डॉ. रविन्द्र एस. बनसोडे आज नेक, इमानदारी, सचरित्रता और नैतिकता का युग नहीं बल्कि बेईमान, गैरजिम्मेदार, ऐयाशी और कामचोर जैसे अव्यवस्था से भरा दूषित समाज है। एक ओर मिनिस्टर, कमिश्नर, कलेक्टर, सीनियर सुपरिटेंडडेण्ट आफ़ पुलिस, व्यवसायी, अध्यापक, प्राध्यापक, उप-कुलपति, बड़े-बड़े स्टॉकिस्टों ये सभी सुन्दरी के पिछे पड़े भ्रष्टाचार, डकैती, घूस, नग्न नृत्य आदि का पोषण करते जा रहे है। इसलिए नारी मन में खफगी छा गई है। वे कदम-कदम पर नारी तन के प्यासे हो जाने के कारण वह तलबगार की प्यास मिठाने के लिए मौजूद होती है तो वह उसे भोग की वस्तु समझ बैठा है। तो वह जो अर्थवश, बेसहारा अबला क्या करती? उसे अनायास ही अपने तन के वस्तु का व्यापार ही तो करना पड़ता है और दूसरी बात यह रही कि हम अकल के पीछे लट्ठ लेकर फिरते है। क्योंकि उसके साथ अमानवीय कुकृत्यों की स्थिति को ऊपर उठाकर उसे अनैतिक सम्बन्ध, असहाय, दुर्व्यवहार, व्याभिचारिणी, बेशर्मी, रण्डी, बेऔलाद, निर्लज्य, निकम्मा औरत जैसा किसी औरत पर यह हम समाज का पट्टा लगा देते है, तो वह सुन्दर औरत आखिर उसे जीना है तो क्या करती ? वह वेश्या नहीं बनती तो और क्या करती। इस प्...