Sunday, November 7, 2010

‘ज़ीरो रोड’ का सिद्धार्थ

बन्धु कुशावर्ती

बीसवीं सदी के आखिरी दो तथा इक्कीसवीं सदी के इस पहले दशक तक पूरी दुनिया आधुनिकता, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, विचार आदि के स्तर पर न केवल बदली बल्कि बढ़ी और बेहद नयी हुई है। इसी कालखण्ड में दो-धु्रवीय दायरों वाला विश्व अन्ततः अनेकानेक तब्दीलियों के साथ ही कई खेमों से सिमट कर एकध्रुवीय हो गया है। देश से लेकर दुनिया तक में इस बीच होते परिवर्तनों, चुनौतियों, संघर्षों, तनावों, द्वन्द्वों आदि को दूर-नज़दीक देखने या उसमें धँसका जो कुछ लोग समानान्तर रूप से सृजनरत रहे हैं, नासिरा शर्मा उनमें एक अग्रणी नाम है। अपनी ज़मीन व जड़ों से भी उनका लगाव-जुड़ाव अत्यन्त सघन है। उनका लेखन वैश्विक-व्याप्ति लिये वैविध्यातापूर्ण है।

नासिरा शर्मा की अनेकानेक कहानियाँ और शामी काग़ज़, पत्थरगली, सबीना के चालीस चोर, खुदा की वापसी, दूसरा ताजमहल, बुतखाना आदि कहानी संकलन तथा शाल्मली, ठीकरे की मँगनी, अक्षयवट आदि उपन्यास हिन्दी में यदि देशज और अन्तर्देशीय जीवन व समाज की अन्तरंगता से पहचान कराते हैं तो ‘ज़िन्दा मुहावरे’ उपन्यास भारत-पाकिस्तान विभाजन की त्रासदी, साम्प्रदायिकता बनाम इंसानियत आदि की विडम्बनाओं को वाणी देता है। ‘संगसार’ व ‘इब्ने मरियम’ कहानी संकलनों एवं ‘सात नदियाँः एक समन्दर’, ‘कुइयाँजान’ तथा ‘ज़ीरो रोड’ उपन्यासों के कथा वितान ने नासिरा शर्मा की वैश्विक सरोकारों से संजीदा संलग्नता को प्रमाणित किया है।

बीते 30-35 वर्षों के दरम्यान नासिरा शर्मा के विदेश-प्रवास के अनुभवों, इराक़, ईरान, अफ़गानिस्तान आदि मध्य एशियाई देशों से जुड़ी भूमिकाओं, ईरान-क्रांति के दौरान उनकी सक्रियताओं तथा फ्रान्स, सीरिया, जापान, हांगकांग, बैंककाक, बांग्लादेश, नेपाल, दुबई आदि देशों व ग्रेटब्रिटेन के विभिन्न हिस्सों की यात्राओं के दौरान उनके साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं वैचारिक क्रियाकलापों की तारतम्यता ने भारतीय बुद्धिजीवी के रूप में उन्हें ‘हिन्दुस्तान की स्वायत्त-अन्तर्राष्ट्रीय राजनयिक’ की गरिमापूर्ण-छवि दी है। उनका सृजन लेखन मूलतः मानवधर्मी है। उसमें प्रगतिशीलता के व्यापक सरोकार सीधे संवाद करते मिलते हैं। इधर उनके तीनों उपन्यास अत्यन्त एकाग्रभाव से एक ओर ‘अक्षयवट’ (2003), ‘कुइयाँजान’ (2005) एवं ‘ज़ीरो रोड’ (2008) उस शहरी मध्यवर्गीय परिवार एवं जीवन को केन्द्र में रखते हैं, जिसे विख्यात हिन्दी कथाकार और उपन्यासकार अमृतलाल नागर ने अपने कोई 50 वर्षों के दौर के लेखन से ‘नगरीय सभ्यता और आंचलिकता’ की नयी पहचान के साथ हिन्दी में प्रतिष्ठित किया है तो दूसरी ओर नासिरा शर्मा के ये तीनों उपन्यास बीसवीं सदी के आखिरी दौर में शहरी मध्यवर्ग के नौजवान और नयी पीढ़ी को अपने आस-पास की स्थानीयता से लेकर भूमण्डलीकृत विश्व के बीच तक सीधे-जटिल द्वन्द्वों और संघर्षों से जूझते हुए अस्तित्व की कैसी लड़ाई लड़नी पर रही है, इससे भी रू-ब-रू कराते हैं।

नासिरा शर्मा के नयी सदी (21वीं) में आये उपर्युक्त तीनों उपन्यासों के केन्द्र में इलाहाबाद के मध्यवर्गीय शहरी हैं। उनका जीवन और उनकी स्थितियाँ-परिस्थितियाँ इस शहर की गंगा-जमुनी सांस्कृतिक-बौद्धिक माहौल से उपजी अन्तर्धारा की देन है। यहीं जन्मी और यहीं की खास इलाहाबादी रंगत, आबोहवा व मिजा के बीच दम भरते हुए खुद नासिरा शर्मा का भी इलाहाबाद छोड़ने तक विकास हुआ है। यही वजह है कि नासिरा शर्मा की अनेकानेक कहानियों व उपन्यासों के साथ ही इधर के कोई एक दशक में लिखे छपे तीनों उपन्यासों ‘अक्षयवट’, ‘कुइयाँजान’ और ‘ज़ीरो रोड’ में इलाहाबाद की अन्तर्धारा यहाँ से दूर और बाहर रहने के बावजूद उनके दृष्टिपथ में रही है। इनमें ‘ज़ीरो रोड’ कई कारणों से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और उल्लेखनीय है।

‘ज़ीरो रोड’ की मूल कथा इलाहाबाद के सिद्धार्थ, उसके मुहल्ले चक, ‘ज़ीरो रोड’, जैसी शहर की महत्त्वपूर्ण ज़ीरो रोड सड़क के आसपास से लेकर इलाहाबाद के कुछ अन्य इलाकों से जुड़ी हुई है किन्तु, सिद्धार्थ की बेरोज़गारी के माध्यम से ‘ज़ीरो रोड’ आज के भूमण्डलीकृत विश्व की ‘वैश्विक स्थानीयता’ के बड़े वितान से लेकर देश-दुनिया की साम्प्रदायिकता, आतंकवाद, एकधु्रवीय विश्व के वर्चस्ववाद और इस सब में जूझते-जीते, राह खोजते-बनाते या इस कोशिश में अपने को झोंक देते इंसान की कथा कहता है। इस सन्दर्भ में ‘ज़ीरो रोड’ का सिद्धार्थ, नासिरा शर्मा की क़लम से सिरजा हुआ है वैसा ही महत्त्वपूर्ण पात्रा है जैसे कि अमृतलाल नागर के ‘बँूद और समुद्र’ में ‘ताई’ और ‘नाच्यो बहुत गोपाल’ में निरगुनियाँ, जिन्हें हिन्दी के स्वातन्त्रयोत्तर उपन्यास साहित्य में विशेष रूप से चिद्दित-रेखांकित करते हुए अनेक कोणों से प्रक्षेपित किया गया है।

सिद्धार्थ को भी 21वीं सदी के पहले दशक के हिन्दी उपन्यासों में ‘गौरतलब’ और ‘महत्त्वपूर्ण’ पात्रा के रूप में पहचानना मुझे अपरिधर्म महसूस हुआ। यह कहते हुए मुझे सबसे पहले प्रेमचंद याद आए, जिन्होंने हाशिए के लोगों, किसानों, मज़दूरों वंचितों-शोषितों को सम्भ्रान्त और आर्थिक-सामाजिक रूप से प्रभावशाली हैसियत वाले लोगों के मुकाबले और समानान्तर खड़ा किया। ‘रंगभूमि’ का ‘सूरदास’ इस सिलसिले की बड़ी नज़ीर बन गया है।

ज़ीरो रोड में सिद्धार्थ की आद्योपान्त उपस्थिति उसे बेशक नायक का पद देती है परन्तु, नायकत्व का उसमें कोई उल्लेखनीय गुण नहीं है, विशेष रूप से इलाहाबाद में बेकारी.............................................शेष भाग पढ़ने के लिए पत्रिका देखिए

















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