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बृहस्पतिवार का व्रत

अमृता प्रीतम आज बृहस्पतिवार था, इसलिए पूजा को आज काम पर नहीं जाना था...बच्चे के जागने की आवाज़ से पूजा जल्दी से चारपाई से उठी और उसने बच्चे को पालने में से उठाकर अपनी अलसाई-सी छाती से लगा लिया, ‘‘मन्नू देवता ! आज रोना नहीं, आज हम दोनों सारा दिन बहुत-सी बातें करेंगे...सारा दिन....’’यह सारा दिन पूजा को हफ्ते में एक बार नसीब होता था। इस दिन वह मन्नू को अपने हाथों से नहलाती थी, सजाती थी, खिलाती थी और उसे कन्धे पर बिठाकर आसपास के बगीचे में ले जाती थी। यह दिन आया का नहीं, माँ का दिन होता था...आज भी पूजा ने बच्चे को नहला-धुलाकर और दूध पिलाकर जब चाबी वाले खिलौने उसके सामने रख दिए, तो बच्चे की किलकारियों से उसका रोम-रोम पुलकित हो गया.....चैत्र मास के प्रारम्भिक दिन थे। हवा में एक स्वाभाविक खुशबू थी, और आज पूजा की आत्मा में भी एक स्वाभाविक ममता छलक रही थी। बच्चा खेलते-खेलते थककर उसकी टाँगों पर सिर रखकर ऊँघने लगा, तो उसे उठाकर गोदी में डालते हुए वह लोरियों जैसी बातें करने लगी—‘मेरे मन्नू देवता को फिर नींद आ गई...मेरा नन्हा-सा देवता...बस थोड़ा-सा भोग लगाया, और फिर सो गया...’’पूजा ने ममता से विभोर ...

याद तो फिर भी आओगे

SEEMA GUPTA ह्दय के जल थल पर अंकित बस चित्र धूमिल कर जाओगे याद तो फिर भी आओगे हंसना रोना कोई गीत पुराना सुर सरगम का साज बजाना शब्द ताल ले जाओगे याद तो फिर भी आओगे सुनी राहे, दिल थाम के चलना साथ बिताये पलो का छलना सब खाली कर जाओगे याद तो फिर भी आओगे कांधे पर सर और स्पर्श का घेरा रात के मुख पर चाँद का सेहरा तुम विराना कर जाओगे याद तो फिर भी आओगे

निर्वासित

प्रताप दीक्षित वह पान की दुकान से सिगरेट लेते हुए या मेरे घर के सामने की गली में आते जाते अक्सर दिखाई दे जाते। मोहल्ले के पढ़े लिखे बेकार लड़के उनके आगे पीछे रहते। जिन्हें वह नौकरी के संबंध में सलाह देते। किसी से उसके इण्टरव्यू के संबंध में बात करते हुए, किसी को किसी कार्यालय में लीव-वेकैंसी के लिए प्रार्थना पत्रा देने को कहते। उनके बगल से निकलते हुए, जब कब, उनकी बातचीत के टुकड़े मेरे कानों में पड़ते। उनके आसपास युवाओं की अनुशासन बद्धता, शिष्टता और आज्ञाकारिता देखकर आश्चर्य होता। मेरे जैसे बेरोजगार युवक को स्वर्ग के देवदूत से कम नहीं प्रतीत होते। उनकी बातें गीता के वाक्य। परन्तु मैं अपने भीरू और दब्बू स्वभाव के कारण उनसे परिचय करने का साहस नहीं जुटा पाता। उनसे अपरिचित रह कर भी मैं उनके संबंध में बहुत कुछ सुन और जान चुका था, कि वे किसी बड़े कार्यालय में डायरेक्टर के स्टेनो हैं। बड़े-बड़े अधिकारियों से उनका परिचय है। किसी की नौकरी लगवाना, साक्षात्कार में सिफारिश करवाना उनके लिए बहुत सरल है। जाने कितने लोग उनकी सिफारिश से नौकरी पाकर मौज कर रहे हैं। इस पर भी वे बड़े ही सरल हृदय, दयालु और परोप...

वाड्मय पत्रिका का लोकार्पण नासिरा शर्मा अंक

नासिरा शर्मा विशेषांक उपलब्ध मूल्य 100/ (डाक खचॅ अलग) पृष्ट 344 अनुक्रम सम्पादकीय नासिरा शर्मा : मेरे जीवन पर किसी का हस्ताक्षर नहीं डॉ. सुदेश बत्रा : नासिरा शर्मा - जितना मैंने जाना ललित मंडोरा अद्भुत जीवट की महिला नासिरा शर्मा अशोक तिवारी : तनी हुई मुट्ठी में बेहतर दुनिया के सपने शीबा असलम फहमी : नासिरा शर्मा के बहान अर्चना बंसल : अतीत और भविष्य का दस्तावेज : कुइयाँजान फजल इमाम : जीरो रोड में दुनिया की छवियां अमरीक सिंह दीप : ईरान की खूनी क्रान्ति से सबक़ सुरेश पंडित : रास्ता इधर से भी जाता है वेद प्रकाश : स्त्री-मुक्ति का समावेशी रूप डॉ. नगमा जावेद : जिन्दा, जीते-जागते दर्द का एक दरिया हैः जिन्दा मुहावरे डॉ. आदित्य : भारतीय संस्कृति का कथानक जीवंत अभिलेखः अक्षयवट एम. हनीफ़ मदार : जल की व्यथा-कथा कुइयांजान के सन्दर्भ में बन्धु कुशावर्ती : जीरो रोड का सिद्धार्थ प्रो. अली अहमद फातमी - एक नई कर्बला सगीर अशरफ : नासिरा शर्मा का कहानी संसार - एक दृष्टिकोण प्रत्यक्षा सिंहा : संवेदनायें मील का पत्थर हैं डॉ. ज्योति सिंह : इब्ने मरियम : इंसानी मोहब्बत का पैग़ाम देती कहानियाँ डॉ. अवध बिहारी : इंसा...

तमाचा

प्रताप दीक्षित शाम को दफ्तर से लौटने पर देखा तो घर में बिजली नहीं थी। अक्सर ऐसा होने लगा था। जैसे-जैसे मौसम के तेवर बदलते, बिजली की आँख-मिचौली बढ़ती जाती। बिजली विभाग का दफ्तर न हुआ देश की सरकार हो गई। वह पसीने में लथपथ प्रतीक्षा करने लगा। और कोई चारा भी तो नहीं था। जब शहर का यह हाल है तो गाँवों में क्या होगा। इन कष्ट के क्षणों में भी उसे देश-समाज की चिन्ता थी। उसे अपने आप पर गर्व हुआ। कुछ देर बाद अंधेरा घिर आया। आ गई। अचानक एक उल्लास मिश्रित शोर उभरा। लाइट आ गई थी, जैसा कि अन्य घरों से आते प्रकाश से लग रहा था। सिवाय उसके यहाँ। अब उसे चिन्ता हुई। सामूहिक रूप से तो किसी कष्ट को भोगा जा सकता है। एक दूसरे के प्रति एक अव्यक्त सहानुभूति की धारा सबको एक सूत्रा में बाँधे रहती है। परन्तु ऐसी स्थिति में तो दूसरे से ईर्ष्या ही पैदा होती है। लगता है कि उसके यहाँ ही कुछ फॉल्ट है। शायद फ्यूज उड़ा हो। उसने फ्यूज देखा, वह सही था। उसने स्विच, बोर्ड हिलाए-डुलाए परन्तु परिणाम ज्यों का त्यों। वह थककर बैठ गया। पत्नी ने कहा कुछ करो न, हाथ पर हाथ रखकर बैठने से क्या होगा? वह परेशान हो गया। ये छोटे-मोटे काम, जि...

अंतर्मन

SEEMA GUPTA अंतर्मन की , विवश व्यथित वेदनाएं धूमिल हुई तुम्हे भुलाने की सब चेष्टाएँ, मौन ने फिर खंगाला बीते लम्हों के अवशेषों को खोज लाया कुछ छलावे शब्दों के, अश्कों पे टिकी ख्वाबों की नींव, कुंठित हुए वादों का द्वंद , सुधबुध खोई अनुभूतियाँ , भ्रम के द्वार पर पहरा देती सिसकियाँ.. आश्वासन की छटपटाहट "और" सजा दिए मानसपट की सतह पर फ़िर विवश व्यथित वेदनाएं धूमिल हुई तुम्हे भुलाने की सब चेष्टाएँ,

गुमशुदा

प्रताप दीक्षित रघुवीर शरण के लिए ये अवकाश के क्षण थे। निश्चिंतता के भी। ऐसी स्थितियाँ कम ही होतीं। अधिकाँशतः खाली समय में, जिसकी इफ़रात होती, उनके हाथों में कागज और पेन रहता। चारों ओर छोटी-छोटी पर्चियों का ढेर लग जाता। वे एकाग्र मन से जाने क्या जोड़ा-घटाया करते। वर्तमान से कटे, आने वाले पलों से बेपरवाह। सामान्यतः बँधी-बँधायी आमदनी वालों का लेखा-जोखा मात्रा खर्चों की कतर-ब्योंत एक सीमित रहता है। उन्हें भी प्रतिमाह एक निर्धारित राशि प्राप्त होती। खर्र्चे भी लगभग निश्चित। परन्तु वे आय के हिसाब-किताब के अलावा, आकस्मिक स्रोतों से होनेवाली आमदनी की संभावना का ध्यान रखते। उन्हें लगता, जिन्दगी का क्या भरोसा? उन्हें कुछ हो गया तो! पक्षपात या हृदय का दौरा तो आज आम हो गया है। इसके अतिरिक्त नौकरी से निलम्बन की आशंका, बेटी के संभावित विवाह, पुत्रा के लिए एक अद्द नौकरी या रोजगार का जुगाड़। अनेकों समस्याएँ थीं, जहाँ एकमुश्त रकम की जरूरत पड़ सकती थी। वे अक्सर हिसाब फैलाते-प्राविडेण्ट फण्ड से अग्रिम पच्चीस हजार, बैंक की फिक्स्ड डिपॉजिट दस हजार, शेयर्स के...बचत खाते में शेष तीन सौ-कुल जोड़... जोड़ने ...

खुश्की का टुकड़ा

- राही मासूम रजा आदमी अपने घर में अकेला हो और पड़ोस की रोशनियां और आवाजें घर में झांक रही हों तो यह साबित करने के लिए कि वह बिल्कुल अकेले नहीं है, वह इसके सिवा और क्या कर सकता है कि उन बेदर्द रोशनियों और आवाजों को उल्लू बनाने के लिए अपनी बहुत पुरानी यादों से बातें करने लगे।वह कई रातों से लगातार यही कर रहा था।अकेला होना उसके लिए कोई नयी बात न थी। उसे मालूम था कि बदन और आत्मा की तनहाई आज के लोगों की तक़दीर है। हर आदमी अपनी तनहाई के समुद्र में खुश्की के एक टुकड़े की तरह है। सागर के अंदर भी है और बाहर भी । और वह इस अकेलेपन का ऐसा आदी हो गया है कि अपनी तनहाई को बचाने के लिए अपने से भी भागता रहता है। दस-ग्यारह बरस या दस-ग्यारह हजार वर्ष पहले उसने एक शेर लिखा थाःछूटकर तुझसे अपने पास रहे,कुछ दिनों हम बहुत उदास रहे।यह उदासी आधुनिक है हमारे पुरखों की उदासी से बिल्कुल अलग है इसने हमारे साथ जन्म लिया है और शायद यह हमारे ही साथ मर भी जायेगी। क्योंकि हर पीढ़ी के साथ उसकी अपनी उदासी जन्म लेती है।हमारे युग की उदासी को उदासी कहना, ठीक नहीं है, वास्तव में यह बोरियत है, यह बोर होने वालों की पीढ़ी है, किसी चीज...

तेरे जाने के बाद

Seema Gupta आँखों मे जलजले , मरुस्थल दिल की जमीन . भावनाओ की साजिश , संभावनाओ का जलना . धधकते अंगारों से पल, दर्द का विकराल रूप , म्रत्यु से द्वंद , पथराये जिस्म का गलना . तेरे जाने के बाद......

वैषम्य

महेंद्र भटनागर हर व्यक्ति का जीवन नहीं है राजपथ — उपवन सजा वृक्षों लदा विस्तृत अबाधित स्वच्छ समतल स्निग्ध ! . सम्भव नहीं हर व्यक्ति को उपलब्ध हो ऐसी सुगमता, इतनी सुकरता। सम दिशा सम भूमि पर आवास सबके हैं नहीं प्रस्थित, एक ही गन्तव्य सबका है नहीं जब अभिलषित। . कुछ को पार करनी ही पड़ेंगी तंग-सँकरी कण्ट-कँकरीली घुमावोंदार ऊँची और नीची जन-बहुल अंधारमय पगडण्डियाँ — गलियाँ पसीने-धूल से अभिषिक्त, प्रति पग पंक से लथपथ। . नहीं, हर व्यक्ति का जीवन सकल सुविधा सहित आलोक जगमग राजपथ ! . जब भूमि बदलेगी, मार्ग बदलेगा ! .  

जीवन-संदर्भ

महेंद्र भटनागर आओ जीवन की गीता को अभिनव संदर्भ प्रदान करें ! बदला जब परिवेश मनुज का आओ नयी ऋचाओं का निर्माण करें ! . नव मूल्यों को स्थापित कर जीवन-धर्मी कविता के अन्तर-बाह्य स्वरूपों को अभिनव रचना दे ! जीवन्त नये आदर्शों की आभा दें ! जगमग स्वर्णिम गहने पहना दें ! . जीवन की प्रतिमा को नयी गठन नव भाव-भंगिमा से सज्जित कर; मानव को चिर-इच्छित संबंधों की गरिमा से सम्पूरित कर युग को महिमावान करें ! आओ नव राहों के अन्वेषी बन नूतन क्षितिजों की ओर प्रवह प्रयाण करें ! .

ऊहापोह

महेंद्र भटनागर प्रश्न — अविकल स्थिर अपनी जगह पर। पंगु सारी तर्कना, विखण्डित कल्पना ! अनिश्चित की शिलाओं तले रोपित प्रश्न ! . सूत्राभाव पूर्व...उत्तर...सर्वत्र ठहराव ! . यह कश-म-कश और कब तक ? विवश मनःस्थिति और कब तक ? और कब तक ओढ़े रहोगे प्रश्न ? उलझी ऊबट सतह पर। . सब पूर्ववत् अपनी जगह पर।

वात्याचक्र

महेंद्र भटनागर अंधड़ आ रहा सम्मुख उमड़ता सनसनाता वेगवाही धूलि-धूसर ! . कुछ क्षणों में घेर लेगा बढ़ तुम्हारा भी गगन ! जागो उठो दृढ़ साहसिक मन हो सचेत-सतर्क ! थपेड़े झेलने का प्रण अभी तत्काल निश्चय आत्मगत कर। . अंधड़ों की शक्ति तुमको तौलनी है, संकटों पर आत्मबल सन्नद्ध हो जय बोलनी है, प्राण की सोयी हुई अज्ञात-मेधा को सचेतन कर ! . हिमालय-सम सुदृढ़ व्यक्तित्व के सम्मुख गरजता क्रूर अंधड़ राह बदलेगा ! मरण का तीव्र धावन तिमिर अंधड़ राह बदलेगा !

परिवेश के प्रति

महेंद्र भटनागर कितनी तीखी ऊमस से परिपूर्ण गगन, लहराती अग्नि-शिखाओं से कितना परितप्त भुवन ! कितना क्षोभ-युक्त भाराक्रांत दमित मानव-मन ! जीवन का वातावरण समस्त थका-हारा, काराबद्ध ! . आओ इसको बदलें, गतिमान करें, मल्लार-राग से भर दें जलवाह ! पवन-संघातों से निःशेष करें दिग्दाह !

नियति

महेंद्र भटनागर संदेहों का धूम भरा साँसें कैसे ली जायँ ! . अधरों में विष तीव्र घुला मधुरस कैसे पीया जाय ! . पछतावे का ज्वार उठा जब उर में कोमल शय्या पर कैसे सोया जाय ! . बंजर धरती की कँकरीली मिट्टी पर नूतन जीवन कैसे बोया जाय ! .  

हिन्दी इन्टरव्यू : उद्भव और विकास

पुस्तक उपलब्ध मूल्य 200(25प्रतिशत छूट के साथ) आलेख डॉ० मेराज अहमद- साक्षात्कार की भूमिका प्रो० रमेश जैन- साक्षात्कार डॉ० विष्णु पंकज- हिन्दी इन्टरव्यू : उद्भव और विकास डॉ० हरेराम पाठक- हिन्दी साक्षात्कार विधा : स्वरूप एवं सम्भावनाएं अशफ़ाक़ कादरी- साहित्य एवं मीडिया में साक्षात्कार - एक दृष्टि विज्ञान भूषण- प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से संबंधित साक्षात्कार की सैद्धान्तिकी में अन्तर दिनेश श्रीनेत- हमारे समय में नचिकेता का साहस साक्षात्कार डॉ० शिवकुमार- मिश्र डॉ० सूर्यदीन यादव प्रो० मैनेजर पाण्डेय -देवेन्द्र चौबे, अभिषेक रोशन, रेखा पाण्डेय एवं उदय कुमार जाबिर हुसैन- रामधारी सिंह दिवाकर नासिरा शर्मा- डॉ० फीरोज अहमद काशीनाथ सिंह- रामकली सराफ मधुरेश- साधना अग्रवाल ओमप्रकाश वाल्मीकि- डॉ० शगुफ्ता नियाज कंवल भारती- अंशुमाली रस्तोगी डॉ० अर्जुनदास केसरी- डॉ० हरेराम पाठक चित्रा मुद्गल- श्याम सुशील मलखान सिंह सिसौदिया -डॉ० राजेश कुमार शहरयार- डॉ० जुल्फिकार प्रो० जमाल सिद्दीकी- डॉ० मेराज अहमद एवं डॉ० फीरोज अहमद एक साधारण होटल वाला- डॉ० मेराज अहमद

मुस्लिम कथाकार और उनकी हिन्दी कहानियाँ

पुस्तक उपलब्ध मूल्य 200(25प्रतिशत छूट के साथ) भूमिका डॉ० मेराज अहमद:सम्पूर्ण समाज की अभिव्यक्ति मुस्लिम कथाकार और उनकी हिन्दी कहानियाँ कहानियाँ हसन जमाल : चलते हैं तो कोर्ट चलिए मुशर्रफ आलम जौक़ी : सब साजिन्देएखलाक अहमद जई : इब्लीस की प्रार्थना सभा हबीब कैफी : खाये-पीये लोग तारिक असलम तस्नीम : बूढ़ा बरगद अब्दुल बिस्मिल्लाह : जीना तो पड़ेगा असगर वजाहत : सारी तालीमात मेहरून्निसा परवेज : पासंग नासिरा शर्मा : कुंइयांजान मेराज अहमद : वाजिद साँई अनवर सुहैल : दहशतगर्द आशिक बालौत : मौत-दर-मौत शकील : सुकून मौ० आरिफ : एक दोयम दर्जे का पत्र एम.हनीफ मदार : बंद कमरे की रोशनी

अनुदर्शन

महेंद्रभटनागर उड़ गये ज़िन्दगी के बरस रे कई, राग सूनी अभावों भरी ज़िन्दगी के बरस हाँ, कई उड़ गये ! . लौट कर आयगा अब नहीं वक़्‍त जो — धूल में, धूप में खो गया, स्याह में सो गया ! . शोर में चीखती ही रही ज़िन्दगी, हर क़दम पर विवश, कोशिशों में अधिक विवश ! . गा न पाया कभी एक भी गीत मैं हर्ष का, एक भी गीत मैं दर्द का ! . गूँजता रव रहा मात्र : संघर्ष....संघर्ष... संघर्ष ! विश्रान्ति के पथ सभी मुड़ गये ! ज़िन्दगी के बरस, रे कई देखते...देखते उड़ गये !

दिनान्त

. महेंद्रभटनागर आज का भी दिन हमेशा की तरह चुपचाप बीत गया ! . अनिच्छित असह ब्राह्ममुहूर्त का कर्कश अलार्म बजा, दिनागम की खुशी में एक पक्षी भी न चहका, भोर घर-घर बाँट आयी स्वर्ण, मेरे बन्द द्वारों पर किसी ने भी न दस्तक दी न धीरे से किसी ने भी पुकारा नाम ! . प्रौढ़ा दोपहर प्रत्येक की दैनन्दिनी में लिख गयी विश्रान्ति के क्षण ; मात्र मुझको ऊब केवल ऊब ! . अलसाया शिथिल अब देखता हूँ आ रही सन्ध्या अरुणिमा, तुम भला क्या दे सकोगी ? मौन उत्तर था — ‘अँधेरा.... घन अँधेरा !’ .

सुकर : दुष्कर

महेंद्रभटनागर महज़ दिन बिताना सरल है, जीना कठिन ! . ज़िन्दगी को काटना कितना सहज है, खण्डित व्यक्तित्व के धागों रेशों को सहेजना सँवारना सीना कठिन ! . केवल समय-असमय उगलने को गरल है पीना कठिन ! महज़ दिन बिताना सरल है जीना कठिन !