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नासिरा शर्मा एक मूल्यांकन

नासिरा शर्मा एक मूल्यांकन


अनुक्रम



सम्पादकीय


नासिरा शर्मा : मेरे जीवन पर किसी का हस्ताक्षर नहीं


सुदेश बत्राा : नासिरा शर्मा - जितना मैंने जाना


ललित मंडोरा : अद्भुत जीवट की महिला नासिरा शर्मा


अशोक तिवारी : तनी हुई मुट्ठी में बेहतर दुनिया के सपने


शीबा असलम फहमी : नासिरा शर्मा के बहाने


अर्चना बंसल : अतीत और भविष्य का दस्तावेज : कुइयाँजान


फज+ल इमाम मल्लिक : ज+ीरो रोड में दुनिया की छवियां


मरगूब अली : ख़ाक के परदे


अमरीक सिंह दीप : ईरान की खूनी क्रान्ति से सबक़


सुरेश पंडित : रास्ता इधर से भी जाता है


वेद प्रकाश : स्त्री-मुक्ति का समावेशी रूप


नगमा जावेद : जि+न्दा, जीते-जागते दर्द का एक दरिया हैः


जि+न्दा मुहावरे


आदित्य प्रचण्डिया : भारतीय संस्कृति का कथानक जीवंत अभिलेखः अक्षयवट


एम. हनीफ़ मदार : जल की व्यथा-कथा कुइयांजान के सन्दर्भ में


बन्धु कुशावर्ती : ज+ीरो रोड का सिद्धार्थ


अली अहमद फातमी : एक नई कर्बला


सगीर अशरफ : नासिरा शर्मा का कहानी संसार - एक दृष्टिकोण


प्रत्यक्षा सिंहा : संवेदनायें मील का पत्थर हैं


ज्योति सिंह : इब्ने मरियम : इंसानी मोहब्बत का पैग़ाम देती कहानियाँ


अवध बिहारी पाठक : इंसानियत के पक्ष में खड़ी इबारत - शामी काग़ज+


संजय श्रीवास्तव : मुल्क़ की असली तस्वीर यहाँ है


हसन जमाल : खुदा की वापसी : मुस्लिम-क़िरदारों की वापसी


प्रताप दीक्षित : बुतखाना : नासिरा शर्मा की पच्चीस वर्षों की


कथा यात्राा का पहला पड़ाव


वीरेन्द्र मोहन : मानवीय संवेदना और साझा संस्कृति की दुनियाः इंसानी नस्ल


रोहिताश्व : रोमांटिक अवसाद और शिल्प की जटिलता


मूलचंद सोनकर : अफ़गानिस्तान : बुज+कशी का मैदान- एक महादेश


की अभिशप्त गाथा


रामकली सराफ : स्त्रीवादी नकार के पीछे इंसानी स्वर : औरत के लिए औरत


इकरार अहमद : राष्ट्रीय एकता का यथार्थ : राष्ट्र और मुसलमान


सिद्धेश्वर सिंह : इस दुनिया के मकतलगाह में फूलों की बात


आलोक सिंह : नासिरा शर्मा का आलोचनात्मक प्रज्ञा-पराक्रम


मेराज अहमद : नासिरा शर्मा का बाल साहित्य : परिचयात्मक फलक


ग़ज+ाल जैग़म : या रब किसी का बाग-ए-तमन्ना खिज+ा न हो


साक्षात्कार


नासिरा शर्मा से मेराज अहमद और फ़ीरोज+ अहमद की बातचीत


नासिरा शर्मा से प्रेमकुमार की बातचीत

Comments

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साक्षात्कार

प्रो. रमेश जैन
साक्षात्कार जनसंचार का अनिवार्य अंग है। प्रत्येक जनसंचारकर्मी को समाचार से संबद्ध व्यक्तियों का साक्षात्कार लेना आना चाहिए, चाहे वह टेलीविजन-रेडियो का प्रतिनिधि हो, किसी पत्र-पत्रिका का संपादक, उपसंपादक, संवाददाता। साक्षात्कार लेना एक कला है। इस विधा को जनसंचारकर्मियों के अतिरिक्त साहित्यकारों ने भी अपनाया है। विश्व के प्रत्येक क्षेत्र में, हर भाषा में साक्षात्कार लिए जाते हैं। पत्र-पत्रिका, आकाशवाणी, दूरदर्शन, टेलीविजन के अन्य चैनलों में साक्षात्कार देखे जा सकते हैं। फोन, ई-मेल, इंटरनेट और फैक्स के माध्यम से विश्व के किसी भी स्थान से साक्षात्कार लिया जा सकता है। अंतरिक्ष में संपर्क स्थापित कर सकते हैं। पहली बार पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी ने अंतरिक्ष यात्री कैप्टन राकेश शर्मा से संवाद किया था, जिसे दूरदर्शन ने प्रसारित किया था। इस विधा का दिन पर दिन प्रचलन बढ़ता जा रहा है।
मनुष्य में दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ होती हैं। एक तो यह कि वह दूसरों के विषय में सब कुछ जान लेना चाहता है और दूसरी यह कि वह अपने विषय में या अपने विचार दूसरों को बता देना चाहता है। अपने अनुभ…

समकालीन साहित्य में स्त्री विमर्श

जया सिंह


औरतों की चुप्पी सदियों और युगों से चली आ रही है। इसलिए जब भी औरत बोलती है तो शास्त्र, अनुशासन व समाज उस पर आक्रमण करके उसे खामोश कर देते है। अगर हम स्त्री-पुरुष की तुलना करें तो बचपन से ही समाज में पुरुष का महत्त्व स्त्री से ज्यादा होता है। हमारा समाज स्त्री-पुरुष में भेद करता है।
स्त्री विमर्श जिसे आज देह विमर्श का पर्याय मान लिया गया है। ऐसा लगता है कि स्त्री की सामाजिक स्थिति के केन्द्र में उसकी दैहिक संरचना ही है। उसकी दैहिकता को शील, चरित्रा और नैतिकता के साथ जोड़ा गया किन्तु यह नैतिकता एक पक्षीय है। नैतिकता की यह परिभाषा स्त्रिायों के लिए है पुरुषों के लिए नहीं। एंगिल्स की पुस्तक ÷÷द ओरिजन ऑव फेमिली प्राइवेट प्रापर्टी' के अनुसार दृष्टि के प्रारम्भ से ही पुरुष सत्ता स्त्राी की चेतना और उसकी गति को बाधित करती रही है। दरअसल सारा विधान ही इसी से निमित्त बनाया गया है, इतिहास गवाह है सारे विश्व में पुरुषतंत्रा, स्त्राी अस्मिता और उसकी स्वायत्तता को नृशंसता पूर्वक कुचलता आया है। उसकी शारीरिक सबलता के साथ-साथ न्याय, धर्म, समाज जैसी संस्थायें पुरुष के निजी हितों की रक्षा करती …

स्त्री-विमर्श के दर्पण में स्त्री का चेहरा

- मूलचन्द सोनकर

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अब हम इस बात की चर्चा करेंगे कि स्त्रियाँ अपनी इस निर्मित या आरोपित छवि के बारे में क्या राय रखती हैं। इसको जानने के लिए हम उन्हीं ग्रन्थों का परीक्षण करेंगे जिनकी चर्चा हम पीछे कर आये हैं। लेख के दूसरे भाग में वि.का. राजवाडे की पुस्तक ‘भारतीय विवाह संस्था का इतिहास' के पृष्ठ १२८ से उद्धृत वाक्य को आपने देखा। इसी वाक्य के तारतम्य में ही आगे लिखा है, ‘‘यह नाटक होने के बाद रानी कहती है - महिलाओं, मुझसे कोई भी संभोग नहीं करता। अतएव यह घोड़ा मेरे पास सोता है।....घोड़ा मुझसे संभोग करता है, इसका कारण इतना ही है अन्य कोई भी मुझसे संभोग नहीं करता।....मुझसे कोई पुरुष संभोग नहीं कर रहा है इसलिए मैं घोड़े के पास जाती हूँ।'' इस पर एक तीसरी कहती है - ‘‘तू यह अपना नसीब मान कि तुझे घोड़ा तो मिल गया। तेरी माँ को तो वह भी नहीं मिला।''
ऐसा है संभोग-इच्छा के संताप में जलती एक स्त्री का उद्गार, जिसे राज-पत्नी के मुँह से कहलवाया गया है। इसी पुस्तक के पृष्ठ १२६ पर अंकित यह वाक्य स्त्रियों की कामुक मनोदशा का कितना स्पष्ट विश्लेषण …