Friday, November 5, 2010

जल की व्यथा-कथा ‘कुइयाँजान’ के संदर्भ में

एम. हनीफ़ मदार

रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून,

पानी गये न ऊबरे मोती, मानुष, चून।

बचपन में रहीम की इन पंक्तियों का कोई खास अर्थ समझ में नहीं आता था। लेकिन 2005 में एक अख़बार के लिए पानी को लेकर एक कवर स्टोरी लिखते समय रहीम की इन्हीं लाइनों ने दिमाग पर दस्तक दी। लगा कि इन दो लाइनों में रहीम ने इंसान को जीवन के मूलतत्त्व के प्रति सजग रहने का इशारा किया है, और वह भी तब जब न तो पानी की कहीं कमी थी और न ही ऐसी कोई चर्चा ही वजूद में थी। लेखक की यह चिन्ता निश्चित ही समाज के प्रति उसका उत्तरदायित्व थी। यह अलग बात है कि उनके पास दुनिया भर के तात्कालिक आंकड़े मौजूद नहीं थे और ऐसा होना इसलिए भी स्वाभाविक है कि तब मानव जीवन विकास पथ की अन्य प्राथमिकताओं की तरफ ज़्यादा चिंतित या अग्रसर रहा था।

इसके बरअक्स 2005 में ही नासिरा शर्मा का उपन्यास ‘कुइयाँजान’ प्रकाश में आया जो केवल प्रदेश या देश ही नहीं अपितु दुनिया भर के जलीय आंकड़े खुद में समेटे एक विशाल दस्तावेज के रूप में नज़र आया। निःसंकोच उपन्यास को उस लेखिका का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास घोषित किया जाना साहित्य आलोचकों की मजबूरी बन गयी। नामवर सिंह ने कुइयाँजान को 2005 का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास कहा भी।

सदियों से मानव विकास की शतत् प्रक्रिया से गुज़रते हुए हम वर्तमान आधुनिक युग में आ गये। हमने भौतिक सुख- सुविधाओं में अंबार खड़े कर दिये। हमारे विज्ञान ने चालक रहित विमान से लेकर मानव क्लोन तक ईजाद कर दिया। हम चाँद पर जा पहँुचे, जैविक और रासायनिक हथियार हमारी वैज्ञानिक उपलब्धि बने किन्तु जीवन का वह आवश्यक मूल तत्त्व जिसके बिना जीवन की संकल्पना करना ही बेमानी लगने लगता है, ‘स्वच्छजल’ इसके लिए इन तमाम वैज्ञानिक या मानवीय उपलब्धियों में कहीं कोई स्थान नज़र नहीं आता। जबकि जल स्वयं मानव इतिहास की वह पहली

उपलब्धि है जिसे पीकर गयी उसने अपनी प्राण रक्षा की। वह प्यास वह तृष्णा जिसकी तीव्रता मानव जीवन में आज भी कम नहीं है और न ही हो सकेगी। निश्चित ही इन्हीं चिन्ताओं ने लेखिका नासिरा शर्मा को भी व्यथित और विवश किया होगा- ‘कुइयाँजान’ लिखने को। क्योंकि पानी को लेकर नासिरा शर्मा के भीतर उठता भूचाल, एक वैचारिक द्वन्द्व के रूप में पूरे उपन्यास पर छाया रहता है। जल समस्या के संदर्भ में उपन्यास में बार-बार इस बात का उभरना कि - मनुष्य चाहे आधुनिक टैक्नाॅलौजी में कितना ही आगे क्यों न निकल जाय या फिर प्राकृतिम जल संपदा के अक्षय स्रोतों के साथ मानवीय महत्वाकाक्षाओं की खिलवाड़ भले ही क्षणिक सुख समृद्धि के रूप में नज़र आती हो किन्तु वह अपनी जिजीविषा के लिए भीषण और भयंकर परिणामों को भी आमंत्रित कर रहा है। लेखिका की सामाजिक सोच और अपनी दृष्टि में प्रकृति के प्रति मानव का उच्चछृंखल होना दर्शाता है। तब क्या वास्तविक से दूर जाया जा सकता है कि धरती का तीन चैथाई भाग पानी से घिरा होने के बावजूद भी आज हम प्यासे तड़पने को विवश हो रहे हैं? प्रकृति के प्रति बढ़ती हमारी बेरुखी और कुत्सित कार्यवाहियों के परिणामस्वरूप हम जिस प्राकृतिक वरदान जल संपदा को नष्ट कर रहे हैं तो समझ लें कि वह दिन दूर नहीं जब महज पानी को लेकर समूचा विश्व समुदाय एक महायुद्ध को तैयार होगा। दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों के साथ राजस्थान में और अब उत्तर प्रदेश के कुछ शहरों में जिनमें आगरा शहर ताजा उदाहरण हो सकता ह,ै में धरती से पीने को पानी का न निकलना समस्या की विकरालता को स्पष्ट करता है।

चार सौ सोलह पेजों में सिमटा उपन्यास कुइयाँजान नासिरा शर्मा की सपनीली या डरावनी कोरी परिकल्पना नहीं है और न ही स्वांत सुखाय के लिए किया गया सृजन ही है। भले ही सृजन के समय किसी भी साहित्यकार की कलम स्वांत सुखाय ही चलती हो किन्तु उसकी सार्थकता सकारात्मक मानवीय उद्देश्य एवं सामाजिक संदर्भों में ही अन्तर्निहित होती है। सामाजिक संदर्भों में कुइयाँजान का वैचारिक फलक दुनिया को खुद में समा लेने की क्षमता रखता है। उसकी चिन्ताओं में समूचे विश्व का मानव जीवन ही नहीं बल्कि धरती सम्पूर्ण जीवन की चिन्ताएं हैं - ‘‘आज विश्व में आँकड़ों द्वारा ज्ञात होता है कि लगभग एक अरब से ज़्यादा लोगों को साफ पानी पीने के लिए उपलब्ध नहीं है। दो अरब लोगों को नहाने धोने के लिए पानी नहीं मिल पाता, जिससे लोग अनेक तरह के रोगों का शिकार हो रहे हैं। मृत्यु-दर दिन-प्रतिदिन बढ़ती चली जा रही है। भारत में गाँव, कस्बों, शहरों में लोग कुँआ, तालाबों और नदियों से पानी लेते हैं जो अधिकतर गंदा और कीटाणुयुक्त होता है। उसमें प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले संखिया की मिलावट होती है। सारे विश्व में 261 प्रमुख नदियाँ एक से अधिक देशों से होकर गुज़रती हैं। दुनिया के कुल नदी प्रवाह का 80 प्रतिशत इन्हीं में है और जिन देशों से होकर यह गुज़रती हैं उनमें संसार की 40 प्रतिशत जनसंख्या रहती है। पानी के कारण सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तनाव पनपते हैं - जैसे - भारत और पाकिस्तान, भारत और बंगला देश, भारत और नेपाल, सीरिया और तुर्की के बीच स्वयं भारत में कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी को लेकर तनाव की स्थिति पनप चुकी है।’’1 उपन्यास में प्रस्तुत ऐसे आंकड़ों से गुज़रते हुए जल समस्या की वैश्विक विकरालता से साक्षात्कार होता है। तब नासिरा शर्मा का यह महत्त्वपूर्ण सृजन जल समस्या पर लिखा गया - .............................................शेष भाग पढ़ने के लिए पत्रिका देखिए

















1 comment:

DIMPLE SHARMA said...

बहुत अच्छा पोस्ट, दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये....
sparkindians.blogspot.com