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ज़ीरो रोड में दुनिया की छवियां

फ़ज़ल इमाम मल्लिक



नासिरा शर्मा से पहली और अब तक की आखि़री मुलाक़ात क़रीब पंद्रह साल पहले कलकत्ता में हुई थी। दिल्ली में सात साल होने को आए पर उनसे मिलना अब तक हो नहीं पाया। दिल्ली के साहित्यिक समारोहों में उनका आना-जाना न के बराबर होता है और यही हाल कुछ-कुछ मेरा भी है। इस तरह के सभा-समारोहों में एक तरह के चेहरे और एक तरह की बातें सुनकर बेइंतहा कोफ़्त होती है इसलिए कुछ परिचितों और मित्रों के अलावा साहित्य के अधिकांश समारोहों में जाने से गुरेज़ ही करता हँू। कमलेश्वर जी जब थे तो ज़रूर इस तरह के सभा-समारोहों में आना-जाना होता था। उसकी वजह भी थी। उन्हें हमेशा मैंने अभिभावक का दर्जा दिया है और उन कार्यक्रमों में जिनमें वे शिरकत करते थे ज़रूर हिस्सा लेता ताकि उनके साथ कुछ देर बिताने का मौक़ा मिले। पर उनके जाने के बाद अब दिल्ली की साहित्यिक मंडी के समारोहों का हिस्सा बनने की इच्छा नहीं होती। नासिरा शर्मा भी दिल्ली की साहित्यिक नौटंकी में नहीं शामिल होतीं इसलिए अब तक उनसे मिलना नहीं हुआ। वे दिल्ली के एक सिरे पर रहती हैं, उनसे नहीं मिल पाने की वजह यह भी हो सकती है। हो सकता है कि कुछ लोग कहें कि यह सब तो न मिलने का बहाना भर है, आदमी किसी से मिलना चाहे तो चांद पर कमंद डाल सकता है फिर नासिरा शर्मा तो दिल्ली में ही रहती हैं। यह बात सही भी है। नासिरा शर्मा रहतीं तो ‘छत्तरपुर की पहाड़ियों’ पर ही हैं, जहां जाना बहुत दुश्वार नहीं। उनके घर की राह पर चलते हुए कहकशां भले न हो पर पत्थर भी नहीं है जिन पर चल कर उन तक पहुंचा नहीं जा सकता है। यह बात दीगर है कि नासिरा शर्मा ने रहने के लिए जो जगह चुनी है वह पहाड़ी के नाम से ही जानी-पहचानी जाती है। पर मुझे पूरा यक़ीन है कि नासिरा शर्मा ने वहां घर बना कर पत्थरों को मोम में बदल डाला होगा। दरअसल नासिरा शर्मा की साहित्य की एक बड़ी ख़ूबी भी उसकी मासूमियत, उसकी नर्मी और धीमी-धीमी तपिश ही है जो आदमी को आदमी से जोड़ कर उसे बेहतर इंसान बनने के लिए प्रेरित करती है। यों भी दिल्ली में एक जगह से दूसरी जगह जाने के दौरान पत्थरों से होकर तो जाना नहीं पड़ता। यह ज़रूर है कि दर्जनों लाल बत्तियों, वाहनों के शोर, भीड़, उमस और जाम से गुज़रकर ही कहीं पहँुचा जा सकता है। ग़ालिब अगर आज होते तो इश्क़ में आग के दरिया से गुज़रने की जगह जाम और गाड़ियों की भीड़ से तैर कर निकलने को कहते। पर आज ग़ालिब नहीं है। पर ग़ालिब की उस दिल्ली में नासिरा शर्मा रहती हैं, जिनकी रचनाओं में अपनी सदी के अक्स को बहुत ही बेहतर ढंग से देखा जा सकता है। कभी-कभी तो लगता है कि नासिरा शर्मा की कहानियां, उनके उपन्यास आईना बन जाते हैं और जिनमें हम उस दुनिया के चेहरा ठीक उसी तरह देखते हैं जिस तरह वह है। बदरंग भी और खुशरंग भी। उसमें दुनिया का धूसर और मटमैला रंग भी आकार लेता है और इंद्रधनुष भी पसरा होता है। जूही, चंबेली, मोगरा और गुलाब की खुशबू भी फैली है तो नफ़रत की सड़ांध भी। ऐसा क्यों होता है कि हर बार नासिरा शर्मा को पढ़ते हुए नए अनुभव से गुज़रता हंू। उनका साहित्य उंगलियां पकड़कर ज़िन्दगी की संगलाख़ राहों पर भी ले जाता है और मोम के दरिया को भी पार कराता है। नासिरा शर्मा की उस दुनिया में जगह-जगह अपनेपन और मोहब्बत की छौंक मिलती है जो इस बदरंग और बदसूरत दुनिया में जीने को प्रेरित करती हैं।


कलकत्ता में दस-पन्द्रह साल पहले जब उनसे मिलना हुआ था तो उनकी एक अलग छवि मेरे दिलो-दिमाग़ में बसी थी। यह सही है कि उनसे मैं पहली बार रूबरू हो रहा था लेकिन उन्हें जानता काफ़ी पहले से था। पटना में उनका ग़ायबाना तआरुफ़ शंकर दयाल सिंह ने उनसे मिलने से भी दस-बारह साल पहले अपने ख़ास अंदाज़ में कराया था। उनके उस तआरुफ़ ने नासिरा शर्मा की एक अलग छवि बना डाली थी। तो क़रीब पच्चीस साल पहले, शंकर दयाल सिंह ने नासिरा शर्मा की जो छवि मेरे भीतर बना डाली थी वह आज भी जस की तस बरक़रार है। तब पटना के डाकबंगला रोड पर पारिजात प्रकाशन हुआ करता था। शंकर दयाल सिंह की वजह से प्रकाशन गुलज़ार रहा करता था। शंकर दयाल सिंह के ठहाकों के बीच एक अलग तरह की दुनिया आबाद रहती थी और उस दुनिया में जीतेन्द्र सिंह, गोपी वल्लभ सहाय, सत्यनारायण, रवींद्र राजहंस, परेश सिन्हा, भाई नरेंद्र, काशीनाथ पांडेय के साथ मैं भी आज़ादी के साथ सांसें लेता था। पटना के साहित्य समाज में प्रगतिशील और जनवादी सोच के साहित्यकारों के लिए शंकर दयाल सिंह और उनकी यह मंडली, जिसका मैं सबसे छोटा सदस्य था, अछूतों की तरह थी। अज्ञेय से लेकर जैनेंद्र और भवानी प्रसाद मिश्र से विद्यानिवास मिश्र और न जाने कितने नाम इस सूची में शामिल हैं, जिनकी मेहमाननवाज़ी शंकर दयाल सिंह ने नहीं की थी। तब वे पटना में साहित्यिक गतिविधियों का एक बड़े केन्द्र थे। बीच-बीच में कलकत्ता से बुद्धिनाथ मिश्र, रांची से किटू या चंपारण से पांडेय आशुतोष या दिनेश भ्रमर आते तो पारिजात प्रकाशन आना ज़रूरी था। रेणु सरीखे कथाकारों के लिए भी पारिजात प्रकाशन मिलने-मिलाने का एक अड्डा था। साहित्य और राजनीति से जुड़े बड़े से बड़े लोग पारिजात प्रकाशन आते और एक-दूसरे के साथ बोलते-बतियाते। आज वे पटना में नहीं हैं तो साहित्य की वह दुनिया बहुत ही वीरान और उदास है। शायद यही वजह है कि उन दिनों पटना में वामपंथी लेखकों ने हम लोगों का ‘सोशल बाॅयकाट’ कर रखा था जो शंकर दयाल के क़हक़हों में जीवन का विस्तार देखते थे। हो सकता है, मेरी इन बातों से मेरे वामपंथी लेखक और मित्रा बुरा मान जाएं पर यह सौ फीसद सही है कि शंकर दयाल सिंह ने कइयों की प्रतिभा को विस्तार देकर उसे जीवन के कठिन दिनों से जूझने और संघर्ष.............................................शेष भाग पढ़ने के लिए पत्रिका देखिए


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