Skip to main content

तमाचा

प्रताप दीक्षित
शाम को दफ्तर से लौटने पर देखा तो घर में बिजली नहीं थी। अक्सर ऐसा होने लगा था। जैसे-जैसे मौसम के तेवर बदलते, बिजली की आँख-मिचौली बढ़ती जाती। बिजली विभाग का दफ्तर न हुआ देश की सरकार हो गई। वह पसीने में लथपथ प्रतीक्षा करने लगा। और कोई चारा भी तो नहीं था। जब शहर का यह हाल है तो गाँवों में क्या होगा। इन कष्ट के क्षणों में भी उसे देश-समाज की चिन्ता थी। उसे अपने आप पर गर्व हुआ। कुछ देर बाद अंधेरा घिर आया।
आ गई। अचानक एक उल्लास मिश्रित शोर उभरा। लाइट आ गई थी, जैसा कि अन्य घरों से आते प्रकाश से लग रहा था। सिवाय उसके यहाँ। अब उसे चिन्ता हुई। सामूहिक रूप से तो किसी कष्ट को भोगा जा सकता है। एक दूसरे के प्रति एक अव्यक्त सहानुभूति की धारा सबको एक सूत्रा में बाँधे रहती है। परन्तु ऐसी स्थिति में तो दूसरे से ईर्ष्या ही पैदा होती है। लगता है कि उसके यहाँ ही कुछ फॉल्ट है। शायद फ्यूज उड़ा हो। उसने फ्यूज देखा, वह सही था। उसने स्विच, बोर्ड हिलाए-डुलाए परन्तु परिणाम ज्यों का त्यों। वह थककर बैठ गया। पत्नी ने कहा कुछ करो न, हाथ पर हाथ रखकर बैठने से क्या होगा?
वह परेशान हो गया। ये छोटे-मोटे काम, जिन्हें अन्य लोग आसानी से निपटा लेते, उनसे न सम्हलते। इस तरह के कार्य उसे सदा दुःसाध्य लगते रहे थे। मजबूरी की बात तो अलग। वह अनमने ढंग से बिजली मिस्त्री की तलाश में निकला। इन बिजली वालों से भगवान बचाए। पहले तो वह इतने छोटे से कार्य के लिए तैयार नहीं होगा। आजकल पंखे-कूलर के काम में वैसे ही व्यस्तता है। गली-मोहल्ले के मुलाहिजे से हामी भी भर लें तो घण्टों क्या एक दो-दिन शक्ल नहीं दिखाते।
दोबारा जाने पर उत्तर मिलता है, आप चलें। बस अभी आ रहा हूँ। यदि बहुत फुसलाने से आ भी गए तो जरा से काम का, वह भी रिपेयरिंग के बाद, जो पारिश्रमिक बताते उससे तो लगता पहले की स्थिति में लौटना ज्यादा अच्छा होगा। परन्तु तब ऐसा होना सम्भव नहीं होता। खैर, बिजली वाले के पास जाना तो था ही। वह पास में ही स्थित बिजली वाले की दुकान पर गया। दुकान में मिस्त्री नहीं था। दुकान वाले ने बड़ी ही नम्रता से कहा।
आप चलें साहब! थोड़ी देर में मिस्त्री के आने पर उसे आपके यहाँ भेजता हूँ।
दुकानदार उसका घर जानता था, फिर भी उसने मकान नम्बर, नुक्कड़ पर मन्दिर की पहचान आदि भली भाँति समझा दी। वह लौट आया। उसे तो पहले से ही इसी जवाब की उम्मीद थी।
काफी देर हो गई। न किसी को आना था, न कोई आया। उसने सोचा-अब कल देखा जाएगा। परेशानियों के बाद वह परिस्थितियों से समझौता कर लेता। धीरे-धीरे उसकी अंधेरे से पहचान बनने लगी थी। परन्तु पत्नी और बच्चे चित्रहार न देख पाने के कारण बेचैन और झुँझलाए हुए थे। बिजली वाले के पास फिर जाना पड़ा। इस बार दुकान का मालिक दुकान बंद करने की तैयारी में लग रहा था।
उसने कहा, इस समय तो मिस्त्री लौटा नहीं। अगर सुबह भेज दे....।
अरे नहीं भई, कुछ करो। वह गिड़गिड़ाता हुआ-सा बोला। उसके चेहरे पर व्यग्रता और निरीहता दोनों उभर आये।
तभी दुकान में एक १६-१७ साल का छोकरा-सा दिखता लड़का आया।
१५ एम्पियर का एक प्लग टॉप, पाँच मीटर २ बाई ४ का पी.वी.सी. तार देना।
गोरे, बड़े बालों वाले जीन्स पहने छोकरे ने कहा। लड़का तेज दिख रहा था। उसके हाथ में एक प्लास था। यद्यपि लड़का देखने में बिजली मिस्त्री जैसा नहीं लग रहा था, परन्तु उसके हाथ में प्लास और क्रय किए जाने वाले सामान के
सम्बन्ध में उसके तकनीकी विवरण के कारण उसे लगा कि शायद उसका काम निकल सके।
उससे झिझकते हुए उसे संबोधित किया।
क्या... उसे असमंजस हुआ, लड़के को आप कह कर सम्बोधित करे या तुम'। आप लायक उसकी उम्र नहीं थी और तुम कहने में उसके साथ-सुथरे कपड़े और तेजी बाधक थी। उसने तुम-आप गोलमोल कर दिया।
जरा-सा काम था।
क्या काम है?'' छोकरे प्रत्युत्तर में पूछा।
यहीं पास में...।'' उसने पहले जगह बताते हुए बाद में काम बताया। कहीं दूर जाने की बात सुन वह मना न कर दे।
चलिए। वह तैयार हो गया।
उसने पारिश्रमिक पूछना चाहा। परन्तु हमेशा की तरह आशंका के कारण-कहीं अनजान समझ, पैसे ज्यादा बता दिए और बात न तय हो सकी, वह कतरा गया।
जब-तब ऐसा होता। रिक्शे पर बैठने से पहले पैसे तय करने में उसे डर लगता। मालूम नहीं क्या माँग बैठे। मोलभाव करने पर मना कर दे। मोलभाव उसे अपनी प्रतिष्ठा और गरिमा के प्रतिकूल भी लगता है। और जब बिना पूछे बैठ जाता तो पूरे रास्ते मन ही मन पछताता-तय कर लेना था, अब तो जो भी अनाप-शनाप माँगेगा देना पड़ेगा। वह हिसाब जोड़ता रहता। इतनी दूर का अधिकतम किराया क्या हो सकता है। उससे दो रुपये अधिक दे दे। पर नहीं यह तो मूर्खता होगी। एक रुपया ज्यादा दिया जा सकता है। वह रिक्शे वाले से संवाद आरम्भ कर देता।
कहाँ के रहने वाले हो?
कब से रिक्शा चला रहे हो?
आदि आदि।
उसे लगता, इस प्रकार निकटता होने से कम से कम वह ठगेगा तो नहीं। संयोग से यदि वह उसके गाँव-जवार या आसपास का निकल आता तो वह खिल उठता।
भाई, तुम तो अपनी ही तरफ के हो।
गन्तव्य पर पहुँच वह सोची हुई राशि उसे देता, यदि वह चुपचाप स्वीकार कर लेता तो उसे निराशा सी होती-उसने जल्दबाजी कर दी। यदि एक रुपया कम भी दिया जाता तो काम चल जाता।
हिसाब-किताब में वह सदा का पक्का रहा है। किसी रेस्टोरैंट में बैठकर खाते-पीते, वह सम्बन्धित बिल का हिसाब-किताब मन ही मन करता रहता। दोस्तों अथवा परिवार के साथ इसकी गति में तीव्रता आ जाती। खाई जाने वाली सामग्री के साथ ही बैरे को दी जाने वाली टिप की राशि वह प्रति व्यक्ति व्यय में जोड़ लेता।
उसने दुकानदार से पूछना चाहा, लड़के को क्या दे दें। लड़का वही खड़ा था। उसके सामने पूछने में संकोच हुआ। उसके आगे बढ़ जाने पर उसने पलटकर पूछ ही लिया।
साहब, समझकर दे दीजिएगा।'' दुकानदार ने कहा।
घर आकर लड़के ने मेन स्विच में टेस्टर से करेण्ट चेक किया। लाइन ठीक थी। मीटर में करेण्ट आ रहा था। उसने बोर्ड खोला। मेन लाइन से बोर्ड तक आए तारों में एक तार अलग था। उसने दोनों तार बाहर खींचे। तारों को छीलकर जोड़ने लगा।
वह टार्च दिखा रहा था। वह उससे लगातार बातें किये जा रहा था, ÷÷मेरे दफ्तर में तो बहुत काम निकलता है। कई मिस्त्री आगे-पीछे घूमते रहते हैं।''
फिर रुककर कहा, ÷÷यदि तुम्हें फुरसत है तो तुम्हारे लिए बात करूँ।'' लड़का अपने काम में मग्न था।
उसने मेन स्विच ऑन किया, बिजली नहीं आई। ऑफ और फिर ऑन करने पर लाइट एकबारगी चमककर चली गई। वह फिर से तार अलग करने लगा। उसकी बेचैनी बढ़ रही थी। जितनी देर होगी, उतने ही ज्यादा पैसे माँगेगा। जल्दी काम होने पर कम से कम यह कहने का मौका तो रहता ही है, ÷÷काम ही कितनी देर का था।''
उसने कहना चाहा इससे तो पहले ही ठीक था। अगर कहीं यह ठीक न कर सका तो दूसरा व्यक्ति और ज्यादा वसूलेगा। जैसे-जैसे देर हो रही थी उसकी झुँझलाहट बढ़ रही थी। उसने मन ही मन निश्चय किया-आज एक भी पैसा फालतू नहीं देना है। वह हमेशा की तरह बरगलाने या धौंस में नहीं आएगा। आखिर उसका भी तो अपना व्यक्तित्व है। सरकारी दफ्तर में बड़ा बाबू। तमाम अधीन लोगों को दबाव में रखता ही है-चाहे वे दैनिक वेतनभोगी ही क्यों न हो। क्या हुआ जो वह बड़े अधिकारियों के आगे, लोगों के कथनानुसार, ÷हें-हें' करता रहता है। वह तो सरकारी ड्यूटी का मामला है। अब इन रिक्शे वालों, बिजली वालों जैसे दो टके के लोगों के सामने दब गया तो रह गई मर्दानगी। अब लौ नसानी अब न नसैहों। उसने विचार किया-दस रुपए पर्र्याप्त होंगे। हैं तो कुछ ज्यादा। परन्तु इससे कम में होता क्या है।
उसे अपनी दरियादिली पर स्वयं गर्व हुआ। परन्तु यदि यह न माना! अगले ही क्षण उसके मन में आया-ठीक है दो रुपये और सही। उसने ऊपर की जेब में दस रुपए का नोट अलग रख लिया। ज्यादा पैसे देखकर ये लोग और मुँह फैलाते हैं। पहले दस, फिर न मानने पर दो और। इससे अधिक एक भी नहीं। कोई नया सामान तो लगाया/बदला नहीं है। आखिर काम ही कितना किया है। वह मन ही मन आश्वस्त हुआ।
लेकिन बड़े बालों वाला छोकरा लग तेज रहा है। पूरा गुण्डा नज+र आ रहा है। उसे लगा इसको नहीं बुलाना था। लगता है आज छुआ कर रहेगा। वह भी कैसी मूर्खता कर जाता है बाज वक्त। उसे परिवार वालों पर गुस्सा आने लगा। एक दिन भी बिना बिजली के नहीं रहा जा सकता था। खैर अब तो सर दे ही दिया है ओखली के बीच। जो होगा देखा जाएगा।
अब तो भुगतना ही है। देखो, कैसे चालाकी से देर किए जा रहा है। चलो दो और सही। उसने गहरी सांस ली। कुल हुए चौदह। पर कहीं २०, ३० या ५० जो, जी में आए न माँग ले? यदि झगड़ा किया, कुछ अभद्रता न कर बैठे। जो भी हो, परन्तु किसी भी सूरत में आज दबना नहीं है। जरा सी भी बदतमीजी की तो वह तमाचा मुँह पर मारेगा कि सारी हेकड़ी निकल जाएगी। दो हड्डी का तो दिख रहा है। आज वह दृढ़प्रतिज्ञ हो गया था। उसने कोशिश की लेकिन उसे याद नहीं आया कि उसने पिछली बार, कब और किसकी पिटाई की थी। परन्तु मारपीट से कहीं मामला बढ़ भी तो सकता था।
उसे अखबारों की कुछ घटनाएँ याद आईं, जरा सी बात पर चाकू या बम मार दिए गये थे। उसने उसे आजमाना चाहा। स्वर को रहस्यमय बनाते हुए, ÷÷गुड्डू को तो जानते ही होगे। अरे वह जिसने पिछली बार भरे बाजार में गोली चला दी थी। चाकू-वाकू तो मामूली सी बात है उसके लिए। मेरा भतीजा लगता है।''
तभी लाइट आ गई। अब जौहर का अवसर आ गया। उसने सोचा। उसके हाथ-पैर कांप रहे थे। लड़के के चेहरे पर धूर्तता-भरी मुस्कुराहट दिखाई पड़ी। दोनों एक दूसरे पर दाँव भाँज रहे थे। पहल कौन करता है?
लड़का हँसा।
वह हतप्रभ हुआ, यह तो नया पैंतरा है। इस पर तो उसने विचार ही नहीं किया था। वह इस दाँव की काट ढूंढता तब तक लड़का सीढ़ियों से उतर चुका था।
÷÷अरे रुको, पैसे तो लेते जाओ।'' उसने कहा। लड़का निचली सीढ़ी पर ठिठका, ÷÷साहब, देर ही कितनी लगी है। इतने से काम का क्या चार्ज? आप परेशान थे। काम हो गया।'' लड़का तेजी से निकल गया था।

Comments

Popular posts from this blog

साक्षात्कार

प्रो. रमेश जैन
साक्षात्कार जनसंचार का अनिवार्य अंग है। प्रत्येक जनसंचारकर्मी को समाचार से संबद्ध व्यक्तियों का साक्षात्कार लेना आना चाहिए, चाहे वह टेलीविजन-रेडियो का प्रतिनिधि हो, किसी पत्र-पत्रिका का संपादक, उपसंपादक, संवाददाता। साक्षात्कार लेना एक कला है। इस विधा को जनसंचारकर्मियों के अतिरिक्त साहित्यकारों ने भी अपनाया है। विश्व के प्रत्येक क्षेत्र में, हर भाषा में साक्षात्कार लिए जाते हैं। पत्र-पत्रिका, आकाशवाणी, दूरदर्शन, टेलीविजन के अन्य चैनलों में साक्षात्कार देखे जा सकते हैं। फोन, ई-मेल, इंटरनेट और फैक्स के माध्यम से विश्व के किसी भी स्थान से साक्षात्कार लिया जा सकता है। अंतरिक्ष में संपर्क स्थापित कर सकते हैं। पहली बार पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी ने अंतरिक्ष यात्री कैप्टन राकेश शर्मा से संवाद किया था, जिसे दूरदर्शन ने प्रसारित किया था। इस विधा का दिन पर दिन प्रचलन बढ़ता जा रहा है।
मनुष्य में दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ होती हैं। एक तो यह कि वह दूसरों के विषय में सब कुछ जान लेना चाहता है और दूसरी यह कि वह अपने विषय में या अपने विचार दूसरों को बता देना चाहता है। अपने अनुभ…

समकालीन साहित्य में स्त्री विमर्श

जया सिंह


औरतों की चुप्पी सदियों और युगों से चली आ रही है। इसलिए जब भी औरत बोलती है तो शास्त्र, अनुशासन व समाज उस पर आक्रमण करके उसे खामोश कर देते है। अगर हम स्त्री-पुरुष की तुलना करें तो बचपन से ही समाज में पुरुष का महत्त्व स्त्री से ज्यादा होता है। हमारा समाज स्त्री-पुरुष में भेद करता है।
स्त्री विमर्श जिसे आज देह विमर्श का पर्याय मान लिया गया है। ऐसा लगता है कि स्त्री की सामाजिक स्थिति के केन्द्र में उसकी दैहिक संरचना ही है। उसकी दैहिकता को शील, चरित्रा और नैतिकता के साथ जोड़ा गया किन्तु यह नैतिकता एक पक्षीय है। नैतिकता की यह परिभाषा स्त्रिायों के लिए है पुरुषों के लिए नहीं। एंगिल्स की पुस्तक ÷÷द ओरिजन ऑव फेमिली प्राइवेट प्रापर्टी' के अनुसार दृष्टि के प्रारम्भ से ही पुरुष सत्ता स्त्राी की चेतना और उसकी गति को बाधित करती रही है। दरअसल सारा विधान ही इसी से निमित्त बनाया गया है, इतिहास गवाह है सारे विश्व में पुरुषतंत्रा, स्त्राी अस्मिता और उसकी स्वायत्तता को नृशंसता पूर्वक कुचलता आया है। उसकी शारीरिक सबलता के साथ-साथ न्याय, धर्म, समाज जैसी संस्थायें पुरुष के निजी हितों की रक्षा करती …

स्त्री-विमर्श के दर्पण में स्त्री का चेहरा

- मूलचन्द सोनकर

4
अब हम इस बात की चर्चा करेंगे कि स्त्रियाँ अपनी इस निर्मित या आरोपित छवि के बारे में क्या राय रखती हैं। इसको जानने के लिए हम उन्हीं ग्रन्थों का परीक्षण करेंगे जिनकी चर्चा हम पीछे कर आये हैं। लेख के दूसरे भाग में वि.का. राजवाडे की पुस्तक ‘भारतीय विवाह संस्था का इतिहास' के पृष्ठ १२८ से उद्धृत वाक्य को आपने देखा। इसी वाक्य के तारतम्य में ही आगे लिखा है, ‘‘यह नाटक होने के बाद रानी कहती है - महिलाओं, मुझसे कोई भी संभोग नहीं करता। अतएव यह घोड़ा मेरे पास सोता है।....घोड़ा मुझसे संभोग करता है, इसका कारण इतना ही है अन्य कोई भी मुझसे संभोग नहीं करता।....मुझसे कोई पुरुष संभोग नहीं कर रहा है इसलिए मैं घोड़े के पास जाती हूँ।'' इस पर एक तीसरी कहती है - ‘‘तू यह अपना नसीब मान कि तुझे घोड़ा तो मिल गया। तेरी माँ को तो वह भी नहीं मिला।''
ऐसा है संभोग-इच्छा के संताप में जलती एक स्त्री का उद्गार, जिसे राज-पत्नी के मुँह से कहलवाया गया है। इसी पुस्तक के पृष्ठ १२६ पर अंकित यह वाक्य स्त्रियों की कामुक मनोदशा का कितना स्पष्ट विश्लेषण …