनी सोच से चल रही है। कुछ समझने लगी है। गाँव में भी थोड़ी शिक्षा पहुँची है। इसलिए बदलाव आएगा लेकिन पाँच हजार साल की स्त्रियों का इतिहास है वह एक दिन में नहीं बदल जाएगा।
बहुत सारे लेखक आलोचक अपने लेखन में तो स्त्री मुक्ति के समर्थक हैं, लेकिन व्यक्तिगत जीवन में घोर पुरुषवादी हैं। इस संदर्भ में आपका क्या मानना है?
देखो, सिद्धान्त गढ़ना तो बहुत आसान है, लेकिन उनको व्यावहारिक रूप देना उतना ही कठिन है। मैं बहुत से लोगों को देखती हूँ कि मंच से क्या-क्या बोलकर आते हैं और घर में क्या-क्या करते हैं? ताज्जुब भी होता है कि जैसा कहते हैं वैसा जीवन नहीं है उनको तो बदलना पड़ेगा, उनको अपने आपको बदलना पड़ेगा। अगर वह नहीं बदलेंगे तो उनके आगे की पीढ़ी बदलेगी। नहीं बदलेगी तो उनका निभाव नहीं है और स्त्री और पुरुष मिलकर ही एक समाज बनाते हैं। हर हालत में चाहे धीमा हो, परिवर्तन करना ही पड़ेगा। यह बहुत दिनों तक नहीं चलेगा कि आप कह कुछ रहे हैं और कर कुछ रहे हैं। यह दोगली नीति साहित्य को प्रभावशाली नहीं बनायेगी। तभी तो अभी तक स्त्रियों के लिए आदमी का कलेजा पिघला नहीं है। जबकि हमें उदाहरण दे देकर किताबें दिखाते हैं, कि देखो इसको पुरुष ने ही लिखी हैं और कितनी बढ़िया लिखी हैं। स्त्रियों को ठीक है वो हमदर्दी दे देते हैं, दया दे देते हैं लेकिन यह सब कहने की बातें हैं, दिखाने की बातें हैं, लेकिन व्यवहार में अपने लिए जो सुविधा चाहिए उसमें कमी नहीं होनी चाहिए।
महिला लेखन के संदर्भ में आप पर बहुत सारे आरोप-प्रत्यारोप लगाये जाते हैं विशेष रूप से यौन संदर्भों के चित्रण को लेकर, तो इस पर आप की क्या प्रतिक्रिया है?
मेरे ऊपर आरोप लगाये जाते हैं ना, जब तुम यही कह रहे हो कि महिला लेखन के संदर्भ में तो मैं महिला हूँ इसलिए आरोप लगाये जाते हैं, अगर यही चित्रण पुरुष करता है तो शायद यह इतना अजीब ना लगता। महिला कर रही है इसलिए बहुत अजीब लग रहा है, लेकिन उसके पहले कृष्णा सोबती ने भी लिखा है। शायद मैंने कुछ ज्यादा ही लिख दिया है? एक बात मैं पूछा करती हूँ और तुमसे पूछ रही हूँ जो स्त्री का शरीर है या पुरुष का शरीर है मान लो शरीर है। उसमें हर चीज का अपना महत्त्व है तो यौन संबंधों से इतना परहेज क्यों है। जबकि सृष्टि उसी से चलती है विवाह उसी से चलता है। जैसे विवाह संस्था को पवित्र और उच्च माना जाता है उसी से चलता है? है ना। चाहे वो विवाह स्त्री की राजी से हुआ हो या ना हुआ हो लेकिन जो यौन संबंध हैं वो जायज माने जाते हैं और पवित्र भी माने जाते हैं, जो नाजायज संबंध माने जाते हैं यौन संबंध हैं, वे समाज में हैं? यह तो है या नहीं हैं। बल्कि उस जायज संबंधों से ज्यादा नाजाइज संबंध पनपते हैं इस समाज में। जायज का हमारे लिए एक नियम बना दिया गया है। बस तो नियम तोड़ने की जो प्रवृत्ति होती है वह जन्मजात होती है। नियम में बंधकर कोई भी नहीं रहना चाहता है। पंछी भी नहीं रहना चाहता है, वो भी उड़ते हैं। यौन संबंधों का उतना ही महत्त्व हैं जितना हमारे मन का, दिमाग का है। है ना। बार-बार यही कहना चहाती हूँ कि ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का जितना महत्त्व है, यौन संबंध उतना ही महत्त्वपूर्ण है। इससे इतना परहेज क्यों? अच्छा जैसे आप पत्नी बनाते हैं उसे कहते हैं धर्मपत्नी है ना। लेकिन उससे यौन संबंध ना हों तो? यौन संबंध तो होते ही हैं, उसी को आपने नाम दिया है ना। फर्क इतना होता है पत्नी सब करती है बिना कुछ दिए लिए। आपके लिए हाजिर रहती है। आपकी इच्छा से, चाहें उसकी इच्छा हो या ना हो और जो दूसरी औरत है आपसे कुछ ले के तब आपके लिए हाजिर होती है, इच्छा उसकी भी हो या ना हो। आप उसकी इच्छा कभी नहीं देखते हैं, तीसरी रखैल जो होती है वो भी आपकी इच्छा लेकिन आप सबको बराबरी का दर्जा नहीं देते हैं। रखैल, वेश्या यह नाम आपने दिया है स्त्री को। तो यह क्या यौन संबंधों के वर्णन से कम बड़ा अपराध है? उस पर कभी गौर किया कि नहीं? मेरा तो अपराध मान लिया आपने वेश्याओं की बस्तियाँ अलग बसा दी और कहा कि जब मेरी इच्छा करेगी तो मैं वहाँ आ जाऊँगा। एक मेरी पत्नी हो और एक और रह रही है वो तो रखैल है उसको तो सिर्फ सरंक्षण देना है। आपने तो इतनी सुविधा पैदा कर ली, जब स्त्री और पुरुष की बराबरी की बात करती हूँ, यौन के स्तर पर तो आपको बुरा क्यों लगता है? बुरा इसलिए लगता है क्योंकि मैं उस व्यवस्था को तोड़ रही हूँ! इसीलिए आरोप-प्रत्यारोप लगते हैं, लेकिन जब यह चीजे रूकेंगी नहीं तो आरोप-प्रत्यारोप सब खण्डित हो जायेंगे। बार-बार यही तो कह रही हूँ कि जब समानता के लेविल पर आती है तो विरोध तो उसका बहुत करते हैं लेकिन छुप-छुप के उसे ही पढ़ते हैं।
वर्तमान हिन्दी कथा साहित्य को आप किस मुकाम पर पाती हैं। हिन्दी कथा साहित्य में महिलाओं की स्थिति को आप लेखन के रूप में किस प्रकार देखती हैं। स्थिति क्या संतोषजनक है या अभी और स्पेस (स्थान) है?
जो नब्बे का दशक आया ये काफी आशाएँ लाया है। लग रहा है कि स्त्री को लेकर जो साहित्य लिखा जा रहा है वह दिन पर दिन विकास कर रहा है। जो पुरानी एक झिझक थी वह टूट रही है, तमाम विरोधों के बावजूद भी! हालाँकि जो लेखिकाएँ ७० के दशक में थी वह आज भी हैं। शुरू में जो नई पीढ़ी आई या हम जैसे लोगों ने बदलाव की बातें की तो उन्हें बुरा लगा, लेकिन अब वो गौर करती हैं कि नहीं... तभी कुछ हो सकता है। अभी जो हो रहा है उससे तो वाकई आशा दिखती है उतना लिखने वालों से नहीं लगती। जितनी की पढ़ने वालों से लगती है। जो रिसर्च करते हैं उनसे लगती है, कि ये क्यूँ इसकी आशा करते हैं जिनका इतना विरोध हो रहा है उससे आशा करते हैं। क्योंकि वह भी उसी तरह सोच रहे हैं जैसे हमने सोचा है जैसा आजकल सभी सोच रहे हैं। उसमें उनकी रुचि है। ऐसा नहीं है कि उन्हें कुछ मिल नहीं रहा है, वह पुराने पर भी कर सकते हैं! जब मैं इसको देखती हूँ तो तब मुझे बड़ा ही सकारात्मक फीड-बैक मिलती है। हिम्मत बंधती है। आगे चलने का उत्साह होता है, इसीलिए साहित्य बिल्कुल नये स्तर से विकासमान तो है ही ।
चूँकि आप का संबंध ग्रामीण और शहरी परिवेश में रहा है और आपने दोनों ही जीवन को संभवता निकट से देखा है तो कोई ऐसा पक्ष या अन्तर जो आप को गहराई से कचोटता है?
देखो, २० साल तक जीवन काटा था गाँव में। अभी संबंध बना हुआ है। आना-जाना बना हुआ है। जितना मैं यहाँ रहती हूँ शहर में, उसका एक तिहाई हिस्सा मैं जरूर वहाँ रहती हूँ गाँव में। यहाँ का जीवन एक तो रूटीन है। सुबह जाना शाम को आना। यहाँ का जीवन केवल केबल टी.वी. पर जिया जाता है। मेरा शायद इससे जो काम है वह बिखर रहा है। यहाँ केवल पैसा कमाने के नीयत से आए हैं ये किसी के दिमाग से जाता नहीं है। क्योंकि कोई यहाँ का निवासी नहीं है। सभी अपने अपने घर छोड़-छोड़ कर यहाँ पर आए हैं, तो वह सोचते हैं कि हम पैसा कमाने के लिए आए हैं, चौथी बात यहाँ सुविधाएँ हैं वह सुविधाएँ ही कहीं तक कमजोर करती हैं आदमी को। अब कोई भी कह सकता है क्या सुविधा नहीं होनी चाहिए? गाँव में भी सुविधाएँ जा रही हैं तो वहाँ भी कमजोर हो जाएगा, लेकिन जिस तरह से आदमी सुविधाओं को ले रहा है वह खतरनाक है। सुविधाएँ जिस दिन गाँव में पहुँच जाएंगी गाँव-गाँव तो नहीं रह जाएगें। उनके अन्दर एक भावना रहती है। एक जुझारूपन होता है। वह भी खत्म होता चला जाएगा। रिमोट कंट्रोल वाला जीवन जहाँ भी होगा वहाँ यही सब होगा क्योंकि तुम देखते होगे। मैं उदाहरण दूँ कि, रिमोट कंट्रोल से जो बम फूटते हैं वह तीर-तलवार वाले युग से हीन हैं, क्योंकि इनमें तीर-तलवार वाली वीरता नहीं है। रिमोट कंट्रोल से जो बम विस्फोट करते हैं वो सब पीठ पीछे की बात हैं। तो उसी से पता चलता है कि उनमें कितना साहस बच गया है। पहले पीठ पर वार करना कायरता माना जाता था। अब पीठ पर ही वार करना उचित है। यह सब चीजें मैं स्त्रिायों में पाती हूँ। गाँव की स्त्री संघर्षों का सामना करती है, उसके अन्दर साहस है यहाँ की स्त्री सिर्फ अपने को बचाने में अपनी सुरक्षा में, सुख-सुविधाओं की तलाश में रहती है। जल्दी में जैसे पुरुष भी है, स्त्री भी है। यहाँ तो सभी बहुत जल्दी में हैं। सभी को सफलता चाहिए, लेकिन सफलता और सार्थकता में बहुत अन्तर है। आप सफल हो सकते हैं लेकिन आप का काम सार्थक नहीं हो सकता है। बहुत से पी.एच-डी. करने वाले जो आते हैं वह वायवा करा के डिग्री ले जाते हैं, लेकिन उनका काम कितना सार्थक होता है? काम तो ऐसा होना चाहिए कि हमारा हो या तुम्हारा किसी का काम हो उसको आगे आने वाली पीढ़ी देखे। वही चीज सार्थक है, लेकिन यही चीज यहाँ मुझे दिखाई नहीं देती है। जो संघर्ष करते हैं किसी भी स्थिति में वह साहस न खोकर और कुछ नया करने की जिद रखते हैं। देखो, खाली डे्रस बदलने से हम नहीं बदलते हैं खाली जो वेशभूषा बदलने से भाषा बदलने से हम नहीं बदलते हैं, हमको बदलना है तो अपना पूरा संस्कार बदलना होगा। इसके लिए न भाषा बदलने की जरूरत है न डे्रस बदलने की जरूरत होती है। वस्तुतः आधुनिकता बाहरी न हो, मैं तो नहीं कहूँगी नहीं होनी चाहिए। भइया खूब करो लेकिन आधुनिकता अन्दर से हो तो वह सार्थक है। एक पत्रा छपा है वार्ग्थ के अंक में। मैंने विजय बहादूर सिंह के जो कि एक समीक्षक हैं के नाम लिखा, मुझसे उन्होंने मेरी शैली के बारे में कहा था। आपकी शैली कुछ नयी नहीं है तो, मैंने कहा कि शैली के दो रूप होते हैं एक तो हम ऊपर से उसका रूप बदलते हैं उपन्यास हम किस शैली में लिखेंगे कैसे लिखेंगे या हम पाठक को कैसे आकर्षित करेंगे दूसरी अंदूरुनी लेबिल पर होती है तो मैं अंदूरुनी स्तर के बदलाव की पक्षधर हूँ। यदि आप को लगा कि मेरे उपन्यासों की स्त्री पात्रों ने पुरुष पात्रों के अन्दूरुनी जो रूढ़ संस्कार को तोड़ दिया यदि कुछ किया है तो निश्चित ही शैली में बदलाव आएगा।

Monday, June 16, 2008

नारी शोषण की अनंत कथा

- डॉ. सुनीता गोपालकृष्णन
‘अनादि अनंत' उपन्यास का कलेवर छोटा है लेकिन इसमें एक भारतीय नारी के उत्पीड़ित से उत्पीड़क बनने की लंबी कथा कही गई है। ‘कालचक्र' और ‘ज्वार' के बाद मधु भादुड़ी का यह तीसरा उपन्यास है। मूल समस्या स्त्री की है जो उपन्यास में शुरू से अंत तक बनी हुई है। नारी-लेखन मुख्यतः नारी समस्या पर ही तो केन्द्रित है। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण मुद्दा शादी का रहा है जो प्रायः नारी जीवन की दुर्दशा का मेरुदण्ड बनता है। क्योंकि अक्सर शादी का अर्थ होता है ‘एक दासी लाकर घर में बिठाना और उस पर मनमानी हुकूमत करना। कमली के माध्यम से मधु भादुड़ी जिस स्त्री-दुख को अनावृत्त करती है वह नारी-विमर्श का बिल्कुल ही नया संदर्भ है। एक ओर नारी का वह पतिव्रता और आदर्श रूप सामने आता है जो शोषण की चक्की में पिसती और घुटती है। तो दूसरी ओर वही शिक्षा के बल पर और युग के बदलाव के अनुरूप प्रबल और सशक्त रूप धारण करती है। स्त्री-उत्थान की बात जब भी उठाई जाती है तब पुरुष वर्ग पर लांछन लगाई जाती है। लेकिन इस उपन्यास में युग-युग से प्रताड़ित नारी ही नारी व्यक्तित्व का बदला ले रही है। अतः नारी के संदर्भ में जिन साहित्यिक मान्यताओं को आज तक स्वीकृति मिली है उन पर यह उपन्यास बड़ा आघात पहुँचाने वाला साबित होता है।
कमली की शादी बहुत ही कच्ची उम्र में एक निकम्मे, कायर, कमजोर आदमी से होती है। घर पर उसके तीन भाई और बाप थे। सास की कमी को ससुर पूरा करते थे। घर में एक अकेली औरत थी। इसलिए घर का सारा भार उसे अकेला ढोना पड़ा। पड़ोस की स्त्रियों से घुलने मिलने की इजाजत भी नहीं थी। अकेली लड़की को चौधरी परिवार के ‘भूतों' और ‘भैंसों' के बीच गुजारा करना पड़ा। खूब काम करके रात को जब वह नींद के आलस्य में डूब जाती है तब चौधरी का खून उबलता है। वह तो मर्द था और भला अपनी शारीरिक भूख को क्यों रोकता। पुरुष नपुंसक और स्वयं सामर्थ्यहीन होते हुए भी स्त्री को उपभोग्या से बढ़कर नहीं समझता। वह उनकी भावनाओं का आदर नहीं करता और अपनी पत्नी को पीटकर या बलात्कार करके अपने पराजयबोध और हीनताग्रंथि को छिपाते है। चौधरी की क्रूरता को लेखिका इस प्रकार व्यक्त करती है - ‘भैंस पालते-पालते चौधरी परिवार न जाने कैसे बन गया था। यद्यपि भैंसे अपने साथी संगियों पर बेबात प्रहार नहीं करती लेकिन चौधरी कमला पर अक्सर प्रहार करता था।''१ पति के प्रताड़नाओं के बावजूद वह हमेशा अपने मान-सम्मान को पति के मान-सम्मान के साथ जोड़कर देखती थी। कमली की असहाय हरकतें चौधरी को अपनी ताकत का सुखद एहसास प्रदान करती थीं। लेखिका ने यशपाल चौधरी के माध्यम से पुरुष के अस्तित्वहीन चरित्र को दिखाया है तो दूसरी ओर उसकी सामंती मानसिकता को। समाज में स्त्री-पुरुष असंतुलन का मूल कारण एक वर्ग द्वारा दूसरे के विरुद्ध अपनायी जाती है। इस तरह लेखिका ने उन परिस्थितियों का विश्लेषण किया है जो स्त्री को अंतर्मुखी, अमूर्त और ऋतु बना देती है।
बेटियों के अवमूल्यन की शुरुआत मायके से होती है। वे खुद लड़कियों को अवांछित मानते हैं। तीन-चार जवान बेटियों को घर पर बिठा रखने से माँ-बाप के ऊपर बोझ होता है। इसलिए उसकी शादी तय हो जाती है। नतीजा यह कि अपनी पसंद या रुचि का जिक्र वह खुद से भी नहीं कर पाती और उसके लिए अपने जीवन की पूर्व निर्धारित दिशा को स्वीकारने के अलावा कोई सवाल ही नहीं उठता। कमली एक मामूली परिवार की छः या सात बेटियों में तीसरी या चौथी थी। वह पढ़ाई में अपने सहपाठियों में सबसे होशियार लड़की थी। यही नहीं उसे घर के कामकाज या रसोई में कोई लगाव न रहकर किताबों में ज्यादा रुचि थी। लेकिन विडम्बना यह कि सत्राह वर्ष की अवस्था में वह निरीह बालिका एक क्रूर और हीन मनोग्रंथि वाले पुरुष से जुड़कर भविष्यहीन भविष्य में बंध जाती है। इसके फलस्वरूप उसके जीवन में प्रेम, समर्पण, त्याग आदि भावनाएँ मौजूद नहीं रहतीं जो दाम्पत्य जीवन का आधार होती हैं। इसी कारणवश शादी के बाद कमली तीन बच्चों की माँ बनती है। लेकिन इस अन्याय से बेखबर रह जाती है। लेखिका के शब्दों में ‘जिसकी आँखों ने सावन की फुहार न देखी हो उसे अनायास उस फुहार से उठती महक की लहर ताजा कर जाती है या उसकी भीगी हवाओं का स्पर्श सहला जाता है। कमली उस लहर के अनोखे जादुओं से अपरिचित रही।'२ लेखिका की राय में कमली सम्पन्न कंगाली में जा पड़ी थी। लेकिन वह अपने भीतर की कसक को बाहर की सम्पन्नता के नीचे दबा लेती है। वह रोती हुई किसी ईश्र्वर के शरण में नहीं जाती। इस तरह मधु भादुड़ी यह स्पष्ट करती है कि स्त्रियों द्वारा अपनी अस्मिता की सही खोज शिक्षा और उसके द्वारा प्राप्त जीविकोपार्जन की क्षमता से ही संभव है।
जीवन की विपरीत परिस्थितियाँ कमली को सक्षम्‌ बनाती हैं। वह अपने पति के भाइयों को ठिकाना लगाने के लिए डेरी खोलने का निश्चय करती है। समय निकालकर वह अखबार पढ़ने लगती है। कम पैसों पर घर चलाने की क्षमता हासिल करती है। घर के बाहर खुली हवा के झोंके उसे एक नया उत्साह और ताज+गी प्रदान करते हैं। कमली पुरुष वर्चस्व के दमन और शोषण से मुक्ति का आग्रह करने लगती है। स्वावलंबन के उच्च शिखर पर पहुँचकर जब कमली निर्णय लेती है तब पुरुष मानसिकता उस पर साजिश का आरोप लगाती है। लेकिन वह हार मानने को तैयार नहीं है। असंतोष और विद्रोह की भावना कमली को राजनीतिक रूप से भी सक्रिय बनाती है। वह एक सामान्य विवाहिता और माँ के स्तर से ऊपर उठकर बुनियादी मूल्यों और वसूलों वाली नारी बन जाती है। बेटे का फिजूलखर्च इतना बढ़ जाता है कि वह खुद कमाऊ बहू का एहसास करती है। वह चाहती है कि बहू ऊँचे कुल की हो ताकि नकद में ज्यादा पैसे मिले। इस तरह शोषित होते-होते स्वयं जब वह परिवार का पालनहार बनती है तो शोषक की भाषा बोलने लगती है। यहाँ से उपन्यास की कथा एक नया मोड़ लेती है।
कमली जब ससुराल आयी थी तब उसे अपना घर समझकर सारा बोझ ढोना शुरू कर दिया था जबकि उनकी बहुएँ रेनू और वीणा ससुराल को अपना घर नहीं समझ पाई। रेनू कामकाजी औरत थी और कमली उससे घर का सारा काम करवाती थी। उसे अपनी तनख्वाह सास को सौंप देना पड़ा। पति-पत्नी के बीच जब झगड़ा या मारपीट होती तो रेनू की चीख सुनाई देती। कमली को इससे और गुस्सा आती। ‘यह रोना कैसा? इन्हीं दीवारों ने घुट-घुटकर आँसू पिए थे। तो उस चुडैल को सिसककर रोने की छूट किसने दी।'३ यानि कि शोषण का सिलसिला कभी नहीं बदला। औरत-औरत के प्रति ईर्ष्या का कारण पुरुष-ईर्ष्या ही हो सकती है।
जब रेनू ने एक बच्ची को जन्म दिया तब पहले कमली उसे देखना नहीं चाहती थी। लेकिन धीरे-धीरे माँ की ममता और स्नेह उसमें कुछ बदलाव लाया। तब तक दोनों बहुएँ सास के व्यवहार के प्रति प्रतिक्रिया करने लगीं। पोती के प्रति कमली के अपार प्रेम को देखकर रेनू अपने गुस्से को उस पर उतारने लगी। जब कमली बीमार पड़ गई तब दोनों बहुएँ उसकी सेवा से विरत हो गईं। प्रदीप की नजर तकिए के आसपास मंडरा रही थीं जहाँ कमली की आलमारी की चाबियाँ होने की संभावना थी। उसे कुछ पैसों की जरूरत थी। जब अस्पताल ले जाने के लिए कमली को उठाया जाता है तब उसकी क्षीण आवाज सुनाई दी - ‘मुझे मत उठाओ, यहीं रहने दो। उसे पता नहीं कि मुझे भी भीष्म पितामह का वरदान मिला है।''४ इतना कहकर कमली के हाथ टाँग के प्लास्टर के अंदर रखी चाबियाँ धीरे से निकलकर मुट्ठी में बंद कर दी। यह कोई दुर्बल या असहाय वाणी प्रतीत नहीं होती, न ही वह कोई बेहोशी का बड़बड़ाना है। यह शोषण की अवचेतन धारा है जो सदियों बहती आ रही है और अनन्त तक बहती चली जाएगी। यह निश्चय ही किसी शोषक या सत्ताधारी का कथन है कि उसे स्वच्छंद मरण का वरदान मिला है। चाहे उसे ‘वरदान' कहे या ‘अभिशाप'। उसे प्रारब्ध के बहाव से कभी छुटकारा नहीं मिलता। शोषण का बहाव निरन्तर बना रहेगा चाहे वह पुरुष का नारी के प्रति हो या औरत का औरत के प्रति।
सम्पूर्ण उपन्यास कमली की शोषित से शोषक बनने की कथा पर केन्द्रित है। आरम्भ में कमली एक परम्परावादी स्त्री और पत्नी की हैसियत से अपने पति के कोप और ताड़ना को निःशब्द सहती है और उसके आत्मसम्मान और इज्जत को बचाती रहती है। लेकिन इस शोषण में वह घुट-घुटकर मरती नहीं बल्कि इससे मुक्ति चाहती है। वह अपनी कर्तव्यपरायणता, मानसिक वेग और प्रेरणा के प्राबल्य से अपने परिवार का पालनकर्ता बन जाती है। इस प्रकार जब स्त्री पुरुष के दबाव से ऊपर उठती है, तब उसके व्यक्तित्व का विकास हो पाता है और वह पारिवारिक और सामाजिक जीवन की धुरी बन जाती है।
उपन्यास में स्त्री-चरित्रऔर विश्लेषण नारी-मनोविज्ञान का सहारा लेकर किया गया है। घरेलू जिम्मेदारियाँ और निरन्तर उपेक्षा उसके लिए मानसिक तनाव का कारण बन जाती हैं। इसके फलस्वरूप वह अस्वाभाविक रूप से क्रूर, हृदयहीन और विद्रोहिणी बन जाती है। इसलिए कमली के जीवन का उत्तरार्द्ध उसके पूर्वार्द्ध की प्रतिक्रिया बनता है। पुरुष के कोप और प्रताड़ना को सहने के कारण उसके मन में पुरुष, ईर्ष्या जागृत होती है जिसके फलस्वरूप वह औरत के साथ अन्याय करती है।
भारतीय विदेश सेवा में कार्यरत और प्रायः विदेश में ही रहने वाली लेखिका ने तेजी से बदलती भारतीय परिवेश और संस्कृति के यथार्थ पर पैनी नजर रखी है। अपने रचनाकर्म से उसने यह साबित भी किया है। ‘अनादि अनंत' में लेखिका ने अनादि से अनंत तक बहती जाने वाली नारी शोषण पर प्रकाश डाला है और इस शोषण से मुक्ति की कामना भी की है। राजनीतिक, सामाजिक और पारिवारिक जीवन की विसंगतियाँ उपन्यास को समकालीनता से अंतर्ग्रन्थित करती हैं।

Sunday, June 15, 2008

मध्यकालीन हिन्दी भक्तिकाव्य और नारी-विमर्श के आयाम

- प्रो. रमेश शर्मा
नारी-विमर्श वर्तमान साहित्य-चिन्तन का एक सुचिन्तित आयाम है। नारी-विमर्श और दलित-विमर्श हिन्दी साहित्य के मनीषियों के लिए आज उसी प्रकार लुभावने फैशन बन गए हैं, जिस तरह कभी मार्क्सवाद को हिन्दी मनीषियों ने अपने को प्रतिष्ठित करने के लिए अपनी विशेष पहचान के रूप में एक साहित्यिक फैशन बनाकर अपनाया था। विमर्शन को कभी काल की सीमाओं में बाँधकर नहीं देखा जा सकता। इसे किसी सिद्धान्त विशेष के रूप में भी सीमित नहीं किया जा सकता। यह तो जीवन-संदर्भित चिन्तन का एक सतत्‌ प्रवाह होता है जो विभिन्न माध्यमों से विभिन्न रूपों में प्रकाशित होता है। जीवन के अनुभूतिगत प्रकाश का प्रकाशन ही विमर्शन है। साहित्य भी जीवन के अनुभूतिपरक प्रकाशन का एक माध्यम है। साहित्य की अबाध धारा जीवन के विविध आयामों को निरन्तर विमर्शन की ओर ले जाती है। नारी-विमर्श भी मानव के जीवन-संदर्भित विमर्श का एक आयाम है जिसके सम्यक्‌ स्वरूप तब तक नहीं समझा जा सकता जब तक हम मानव-जीवन से उस प्रस्थान बिन्दु तक न जायें जहाँ मानव एक संस्कारित जीवन की ओर उन्मुख हुआ है।
मानव का सामाजिक स्वरूप और तज्जन्य सामाजिक व्यवस्था पुरुष और नारी के शारीरिक, मानसिक और भौतिक संदर्भों में सामरस्य हेतु बनी परस्पर सहमति का परिणाम है। मानव-जीवन में सामरस्य की खोज में हुए विमर्श का परिणाम ही समाज की परिवार व्यवस्था है। परिवार के रूप में स्त्री और पुरुष ने अपनी रागात्मिका वृत्ति को आधार बनाकर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए एक ऐसी सामाजिक संस्था का विकास किया जिसका विस्फार ही सामाजिक संरचना और जीवन के अनेक संदर्भों पर आधारित सामाजिक व्यवस्था है जिसका एक प्रधान अंग नारी है। अतः नारी-विमर्श की अवधारणा को हमें परिवार नामक संस्था की स्थापना के संदर्भ से ही देखना होगा।
यह सहज अनुमन्य है कि प्रारम्भ में मानव समाज के प्रादुर्भाव के समय नारी और पुरुष के कार्य-संसार का विभाजन उनकी प्रवृत्तियों और क्षमताओं के आधार पर दोनों की सहमति से ही हुआ होगा। नारी की इस सहमतिजन्य जीवन-अस्मिता के स्वरूप में ही हम आज के नारी-विमर्श के बीज खोज सकते हैं।
भारतीय सामाजिक चिन्तन और साहित्य में नारी-विमर्श की एक अविच्छिन्न श्रृंखला है जिसके आधारभूत तत्त्व नारी-देह की प्राकृतिक संरचना, नारी-मनोविज्ञान और नारी-जीवन के सामाजिक संदर्भ रहे हैं। आज की नारी-विमर्श सम्बन्धी धारा भी इन्हीं आधारभूत तत्त्वों से किसी न किसी रूप में जुड़ी हुई हैं, नारी-विमर्श के प्रति अतिशय मोह और समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन के नारों से मोहित विद्वानों द्वारा अपनी पहचान बनाने की होड़ ने नारी-विमर्श को भटकाव के रास्ते पर लाकर छोड़ दिया है जिससे मानव-समाज का रचनातंत्रा चरमरा रहा है लेकिन उसके सामने नव निर्माण की कोई दिशा नहीं है।
प्राचीन भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक साहित्य में नारी की सृजनशक्ति को आधार बनाकर उसकी अर्थवत्ता को स्वीकार करते हुए नारी-विमर्श की नींव रखी गई है। भारतीय संस्कृति के प्राण आगम और निगम दोनों में ही नारी के महत्त्व और जीवन में उसकी अर्थवत्ता को स्वीकार किया गया है। मनुस्मृति भारतीय सामाजिक व्यवस्था का मूलभूत दस्तावेज है। आज के बदलते संदर्भों में उस व्यवस्था पर अनेक प्रश्न-चिह्न लग जाते हैं क्योंकि कोई भी व्यवस्था काल प्रवाह के संदर्भ अप्रासंगिक हो जाती है और होनी भी चाहिए, लेकिन किसी भी व्यवस्था की सामाजिक संचेतना कभी अप्रासंगिक नहीं हो सकती यदि वह मानव-मनोविज्ञान को आधार बनाकर चली है। मनुस्मृति के साथ भी ऐसा ही है, उसमें वर्णित सामाजिक व्यवस्था जिस मानव-मनोविज्ञान को आधार बनाती है वह सामाजिक संरचना के लिए कभी अप्रासंगिक नहीं हो सकती। मानव-मनोविज्ञान की उपेक्षा कर अस्तित्त्व में आयी मार्क्सवादी सामाजिक व्यवस्था की दुर्दशा आपके सामने है। मनुस्मृति में सामाजिक संरचना के लिए नारी के रूप में एक जीवन-दृष्टि है, लेकिन रचनात्मक रूप में, ध्वंसात्मक रूप में नहीं, साथ ही मानव-मनोविज्ञान के गंभीर चिन्तन के बाद।
स्मृतियों में नारी-विमर्श को सामाजिक न्याय का आधार दिया गया है। मनु नारी के जीवन-संदर्भ में नारी को पुरुष के साथ समानता का अधिकार देते हुए कहते हैं-
यो भर्त्ता सा स्मृताङ्गना।
(जो भर्त्ता है वही भार्या है)
अन्यत्र भी -
स्वेच्छामयः स्वेच्छया च द्विधा रूपो बभूव ह।
स्त्री रूपो बामभागांशो दक्षिणांशः पुमान स्मृतः॥

मनु ही नहीं याज्ञवल्क्य भी परिवार के संदर्भ में नारी-विमर्श को केन्द्र में रखकर कहते हैं -
भर्तृभ्रातृ पितृजाति श्वश्रुश्वसुर देवरैः।
बन्धुभिश्च स्त्रिायः पूज्यां।
अर्थात्‌ समाज में नारी के सभी सम्बन्धिओं द्वारा नारी पूज्य है।
केवल स्मृतियों में ही नहीं भारतीय आध्यात्मिक चिन्तन में भी शक्ति-परिकल्पना और शाक्त-साधना के रूप में नारी शक्ति की प्रकारान्तर से यथार्थ स्वीकृति रही है। देवी भागवत में स्त्री-शक्ति को समस्त कलात्मक जगत्‌ का पर्याय माना गया है -
विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः,
स्त्रियः समस्ता सकला जगत्सु।
शक्ति संगम तंत्र में शक्ति रूपा नारी का स्वरूप वर्णन करते हुए नारी-विमर्श को सामाजिक संदर्भ में एक विशिष्ट आयाम के रूप में दिशा दी गई है -
‘नारी त्रैलोक्यजननी नारी त्रैलोक्यरूपिणी।
नारी त्रिभुवना धारा नारी देहस्वरूपिणी॥
...
न च नारी समं सौख्यं न च नारी समागतिः।
न नारी सदृशं भाग्यं न नारी सदृशो तपः॥
...
न नारी सदृशो योगो न नारी सदृशं यशः।
न नारी सदृशं मित्रं न भूतो न र्भाविष्यति॥
प्राचीन भारतीय चिन्त-धारा का यह नारी-विमर्श आध्यात्मिक चिन्ताधारा में विलीन होकर जीवन-व्यवहार में नारी-अस्मिता को बहुत सुदृढ़ आधार नहीं दे सका। पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्था के विकास के साथ जिस पुरुष मनोविज्ञान का विकास हुआ वह नारी-मनोविज्ञान के प्रकाश में विकसित होने वाले नारी-व्यक्तित्व के सहज विकास में बाधक होता चला गया। इसी का परिणाम है कि सामाजिक व्यवस्था में नारी-जीवन अनेक विद्रूपताओं का शिकार होता चला गया। पुरुष के निरंकुश जीवन और उसकी सामंती मनोवृत्ति ने नारी के अधिकारों का अपहरण करके उसकी सहज अस्मिता पर संकट खड़ा कर दिया। मध्यकाल तक आते-आते नारी-जीवन अनेक विसंगतियों से भर गया था, यही कारण है कि हिन्दी भक्तिकाव्य धारा में नारी-विमर्श सशक्त होकर रचनाओं के रचनातंत्र और रचना-रहस्य के रूप में आया है। सन्त काव्य को छोड़कर हिन्दी भक्तिकाव्य की सम्पूर्ण काव्य-चेतना सामाजिक संदर्भ में नारी-विमर्श को ही केन्द्र में रखकर अपने रचनातंत्र का निर्माण करती है। नारी-जीवन की अस्मिता इस काव्यधारा के रचना रहस्य के रूप में अनुभावित की जा सकती है।
मध्यकाल तक नारी-जीवन सामान्यतः मानव-समाज की आधारभूत संस्था परिवार तक ही सीमित था। पारिवारिक संरचना को सुदृढ़ करने के लिए नारी-विमर्श को एक ऐसा मोड़ दे दिया गया जिसमें नारी व्यक्तित्व के सहज विकास की पूर्णतः उपेक्षा थी। नारी-विमर्श की यह धारा नारी-मनोविज्ञान की उपेक्षा कर उसे कृत्रिम आदर्शों पर बने सामाजिक साँचे में ढालने का प्रयत्न कर रही थी। हिन्दी भक्तिकाव्य धारा के नारी-विमर्श की इस विसंगति को पहचाना और अपनी सामाजिक चिन्ता को सामाजिक संदर्भ में विकृत हुए उस नारी-जीवन की ओर मोड़ दिया जिसकी बेड़ियों में कसी हुई नारी बिबस होकर कराह रही थी। नारी-विमर्श की यह करवट हमें हिन्दी सूफी कवियों ने अपनी रचनाओं के रचनातंत्रा के कथा सूत्रों के माध्यम से नारी-जीवन की पीड़ाओं को स्पष्ट रूप से उभारा और उसे आदिकालीन साहित्य में अभिव्यक्त नारी-विमर्श सम्बन्धी उस काव्य-चेतना से जोड़ा जो रासो काव्य में दबे स्वर में दिखाई दे रही थी। हिन्दी रासो-काव्य को यदि नारी-विमर्श की दृष्टि से देखा जाए तो वहाँ जीवन-अस्मिता को लेकर नारी का अन्तर्द्वन्द्व विद्रोह और स्वातंत्रय के लिए छटपटाहट दिखाई देती है। पृथ्वीराज रासो की पद्मावती हो या बीसलदेव रासो की राजमती, पुरुष प्रधानसमाज के निरंकुश तंत्रा को चुनौती देती हुई अपने अस्तित्त्व को प्रतिष्ठित करती हुई नारी की वैयक्तिक पहचान और नारी मुक्ति आन्दोलन की प्रेरणा-सी दिखाई देती हैं। सूफी काव्य धारा के अमर कवि जायसी अपनी रचना पद्मावत में कथा सूत्रों से जिस रचनातंत्रा की रचना करते हैं वह आदि से अन्त तक नारी-विमर्श के चारों ओर घूमता है। पद्मावत में पद्मावती और नागमती का जिन जीवन संदर्भों में रखकर जायसी प्रस्तुत करते हैं उससे नारी अस्मिता को केन्द्र में रखकर नारी-विमर्श को सही दिखा पाने के लिए एक सशक्त आधार मिलता है। पद्मावत में पद्मावती और नागमती की चरित्र-संकल्पना मानव-समाज में विसंगतियों से घिरे हुए नारी-जीवन की व्यथा-कथा है। यह कथा पुरुष-प्रधान समाज में नारी-अस्मिता के संदर्भ में अनेक प्रश्न खड़े करके नारी-विमर्श को गति प्रदान करती है जिसकी गूँज हमें आधुनिक काल की छायावादी कृति कामायनी तक दिखाई देती है। जायसी अपने नारी-विमर्श में नारी-जीवन की चिन्ताओं से ग्रस्त होकर इस संदर्भ में समाधान की व्यंजना भी करते दिखाई देते हैं। यहाँ पद्मावत में अभिव्यक्त नारी-विमर्श को सम्पूर्ण में लेना तो संभव नहीं है लेकिन एक-दो प्रसंगों पर विचार किया जा रहा है जिनको आधार बनाकर पद्मावत की व्याख्या नारी-विमर्श के संदर्भ की जा सकती है। यह हिन्दी के शोधकर्त्ताओं के लिए शोध का एक बिन्दु है।
पद्मावत में पद्मावती के प्रसंग में नारी-जीवन को उसके बाल्यकाल से विवाहोत्तर काल तक देखा गया है। पुरुष प्रधान समाज में नारी की अर्थवत्ता पुरुष की भोग्या के रूप में ही देखी जाती रही है। वह अपनी कुण्ठा से ग्रस्त होकर उसे वर्जनाओं के घेरे में बाल्यकाल से ही डालना चाहता है। वह नहीं चाहता कि विवाह से पूर्व किसी भी नारी को काम-भावना का बोध हो। पुरुष का यह सोच नारी के स्वाभाविक मनोविज्ञान के विपरीत है। स्वाभाविक विकास को वर्जनाओं की बेड़ियों में जकड़कर नहीं रोका जा सकता। पुरुष की इसी कुण्ठा का प्रतिफल है कि नारी-पुरुष सम्बन्धों को लेकर समाज में निरन्तर टकराहट की स्थिति बनी रहती है। जायसी पुरुष की इस कुण्ठा और नारी-मनोविज्ञान के अनुपम पारखी हैं। वे पद्मावती के विवाह पूर्व जीवन के द्वारा इसी तथ्य की व्यंजना करते हैं जो उनके नारी-विमर्श का एक क्रमबद्ध आयाम है। पद्मावती जब मात्रबारह वर्ष की है उसे पिता द्वारा वर्जनाओं की बेडियों में जकड़ दिया जाता है-
बारह बारह माहै भई रानी। राजै सुना संजोग सयानी।
सात खंड धौराहर तासू। सो पद्मिनी कहँ दीन निवास।
और दीनी संग सखी सहेली। जो संग करै रहसि रस केली।
सबै नवल पिउ संग न सोई। कँवल पास जनु बिगसी कोई।
जायसी जानते हैं कि पुरुष की ये वर्जनाएँ नारी के स्वाभाविक विकास को नहीं रोक सकती। पद्मावती में स्वाभाविक रूप से काम-भावना का विकास होता है और पुरुष की इस मनोवृत्ति को लक्ष्य कर अपने पिता को केन्द्र में रखकर पद्मावती नारी की वेदना व्यक्त करती है -
एक दिवस पद्मावति सनी। हीरामनि तइँ कहा सयानी।
सुनु हीरामनि कहौं बुझाई। दिन-दिन मदन सतावै आई।
पिता हमार न चालै बाबा। त्रासहि बोलि सकै नहिं माता।
जायसी पद्मावती के द्वारा माता के सन्दर्भ से पति के त्रास से नारी के घुटन भरे जीवन की व्यंजना करते हैं। नारी की क्या ही अजीब नियति रही है कि वह अपने पति को उचित सलाह भी देने में भी डरती है।
नारी-जीवन की यह नियति रही है कि वह हमेशा अपने भविष्य को लेकर अविश्वास और संशय से ग्रस्त रहती है। पितृगृह में रहते हुए जहाँ उसे वह अपना घर नहीं कह सकती, वहीं पतिगृह में होने वाले अनात्मीय व्यवहार को लेकर सदैव आशंकित रहती है। जायसी नारी-जीवन के इस आयाम को भी अपने नारी-विमर्श में बड़े सहज ढंग से उठाते हैं। विवाह के बाद नारी के प्रति ससुराल पक्ष से होने, व्यवहार और अत्याचारों की व्यंजना जायसी की इन पंक्तियों में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।
‘ए रानी! मन देसु विचारी। एहि नैहर रहना दिन चारी।
जौ लगिं अहै पिता कर राजू। खेलि लेहु जो खेलहु आजू।
पुनि सासुर हम गवनव काली। कित हम कित यह सरवर पाली।
सासु ननद बोलिन्ह जिउ लेही। दारुन ससुर न निसरै देही।
पिउ पियार सिर ऊपर, पुनि सो करै दहुं काह।
दहुं सुख राखै की दुख, दहुँ कस जनम निवाह॥
उपर्युक्त पंक्तियों के वाच्यार्थ पर यदि ध्यान दिया जाए तो इससे जायसी के नारी-विमर्श की उस भावभूमि की व्यंजना है जो नारी की उस नियति से जुड़ी हुई है जहाँ नारी हमेशा से दो परिवारों द्वारा स्वीकृति और अस्वीकृति के बीच झूलती रहती है। नारी का जीवन उस टूटी डाली की तरह है जो पति के परिवार रूपी वृक्ष के साथ हमेशा विजातीय ही बनी रहती है। उसका मन हमेशा अपने जीवन और भविष्य को लेकर आशंकित बना रहता है। नारी-जीवन की यह विसंगति इस शताब्दी में बहुत दूरी तक जस की तस बनी हुई है। यह भव्युला में नारी-मन की यह आशंका और पीड़ा जायसी के चिन्तक और संवेदनशील मन को झकझोरती है और वे पद्मावती के स्वर में नारी-विमर्श के एक आयाम को आधार देते हैं।
एक-दो प्रसंग ही नहीं पद्मावत का पूरा रचनातंत्र अपने वाच्यार्थ में मध्यकालीन भक्तिकाव्य में अभिव्यक्त नारी-विमर्श की एक कड़ी है। रत्नसेन द्वारा पद्मावती की प्राप्ति के लिए नागमती को छोड़कर जाना, अलाउद्दीन और देवपाल प्रकरण जायसी के नारी-विमर्श की अभिव्यक्ति के आयाम के रूप में देखे जा सकते हैं। जो नारी जीवन की नियमित और पुरुष-मनोविज्ञान पर विचार करने के लिए प्रेरक तत्त्व के रूप में हमारे सामने हैं।
हिन्दी रामभक्तिकाव्य धारा के पुरोधा तुलसी नारी-विमर्श के अनेक आयामों को लेकर अपनी रामकथा का ताना-बाना बुनते हैं। वहाँ कथा सूत्रा तो परम्परा से गृहीत हैं लेकिन रचनातंत्रा और रचना रहस्य तुलसी का अपना है। वे नारी-अस्मिता से जुड़े विविध प्रसंगों को उठाकर नारी-विमर्श की धारा को कई आयाम देते हैं। सीता स्वयंवर, सीता का वनगमन, सूर्पणखा प्रसंग, सीता-हरण प्रसंग, अहल्या प्रसंग, तारा, मन्दोदरी आदि के प्रसंग नारी-विमर्श के विविध आयामों की बड़े सशक्त ढंग से व्यंजना करते हैं। तुलसी पर नारी विरोधी होने का आरोप लगाने वाले तुलसी की काव्य-चेतना को नहीं देख पाते क्योंकि उनकी आँखों पर तो परम्परा-विरोध की पट्टी बँधी हुई है। वे नहीं देखते कि तुलसी किस प्रकार नारी के शील की जकड़न की कसमसाहट नारी के द्वारा ही व्यक्त करते हैं। तुलसी जानते हैं कि शील के नाम पर नारी की मानसिकता को किस प्रकार जकड़ दिया है कि उसके मन लड़की होने का एहसास उसे हमेशा विवशता का बोध कराता है। यहाँ तक कि अपने जीवन-साथी के वरण के लिए भी वह स्वतंत्र नहीं है। वरण तो दूर की बात अपने मन की बात वह किसी से कह भी नहीं सकती कि उसे कैसा वर चाहिए। सीता-स्वयंवर प्रकरण स्वयंवर प्रथा का एक मजाक-सा है। स्वयंवर में लड़की द्वारा अपने पति का स्वयं ही वरण करने की अवधारणा निहित है। तुलसी इस अवधारणा को अच्छी तरह जानते हैं। वे इस प्रकरण को रामकथा में उठाते हैं। गीतावली में तुलसी की सीता अपने होने वाले पति के सम्बन्ध में अपनी कामना प्रकट करना चाहती है लेकिन लड़की होने का बोध और तज्जन्य शील के बंधन में जकड़ी उसकी विवशता उसे अपनी कामना व्यक्त करने से रोक देती है -
पूजा पारवती भले भाय पाँय परिकै।
सजल, सुलोचन, सिथिल तनु पुलकित,
आवै न वचन, मन रह्‌यौ प्रेम भरिकै।
अंतरजामिनी, भवभामिनी, स्वामिनी सौं हैं,
कही चाहौं बात, मातु अन्त तौ हौं लरिकैं।
रामचरितमानस की रामकथा का धनुष यज्ञ प्रसंग नारी-जीवन की नियति को लेकर तुलसी के नारी विमर्श का एक आयाम है। तुलसी की रामचरित मानस की सीता राम से विवाह करना चाहती है लेकिन पिता की असंगत हठ को लेकर शंकित मन में उठता उसका करुण क्रन्दन नारी-जीवन की विवशता की कथा कह रहा है -
जानि कठिन सिव चाप विसूरति। चली राखि उर स्याम सुम्‌रति॥
तुलसी का नारी-विमर्श केवल सीता के मन के क्रन्दन की अभिव्यक्ति से ही संतुष्ट नहीं होता। वह नारी में छिपी विद्रोही भावना को सीता की माता के स्वर में व्यक्त करते हैं। सीता की माता राजा जनक की अविवेकपूर्ण प्रतिज्ञा से सीता के जीवन के प्रभावित होने की आशंका से पति के प्रति विद्रोही स्वर में मुखर हो उठती है-
सखि सब कौतुक देखनिहारे। जेउ कहावत हितू हमारे॥
कोउ न बुझाइ कहइ गुर पाहीं। ए बालक असि हठभल नाहीं।
...
भूप सयानप सकल सिरानी। सखि विधि गति कछु जात ना जानी॥
रामकथा के उपर्युक्त प्रसंग तो तुलसी के नारी-विमर्श की भूमिका भर कहे जा सकते हैं। रामकथा के पूरे रचनातंत्रा में तुलसी के नारी-विमर्श को यदि देखना है तो उसमें नारी जीवन संदर्भों पर गंभीरता से शोध करनी होगी।
हिन्दी भक्तिकाव्यधारा में कृष्णकाव्य का रचनातंत्र तो एक प्रकार से नारी-अस्मिता की भावभूमि का पर्याय कहा जा सकता है। यदि आध्यात्मिक आवरण को हटाकर कृष्ण कथा को सामाजिक संरचना के संदर्भ में देखा जाए तो वहाँ पुरुष-मनोविज्ञान और नारी-मनोविज्ञान के संदर्भ में नारी-जीवन की अस्मिता का ऐसा संसार दिखाई देता है जिसमें नारी जीवन की मुस्कराहट तो बहुत कम है लेकिन उसकी कराह ही अधिक दिखाई देती है। उसमें क्रमबद्ध रूप में पुरुष-मनोविज्ञान के जाल में फँसती हुई नारी पश्चाताप और करुण क्रन्दन ही अधिक दिखाई देता है जो नारी-विमर्श का एक यथार्थ परक आयाम है। सूरसागर की कृष्ण कथा ही नहीं साहित्य लहरी का नायिका भेद भी सूर के नारी-विमर्श का एक आयाम है। यहाँ हम कुछ उदाहरणों से सूर के नारी-विमर्श पर दृष्टिपात करेंगे।
सूरसागर में भ्रमरगीत प्रकरण नारी-विमर्श का एक सशक्त बिन्दु है। भ्रमरगीत प्रकरण में गोपियों के रूप में यदि नारी-जीवन को देखा जाए तो वह समाज का एक ऐसा यथार्थ है जो आज भी हमारे सामने एक ज्वलंत समस्या के रूप में विद्यमान है। सूर कृष्ण के द्वारा गोपियों की उपेक्षा को वर्ग-चेतना के संदर्भ में देखना चाहते हैं। सूर की गोपियाँ कृष्ण को दो रूपों में देखती हैं। १. गोकुल के कृष्ण-जो गोपाल है, उनके ग्रामीण परिवेश के साथी हैं। २. मथुरा के कृष्ण जो राजा है - यादवनाथ हैं। गोकुल से मथुरा जाकर कृष्ण का वर्ग बदल जाता है। वह सामान्य ग्वाले से राजा हो जाते हैं और वहाँ जाकर एक नारी कुब्जा को अपना लेते हैं। कुब्जा तन से कुब्जा हो या न हो लेकिन वह मन से कुब्जा है ही, जो गोपियों के कृष्ण को गोपियों से छीन लेती है। कृष्ण भी राजा होकर गोपियों को छोड़ देते हैं और पराकाष्ठा तो तब होती है, जब वे उद्धव के द्वारा गोपियों को दूसरे आलम्बन के वरण का संदेश देते हैं। सूर के नारी-विमर्श की व्यंजना इस बिन्दु पर निम्न पंक्तियों में देखी जा सकती है -
१. कहौ कहाँ तैं आये हौ।
जानति हौं अनुमान मनो तुम जादवनाथ पठाए हौ॥
...
मधुवन की कामिनी मनोहर तहँहिं जाहु जहँ भाए हौ॥
२. हमको जोग, भोग कुब्जा को काके हिमै समात।
नारी-विमर्श के संदर्भ में यदि सूर के इन प्रकरणों को देखा जाए तो आज भी ऐसे धूर्त पुरुष मिलते हैं जो पढ़-लिख अच्छा पद प्राप्त करते ही अपनी अशिक्षित ग्रामीण पूर्व परिणीता को धोखे में छोड़कर उसके विश्वास को तोड़ते हुए उसे उसकी नियति पर छोड़ देते हैं इसके साथ समाज में ऐसी कुब्जाएँ भी है नारी के अधिकारों पर आघात करके ऐसे पुरुष को अपनी धूर्तता के जाल में फँसा लेती हैं और हद तो तब होती है जब ऐसी स्त्री-पुरुष नारी के प्रति संवेदनापूर्ण लेखन करते हुए बेशर्मी के साथ नारी-विमर्श का झण्डा थाम लेते हैं।
सूर की साहित्यलहरी सूर के नारी-विमर्श को एक नया आयाम देती है। साहित्य लहरी के वर्ण्य-विषय के केन्द्र में नायिका-भेद है। नायिका-भेद में स्वकीया नायिका का स्वरूप नारी का पूर्ण आदर्श माना गया है। सूर नारी-विमर्श के धरातल पर खड़े होकर इस रूप में पुरुष द्वारा थोपे गए आदर्श की स्वीकृति-अस्वीकृति के बीच झूलते दिखाई देते हैं। सूर की राधा के स्वकीया के रूप में चित्रित आदर्श पर एक गोपी व्यंग करती हुई कहती है -
राधे कियौ कौन सुझाव।
प्रानपति वेदन विभूषित सुन गुन चितचाव॥
भानुवंसी रस सुधागृह हैं न निकसन पाव।
रजनिचर गुन जान....॥
गोपी राधा के रूप में नारी द्वारा पुरुष के लिए एक पक्षीय सर्वतो भावेन समर्पण पर प्रश्न चिह्न लगाती है। गोपी का यह प्रश्न चिह्न नारी-जागरण की भूमिका के लिए सूर के नारी-विमर्श की रूपरेखा की एक दिशा है।
साहित्य लहरी में नायिका-भेद के प्रसंग से सूर ने नारी-जीवन और नारी-अस्मिता से सन्दर्भित अनेक प्रश्न उठाकर नारी-विमर्श को यथार्थ दिशा देने का प्रयास किया है। पुरुष द्वारा अल्पवयस्यक बालिका के यौन-शोषण की समस्या को सूर मुग्धा नायिका के एक भेद अज्ञात यौवना के प्रसंग से उठाते हैं। काम भावना से प्रेरित पुरुष यह नहीं देखता कि जिस पर कुदृष्टि डाल रहा है वह शारीरिक और मानसिक रूप से काम-संदर्भों के लिए उपयुक्त है या नहीं। साहित्य लहरी के निम्न पद में नारी-जीवन से संबंधित इस ज्वलंत समस्या की व्यंजना करते हुए सूर पुरुष द्वारा विवेक से काम लेने की सलाह देते हैं -
हरि उर पलक धारौ धीर।
हित तिहारे करत मनसिज सकल सोभातीर॥
उपर्युक्त विवेचन के आधार पर हम कह सकते हैं कि मध्यकालीन हिन्दीभक्ति काव्य धारा आध्यात्मिक चेतना पर आधारित कोरा भाव-विलास ही नहीं है, उसमें कहीं वाच्यार्थ में तो कहीं प्रतीकार्थ में सामाजिक चिन्ताओं का सन्निवेश है और उसमें भी विशेषकर नारी जीवन की विषमताओं का, जो नारी-विमर्श की धारा को युगानुरूप निरन्तर गति देती हैं। हिन्दी के शोध कर्त्ताओं और विद्वानों से भक्त साहित्य में नारी-विमर्श को एक अविच्छिन्न कड़ी के रूप में देखे जाने की अपेक्षा की जा सकती है।

Saturday, June 14, 2008

दादूदयाल : एक परिचय

शगुफ्ता नियाज़



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दादू पंथी का स्वरूप
दादू के देहान्त के उपरान्त पंथ में काफी परिवर्तन हो गया था। उनके जीवनकाल में पंथ के अनुयायी अपने आपको किसी जाति, वर्ग, सम्प्रदाय या मत में नहीं मानते थे। सभी के साथ समानता का व्यवहार होता था समाज की भलाई करना वे अपना कर्तव्य समझते थे। इनकी मृत्यु के बाद इनके अनुयायियों में आपसी वैमनस्य बढ़ गया, उनकी मनोवृत्ति कल्याणकारी न होकर व्यक्तिगत स्वार्थ तक सीमित हो गयी थी। पंथ में धीरे-धीरे उदर-पोषण एवं इन्द्रिय दर्पण की समस्याएँ खड़ी हो गयी४९ और कई उपसम्प्रदाय बन गये।


हिन्दी विश्वकोश में दादू पंथी को तीन श्रेणियों में विभक्त किया है५० - १. विरक्त, २. नागा तथा ३. विस्तरधारी
विरक्त
जो विषय रागशून्य होकर परमार्थ साधन में समय बिताते हैं, वे लोग विरक्त कहलाते हैं। इन लोगों के शरीर पर केवल एक वस्त्र और हाथ में कमंडलु रहता है। उनके सिर पर कोई आवरण नहीं रहता।
नागा
ये लोग अस्त्रधारी होते हैं, रूपये पैसे मिल जाने पर युद्ध करने को भी तैयार हो जाते हैं। ये सब युद्धकार्य में बड़े दक्ष होते हैं। बहुत से राजा नागा सेना अपने यहाँ रखते हैं।
विस्तरधारी
ये लोग साधारण मनुष्यों की तरह भिन्न-भिन्न प्रकार के व्यवसाय करते हैं।
उपयुर्क्त ये तीन शाखाएं फिर से विभक्त होकर कई एक प्रशाखाओं में बँट गयी हैं। जिनमें से ५२ प्रशाखा प्रधान है। गरीबदास, मस्कीनदास, रज्जबदास एवं सुन्दरदास के बाद तो उपसम्प्रदायों की भी शाखायें बन गयीं। उप सम्प्रदायों में पाँच को मुख्य स्थान मिला। यों तो दादू पंथियों में साधुओं के अतिरिक्त सद्गृहस्थों को भी उचित स्थान मिला था। इन्हें सेवक कहकर पुकारा जाता था लेकिन दादूपंथियों के उपसम्प्रदायों की ये कोटियाँ है -
दादू पंथ में अनेक उपसम्प्रदाय निर्मित हो गये हैं उनमें से पाँच को प्रमुख माना गया है। इन सबमें खालसा का स्थान महत्त्वपूर्ण हैं। इनका स्थान तथा प्रधान केन्द्र नरैणा में है। इनमें अनेक विद्वान भी हैं जो साधना एवं उपदेशों में रत रहना ही अपना कर्तव्य मानते हैं। वे अपने आपको शुद्ध और पवित्र दादूपंथी समझते हैं। खालसा के सदस्यों का विशेष ध्यान अध्ययन, अध्यापन तथा भजन-आराधना की ओर रहा करता था। इनमें कुछ लोग गृहस्थ भी हैं। दादू पंथियों की एक शिक्षा संस्था दादू महाविद्यालय के नाम से जयपुर में जेठ सुदी १० सम्वत्‌ १९७७ से स्थापित है।५१
खालसा सम्प्रदाय के बाद नागा सम्प्रदाय आता है। इसके प्रवर्तक सुन्दर दास जी हैं। ये साधक ब्रह्‌मचारी होने के साथ-साथ सैनिक के गुणों से भी युक्त थे। ये विरागी साधक होकर भी युद्धवीर थे। ये लोग अधिक नग्न रहते हैं वस्त्र धारण नहीं करते हैं। वस्त्रों की सादगी इनका मुख्य लक्षण है।५२ भारतीय इतिहास में सन्‌ १८५१ ई० में इन नागाओं ने समर्पित योगदान दिया था।
नागा सम्प्रदाय के उपरान्त उत्तरदायी उपसम्प्रदायों की स्थापना बनवारीदास ने पंजाब में की थी। पटियाला से ये धीरे-धीरे पूरे उत्तर भारत में अपना प्रभाव स्थापित करने लगे। इसमें इसके प्रवर्तक गुजरात, पंजाब, पटियाला में अधिक पाये जाते हैं। इसमें बड़े वैद्य और विद्वानों को पढ़ाने वालों की पर्याप्त संख्या थी। ये गृहस्थ भी थे इसलिए आजीविका सम्बन्धी उनको छूट भी मिली थी।५३
उत्तरादि उपसम्प्रदायों के बाद विरक्त तपस्वी उपसम्प्रदाय आता है। ये किसी आश्रम में बैठकर शिक्षा प्राप्त नहीं करते हैं। बल्कि घूम-घूमकर एकांकी मण्डली बनाकर दादू वाणी तथा उनके उपदेशों का प्रचार करते हैं। धन सम्पत्ति से उनका कोई सरोकार नहीं रहता भिक्षा पर ही इनका जीवन निर्भर रहता है। यह किसी प्रकार का व्यवसाय नहीं करते हैं। इनका मुख्य कार्य दादू पंथी अनुयायियों के घर-घर में जाकर उनके उपदेशों को सुनाते हैं।
आखिरी उपसम्प्रदाय खाकी उपसम्प्रदाय है। ये अधिकतर वस्त्र धारण नहीं करते थे तथा शरीर पर भस्म का लेपन करते थे और छोटी-छोटी मण्डली बनाकर घूमते हैं। ये अधिक वस्त्र नहीं धारण करते और लम्बी जटा धारण करके साधना करते हैं ये पवित्र तथा सात्विक जीवन व्यतीत करने के लिए किसी प्रवाहित नदी की भाँति निरन्तर भ्रमण करते रहते थे।





दादू का रचना संसार
सन्त दादू दयाल ने अपनी बानियों की रचना कब की इस बारे में निश्चित तिथि का उल्लेख नहीं मिलता है। अन्य सन्त कवियों की तरह दादू के रचनाकाल को सही तिथि का पता नहीं चलता है और न ही इनकी आवश्यकता दादू ने कभी महसूस की। विराट् लक्ष्य के लिए कार्य करने वाले साधक के लिये ये सब बातें कोई मायने नहीं रखती हैं। फिर भी दादू की वाणियों का संकलन एवं उनका वर्गीकरण उनके शिष्यों एवं विभिन्न विद्वानों द्वारा किया गया। इनकी वाणी की कितनी रचनाएँ उपलब्ध हैं इसके बारे में विद्वानों की अलग-अलग राय है।
जयपुर के महन्त जयराम दास जी ने स्वामी दादू दयाल जी की वाणी नाम से बड़ा ग्रन्थ छपवाया। जिसकी भूमिका दादू जी के शिष्य मंगलदास जी द्वारा लिखी गयी है। मंगलदास ने इनकी वाणी का आरम्भ सम्वत्‌ १६१९ से ही माना है।५४ इनके शिष्यों ने अपने गुरू की स्मृति में अनुभव वाणी का आरम्भ एवं संग्रह किया।५५ दादू की रचनाओं का पृथक्‌ संग्रह सन्‌ १९०४ में ज्ञान सागर प्रेस बम्बई से प्रकाशित हुआ था।५६
दादू की वाणी को संकलित करने का कार्य सर्वप्रथम इनके शिष्यों सन्तदास एवं जगन्नाथ ने किया, जिसका नाम इन्होंने ÷हरडे वाणी' दिया था। किन्तु यह वर्गीकरण सुव्यवस्थित नहीं था, न ही नियोजित था। इनकी वाणियों को भी अलग-अलग शीर्षकों में विभाजित नहीं किया गया था।५७ कुछ विद्वानों ने यह भी स्वीकार किया है कि मोहन दास दफ्तरी ने सर्वप्रथम दादू की साखियों का संग्रह किया।५८
इसी क्रम में रज्जब ने इनकी वाणी को क्रमबद्ध तथा अलग-अलग भागों में विभाजित करके अंगवधू के नाम से इनकी वाणियों का संकलन किया। अंगवधू में हरडे वाणी की सभी त्रुटियों को दूर करने का प्रयास परिलक्षित होता है। अंगवधू को ३७ भागों में विभाजित करने का प्रयास है। इसी के आधार पर ही अलग-अलग विद्वानों ने दादू वाणी को अपने-अपने ढंग से सम्पादित किया है।५९ दादू वाणी को कई लोगों ने सम्पादित किया है। जिनमें चन्द्रिका प्रसाद, बाबू बालेश्वरी प्रसाद, स्वामी नारायण दास, स्वामी जीवानंद, भारत भिक्षु आदि प्रमुख हैं। सन्‌ १९०७ में सुधाकर द्विवेदी ने काशी नागरी प्रचारिणी सभा से इनकी रचनाओं को दादूदयाल की बानी के नाम से प्रकाशित करवाया। इन्होंने इसको दो भागों में विभाजित किया है। पहले खण्ड में दोहे तथा दूसरे में पद है, जिन्हें राग-रागिनियों के सन्दर्भों में वर्गीकृत किया है।६०
दादूदयाल की वाणी अंगवधू सटीक आचार्य चन्द्रिका प्रसाद त्रिपाठी द्वारा सम्पादित है जो अजमेर से प्रकाशित हुई है। यह कई हस्तलिपियों के अनुकरण के आधार पर सम्पादित की गई है। साखियों को भावानुकूल वर्गीकृत किया गया है। राग-रागिनियों को नियोजित एवं व्यवस्थित तरीके से क्रमबद्ध किया है।६१ त्रिपाठी जी के संग्रह का आधार लेकर दादू वाणी का सम्पादन सरजन दल जग सिंह ने किया। इसका प्रकाशन काल १९१८ है।
वेलेडियर प्रेस इलाहाबाद से दादू वाणी का प्रकाशन हुआ जिसका सम्पादन बालेश्वरी प्रसाद ने सन्‌ १९२८ में किया। यह कृति साखी एवं पद, दो भागों में प्रकाशित है।६२
स्वामी नारायण दास जी दादू वाणी सटीक का सम्पादन किया। जो सम्वत्‌ २०१८ में प्रकाशित हुई।६३ इसके अतिरिक्त दादू सेवक प्रेस से स्वामी जीवानन्द भारत भिक्षु के सम्पादन में महर्षि श्री स्वामी दादूदयाल की अनभै वाणी प्रकाशित हुई। इनका लक्ष्य दादू की अनभै वाणी को जनसामान्य तक पहुँचाना था।६४
दादू पद संग्रह सन्‌ १९१७ में ब्रह्‌म विद्या कार्यालय लाहौर से प्रकाशित हुई। इसमें दादू के मूल पदों को किया गया है।६५
सन्‌ १९५६ में बलिया से सन्त दादू और उनकी वाणी का प्रकाशन हुआ। यह राजेन्द्र कुमार एण्ड ब्रदर्स बलिया द्वारा प्रकाशित हुई। इसका सम्पादक कोई अज्ञात सन्त हैं।६६
आधुनिक विद्वानों में परशुराम चतुर्वेदी की नागरी प्रचारिणी सभा काशी द्वारा प्रकाशित ÷दादूदयाल ग्रन्थावली' सर्वाधिक प्रमाणिक मानी जाती है। यह ग्रन्थावली आकार ग्रन्थावली-१० के अन्तर्गत सम्वत्‌ २०२३ में प्रकाशित हुई। उन्होंने अपनी भूमिका में इन हस्तलिखित प्रतियों का भी उल्लेख किया है। जिनकी मदद से यह ग्रन्थावली सम्पादित की गयी है।
इनके उपरान्त काशीनाथ उपाध्याय द्वारा प्रकाशित संग्रह ÷÷सन्त दादू दयाल'' का प्रकाशन हुआ। इसका प्रकाशन काल १९८० है। इसमें दादू दयाल की साखियों एवं पदों को संकलित किया गया है।
इन सबके अतिरिक्त दादू की वाणी के अनेक संग्रहों को विभिन्न विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से सम्पादित कर विभिन्न प्रकाशक केन्द्रों से प्रकाशित करवाया है।
सन्दर्भ
१. (सं.) डॉ० बलदेव वंशी, दादू जीवन दर्शन, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, १९९८, पृ० ९
२. डॉ० रवीन्द्र कुमार सिंह, दादू काव्य की सामाजिक प्रासंगिकता, पृ० ३६
३. डॉ० पीताम्बर दत्त बडथ्वाल, हिन्दी काव्य की निर्गुण सम्प्रदाय, अवध पब्लिशिंग हाउस, लखनऊ, सम्वत्‌ २००७, पृ० २२८
४. दादू जीवन दर्शन, पृ० ९
५. डॉ० किशनाराम बिशनोई, दादूदयाल सिद्धान्त और कविता, निर्मल पब्लिकेशन्स, शाहदरा, दिल्ली, पृ० ११५
६. वही, पृ० ११५-११६
७. वही, पृ० ११६
८. परशुराम चतुर्वेदी, उत्तर भारत की सन्त परम्परा, भारती भण्डार, प्रयाग, द्वितीय संस्करण, सम्वत्‌ २०२१, पृ० ४२१
९. दादूदयाल सिद्धान्त और कविता, पृ० ११७-११८
१०. डॉ० कृष्णदेव बल्लभ दवे, सन्त कवि दादू, पृ० ७३
११. डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी, हिन्दी साहित्य की भूमिका, हिन्दी ग्रन्थ रत्नाकर, बम्बई, १९६३, पृ० ९९
१२. वही, पृ० ११६-११७
१३. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ० ८१
१४. डॉ० रामकुमार वर्मा, हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास, पृ० २७४
१५. (सं०) परशुराम चतुर्वेदी, दादू ग्रन्थावली, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, सम्वत्‌ २०२३, पृ० ४३६
१६. वही, पृ० २१४
१७. वही, उत्तरी भारत की सन्त परम्परा, पृ० ११०
१८. डॉ० सरनाम सिंह, कबीर एक विवेचन, हिन्दी साहित्य संसार, दिल्ली, १९६८, पृ० २८
१९. उत्तरी भारत की सन्त परम्परा, पृ० २८९ पर उद्धृत।
२०. डॉ० कृष्णदेव बल्लभ दवे, सन्त कवि दादू, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, १९८३, पृ० ३६
२१. स्वामी जनगोपाल, दादू जीवन लीला परची, स्वामी लक्ष्मीराम ट्रस्ट, जयपुर, सम्वत्‌ २००६, पृ० १३६
२२. राघव दास, भक्तमाल, पृ० १२४
२३. सन्त कवि दादू, पृ० ३७
२४. दादू जीवन दर्शन, पृ० १८-१९
२५. डॉ० निकोल मैकीकोल, ए सिक्सटीन्थ सेन्चुरी इंडियन मिस्टिक्स, पृ० २७
२६. डॉ० कृष्णदेव वल्लभ दवे, सन्त कवि दादू, पृ० ३८-३९
२७. डॉ० धीरेन्द्र वर्मा, हिन्दी साहित्य कोश, पृ० २४७
२८. दादूदयाल सिद्धान्त और कविता, पृ० ६९ पर उद्धृत
२९. स्वामी हरिनाम, दादू का जीवन चरित्र, पृ० २०
३०. ए सिक्सटीन्थ सेन्चुरी इंडियन मिस्टिक्स, पृ० २७
३१. दादूदयाल : सिद्धान्त और कविता, पृ० ६८
३२. सुन्दरदास नं० 1
३३. (सं.) स्वामी मंगलदास, दादू की वाणी, पृ० ३
३४. दादू काव्य की सामाजिक प्रासंगिकता, पृ० ४०
३५. हिन्दी साहित्य कोश, भाग-२, पृ० २४८
३६. दादूदयाल सिद्धान्त और कविता, पृ० ६१
३७. हिन्दी साहित्य कोश, भाग-२, पृ० २४८
३८. उत्तरी भारत की सन्त परम्परा, पृ० ४११
३९. डॉ० विद्योत्तमा मिश्र, दादू दास तुम्हारा, नरेश पब्लिशिंग हाउस, शाहदरा, दिल्ली, पृ० १८
४०. दादूदयाल सिद्धान्त और कविता, पृ० ६२ पर उद्धृत
४१. हिन्दी साहित्य कोश, भाग-२, पृ० २४८
४२. उत्तरी भारत की सन्त परम्परा, पृ० ४९६
४३. वही, पृ० ४९६
४४. दादूदयाल सिद्धान्त और कविता, पृ० ७६
४५. उत्तरी भारत की सन्त परम्परा, पृ० ५०१
४६. परशुराम चतुर्वेदी, सन्त काव्यधारा, किताब महल, इलाहाबाद, १९५२, पृ० ३६२
४७. दादू जीवन दर्शन, पृ० ६३-६५ पर उद्धृत
४८. वही, पृ० ६७-६८ पर उद्धृत
४९. दादूदयाल सिद्धान्त और कविता, पृ० ८५
५०. (सं०) नगेन्द्र नाथ बसु, हिन्दी विश्वकोश, पृ० ३४०
५१. उत्तरी भारत की सन्त परम्परा, पृ० ५३४
५२. परशुराम चतुर्वेदी, दादूदयाल ग्रन्थावली, भूमिका भाग, पृ० ११
५३. दादू दास तुम्हारा, पृ० ३३
५४. स्वामी मंगलदास, श्री दादू सम्प्रदाय का संक्षिप्त परिचय, पृ० १८
५५. हिन्दी साहित्य कोश, भाग-१, पृ० २८५
५६. दादू दास तुम्हारा, पृ० ४० पर उद्धृत
५७. हिन्दी साहित्य कोश, भाग-१, पृ० २८५
५८. वासुदेव शर्मा, दादू और उनका पंथ, पृ० ११९
५९. सुधाकर द्विवेदी, दादू वाणी, भूमिका, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, १९०६, पृ० ५
६०. दादू और उनका पंथ, पृ० १३८
६१. वही, पृ० १३५
६२. वही, पृ० १३८
६३. वही, पृ० १३९
६४. वही, पृ० १३९
६५. वही, पृ० १३९
६६. दादू दास तुम्हारा, पृ० २५

Friday, June 13, 2008

दादूदयाल : एक परिचय

शगुफ्ता नियाज़

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दादूदयाल सम्प्रदाय एवं पंथी का स्वरूप
प्रत्येक महापुरुष या सन्त महात्मा को यह अभिलाशा रहती है कि वे अपने सिद्धान्तों एवं आदर्शों और अपने उद्देश्यों एवं सन्देशों से ज्यादा से ज्यादा जनकल्याण हो तथा अपने जीवन में उनको ग्रहण करके और अच्छे समाज की स्थापना करे। प्रत्येक महापुरुष एवं सन्तों के विचारों में विश्व कल्याण की भावना रहती है। सन्तों का लक्ष्य चरित्र निर्माण द्वारा समाज का उन्नयन ही रहा है। जिससे एक आदर्श और नैतिकता युक्त समाज बने। समाज में प्रत्येक व्यक्ति का लक्ष्य दूसरों की भलाई, त्याग, बलिदान, ईमानदारी, निष्काम प्रेम तथा अच्छे चरित्र का निर्माण हो सके। दादू का लक्ष्य भी जनता के चरित्र का उन्नयन ही रहा है। उनकी यह इच्छा नहीं रही कि वह पंथ या सम्प्रदाय की स्थापना करे, पर शिष्यों एवं अनुयायियों की इच्छा ने उन्हें विवश कर दिया। इनके अनुयायियों ने पंथ स्थापना के बारे में प्रामाणिक जानकारी नहीं दी परन्तु जब दादू देश भ्रमण करके वापिस साँभर में रहने लगे थे उसके बाद में ही पंथ के सम्बन्ध में कार्य आरम्भ किया था एवं नियमपूर्वक अपने अनुयायियों की बैठकें कराने लगे।४२
दादू ने ब्रह्‌म सम्प्रदाय नामक संस्थान की स्थापना की। साँभर में रहते समय उन्होंने अपना अलख दरीबा स्थापित कर लिया था। इनके शिष्य और अनुयायी ब्रह्‌म उपासना के लिए एकत्र हुआ करते थे तथा उनके प्रवचनों को ध्यानपूर्वक सुनते थे और सत्संग में दूरदराज से लोग आते थे जिस स्थान पर सब लोग जमा होते थे उसको अलख दरीबा कहा जाता था।४३ परशुराम चतुर्वेदी ने उत्तर भारत की सन्त परम्परा में अलख दरीबा का उल्लेख दादू की उपदेश स्थली के लिए किया है इसी सम्प्रदाय को आगे चलकर परम ब्रह्‌म सम्प्रदाय कहा गया क्योंकि इसके केन्द्र में सर्वव्यापी परमसत्ता ही थी। दादू की रचनाओं में कहीं भी ब्रह्‌म सम्प्रदाय का उल्लेख नहीं मिलता है। दादू के शिष्य सुन्दरदास की रचनाओं में स्पष्ट कर दिया था कि इनका गुरू एक ब्रह्‌म है जो कण-कण में व्याप्त है। उसी के नाम पर ब्रह्‌म सम्प्रदाय रखा है।४४ दादू की मृत्यु के बाद दादू पंथ हो गया।
दादू पंथ की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण था कि उसमें किसी प्रकार की जीवन पद्धतियों एवं कर्मकाण्डों की अनिवार्य जकड़बन्दी नहीं थी। इनके अन्तर्गत सभी धर्मों, सम्प्रदायों एवं मान्यताओं के मानने वाले लोग दीक्षित हुए। उनके समय में अनेक प्रकार की साधनाएँ प्रचलित थी तथा जातीय भावना अत्यधिक थी परन्तु उनके उपदेशों से प्रभावित होकर कई समूहों के लोग इनका शिष्यत्व ग्रहण करते थे। क्योंकि उनका व्यक्तित्त्व बहुत ही नम्र और हृदयग्राही था एक बार जो इनकी सत्संग में अमृत वाणी और धर्म उपदेश सुन लेता और आजीवन इनके उपदेशों का पालन करता था। दादू के जीवन काल में उनके अनुयायियों की संख्या हजारों में पहुँच गयी थी और इनके अनेक शिष्य बहुत प्रसिद्ध हो गये थे।४५
इस प्रकार दादू के ख्याति प्राप्त शिष्यों की संख्या ५२ बतायी गयी है। इन बावन शिष्यों ने इनके विचारों के प्रचार का बीड़ा सहर्ष उठाया। राघवदास कृत भक्तमाल में उन शिष्यों की प्रशंसात्मक स्वर में कहा है -
दादू जी के पंथ में ये बावन द्रिगसु महंत।
प्रथम ग्रीब, मसवीन, बाई, द्वै सुन्दर दास।
रज्जब, दयालदास, मोहन, च्यांरू प्रकासा॥
जगजीवन, जगन्नाथ, तीन गोपाल वषानू।
गरीब जब दूजन, घड़सी, जैमल द्वै जानूं॥
सादा, तेजानंद, पुनि प्रमानंद बनवारी द्वै।
साधुजन हरदास हू, कपिल चतुर भुजपार हवै॥
चन्नदास द्वै, चरणप्राण द्वैं, चैन प्रहलादा।
वषनौ जग्गोलाल, माथू, टीला अरू चाँदा॥
हिंगेल, गिर, हरिस्यंध, निरांइण, जइसौ संकर।
झांझू बांझू सन्तदास टीकू स्यामहि वर॥
माधव सुदास, नागर नियाम जन राधो वर्णि कहंत।
दादूजी के पंथ मैं ये, बावन द्रिगसु महंत॥४६
दादू के शिष्यों की संख्या क्या थी इसका सही अनुमान या ज्ञान तो अभी तक नहीं हो पाया है, पर फिर भी अनुमान से कहा जा सकता है कि यह पौने दो सौ से कम नहीं थी। वैसे प्रचलित गणना के अनुसार उनके केवल १५२ ही शिष्य माने जाते हैं जिनमें से ५२ शिष्य प्रधान और १०० अप्रधान शिष्य कहे जाते हैं। इनके बावन प्रधान शिष्यों की नामावली व उनके थाँभा स्थान निम्नलिखित है४७ -
क्रम शिष्य नामावली जाति थाँभा- स्थान
१. स्वामी गरीबदास(बड़े) दायमा-ब्राह्‌मण नारायणा जयपुर-राज्य
२. स्वामी मस्कीनदास दायमा-ब्राह्‌मण नारायणा जयपुर- राज्य
३. स्वामी युगल बाई -
अ. रामकुमारी दायमा-ब्राह्‌मण नारायणा जयपुर-राज्य
ब. श्यामकुमारी दायमा-ब्राह्‌मण नारायणा जयपुर-राज्य
४. स्वामी सुन्दरदास(बड़े) क्षत्रिय घाटड़ा अलवर-राज्य
५. स्वामी सुन्दरदास(छोटे) खण्डेलवाल फतहपुर जयपुर-राज्य
वैश्य
६. स्वामी रज्जब मुसलमान साँगानेर जयपुर-राज्य
७. स्वामी बखना मुसलमान नारायणा जयपुर-राज्य
८. स्वामी जगजीवन दास गौड़-ब्राह्‌मण दौसा जयपुर-राज्य
९. स्वामी जगन्नाथ कायस्थ आमेर जयपुर-राज्य
१०. जग्गा (जगदीश प्रसाद) वैश्य भड़ौच गुजरात
११. स्वामी जयमल जोगी कूरम-क्षत्रिय साँभर जयपुर-राज्य
१२. स्वामी जयमल चौहान चौहान-क्षत्रिय खालड़ा
१३. स्वामी मोहनदास मेवाड़ा पँवार-क्षत्रिय भानगढ़ अलवर-राज्य
१४. स्वामी मोहनदास दफ्तरी कायस्थ मारौठ जोधपुर-राज्य
१५. स्वामी मोहनदास दरयाई ... नागरचाल उणियारा
१६. स्वामी मोहनदास भजनीक गौड़ ब्राह्‌मण आसोप जोधपुर-राज्य
१७. स्वामी प्रागदास बियाणी महेश्वरी-वैश्य डीडवाणा जोधपुर-राज्य
१८. स्वामी प्रागजन चर्मकार(पीपा-वंशी) टौंक टौंक-राज्य
१९. स्वामी जनगोपाल(बड़े) वैश्य नारायणा जयपुर-राज्य
२०. स्वामी गोपालदास(लघु) वैश्य झोंटवाड़ा जयपुर-राज्य
२१. स्वामी गोपालदास जोगी नागौरी-जोगी राहोरी जयपुर-राज्य
२२. स्वामी बनवारीदास बाबा ... रतिया जिला हिसार
२३. स्वामी बनवारीदास(लघु) ... ... ...
२४. स्वामी माधवदास सनाढ्य ब्राह्‌मण गूलर जोधपुर-राज्य
२५. स्वामी चत्रदास खण्डेलवाल ब्राह्‌मण सिंघावट पंजाब
२६. स्वामी चतुरदास वैश्य कालाडेरा जयपुर-राज्य
२७. स्वामी चतुर्भुज उदीची-ब्राह्‌मण रामपुर उत्तर प्रदेश
२८. स्वामी हरिदास ... रतिया जिला हिसार
२९. स्वामी हरिसिंह कूरम क्षत्रिय विद्याद जोधपुर-राज्य
३०. स्वामी टीलादास वैश्य फोफल्या मेवाड़
३१. स्वामी टीकम सिंह कूरम क्षत्रिय नाँगल जयपुर-राज्य
३२. स्वामी शंकरदास दायमा-ब्राह्‌मण नारायणा जयपुर-राज्य
३३. स्वामी जैसाराम दायमा-ब्राह्‌मण टौंक टौंक-राज्य
३४. स्वामी चौंदादास ... टौंक टौंक-राज्य
३५. स्वामी घड़सीदास खण्डेलवाल कढैल
३६. स्वामी दूजनदास ... ईंडवा जोधपुर-राज्य
३७. स्वामी तेजानन्द वैश्य जोधपुर जोधपुर-राज्य
३८. स्वामी साधूराम गौड़-ब्राह्‌मण माँडोठी जिला रोहतक
३९. स्वामी माखूजन गौड़-ब्राह्‌मण हाँडोती-गंगायचा
४०. स्वामी लालदास नायक पिरान-पट्टण सीरोही-राज्य
४१. स्वामी नारायणदास ... डाँग-ईकलोद ग्वालियर-राज्य
४२. स्वामी चरणदास ... भंवरगढ़
४३. स्वामी श्यामदास ... झालाणा जयपुर-राज्य
४४. स्वामी सन्तदास ... चाँवडया जयपुर-राज्य
४५. स्वामी सादानंद ... इन्दोखली जोधपुर-राज्य
४६. स्वामी परमानंद ... इन्दोखली जोधपुर-राज्य
४७. स्वामी झाँझूजन ... झोंटवाड़ा जयपुर-राज्य
४८. स्वामी बाँझूजन ... झोंटवाड़ा जयपुर-राज्य
४९. स्वामी नागरदास ... टहटड़ा जयपुर-राज्य
५०. स्वामी निजामशाह मुसलमान टहटड़ा जयपुर-राज्य
५१. स्वामी हिंगोलगिरि ... वोकड़ास जयपुर-राज्य
५२. स्वामी कपिल्मुनि ब्राह्‌मण गोंदेर जयपुर-राज्य
उपर्युक्त तालिका के अतिरिक्त दादूदयाल के एक सौ अप्रधान शिष्यों की सूची निम्नलिखित है।४८
१. ईश्वरदास, २. उद्दालवन, ३. उद्धवदास प्रथम, ४. उद्धवदास द्वितीय, ५. कल्याणदास, ६. कान्हरदास तत्ववेत्ता, ७. किशनदास, ८. केवलदास, ९. केशवदास, १०. कँवलनयन, ११. खेतसीदास, १२. खेमदास, १३. गोपालदास, १४. गोविन्ददास प्रथम, १५. गोविन्ददास द्वितीय, १६. गोविन्ददास मोटा, १७. गंगादास प्रथम, १८. गंगादास द्वितीय, १९. चतुरदास मरदनिया, २०. चतुरदास लामरा, २१. चतुरदास ज्ञानी, २२. चरणदास, २३. चैतन्यदास, २४. चोकसराम, २५. जगन्नाथ प्रथम, २६. जगन्नाथ द्वितीय, २७. जगन्नाथ तृतीय, २८. जवानदास जोगी,२९.जगाराम,३०.जीतराम, ३१. जोधराम, ३२. जंगीराम, ३३. टीकाराम,३४.टोडाराम,३५.ठाकुरदास, ३६. ठाकुरदास द्वितीय, ३७. डीडदास, ३८. डँूगदास, ३९. तुलसीदास, ४०. तोलाराम बागड़ी, ४१. दयालदास, ४२. दामोदर दास, ४३. दुर्गादास, ४४. देवदास, ४५. देवेन्द्रमुनि, ४६. द्वारिकादास, ४७. धर्मदास प्रथम, ४८. धर्मदास द्वितीय, ४९. धीरादास,५०. नरसिंह दास प्रथम, ५१. नरसिंह दास द्वितीय, ५२.नरहरिदास,५३.नागादास,५४.नाथूराम, ५५. नारायणदास बालोरिया, ५६.परमानन्द,५७.परसराम,५८.पालाराम, ५९. पांचूराम, ६०. पिच्याण दास,६१.पीपाजन,६२.पूरनदास,६३.प्रेमदास, ६४. बकूजन, ६५. बद्रीदास, ६६. बीरम सिंह, ६७. बीसादास, ६८. बोहिथदास प्रथम, ६९. बोहिथदास द्वितीय, ७०. ब्रह्‌मदास, ७१. भगवानदास प्रथम, ७२. भगवानदास द्वितीय, ७३. भवनजन, ७४. मनोहरदास, ७५. मरालदास, ७६. माधवदास, ७७. माधवदास कानी, ७८. माधवदास गोंदेरिया, ७९. माधवदास मोक्षी, ८०. मेदराम, ८१. मौनीजन, ८२. मंगाराम, ८३. रामदत्त, ८४. रामदास, ८५. रायमल, ८६. लालदास, ८७. वनमाली, ८८. बाजिदअली शाह अथ बाजिन्द, ८९. विट्ठलव्यास, ९०. सन्तदास गल्तानी, ९१. सन्तदास मा, ९२. सन्तोखदास, ९३. सारंगदास, ९४. साँगाराम, ९५. साँवलदास, ९६. सिन्धूजन, ९७. सूरहरि, ९८. श्यामदास, ९९. हरिदास तथा १००. हेमदास।

Thursday, June 12, 2008

दादूदयाल : एक परिचय

शगुफ्ता नियाज़


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माता-पिता
दादू के माता-पिता कौन थे, इस सन्दर्भ में विद्वानों में अनेक मत हैं किवदन्तियों के अनुसार दादू कबीर की भांति ही किसी कुंवारी ब्राह्मणी की अवैध सन्तान थे। विधवा ब्राह्मणी के परित्यक्त पुत्र के रूप में दादू को जिस तिरस्कार का सामना करना पड़ा होगा, उसकी कल्पना हम आज के सामाजिक सन्दर्भों में भी कर सकते हैं। तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था में दादू जैसी सन्तान को समाज किस रूप में ग्रहण करता होगा इससे हम सभी परिचित हैं।
अतः यह मानने में हमें कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि दादू की जन्म की स्थितियों (माता-पिता) ने दादू को जिस समाज से जोड़ा उसने उनकी काव्य चेतना को एक ऐसी काव्य परम्परा से जोड़ा जो आध्यात्मिक चेतना को लोक चेतना से जोड़कर चल रही थी। इस काव्य चेतना ने दादू के काव्य की रूपक चेतना के निर्माण में एक सार्थक योगदान किया होगा।
गुरू एवं शिक्षा-दीक्षा
अन्य अधिकांश सन्त कवियों की भांति ही दादू की शिक्षा भी व्यवस्थित रूप से किसी संस्था में नहीं हुई थी। अक्षर ज्ञान के आधार पर प्राप्त शिक्षा से दादू भी वंचित ही रहे थे। श्रुत परम्परा से इन्होंने अवष्य ज्ञान प्राप्त किया जो इनके काव्य के स्वरूप निर्माण में सहायक सिद्ध हुआ। श्रुत परम्परा से प्राप्त ज्ञान का इन्होंने अपने प्रत्यक्ष अनुभवों के आधार पर विस्तार किया। परिणामस्वरूप इनके काव्य का वाह्य कलेवर जिसमें रूपक भी सम्मिलित है किसी काव्य परम्परा का अनुपालन नहीं बल्कि जीवन व्यवहार की अनुभूतियों के आधार पर बना।
दीक्षा का सम्बन्ध गुरू से होता है। दादू के गुरू के संबध में विद्वानों ने अपनी धारणा स्पष्ट करते हुए बुडढन को दादू का गुरू माना है - विल्सन बुडढन कबीर की वंश परम्परा में दादू को स्वीकार करते हुए इन्हें भी कबीर का ही वंशज मानते हैं। सुधाकर द्विवेदी इन्हें कबीर के पुत्र कमाल का शिष्य बताते हैं। पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल विल्सन से सहमत हैं। परशुराम चतुर्वेदी सन्‌ १५६२ के आस-पास बुडढन नाम धारी किसी ऐतिहासिक व्यक्ति की स्थिति न मानते हुए विल्सन के मत को निराधार व्यक्त करते हैं। दादू पन्थी बुडढन से साक्षात्‌ भगवान का अर्थ लेते हैं और ११ वर्ष की अवस्था में भगवान ने बुद्ध महात्मा के रूप में बालक दादू को दिया ऐसा मानते है।२७
डॉ० ताराचन्द गैरोल ने किसी बुराहानुद्दीन नामक व्यक्ति को दादू के गुरू के रूप में चर्चा की है किन्तु अन्य विद्वानों ने इस विषय में तत्सम्बन्धी कोई चर्चा नहीं की और न ही इस सम्बन्ध में कोई प्रमाण ही उपलब्ध होता है।२८
स्वामी हरिराम ने भी ऐसा मत उद्धद्यत किया है- ७ वर्ष की अवस्था में एक दिन बालकों के साथ कांकरिया तालाब (नगीना बाड़ी) में क्रीड़ा करते समय भगवान ने एक बुद्ध ऋषि के रूप में प्रकट कर दर्शन दिए और दादू को प्रसाद, शुभाशीर्वाद तथा दीक्षा रूप निर्गुण भक्ति का उपदेश देकर अन्तर्ध्यान हो गये। पुनः एकादश वर्ष की अवस्था में वृद्ध भगवान ने कांकीरमा तालाब के उस स्थान पर दर्शन दिए जहां कि आज शिव मंदिर बना हुआ है और निर्गुण का प्रचार करने की आज्ञा देकर अंतर्ध्यान हो गए। बुद्ध भगवान के दर्शन से महाराज को पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हो गई और गुरू आज्ञा मानकर देश एवं ग्रह का त्याग कर दिया और भक्ति का प्रचार करने हेतु अहमदाबाद से प्रस्थान किया।''२९
डॉ० नाइकल मैक्निकल ३० ने भी इसी सन्दर्भ का उल्लेख अपनी पुस्तक में किया है।
गार्सा द तासी ने दादू को रामानन्द की शिष्य परम्परा में स्वीकार कर उन्हें इस परंपरा में उनका छठा शिष्य माना है। इन शिष्यों का क्रम रामानन्द, कबीर, जमाल, विमल, बुडढन और दादू। एच.एच. विल्सन ने भी इसी को स्वीकार किया है। आर.वी. रसाल ने भी इसी को मान्य किया है।३१
दादू के शिष्य छोटे सुन्दरदास ने उनके गुरू का नाम ब्रह्‌मानन्द बताया है और दादू की अपने गुरू से भेंट का विवरण भी निम्न प्रकार प्रस्तुत किया है -
दादू जी कौ गुरू अब सुनिये, बहुत भांति तिनके गुन गुनिये।
दादू जी को दरसन दीन्हों, अस्मात्‌ काहूं चीन्हों,
ब्रह्‌मानन्द नाम है जाको, ठौर ठिकाना काहूं न ताको
सहज रूप विचरै भू मांही, इच्छा परै तहांसो जाही,
ब्रह्‌मानन्द दया तब कीन्हीं, काहूं पै गनि जाह न चीन्ही।
दादू जी तनि निकट बुलायौ, मुदित होय करि कंठ लगायौ,
मस्तक हाथ धरी है जब ही, दिव्य दृष्टि उभरी है तब ही,
यू करि क्रिया बड़ौ हुत दीन्हौ, ब्रह्‌मानन्द पयानौ कीन्हो।३२
उन्होंने ब्रह्‌मानन्द नाम का उल्लेख किया है किन्तु स्वयं दादू ने कहीं भी अपने गुरू का नाम नहीं बताया है। उन्होंने सिर्फ इतना ही कहा -
दादू गैब मांहि गुरूदेव मिल्या, पाया हम परसाद।
मस्तक मेरे कर धर्‌या, देच्च्यां अगम अगाध॥३३
डॉ० पीताम्बर दत्त बडथ्वाल ने यहाँ तक कह दिया कि यदि कमाल नहीं तो कमाल की शिष्य परम्परा में ये किसी के शिष्य अवश्य रहे होंगे।
परन्तु दादू के गुरू के सन्दर्भ में अभी तक निर्णयात्मक ढंग से कुछ कहा नहीं गया है। दादू ने अपनी वाणी में गुरू की महिमा का गान तो बहुत किया है परन्तु उनका नाम कहीं नहीं लिखा है।३४ दादू ने किसी व्यक्ति से नियम पूर्वक दीक्षा लेकर शिष्यत्व ग्रहण किया हो, इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता इससे यही संभावना व्यक्त की जा सकती है कि दादू के कोई निश्चित गुरू नहीं थे।
इसका परिणाम यह हुआ कि दादू का काव्य चिन्तन किसी सीमित संकीर्ण धारा में बंधने से बच गया। दादू का जिस गुरू परम्परा से सम्बन्ध जोड़ा जाता है उसके आधार पर दादू अपने जीवन बिम्बों के निर्माण के लिए कृषक व शिल्पी जीवन के निकट ही अधिक पाए जाते हैं। सन्त परम्परा के ये सभी सन्त अपने मूल रूप में कृषक व शिल्पी जीवन से जुड़े रहे हैं।
अतः यह मानने में संकोच नहीं होना चाहिए कि दादू के काव्य प्रतिमान उनकी आध्यात्मिक साधना परम्परा के सामाजिक परिवेश की भी अभिव्यक्ति करते हैं । यदि कबीर की भांति दादू के लिए भी आलौकिक गुरू की मान्यता को स्वीकार किया जाए तो वह भी काव्य-रूपकों को सषक्त आधार प्रदान करती हैं। रूपकों की आन्तरिक चेतना उनकी आलौकिक अनुभूति की ही देन है जो उनके गुरू साक्षात्कार की ही देन कही जा सकती है।
व्यवसाय व जाति
सभी संत कवियों की भांति दादू भी श्रमण संस्कृति के पोषक नहीं है, वे केवल खंजूरी, तंबूरा अथवा झोली लेकर न तो केवल कहानी व उपाख्यान ही कहते थे और न केवल भक्तों और अनुयायियों की भक्ति भावना और गुरू श्रद्वा के ही भरोसे बैठकर गुलछर्रा ही उड़ाते थे। अन्य सन्तों की तरह दादू भी अपने पैतृक व्यवसाय को अपनी जीविका का साधन बनाते हुए अपनी आध्यात्मिक साधना में रत रहते है। उन्होंने आध्यात्म मार्ग अपनाया परन्तु अपने पैतृक कार्य को भी नहीं छोड़ा अपने पैतृक कार्य को करते हुए भी वे भजन उपासना अथवा पारलौकिक चिन्तन करते थे। अपने व्यवसाय में रत रहते हुए उनका आसपास के कृषक एवं शिल्पी जीवन सम्बन्धी जीवन से जुड़ा होना स्वाभाविक था। अतः उनके व्यवसाय ने उनके काव्य प्रतिमानों के लिए आपेक्षित सामग्री जुटाने में एक बड़ी भूमिका अदा ही होगी।
दादू की जाति के सम्बन्ध में विद्वानों में पर्याप्त मतभेद हैं। सुप्रसिद्ध इतिहासकार मुहसन फनी ने इनको धुनिया कहा और विल्सन ने भी इन्हें धुनिया ही माना है। तारादत्त गैरोला रज्जब की सर्वांगी के एक पद के साक्ष्य पर इन्हें धुनिया मानते हैं। जैसे - धुनी गर्भेउत्पन्नों देवेन्द्रा महामुनि।३५ स्वामी दयानन्द अपने ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश में इन्हें तेली का कार्य करने वाला कहा है। पं० सुधाकर द्विवेदी ने मोची बताया है।३६ क्षिति मोहन सेन वाडलो के एक वन्दना वाक्य - श्रीयुत दाऊद वन्दि दादू यारं नाम के आधार पर इनका वास्तविक नाम दारूद मानकर इन्हें मुसलमान स्वीकार करते हैं।३७ परशुराम चतुर्वेदी और डॉ० पीताम्बरदत्त बडथ्वाल दादू को धुनिया मानते हैं।३८ गार्सा द तासी ने हिन्दी हिन्दोस्तान में इन्हें निम्न जाति का माना है।३९
रज्जब की वाणी में दादू को धुनिया जाति का बताया है। कुल, विल्कस, रसाल, रामकुमार वर्मा, ग्रियर्सन आदि भी दादू को धुनिया ही मानते हैं।४०
उपर्युक्त इन सभी विद्वानों के मतों से दादू की जाति स्पष्ट नहीं हो पाती। इसका कारण यह भी है कि दादू पंथ के कुछ लोग लोदीराम नागर ब्राह्‌मण का औरस पुत्र मानते हैं और कुछ लोग इनके द्वारा केवल पालित पोषित स्वीकार करते हैं।४१
ऐसी स्थिति में दादू की जाति व पेशे को लेकर यह कहा जा सकता है कि कबीर की भांति दादू भी समाज के निचले स्तर से आऐ थे। दादू का यह जातिगत परिवेश भी उनकी काव्य चेतना को कृषक व शिल्पी जीवन से ही जोड़ता है। अतः यह मानकर चला जा सकता है कि दादू के काव्य में कृषक एवं शिल्पी जीवन सम्बन्धी रूपक चेतना को सहज व्यावहारिक आधार मिला है जो दादू के वैयक्तिक परिवेश से जुड़कर व्यवसाय से सम्बन्ध रखता है। उपरोक्त तथ्यों के आधार पर निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि कबीर की भांति दादू ने भी निम्न वर्गीय परिवार में आँखें खोली जो आजीविका के लिए कृषक व शिल्प पर निर्भर था। कबीर की ही भांति निश्चित रूप से दादू को भी उनके जन्म, माता-पिता और संस्कारों से वह परिवेश प्राप्त हुआ जिसने दादू के रूपकों को सामग्री प्रदान

दादूदयाल : एक परिचय

शगुफ्ता नियाज़
मध्यकालीन भारतीय इतिहास (१५वीं शती से लेकर १७ वीं शती तक) सन्तों की वाणी में सिमट आया है। भारत का मध्यकाल सम्राटों एवं सामन्तों का युग था। उस समय में सर्वाधिक विशमता अधर्म थी तथा उसी समय भारत की संवेदनशील लोक चेतना में से उत्तर से दक्षिण तक, पूर्व से पश्चिम तक करूणा और मानवता के अनेक स्रोत फूट उठे जिन्हें हम सन्त कहते हैं।१
मययुगीन सन्त काव्य परम्परा में निश्चित रूप से दादू एक गौरवमयी विभूति है। दादू का काव्यत्व लोकमानस में अब तक जीवित रहा है और आगे भी रहेगा। उनके काव्य का बहुत बड़ा हिस्सा आज भी भारतीय जनता के लिए अमृत वाणी के रूप में विद्यमान है। दादू की रचना का मूल पाठ भले ही विकृत हो गया हो परन्तु उन्होंने जो साहित्य सर्जन किया था वह आज भी लोक मानस में जीवित है।२
कवि युग द्रष्टा होता है। उसी कवि की रचनाएं सफल कही जाती है जो तत्कालीन दशा का ज्ञान प्राप्त कराने में सहायक होती है। कवि की मानसिकता के निर्धारण में आस-पास के वातावरण की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। आस-पास का वातावरण कवि के मस्तिष्क को आधार प्रदान करता है। जो काव्य का माध्यम बनता है। यद्यपि संतों की साधना का स्वरूप आध्यात्मिक है परन्तु वे अपनी साधना का क्षेत्र सामाजिक चेष्टाओं को ही बनाते हैं।३ जिस समाज में वह जन्म लेता है वह आस-पास के परिवेश में हो रहे त्रास को भोगता है। इस भोगे हुए यर्थाथ को ही संतो ने अपनी वाणी का माध्यम बनाया है।
दादू के काव्य में कृषक एवं शिल्पी जीवन सम्बन्धी पृष्टभूमि को अच्छी तरह से समझने के लिए दादू का जीवन परिचय, व्यक्तित्व, जीवन दर्शन आदि परिवेश के बारे में जानना आवश्यक है।
सर्वप्रथम दादू के वैयक्तिक जीवन परिवेश पर एक विमर्शातमक दृष्टि से विचार करेंगे जिसने उन्हें अपनी काव्य-चेतना और उससे सन्दर्भित रूपक चेतना की संरचना के लिए प्रेरित किया।
दादू का व्यक्तित्व
सन्त शिरोमणि दादूदयाल का आविर्भाव साहित्य और समाज की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। यदि अन्याय और उत्पीड़न के समय में कोई समाज अपनी संवेदनशील चेतना के गर्भ से सन्त को जन्म नहीं दे पाता, तो वह अपने ही बोझ से डूब जाता है। सम-विषम का अन्तर्द्वन्द्व सामाजिक प्रक्रिया का आयाम है। यदि किसी समाज में संवेदनशीलता क्षीण हो जाये तो सम्भव है कि वहाँ सन्त का आविर्भाव न हो। उस दशा में समाज स्वयं टूट सकता है।४ उनका व्यक्तित्त्व केवल मानसिक गुण-दोष एवं प्रवृत्तियों का सार ही नहीं है बल्कि उनके चरित्र की विशेषताओं का आधार स्तम्भ था। वह उनके आन्तरिक जीवन का प्रकाशन है जिसमें व्यक्ति की प्रकृति, स्वभाव, अनुभवजन्य प्रवृत्तियाँ, चारित्रिक गुण-दोष, व्यक्तियों के प्रति व्यवहार, क्रिया-कलाप, रूप सौन्दर्य, ऐन्द्रिक क्षमताएँ, स्मरण शक्ति, कल्पना शक्ति, ज्ञान, तर्क-वितर्क, चिन्तन शक्ति, बौद्धिक और भावात्मक प्रवृत्तियों का समावेश होता है।५
मनुष्य का व्यक्तित्त्व वह अमूल्य निधि है जिसे प्राप्त करके व्यक्ति स्वयं की संकुचित सामान्य व साधारण सीमाओं से परे होकर व्यापकता, असामान्यता व असाधारणता को सहज ही अपना लेता है। वह अमृत तुल्य आत्म निधि है जिसको पाकर व्यक्ति अमर हो जाता है। व्यक्तित्त्व ही एक ऐसी निधि है जिसकी सुन्दरता स्वयंमेव व्यक्ति की सीमित, असुन्दर व छोटे स्वरूप को असीम सुन्दरम्‌ और महिमामय बनाकर उसको समाज के सामने प्रस्तुत करती है। सन्त के व्यक्तित्त्व की सार्थकता इसी पर आधारित है और किसी व्यक्तित्त्व को समझने के लिए उसके स्वभाव को जानना बहुत जरूरी है क्योंकि स्वभाव व्यक्तित्त्व का एक अभिन्न अंग है। स्वभाव से व्यक्तित्त्व का निर्माण होता है। इसलिए आत्मप्रेरक व्यक्तित्त्व ही जीवन के लिए संजीवनी समसिद्ध होती है। अतः दादू का स्वभाव और व्यक्तित्त्व भी तद्युगीन समाज के लिए संजीवनी सम ही था जहाँ उनके एक ओर उनके दैन्य व दयालु भाव एवं द्रवित प्रवृत्ति के कारण उनकी शिवमय प्रकृति का बोध होता है तो दूसरी ओर उनके सरल स्वभाव से उनके सत्यमय स्वरूप का परिचय होता है। अतः सन्त दादू के सत्य, शिव और सुन्दर स्वाभाविक स्वरूप का स्तुल्य व सराहनीय समन्वय तद्युगीन अस्तित्त्व के बहुमुखी संघर्ष में रत समस्त समाज के लिए संजीवनी-सम मणिकांचल योग के समान सौन्दर्यमय रूप धारण कर नवीन प्रेरणा का संदेश देता है।६
सन्त दादूदयाल के इस सरल, विनम्र, शान्त, शील, सत्य, संतोष और परोपकारी युक्त व्यक्तित्त्व ने पूरे मध्यकालीन साधकों में उच्च स्थान दिया है तथा पूरे सनातनी जीवन को नवीन आशा-आकांक्षाओं के साथ प्रस्फुटित किया है। उनके दयालु व्यक्तित्त्व ने समाज के समग्र जीवन को प्रभावित करके नयी आशाओं को सिंचित कर उसमें नये मूल्यों का संचार किया है। उन्होंने अपने युगीन परिवेश के साथ सच्चे प्रतिनिधि बनकर सजग व जागरूक प्रहरी का कार्य किया है। वे एक सच्चे धर्म सुधारक, समाज सुधारक और रहस्यवादी कवि थे। एक निडर व्यक्तित्त्व वाला साधक ही धर्म सुधारक तथा समाज सुधारक बन सकता है।७
दादू में नम्रता सर्वप्रधान गुण है। उनके व्यक्तित्त्व के बारे में कहा गया है कि सन्त दादूदयाल का व्यक्तित्त्व अत्यन्त आकर्षक था और उनके कोमल एवं हृदयग्राही स्वभाव के कारण अनेक व्यक्ति उनके प्रभाव में आ जाते थे उनके सत्संग का प्रभाव लोगों पर इस प्रकार पड़ता था कि वे उन्हें अपना गुरू तक स्वीकार कर लेते हैं और उनके आदेशानुसार आजीवन आचरण करने पर कटिबद्ध हो जाते हैं।८
दादू के व्यक्तित्त्व के सामने पाखंडी, अहंकारी और दम्भी का अस्तित्त्व अपने आप ही समाप्त हो जाता है उनके कोमल, कान्त व करूणामय स्वभाव ने पारस की तरह सबको स्पर्श कर निकटता स्थापित कर सिर्फ अपनी ओर ही आकर्षित नहीं किया बल्कि उन्हें स्वर्णिम बनाने का सफल प्रयास भी किया है। वे सम्पूर्ण मानव जाति, समग्र विश्व और प्राणी मात्र के परम सेवक थे यही विश्व सेवक दादू निश्चित ही उस असीम व अनन्त की सेवाओं में सदैव दन्तचित्‌ रहने वाले असाधारण साधक थे, महान भक्त थे, महात्मा थे और अपने समय के गहन चिन्तनशील विचारक और सजग द्रष्टा। सरलता, स्वाभाविकता और शान्ति उनके स्वभाव के साथ घुलमिल गयी थी तो सम्य, शील और सन्तोष उनके व्यक्तित्त्व के साथ एकाकार हो चुके थे। दूसरों के दर्द को देखकर मोम की तरह करूणामय अंतःकरण के कारण एवं दैन्य और दयालुता की दिव्यता के कारण दादू दयाल कहलाये।९
दादू का आकर्षक व्यक्तित्त्व, हृदयग्राही स्वभाव, मनहरण वार्तालाप और प्रभावोत्पादक विचार निश्चित ही उनके साधारण जीवन की ज्योतिर्मय विशिष्टताएँ थी।१० डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी ने हिन्दी साहित्य की भूमिका में दादू के व्यक्तित्त्व के बारे में लिखा है - इनके स्वभाव में अमिय मिश्रित मधुरता अधिक थी। सामाजिक कुरीतियाँ, धार्मिक रूढ़ियों और साधना-सम्बन्धी मिथ्याचारों पर आघात करते समय दादू कभी उग्र नहीं होते थे अपनी बात कहते समय वे बहुत नम्र और प्रीत दिखते हैं।११ दादू के मधुर स्वभाव ने आश्चर्य जनक असर पैदा किया है यही कारण है कि दादू को अधिक शिष्य और सम्मानदाता मिले दूसरों की अपेक्षा अर्थात्‌ कबीर के।१२
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इनकी वाणियों में प्रेमभाव निरूपण अधिक सरस और गम्भीर माना है।१३
डॉ० रामकुमार वर्मा ने लिखा है - दादू इतने अधिक दयालू थे कि लोग इन्हें दादूदयाल के नाम से पुकारने लगे।१४
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि दादू दयाल स्वयं प्रखर बुद्धि के महात्मा थे। उनके व्यक्तित्त्व और स्वभाव की अमिट छाप का कारण उनका दयामय स्वभाव और दयापूर्ण व्यक्तित्त्व था। इन सबकी वजह से उनके व्यक्तित्त्व को उभारता है। यह दयाभाव धर्म का वृक्ष है जिसे सत्य के शुद्ध जल द्वारा खींचा जाता है तभी वह फलता फूलता है। अतः ये इस दयाभाव के धर्म वृक्ष के अमर फलों का सेवन करना चाहते हैं। जिसमें सत्य, शील, संतोष के भाव स्वाभाविक रूप में विद्यमान रहते हैं। दादू को दया की दयालुता और दयामय स्वभाव की एवं दयापूर्ण व्यक्तित्त्व की प्रतिमूर्ति कहा है।
जीवन काल
कवि की रचनाओं की स्वरूप संरचना में जन्म काल की एक अहम्‌ भूमिका होती है। सन्त एवं भक्त कवियों के जन्मकाल के सम्बन्ध में प्रमाणिक रूप से निर्णय करना सम्भव नहीं होता। ये अपने बारे में किसी प्रकार का कोई अवलोकन नहीं करते। यही कारण है कि अनेक भक्त सन्त कवियों की प्रमाणिक जीवनी को जानना अत्यन्त कठिन है। इनमें से कुछ की तो समकालीन सन्तों की परिचयात्मक या प्रषंसात्मक वर्णन मात्र से जानकारी सम्भव हो सकी है। परन्तु कुछ की सिर्फ अनेक किवदंतियों जन्मश्रुतियों या सम्प्रदायों या प्रषिष्यों की अतिष्योक्ति युक्त वर्णन से जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इस विषम परिस्थिति में अन्तः साक्ष्य और वाह्य साक्ष्य पर आधारित अनुसंधानात्मक वैज्ञानिक अध्ययन ही एक मात्र उपाय रह गया है, जिसके माध्यम से सन्देह के अन्धकार को दूर कर सत्य तथ्यों का सहारा ले, इन महापुरूषों की जीवनियों को प्रकाश में लाया जा सकता है।
दादू का जीवन-काल
सन्त दादू की जीवनी को प्रस्तुत करते समय हमारा लक्ष्य उनके जीवन सम्बन्धी तथ्यों को सन्दर्भ में विस्तार से देना उचित नहीं समझा क्योंकि अनेक विद्वानों ने अपने ग्रन्थों में जीवन एवं जन्म-मृत्यु का उल्लेख पर्याप्त रूप में देखने को मिल जाता है। इन सबके आधार पर दादू के जीवन सन्दर्भों को आधार बनाकर उनकी रूपक चेतना को रेखांकित करना है।
दादू के बारे में चाहे जितनी भी किंवदन्तियाँ प्रचलित हो, पर उनके जन्म को लेकर अधिक विवाद इसलिए नहीं हुआ क्योंकि उन्होंने नामदेव, पीपा, रैदास व कबीर आदि सन्त कवियों का सादरपूर्वक अपनी साखियों में स्मरण किया है और यह स्मरण उनके परवर्ती होने का प्रमाण बन जाता है। उदाहरण स्वरूप देखिये -
नामदेव कबीर जुलाहो, जन रैदास तिरै।
दादू बेगि बार नहि लागै, हरि सौ सबै सरै॥१५
दादू ने कबीर की मगहर में देहान्त के सम्बन्ध का भी अपनी साखियों में उल्लेख किया है। यथा -
काशी तजी मगहर गया, कबीर भरोसे राम,
सन्देही साई मिला, दादू पूरे काम।१६
इससे यह स्पष्ट है कि सन्त दादू ने उक्त सन्तों के पश्चात्‌ ही जन्म लिया था। सन्त नामदेव का जन्म समय कार्तिक ११ शक सम्वत्‌ ११९२ तद्नुसार सन्‌ १२६० ई० अथवा वि० सम्वत्‌ १३२६ कहा जाता है१७ तथा रैदास का समय भी विक्रम सम्वत्‌ १६०० के पूर्व अर्थात्‌ १५४३ ई० माना जाता है।१८
सन्त दादू के सदैव साथ रहने वाले उनके प्रमुख शिष्य स्वामी जनगोपाल ने जन्म लीला परची में भी यही कहा है -
संवत सोलह सौ इकात्तर, सन्त एक उपज्यौ भूमि पर
पच्छिम दिया अहमदाबाद तीठां साच परगटै दादू।१९
सन्त साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान क्षिति मोहन सेन और भक्त के रचयिता भी इसी जन्मतिथि (सन्‌ १५४४ ई०) को स्वीकार करते हैं।
वेलवेडियर प्रेस के संस्करण के अनुसार दादू का जन्म विक्रम सम्वत्‌ १६०१ अर्थात्‌ सन्‌ १५४४ ई० में हुआ था।२०
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, मिश्र बन्धु, डॉ० नगेन्द्र, डॉ० राममूर्ति त्रिपाठी ने भी इसी तिथि को स्वीकार किया। अतः उपयुर्क्त तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि दादू का जन्म सन्‌ १५४४ ई० को अर्थात्‌ १६वीं शताब्दी के मध्य मानकर चल सकते हैं।
सन्त दादू की मृत्यु के सन्दर्भ में विद्वानों में किसी भी प्रकार का विवाद नहीं है। स्वामी जनगोपाल कृत जन्मलीला परची में उनकी मृत्यु का समय सम्वत्‌ १६६० की ज्येष्ठ बदी अष्टमी अर्थात्‌ सन्‌ १६०३ ई० माना गया है -
संवत सोलह सौ अठ साठा, जेठ बदी जु गए दिन आठा।
थावर पहर चढ्यौ दिन जबहि, ढिग के सिस सुध पाई तबहि॥२१
राघवदास कृत भक्त माल में इसी तिथि को मान्यता दी है -
सोलह सौ आठ में, जेठ आठे सनवार।
कृष्य पीष दिन पहर चढ़ता, स्वामी मिले करतार॥२२
यही तिथि दादू सम्प्रदाय में भी मानी जाती है। इसी कारण दादू सम्प्रदाय की प्रमुख गद्दी नराणा में आज भी फाल्गुनी ५ से ११ तक सात दिवस का मेला लगता है। इस प्रकार उनकी मृत्यु जेठ सुदी ८, सम्वत्‌ १६६० मानना ही समीचीन है।२३ मानक हिन्दी कोश में भी इसी तिथि को मान्यता दी है।
जीवन स्थली
संत दादू दयाल के जन्म स्थान के संदर्भ में अभी कुछ निर्णयात्मक ढंग से नहीं कहा जा सकता है। दादू के जन्म के सन्दर्भ में प्रचलित कुछ किवदंतियों के आधार पर दादू का जन्म स्थान अहमदाबाद माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि अहमदाबाद नगर में लोदी रामजी नागर ब्राह्मण थे। उनके कोई संतान नहीं थी। अतः संतान प्राप्ति के लिए संत महात्माओं की बड़ी प्रेम से सेवा करते थे, प्रातः साबरमती में रोज स्नानार्थ जाते थे, एक दिन आते हुए एक तपःपूत महात्मा द्वारा वरदान प्राप्त हुआ कि सुबह स्नान करने साबरमती नदी में जाने पर तुम्हें नदी प्रवाह में कमल के फूलों में क्रीड़ा करते हुए एक दिव्य ब्रह्मज्ञानी बालक की प्राप्ति होगी, जैसा कि सद्गुण सागर के उद्धरण से स्पष्ट है -
गैबी संत मिल्यो तिहि बारा, करी बनिती चरन मंझारा।
मांग प्रानि यह वचन उचारा, तू चाहे तो देऊं सारा।
तू चाहे सो देहूँ तोई, भक्ति मुक्ति कामना कोई।
इस प्रकार संत के मिलने पर वरदान रूप में पुत्र प्राप्ति मांगी जिसके लिए जनगोपालजी कद्यत जन्मलीला में लिखा है-
सुन लो एक अरज हमारी, पुत्र बिना दुःख है भारी।
संत कद्यपा कर गिरा उचारी, जाह नदी तट बड़े संवारी।
दियो पुत्र तेहि ब्रह्म विचारी, देवे कुल को केई तारी।
बड़े संवार नदी तट जावै, बालक अधर सो तिरते आवै।
गोद माहि तब लेकर आयो, गैब दूध माता के पायो।
इहि विधि स्वामी जन्म जुलिया, लोदीराम पुत्र यों किया।२४
पाष्चात्य विद्वान नाइकल मैक्निकल२५ ने भी अपनी पुस्तक में इसी मत का समर्थन किया है। सन्त दादू दयाल का जन्म अहमदाबाद में हुआ था या नहीं, यह निर्णय करना हमारे कार्य का अंग नहीं है, उनका जन्म कहीं भी हुआ हो लेकिन उनकी जीवन साधना उनके जन्म स्थान से प्रारंभ नहीं होती। ऐसा माना जाता है कि अपनी वय के १८वें वर्ष में महान विभूति दादू ने अहमदाबाद छोड़ दिया और छः साल तक वे परिव्राजक की तरह जगह-जगह घूमते रहे और २६वर्ष की आयु में सांभर आए। यहीं से उन्होंने अपना सदुपदेश देना प्रारम्भ किया। इस स्थिति में भी दादू सांभर में ही टिक कर नहीं रहते थे। ३२वें वर्ष तक सांभर को अपना केन्द्र बनाने के बाद दादू आम्बेर आ गए। १३-१४ वर्ष के लिए आम्बेर दादू के ज्ञान प्रसार के परिवेश का केन्द्र रहा। अतः इस अवधि में भी दादू आम्बेर में स्थिर होकर नहीं बैठे। सन्‌ १६४५-४६ में ४४-४५ वर्ष की आयु में दादू ने अपने ज्ञान का प्रचार करने के लिए बड़ी यात्रा आरंभ की जो १०-१२ वर्ष तक निरन्तर चलती रही। १२ वर्ष की इस अवधि में सं० १६५५ में दादू नराणा आ गए। ५९ वे वर्ष में पुनः नराणा आकर दादू ने इस भौतिक शरीर को त्याग दिया।२६


Wednesday, June 11, 2008

पद्मभूषण सम्मान के सुपात्र चीनी विद्वान जी जियानलिन

वीरेन्द्र जैन
६ जून २००८ जब अमृतसर में खालिस्तानी आन्दोलन का समर्थन करने वाले लोग भाजपा अकालीदल सरकार की षह पर सिमरन जीत सिंह मान के नेतृत्व में अमृतसर मन्दिर में अलग खालिस्तान की वकालत कर रहे थे और जब ताकतवर गुर्जरों के लाठीधारी समूह राजस्थान में कई जगह रेल की पटरियों पर धरना दते हुये अपने को कमजोर वर्ग में सम्मिलित करने की मांग पर रेल यातायात रोक कर बैठे हुये थे तब भारत के विदेशमंत्री चीन के फौजी अस्पताल में एक ९७ वर्षीय चीनी विद्वान को भारत के प्रथम चार सम्मानों में से एक पद्मभूषण सम्मान से सम्मनित कर रहे थे। सम्मानित होने वाले व्यक्ति का नाम जी जियानलिन है और जो सारी दुनिया के लोगों के विचारों को अनुवाद के द्वारा बांटने का यथार्थवादी तरीका अपनाये जाने के पक्षधर हैं। हमारे प्राचीन ग्रन्थ ऋगवेद में जो कहा गया है-
आ नो भद्रा क्रतवो यंतु विष्वतः(अच्छे विचार सारी दुनिया से आने दीजिये) वह अनुवाद के द्वारा ही संभव है।
भारत के गणतंत्र दिवस पर विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाली चुनिंदा हस्तियों को भारत के राष्ट्रपति की ओर सम्मानों की घोषणा की जाती है। सन २००८ की २६ जनवरी को भारत के राष्ट्रपति ने जिन लोगों को पद्म सम्मानों की घोषणा की थी उनमें चीन के विद्वान जी जियानलिन का नाम भी सम्मिलित था जिन्हें पद्मभूषण सम्मान के लिए चुना गया था। वे इसे विरले विदेशी व्यक्तियों में से एक हैं जिन्हैं साहित्य व शिक्षा के क्षेत्र में इस सम्मान के लिए चुना गया है। उनके इस चयन ने उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के प्रति बरबस ध्यान आकर्षित किया है।
जी जियानलिन की उम्र इस समय ९७ वर्ष है, पर इस उम्र में भी वे सक्रिय हैं और कहते हैं कि असली उम्र तो 100साल के बाद ही प्रारंभ होती है। गत ६ अगस्त २००५ को जी के ९४वें जन्मदिन पर चीन की कन्फयूसियस फाउन्डेशन ने बीजिंग में जी जियानलिन रिसर्च इन्स्टीट्यूट की शुरूआत की है। यह संस्था जी के शोध कार्यों पर काम करने के लिए बनायी गयी है व जिसमें चीन के शीर्षस्थ विद्वान तंगयीज्जी, ले दियान, और ली मेंग्यस्की वरिष्ठ सलाहकार के रूप में सम्मिलित हैं।
जब सन २००६ में चीन की सरकार द्वारा उनके अनुवाद कार्यों के लिए लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड दिया गया था तो उस अवसर पर जी ने कहा था कि गत पॉंच हजार सालों से चीन की संस्कृति के सतत जीवंत और सुसम्पन्न बने रहने का कारण यह है कि हम अनुवाद से जुड़े रहे। दूसरी संस्कृतियों से अनुवाद ने हमारी देह में सदा नये रक्त का संचार किया है।
जी का एक स्थल पर कथन है कि चीन की नदियां घटती बढती रहती हैं पर वे कभी सूखती नहीं हैं क्योंकि उनमें सदा नया जल आता रहता है। इसी तरह हमारी संस्कृति की नदी में भी भारत और पश्चिम से सदा नया जल आता रहता है इन दोनों ही स्थलों ने हमें अनुवाद के माध्यम से धन्य किया है। यह अनुवाद ही है जिसने चीनी सभ्यता को सदा जवान बनाये रखा है। अनुवाद बेहद लाभदायक है।

भारत के गणतंत्र दिवस पर जब जी को पद्मभूषण सम्मान की घोषणा हुयी थी तब भारत चीन संस्कृतिक संबंधों के विशेषज्ञ जू के कियो ने कहा था कि चीन के लोग भारत की परंपरा और संस्कृति के बारे में जो कुछ भी जानते हैं वह जी के माध्यम से ही जानते हैं। उन्होंने भारत के प्राचीन ग्रन्थों को मूल संस्कृत से अनुवाद करके उसे चीनी काव्य में रूपान्तरित किया है।
अपने नैतिक मूल्यों, उज्ज्वल चरित्र और व्यक्तित्व के लिए जी को चीन में बहुत आदर प्राप्त है। चीनी प्रीमियर वेन जियाबों ने भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से कहा था कि जी हमारे सर्वोत्तम सलाहकार हैं। परम राष्ट्रभक्त जी का कहना है कि जब में राख में बदल जाऊॅंगा तब भी चीन के प्रति मेरा प्रेम कम नहीं होगा। उन्होंने अपने छात्र जीवन में ही जापान द्वारा घुसपैठ करने पर च्यांग काई शेक के खिलाफ याचिका दायर की थी।
खाकी पोषाक और कपड़ों के जूतों में स्कूल बैग लटकाये हुये जी एक ख्यात विद्वान से अधिक एक किसान और मजदूर नजर आते हैं। वे सुबह साढे चार बजे उठ जाते हैं औ पॉंच बजे नाश्ता करने के बाद लिखना प्रारंभ कर देते हैं । उनका कहना है कि लिखने के लिए ही सुबह मुझे उठाती है। वे बहुत ही तेजी से लिखते हैं पर विचारों के साथ भाषा पर मजबूत पकड़ होने के कारण उनके लेखन में कहीं झोल नहीं आता।कहा जाता है कि उन्होंने अपना बहुप्रसिद्ध निबंध फारएवर रिग्रैट कुछ ही घंटों में लिख लिया था, जिसे सदियों तक याद रखा जायेगा।
जी अपने विचारों की अभिव्यक्ति में निर्भयता के लिए भी जाने जाते हैं। उन्होंने चीन की सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान ही रामायण के चीनी अनुवाद का दुस्साहसपूर्ण काम किया था। १९८६ में उन्होंने अपने दोस्तों की सलाहों के खिलाफ विवादास्पद हू शी के बारे में लिखा फि्‌यू वर्डस्‌ फार हूशी'। हू उस समय चीन में अनादर भाव से देखे जा रहे थे और उनके विचारों पर लिखने बोलने का कोई साहस नहीं कर रहा था। तब जी का कहना था कि रचनात्मक कार्यों को पहचाना जाना चाहिये और न केवल उनकी कमजोरियों को ही सामने आना चाहिये अपितु उनके आधुनिक साहित्य की अच्छाइयों को भी जाना जाना चाहिये। उनके लिखे हुये का ही परिणाम था जो चीन ने हूशी के काम को पुनः देखा और मान्यता दी।
जी का कहना है कि सांस्कृतिक आदानप्रदान ही मनुष्यता की बड़ी संचालक शक्ति है। वे कहते हैं कि एक दूसरे से सीख कर और उनकी कमियों को ठीक करके ही हम सतत प्रगति कर सकते हैं । उनका कहना कि वैश्विक सद्भाव ही मानवता का लक्ष्य है। जी मानव संसकृति को दो भागों में बांट कर चलते हैं। एक चीन-भारत अरब-इस्लामिक संस्कृति तथा दूसरी यूरोप-अमेरिकन पश्चिम संस्कृति। वे पूरब और पश्चिम की संस्क्‌तियों के बीच में निरंतर समन्वय और आदानप्रदान के पक्षधर हैं। जी को सम्मानित करके भारत सरकार ने विश्व बंधुत्व के एक प्रमुख यथार्थवादी वजवाहक को सम्मानित करने का काम किया है।

२/१ शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल म.प्र.

Tuesday, June 10, 2008

राजनैतिक बनाम सामाजिक लोकतंत्र

रामशिव मूर्ति यादव
भारत का समाज लम्बे अरसे से अन्यायी रहा है। इसका अन्यायी चरित्र दो तरह के प्रशासनों से तैयार हुआ है- प्रथमतः, राजनैतिक प्रशासन और द्वितीयतः, सामाजिक प्रशासन। राजनैतिक प्रशासन का सम्बन्ध जहाँ वाह्य से है, वहीं सामाजिक प्रशासन का सम्बन्ध आन्तरिक से है। अर्थात प्रथम जहाँ शरीर को प्रभावित करता है वहीं दूसरा मन या आत्मा को। प्रथम जहाँ संविधान, कानून, दण्ड, कारागार के माध्यम से भयभीत करके नियंत्रण रखता है, वहीं दूसरा मन या आत्मा पर जन्म से ही धर्म, ई , नैतिकता, स्वर्ग-नरक इत्यादि सामाजिक संस्कारों और धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से नियंत्रण रखता है। प्रथम जहाँ पुलिस, सेना, नौकरशाही का इस्तेमाल करता है, वहीं दूसरा पंडा-पुरोहित, पुजारी, साधु, शंकराचार्य के माध्यम से शासन करता है। यद्यपि दोनों ही तरह के प्रशासनों ने पूरे समाज को अपने अनुरूप जकड़ रखा है परन्तु सामाजिक प्रशासन, राजनैतिक प्रशासन की अपेक्षा ज्यादा प्रभावी है क्योंकि यह लम्बे समय से चली आ रही तमाम परम्पराओं, रीति-रिवाजों और संस्कारों के माध्यम से समाज को शासित करता है, जिससे इसका प्रभाव भी लम्बी अवधि तक चलता है। सामाजिक प्रशासन के सभी कारक स्थिर और स्थायी होते हैं, जैसे ईश्वर की अवधारणा, धर्म की अवधारणा, रीति-रिवाज और परम्पराओं की अवधारणा। ये अवधारणायें आये दिन परिवर्तित नहीं होतीं वरन्‌ सदियों तक सतत्‌ अपने आप चलती रहती हैं। निहित स्वार्थी वर्ग बीच-बीच में इसके अनुकूल वातावरण भी तैयार करते रहते हैं, जिससे कि यह पौधा मुरझाने नहीं पाता। इसके विपरीत राजनैतिक प्रशासन परिवर्तित होता रहता है, यथा- संविधान, कानून, सरकारें सभी समय-समय पर बदलते रहते हैं। कभी-कभी तो विदेच्ची शासक भी कब्जा कर अपना राजनैतिक प्रशासन स्थापित कर लेते हैं जैसे भारत में मुगलों और अंग्रेजों का शासन। परन्तु इनके समय में भी सामाजिक प्रशासन ज्यों का त्यों बरकार रहा। कारण कि पहले से जिस वर्ग का सामाजिक प्रशासन पर प्रभुत्व था, उस वर्ग को मिलाकर शासन करना इन विदेशियों को सुविधाजनक लगा। अतः मुगलों और अंग्रेजों इत्यादि ने भारतीय सामाजिक व्यवस्था से छेड़छाड़ नहीं किया। सुसान बेली ने अपनी पुस्तक कास्ट सोसायटी एण्ड पॉलिटिक्स इन इण्डिया' में जिक्र किया है कि-१८वीं सदी में देशी शासकों ने अपने राजतंत्र का अधिकाधिक ब्राह्मणीकरण किया और कुछ ने तो राज्य के महत्वपूर्ण पद और कार्य ब्राह्मण मूल के लोगों को ही सौंपे। अंग्रेजों ने इस परम्परा को न केवल बरकरार रखा अपितु उसे संस्थाबद्ध भी किया।
उल्लेखनीय है कि जिस वर्ग या जाति के हाथ में सामाजिक प्रशासन होता है, प्रायः उसी के हाथ में राजनैतिक प्रशासन भी हो जाता है। वस्तुतः सामाजिक प्रशासन, राजनैतिक प्रशासन के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करता है। भारत में द्विजवर्ग ने इस स्थिति का फायदा उठाकर सदियों से राजनैतिक और सामाजिक दोनों प्रशासनों पर अपना नियन्त्रण बनाये रखा और आज भी काफी हद तक वही स्थिति बरकरार है। यहाँ तक कि मुगलों और अंग्रेजों के शासन काल में भी इन द्विजों के हितों पर खरोंच तक नहीं आई और इसी के सहारे उन्होंने जमींदार, आनरेरी मजिस्ट्रेट, तालुकदार जैसे तमाम महत्वपूर्ण पदों को हथिया लिया। विदेशी शासकों के लिए यह सुविधाजनक भी था क्योंकि स्थानीय प्रभुत्व वर्ग को मिलाने से उनका काम आसान हो गया। सामाजिक प्रशासन में परिवर्तन करना यद्यपि किसी क्रान्ति से कम नहीं, परन्तु समय-समय पर तमाम महान विभूतियों ने इसको चुनौती दी है और उसके सुखद परिणाम भी सामने आये। कबीरदास, रैदास, गुरुनानक, नारायणगुरु, ज्योतिबा फुले, डॉ० अम्बेडकर इत्यादि ने सामाजिक प्रशासन के पुरातनपंथी कारकों - अन्धविश्वासों, रूढ़िगत परम्पराओं, मूर्तिपूजा, अस्पृश्यता, जातिवाद इत्यादि पर हमला बोला। शिवाजी को शासन सत्ता तब मिली जब महाराष्ट्र के संतों ने द्विजों के सामाजिक प्रशासन के खिलाफ आवाज उठाई तो दक्षिण में पेरियार ने जब ब्राह्मणवाद के खिलाफ आन्दोलन छेड़ा, तब द्रमुक पार्टी सत्ता में आयी। बिहार में १९१५ के दौरान निम्न समझी जाने वाली जातियों ने जनेऊ पहन कर अपनी सामाजिक हैसियत को आगे बढ़ाने का आन्दोलन आरम्भ किया। इसी प्रकार जब डॉ० अम्बेडकर ने ब्राह्मणवादी संस्कृति और मनुवादी व्यवस्था के खिलाफ खुला आन्दोलन छेड़ा तो दलितों में चेतना पैदा हुई और उसी का प्रतिफल है कि आज दलित सत्ता के तमाम शीर्ष ओहदों तक पहुँच पाए हैं।
स्पष्ट है कि बिना सामाजिक प्रशासन के राजनैतिक प्रशासन नहीं मिलता और मिलता भी है तो उसका चरित्र स्थायी नहीं होता। कारण कि उस वर्ग के लोगों में जागरुकता, चेतना और स्वाभिमान का अभाव होता है, जिससे वे अपने जायज अधिकारों को नहीं समझ पाते। उनको जन्म से ही ऐसे संस्कारों और हीनता के भावों से कुपोषित कर दिया जाता है कि वे संघर्ष करना भूलकर भाग्यवाद के सहारे जी रहे होते हैं। उनको कोल्हू के बैल की तरह एक घेरे में ही सीमित कर दिया जाता है। अतः सामाजिक परिवर्तन के लिए इस वर्ग को जागरुक, चेतनशील और चौकन्ना बनना होगा तभी वास्तविक रूप से सामाजिक परिवर्तन आयेगा और राजनैतिक परिवर्तन के लिए सामाजिक परिवर्तन का होना एक अति आवश्यक कारक है। इस हेतु सर्वप्रथम समाज को बदलना पड़ेगा, जो कि एक दुरूह कार्य है। वैसे तो समय-समय पर ऐसे बहुतेरे समाज सुधारक हुये, जिन्होंने सड़ी-गली सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध आवाज उठाई परन्तु ये सभी पुरातनपंथी समाज व्यवस्था के पोषक द्विज वर्गों में से ही थे। फिर यह कैसे सम्भव है कि ये अपने ही लोगों को सदियों से प्राप्त जन्मना विशेषाधिकारों का हनन करते। इन समाज सुधारकों ने ऊपरी तौर पर सामाजिक व्यवस्था को बदलने का प्रयास तो किया, किन्तु उस पुरातनपंथी सामाजिक व्यवस्था की जड़ पर हमला नहीं किया। कहीं न कहीं यह एक तरह से शोषित, पिछड़े और दलित वर्ग के बीच फूट रही चिंगारी को दबाने के लिए महज एक सेफ्टी-वाल्व के रूप में साबित हुआ और यही कारण था कि इन समाज सुधारकों के प्रयास से सामाजिक व्यवस्था में कोई बुनियादी और दूरगामी परिवर्तन सम्भव नहीं हुआ। द्विज वर्ग की सामाजिक प्रभुता ज्यों की त्यों बनी रही और समाज में ऊँच-नीच की भावना और जातिगत कारक जैसे तत्व यथावत्‌ बने रहे जिससे सामाजिक लोकतंत्र स्थापित नहीं हो सका।
डॉ० अम्बेडकर ने कहा था कि राजनैतिक सुधारों की अपेक्षा सामाजिक सुधार ज्यादा कठिन हैं। अपने कटु अनुभवों के आधार पर उन्होंने देख लिया था कि हिन्दू धर्म में विगत के तमाम सुधारवादी आन्दोलनों के बावजूद समता और भ्रातृत्व की भावना नहीं आ पाई और भविष्य में भी इसकी दूर-दूर तक कोई सम्भावना नजर नहीं दिख रही थी। १९३५ में एक सभा में उन्होंने अपने अनुयायियों से कहा था कि-आप लोग ऐसा धर्म चुनें, जिसमें समान दर्जा, समान अधिकार और समान अवसर हों। डॉ० अम्बेडकर को हिन्दू जाति-व्यवस्था का बचपन से ही काफी कटु और तीखा अनुभव था और इसीलिये उन्होंने भारतीय संस्कृति को जाति आधारित ब्राह्मण संस्कृति कहा था। वे हिन्दू समाज की जाति व्यवस्था से सर्वाधिक आहत थे। यही कारण रहा कि वर्ण-व्यवस्था और जाति-व्यवस्था के खिलाफ जैसा खुला संघर्ष उन्होंने किया, वैसी मिसाल भारत के इतिहास में मिलना दुर्लभ है। डॉ० अम्बेडकर ने संविधान सभा को संविधान समर्पित करते हुये कहा था कि-राजनैतिक लोकतन्त्र तभी सार्थक होगा जब देश में सामाजिक लोकतन्त्र कायम होगा। संविधान तो लागू हो गया पर दुर्भाग्य से आज तक भारत में सामाजिक लोकतन्त्र स्थापित नहीं हो सका। कारण स्पष्ट है कि निहित स्वार्थी वर्गों ने बड़े जटिल ताने-बाने के माध्यम से अपना सामाजिक प्रशासन स्थापित कर रखा है और धर्मिक संस्कारों व सांस्कृतिक परम्पराओं की आड़ में इसे अभेद्य बना दिया है। इस अभेद्य दुर्ग को एक झटके में तोड़ना सम्भव नहीं है वरन्‌ इसके लिए अथक्‌ संघर्ष और सतत्‌ सद्-प्रयासों की जरूरत है। आजकल दलित, पिछड़े और आदिवासी जैसे शोषित वर्ग इस ब्राह्मणवादी व्यवस्था को तोड़ने के लिए प्रयासरत हैं, विशेषकर दलित साहित्य के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन का यह कार्य बखूबी किया जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ ब्राह्मणवादी वर्ग अपनी सामाजिक प्रभुता को बचाये रखने हेतु एड़ी-चोटी का पसीना एक किये हुये है और अपने इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु किसी भी हद तक जाने को तैयार है। वस्तुतः इसी सामाजिक प्रभुता के बल पर वह आबादी में मात्र १५ प्रतिशत होते हुये भी राजनैतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, तकनीकी, चिकित्सकीय, शैक्षणिक और आर्थिक क्षेत्रों में अपना पूर्ण वर्चस्व बनाये हुये हैं। यहाँ तक कि दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को आरक्षण तक का सहारा लेने में सतत्‌ अवरोध खड़ा किया जा रहा है, जबकि सामाजिक न्याय के सम्वर्द्धन हेतु आरक्षण व्यवस्था भारतीय संविधान तक में निहित है। वस्तुतः वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सामाजिक प्रशासन और इसके द्वारा निहित हितों की पूर्ति स्वयं में एक साध्य बन गई है। अतः आज सबसे बड़ी आवश्यता है कि दलित, पिछड़े, आदिवासी मिलकर सामूहिक रूप से ब्राह्मणवादियों के इस सामाजिक प्रशासन और उसमें सन्निहित उनके स्वार्थी हितों के चक्रव्यूह को ध्वस्त करें, फिर राजसत्ता तो उनके हाथों में स्वतः आ जायेगी। पर अफसोस कि डॉ० अम्बेडकर, ज्योतिबा फूले, पेरियार जैसी महान विभूतियों के अलावा द्विजों की इस सामाजिक प्रशासन रूपी अवधारणा के तन्तुओं को किसी अन्य ने नहीं समझा या समझने का प्रयास नहीं किया। यही कारण है कि आज भी हिन्दू सामाजिक व्यवस्था उसी प्राचीन मनुवादी सूत्रों से संचालित हो रही है। आर०एस०एस० जैसे संगठनों की स्थापना भी कहीं न कहीं इसी मकसद से की गई। सार्वजनिक मंचों पर भाषणों और प्रवचनों के जरिये सामाजिक समता व भ्रातृत्व का तो खूब प्रचार किया जाता है किन्तु हिन्दू सामाजिक व्यवस्था के रस्मों-रिवाज और परम्परायें, रोजमर्रा का जीवन, जन्म-मरण, विवाह, खान-पान, सम्बोधन, अभिवादन इत्यादि सब कुछ अभी भी मनुवाद से ओत-प्रोत हैं। हिन्दुओं की प्राचीन जीवन पद्धति जिसमें सब कुछ जाति आधारित है, जस की तस है। अगर उसमें कुछ परिवर्तन आया भी तो वह नगण्य है। अंग्रेंजो ने भी इस देश पर शासन करने के लिए उस सामंती और पुरोहिती सत्ता के सामाजिक आधार को पोषित और पुनर्जीवित किया, जिसका आधिपत्य पहले से ही भारतीय समाज पर था। इस सन्दर्भ में भारत के प्रथम गर्वनर जनरल लॉर्ड वारेन हेसिंटग्स का कथन दृष्टव्य है- यदि अंग्रेजों को भारतीयों पर स्थायी शासन करना है, तो उन्हें संस्कृत में उपलब्ध हिन्दुओं के उन पुराने कानूनों पर महारत हासिल करनी चाहिए, जिनके कारण एक ही जाति के मुट्ठी भर लोग हजारों साल तक बहुसंख्यक वर्ग पर शासन करते रहे। इस नीति से जहाँ भारतीयों को गुलामी की जंजीरों का भार थोड़ा हल्का लगेगा, वहीं उन्हें यह भी महसूस होगा कि ये लोग हमारे पुरोहितों की तरह हमारे शुभचिन्तक हैं और इनकी भाषा भी वही है, जो हमारे पुरोहितों की है।
इसी सन्दर्भ में आर्थिक विकास और सामाजिक विकास पर भी प्रकाश डालना उचित होगा। आधुनिक परिवेश में आर्थिक विकास की बात करने पर भूमण्डलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण का चित्र दिमाग में आता है। संसद से लेकर सड़कों तक जी०डी०पी० व शेयर-सेंसेक्स के बहाने आर्थिक विकास की धूम मची है और मीडिया भी इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है। जिस देश के संविधान में लोक कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना की गई हो, वहाँ सामाजिक विकास की बात की गौण हो गई है। यहाँ तक कि नोबेल पुरस्कार विजेता प्रख्यात अर्थशास्त्री डॉ० अमर्त्य सेन ने भी भारतीय परिप्रेक्ष्य में इंगित किया है कि - शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास जैसी आधारभूत सामाजिक आवश्यकताओं के अभाव में उदारीकरण का कोई अर्थ नहीं है। आर्थिक विकास में जहाँ पूजीपतियों, उद्योगपतियों, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों अर्थात राष्ट्र के मुट्ठी भर लोगों को लाभ होता है, वहीं भारत का बहुसंख्यक वर्ग इससे वंचित रह जाता है या नगण्य लाभ ही उठा पाता है। इस प्रकार ट्रिंकल डाउन का सिद्धान्त फेल हो जाता है। अतः सामाजिक विकास जो कि बहुसंख्यक वर्ग की आधारभूत आवश्यकताओं के पूरी होने पर निर्भर है, के अभाव में राष्ट्र का समग्र और चहुमुखी विकास सम्भव नहीं है। एक तरफ गरीब व्यक्ति अपनी गरीबी से परेशान है तो दूसरी तरफ देच्च में करोड़पतियों-अरबपतियों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है। तमाम कम्पनियों पर करोड़ों रुपये से अधिक का आयकर बकाया है तो इन्हीं पूँजीपतियों पर बैंकों का भी करोडों रुपये शेष है। डॉ० अमर्त्य सेन जैसे अर्थशास्त्री ने भी स्पष्ट कहा है कि समस्या उत्पादन की नहीं, बल्कि समान वितरण की है। आर्थिक विकास में पूँजी और संसाधनों का केन्द्रीकरण होता है जो कि कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के खिलाफ है। फिर भी तमाम सरकारें सामाजिक विकास के मार्ग में अवरोध पैदा करती रहती हैं। जिस देच्च की ७० प्रतिशत जनसंख्या नगरीय सुविधाओं से दूर हो, एक तिहाई जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे हो, लगभग ४० प्रतिशत जनसंख्या अशिक्षित हो, जहाँ गरीबी के चलते करोड़ों बच्चे खेलने-कूदने की उम्र में बालश्रम में झोंक दिये जाते हों, जहाँ कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में हर साल हजारों किसान फसल चौपट होने पर आत्महत्या कर लेते हों, जहाँ बेरोजगारी सुरसा की तरह मुँह बाये खड़ी हो-वहाँ शिक्षा को मँहगा किया जा रहा है, सार्वजनिक संस्थानों को औने-पौने दामों में बेचकर निजीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है, सरकारी नौकरियाँ खत्म की जा रही हैं, सब्सिडी दिनों-ब-दिन घटायी जा रही है, निश्चित यह राष्ट्र के विकास के लिए शुभ संकेत नहीं है।
अमेरिका के चर्चित विचारक नोम चोमस्की ने भी हाल ही में अपने एक साक्षात्कार में भारत में बढ़ते द्वन्द पर खुलकर चर्चा की है। चोमस्की का स्पष्ट मानना है कि भारत में जिस प्रकार के विकास से आर्थिक दर में वृद्धि हुयी है, उसका भारत की अधिकांश जनसंख्या से कोई सीधा वास्ता नहीं दिखता। यहीं कारण है कि भारत सकल घरेलू उत्पाद के मामले में जहाँ पूरे विश्व में चतुर्थ स्थान पर है, वहीं मानव विकास के अन्तर्राष्ट्रीय मानदण्डों मसलन, दीर्घायु और स्वस्थ जीवन, शिक्षा, जीवन स्तर इत्यादि के आधार पर विश्व में १२६ वें नम्बर पर है। आम जनता की आर्थिक स्थिति पर गौर करें तो भारत संयुक्त राष्ट्र संघ के ५४ सर्वाधिक गरीब देशों में गिना जाता है। संयुक्त राष्ट्र की मानव विकास रिपोर्ट को मानें तो जैसे-जैसे भारत की विकास दर में वृद्धि हुयी है, वैसे-वैसे यहाँ मानव विकास का स्तर गिरा है। आज ०-५ वर्ष की आयुवर्ग के भारतीय बच्चों में से लगभग ५० फीसदी कुपोषित हैं तथा प्रति १००० हजार नवजात बच्चों में ६० फीसदी से ज्यादा पहले वर्ष में ही काल-कवलित हो जाते हैं। स्पष्ट है कि उपरी तौर पर भारत में विकास का जो रूप दिखायी दे रहा है, उसका सुख मुट्ठी भर लोग ही उठा रहे हैं, जबकि समाज का निचला स्तर इस विकास से कोसों दूर है।
अब समय आ गया है कि गरीब, किसान, दलित, पिछड़े और आदिवासी वर्गों में व्यापक चेतना तथा जागरुकता पैदा की जाय जिससे वे अपनी आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सरकारों को बाध्य कर सकें। यद्यपि यह काम इतना आसान नहीं है क्योंकि द्विज वर्ग आम लोगों का उनकी जरूरतों की तरफ से ध्यान हटाने के लिए सदैव नाना प्रकार के स्वांग रचते रहते हैं। कभी मन्दिर-मस्जिद, कभी राष्ट्रवाद, कभी साम्प्रदायिकता, कभी कशमीर तो कभी आतंकवाद की बात उठाकर लोगों को गुमराह किया जाता है जिससे मूल मुद्दे नेपथ्य में चले जाते हैं। आज जरूरत है कि देश में सबके साथ समान व्यवहार किया जाये, सबको समान अवसर प्रदान किया जाये और जो वर्ग सदियों से दमित-शोषित रहा है उसे संविधान में प्रदत्त विशेष अवसर और अधिकार देकर आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त किया जाये, तभी इस देश में सामाजिक न्याय और सामाजित लोकतंत्र का मार्ग प्रशस्त होगा और भारत एक समृद्ध राष्ट्र के रूप में विश्व के मानचित्र पर अपना अग्रणी स्थान बना सकेगा।


तहबरपुर, पोस्ट- टीकापुर आजमगढ़ (उ०प्र०)-२७६२०८ rsmyadav@rediffmail.com