Sunday, November 7, 2010

एक नई कर्बला

(नासिरा शर्मा की कहानियों में)

प्रो. अली अहमद फातमी

इंसान और इंसानियत के अनेक रूप होते हैं, लगभग यही सूरत होती है इंसानी रिश्तों की भी। रचना में वह कैसे दर्शन पायें उसका मामला उससे भी अजीब है। अंग्रेज़ी साहित्य में रोमानी शायर बर्डसवर्थ से किसी ने इंटरव्यू लेते हुए पूछा था कि आपने इतनी अच्छी रोमानी शायरी किस तरह की? जवाब मिला, अगर फ्राँस में इन्के़लाब न आया होता और अवामी ज़िन्दगी बर्बाद न हुई होती तो मैं एक नये और खुशहाल समाज का ख़्वाब न देख पाता। ज़रा बदली हुई भाषा में ‘फास्टर’ ने भी कहा था कि एक ऐसी दुनिया जो अदब (साहित्य) और आर्ट से ख़ाली हो मेरे लिये नाक़ाबिले क़ुबूल है। लेकिन यह बात ज़्यादा अहमियत रखती है जब वह यह भी कहता है कि इंसानी ताल्लुक़ात के एहसास और सरोकारों के बग़ैर आर्ट, अदब और ज़िन्दगी सभी बेमतलब व बेमानी होते हैं।

आर्ट पैदा होता है अहसास से और अहसास देन है ज़िन्दगी की, लेकिन इन तीनों का तालमेल, समन्वय के मामलात अजीब-व-ग़रीब होते हैं, इसका कोई पक्का पैमाना नहीं, साँचा नहीं। यही तलाश करना आलोचना का काम हुआ करता है।

हिन्दी कथा साहित्य की सुप्रसिद्ध और जानी मानी लेखिका ‘नासिरा शर्मा’ - उर्दू के सुप्रसिद्ध लेखक व शायर और उर्दू विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के भूतपूर्व अध्यक्ष प्रो. ज़ामिन अली की छोटी बेटी हैं। मुसलमानों के खाते पीते शिया घराने में पैदा हुई, जहाँ की एक विशेष तहज़ीब हुआ करती है। यह तहज़ीब उस समय और अहमियत और नज़ाक़त धारण कर लेती है। जब वह ज़मींदार व जागीरदार तबक़े की हो। घर में मरसिया व मजलिस के अलावा बाक़ायदा शेरो-शायरी का भी माहौल मिला हो, जैसा कि एक लेख में वह खुद लिखती हैं - ‘‘घर का माहौल अदबी था, मरसिया सोज़, नौहे लिखने-पढ़ने का रिवाज़ कई पुश्तों से था। ग़ज़ल कहना और सुनाना घर के आदाब में शामिल था। उस खानदान में क़लम उठाना उपलब्धि न था बल्कि कुछ ऐसा लिखना चुनौती था जो ख़ानदान के स्तर से नीचा न हो उसका अपना तनाव व लुत्फ़ दोनों हैं।’’ लुत्फ़ की बात तो बाद में आती है लेकिन अक्सर बाग़ियाना क़दम, बेचैनी व तनाव से ही उठता है। कमसिन नासिरा शर्मा अपने दूसरे भाई बहनों की तरह जीतीं, ज़िन्दगी का लुत्फ़ उठातीं जो अमीर घराने का वाक़ई बेफ्रि़करी से भरा लुत्फ़.............................................शेष भाग पढ़ने के लिए पत्रिका देखिए











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