Tuesday, March 31, 2009

अश्कों का दिया

SEEMA GUPTA

रात गमगीन रही
दिल वीरान रहा
कितना खामोश ये आसमान रहा
सिसकियों की सरगोशियाँ उफ़
"अश्कों का दिया "
अंधेरों मे मेहरबान रहा

Saturday, March 28, 2009

लोगों के बीच में राही मासूम रजा आज भी जिन्दा हैं

लोगों के बीच में राही मासूम रजा आज भी जिन्दा हैं

राही मासूम रजा की १७वीं पुण्यतिथि के अवसर पर वाङ्मय पत्रिका, लिबर्टी होम्स में संगोष्ठी का आयोजन किया। इस संगोष्ठी की अध्यक्षता डॉ० प्रेमकुमार ने की। इस संगोष्ठी में राही मासूम रजा के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला गया। मुख्य वक्ता डॉ० प्रेमकुमार ने कहा कि इस पुण्यतिथि पर राही मासूम पर चर्चा ही बता रहा है कि उनका काम कितना महत्त्वपूर्ण है। प्रेमकुमार ने उनके साहित्य में व्यक्त इंसानियत को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि आज का युग बौनों का युग है जब लोगों को साम्प्रदायिकता व विद्वेष से लड़ने का समय है। उस समय उनसे ही समझौता कर लिया जबकि राही का व्यक्तित्व उन समझौतावादी बौने लोगों का विरोध करता है। राही के एक संस्मरण की चर्चा करते हुए बताया कि अपने बेटे की शादी हिन्दू लड़की से इस शर्त पर की, कि वह अपना धर्म परिवर्तन नहीं करेगी। इस प्रकार के विचार आज के बड़े-बड़े हिन्दू व मुस्लिम सेकुलर कहे जाने वाले लोगों के यहाँ नहीं मिलेगी। उन्होंने बताया कि राही का जुड़ाव जमीन की गहराई से रहा है। राही ने साहित्य में किसी सम्प्रदाय विशेष की, क्षेत्र विशेष की या भाषा विशेष को मुख्य आधार नहीं बनाया है, बल्कि उन्होंने साहित्य में पूरी तरह से भारतीयता की बात की। जहाँ एक भारत व उसके सेकुलर गंगा-जमुना तहजीब मुख्य है। डॉ० प्रेमकुमार ने उनके साहित्य लेखन के अतिरिक्त फ़िल्मों एवं सीरियल में किये गये कामों का भी उल्लेख किया। एक उल्लेखनीय तथ्य की ओर संकेत करते हुए बताया कि जो काम तुलसीदास ने रामकथा को स्थापित व पुनर्जीवित करने में किया है, ठीक वही काम राही ने महाभारत की पटकथा को लिखकर किया है।
इस संगोष्ठी में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के कई छात्र उपस्थित थे। जिनमें जावेद आलम ने राही पर बोलते हुए कहा कि - राही का जुड़ाव अपने जमीन से बहुत गहरा रहा है। उन्होंने अपने को गंगा का बेटा कहा है। आधा गाँव' एवं ओस की बूद' की भी चर्चा की। भारतीय विभाजन की त्रासदी का भी उन्होंने उल्लेख किया। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के सन्दर्भ में १८५७ नामक कविता का जि+क्र किया। साम्प्रदायिकता का विरोध एवं मानवता की बात राही में विशेष रूप से मिलती है।
शोध-छात्र शहबाज अली खान ने राही के साहित्य में समय को महत्त्वपूर्ण आधार बताया। उन्होंने बताया कि साहित्यकार मूल रूप से इंसानियत, प्रेम, सौहार्द की बात करता है। साहित्यकार वही होगा जिसके यहाँ इंसानियत होगी। उन्होंने बताया कि विभाजन का दर्द प्रत्येक भारतीय मुसलमान को है। इसके बावजूद मुसलमानों को देशभक्ति का प्रमाण-पत्र देना पड़ता है, परन्तु राही के साहित्य में हमें पूरे हिन्दुस्तानी होने का भाव अकुण्ठ रूप से मिलता है। खान ने बताया कि राही ने अपने समय के बुद्जीवियों के उपनिवेशवादी नजरिये को पहचान लिया था। उनका पूरा साहित्य उपनिवेशवादी प्रवृत्तियों के विरोध का साहित्य है। उन्होंने राही के भाषाई विशेषता की ओर भी संकेत किया।
संगोष्ठी में बोलते हुए सरताज आलम ने बताया कि राही के साहित्य में भारत की एकता और अखण्डता को बचाने का काम किया है। उन्होंने बताया कि उनकी कविताओं में उनका दर्द देखा जा सकता है।
डॉ० हस्सान ने अपने वक्तव्य में बताया कि - यह कितना महत्त्वपूर्ण है कि एक उर्दू का आदमी महाभारत के संवाद को लिखता है। यह उसकी सेकुलर छवि को ज्ञापित करती है। राही ने हिन्दी-उर्दू की बात न करके इंसानियत पर अधिक बल दिया है और अवाम को पुकारा है। हिन्दू-मुसलमान को नहीं।
डॉ० खुर्शीद ने उर्दू साहित्य में उनके बिखरे हुए रचनाओं व उन पर चर्चा करने की बात कही और इस बात की ओर संकेत किया कि उनकी रचनाओं का उर्दू से हिन्दी में अनुवाद कार्य जल्द से जल्द होना चाहिए।
डॉ० जुल्फ़िकार ने इस संगोष्ठी में बोलते हुए कहा कि राही मासूम रजा की सर्व धर्म समभाव की आवश्यकता पर बल देते हैं। उन्होंने बताया कि हम उनकी कोई भी रचना पढ़ते हैं तो हमें भारत की तस्वीर दिखाई देती है। उनकी रचनाओं में राष्ट्रीय सरोकार हमें दिखाई देता है। उनके सामाजिक धरातल से जुड़ाव को रेखांकित किया और इस प्रकार की संगोष्ठी करने के प्रयासों को उत्साहवर्धक बताया।
शोध-छात्र विनीत कुमार ने बताया कि राही से उनका परिचय उनकी रचनाओं से हुआ। राही अपने लिए तीन माँओं का जि+क्र करते हैं। एक वह माँ जो जननी है। दूसरी माँ ग़ाजीपुर जिसने उन्हें पाला-पोसा। तीसरी माँ अलीगढ़ को बताया। इस प्रकार राही की उनके ज+मीनी जुड़ाव की चर्चा उन्होंने की।
कु० भानु ने राही के धर्मनिर्पेक्षता को आधार बनाकर बोलते हुए कहा कि धर्मनिर्पेक्षता का रूप उनके लिए एकपक्षीय नहीं है, बल्कि समन्वित रूप में आता है। शोध-छात्र वाजिद, अफ़जाल, अशरफ अली खाँ व मु० आसिफ़ ख़ान ने भी अपने विचार संगोष्ठी में रखे।
कार्यक्रम का संचालन हिन्दी विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्राध्यापक मेराज अहमद ने किया। उन्होंने राही के साहित्य पर विशेष चर्चा संचालन के बीच में ही की। राही पर प्रस्तुत गोष्ठी वाङ्मय परिवार की ओर से आहूत की गई थी। वाङ्मय पत्रिका के सम्पादक डॉ० एम० फीरोज अहमद ने उनकी कहानियों की विशेष चर्चा करने की बात कही और उसके साथ ही साथ उनके फ़िल्मी योगदान के विषय में भी उन्होंने चर्चा की। इस कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन वीमेंस कालेज की प्रवक्ता डॉ० शगुफ्ता नियाज ने किया। और गोष्ठी की सफलता के लिए वक्ताओं को धन्यवाद ज्ञापित किया।
इस संगोष्ठी में अहमद अली, मुशीरा ख़ातून आदि लोग भी उपस्थित थे।

यथार्थ

महेंद्रभटनागर
.
राह का
नहीं है अंत
चलते रहेंगे हम!
.
दूर तक फैला
अँधेरा
नहीं होगा ज़रा भी कम!
.
टिमटिमाते दीप-से
अहर्निश
जलते रहेंगे हम!
.
साँसें मिली हैं
मात्र गिनती की
अचानक एक दिन
धड़कन हृदय की जायगी थम!
समझते-बूझते सब
मृत्यु को छलते रहेंगे हम!
.
हर चरण पर
मंज़िलें होती कहाँ हैं?
ज़िन्दगी में
कंकड़ों के ढेर हैं
मोती कहाँ हैं?

Friday, March 27, 2009

लमहा

महेंद्रभटनागर
.
एक लमहा
सिर्फ़ एक लमहा
एकाएक छीन लेता है
ज़िन्दगी!
हाँ, फ़क़त एक लमहा।
हर लमहा
अपना गूढ़ अर्थ रखता है,
अपना एक मुकम्मिल इतिहास
सिरजता है,
बार - बार बजता है।
.
इसलिए ज़रूरी है —
हर लमहे को भरपूर जियो,
जब-तक
कर दे न तुम्हारी सत्ता को
चूर - चूर वह।
.
हर लमहा
ख़ामोश फिसलता है
एक-सी नपी रफ़्तार से
अनगिनत हादसों को
अंकित करता हुआ,
अपने महत्त्व को घोषित करता हुआ!

Thursday, March 26, 2009

निरन्तरता

 महेंद्रभटनागर 
.
हो विरत ...
एकान्त में,
जब शान्त मन से
भुक्त जीवन का
सहज करने विचारण —
झाँकता हूँ
आत्मगत
अपने विलुप्त अतीत में —
.
चित्रावली धुँधली
उभरती है विशृंखल ... भंग-क्रम
संगत-असंगत
तारतम्य-विहीन!
.
औचक फिर
स्वतः मुड़
लौट आता हूँ
उपस्थित काल में!
जीवन जगत जंजाल में!

Wednesday, March 25, 2009

नहीं

. महेंद्रभटनागर

.
लाखों लोगों के बीच
अपरिचित अजनबी
भला,
कोई कैसे रहे!
उमड़ती भीड़ में
अकेलेपन का दंश
भला,
कोई कैसे सहे!
.
असंख्य आवाज़ों के
शोर में
किसी से अपनी बात
भला,
कोई कैसे कहे!

Tuesday, March 24, 2009

मिलन




शैफाली

(अमृता के बहाने )
काया विज्ञान कहता है: यह काया पंचतत्वों से मिलकर बनी है- पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश।
लेकिन इन पाँचों तत्त्वों के बीच इतना गहन आकर्षण क्यों है कि इन्हें मिलना पड़ा?
कितने तो भिन्न हैं ये...कितने विपरीत......
कहाँ ठहरा हुआ-सा पृथ्वी तत्व, तरंगित होता जल तत्त्व,
प्रवाहमान वायु तत्व,
और कहाँ अगोचर आकाश तत्त्व,
कोई भी तो मेल नहीं दिखता आपस में....
ये कैसे मिल बैठे....? कौन-सा स्वर सध गया इनके मध्य....? निश्चित ही इन्हें इकट्ठा करनेवाला, जोड़नेवाला, मिलानेवाला कोई छठा तत्त्व भी होना चाहिए....
यह प्रश्न स्पन्दित हुआ ही था कि दशों दिशाएँ मिलकर गुनगुनाईं....”प्रेम”....वह छठा तत्त्व है, “प्रेम”।
ये सभी तत्त्व प्रेम में हैं एक-दूसरे के साथ, इसलिए ही इनका मिलन होता है।
यह छठा तत्त्व जिनके मध्य जन्म ले लेता है, वे मिलते ही हैं फिर, उन्हें मिलना ही होता है, “मिलन” उनकी “नियति” हो जाती है।

“मिलन” घटता ही है,..... कहीं भी... किसी भी समय ....इस “मिलन” के लिए “स्थान” अर्थ खो देता है और “काल” भी।
फिर किसी भी सृष्टि में चाहे किसी भी पृथ्वी पर, चाहे फिर पैरों के नीचे “कल्प” दूरी बनकर बिछे हों, निकट आना ही होता है उन्हें......

ये उस किताब के पहले पन्ने पर लिखी कुछ पंक्तियाँ है, जो हमारी इस कहानी की नायिका के हाथों में कई बरसों से है....जी हाँ हमारी कहानी शुरू होती है नायिका के परिचय से जो एक लेखिका है.....

और कहानी चाहे किसी किताब में लिखी हो या किसी फिल्म की हो, नायिका है तो उसका एक नायक भी होता है...............
तो हमारी इस कहानी में भी एक नायक है ....यहाँ नाम मायने नहीं रखते क्योंकि हर जन्म में उनके नाम बदलते रहे, काया बदलती रही लेकिन आत्मा हर जन्म में एक-सी रही...बिलकुल पवित्र और निर्मल...............
क्रूर कह लो या मजबूर कोई रहा तो वो है नियती.......

उस किताब की शुरुआती पंक्तियों के बाद नायिका की आँखें सीधे अंतिम पंक्तियों पर ही आकर ठहर जाती......
जो कुछ यूँ थी....
......और नियति भी मौन खड़ी थी लेकिन अपराधी की तरह....जैसे कोई पाप हो गया हो उससे।
किसी मासूम रिश्ते को उसकी जगह न रख ग़लत जगह रख देना पाप ही तो है..........


नायिका को लगता जैसे नियति के किसी पाप की सज़ा ही उसे मिल रही है.....तभी उसके जीवन में एक तड़प है एक प्यास है और कहते हैं...
प्यास और तलाश का रिश्ता बड़ा गहरा होता है। जहाँ प्यास होती है वहाँ तलाश अपने आप साथ हो लेती है। यह तलाश कभी चेतन तौर पर होती है कभी अचेतन तौर पर। कभी-कभी व्यक्ति को पता ही नहीं होता कि उसकी प्यास क्या है लेकिन वह तलाश रहा होता है। और यही प्यास और यही तलाश जो नायिका के अचेतन मन से गुज़र रही थी वो कब उसके चेतन मन से उसके व्यवहार में आने लगी उसे ख़ुद भी पता न चला.............


कई सालों तक उस किताब में लिखी पंक्तियाँ नायिका की आँखों से गुज़रती रही....कई बार तो रातों को उठ उठकर वो उस किताब को हाथ में लिए बैठी रहती या अपने सिरहाने रखकर सो जाती............फिर अचानक यूँ हड़बड़ाकर उठ जाती जैसे कोई उसे बहुत शिद्दत से पुकार रहा हो.....



कई बरस यूँ ही निकल गए.................फिर एक दिन एक पत्र आया.......... मैं अकसर आपकी कविताओं और कहानियों की पुस्तक खरीदकर पढ़ता रहता हूँ, सोचा आपको एक बार बता दूँ कि आपके कई पाठकों में से एक पाठक ऐसा भी है जिसे आपकी पुस्तक पढ़े बिना नींद नहीं आती.....आपका एक मुरीद....

नायिका के हाथ में पाठकों के कई पत्र थे.........सारे टेबल पर बिखरे हुए थे बिलकुल उसी तरह जैसे इस समय नायिका के चेहरे पर उसकी ज़ुल्फें...सारे पत्रों में से नायक के पत्र पर आकर आँखें पथरा गई...ना....नायक के लिखे शब्दों से नहीं, नींद से....नींद इतनी आ रही थी कि उस पत्र को हाथ में लेकर एक सरसरी निगाह तो डाली लेकिन ठीक से पढ़ा नहीं .....और उस पत्र को अपनी उसी किताब में रख दिया जिसे रोज़ सिरहाने लेकर सोती थी...............
रोज़ रात को हड़बड़ाकर उठ जाने वाली नायिका आज न जाने कौन-सी सुकून भरी नींद की बाहों में सोई थी कि जब सुबह फिर चिड़िया की चहचहाहट कानों में और सुबह सुबह की नर्म धूप चेहरे पर पड़ी तभी आँख खुली....

नियति ने उस किताब की पंक्तियों और नायक के ख़त को तो मिलवा दिया था लेकिन नायक अब भी साथ समन्दर पार बैठा है........

नायिका ने दोबारा जब उस पत्र को पढ़ा तो लगा जैसे बहुत ही जाना पहचाना सा नाम है लेकिन न्यूजर्सी के इस पते पर रह रहे इस पाठक को तो वो नहीं जानती है ये भी उसे यकीन था...............

खैर पत्र आया था तो जवाब भी गया..........कौन है कहाँ रहते हैं, क्या करते हैं जैसे शुरुआती औपचारिक परिचय के बाद सात समन्दर पार बैठा नायक पत्र नुमा कागज़ की नाव पर बैठ कर नायिका के देश और शहर का सफर शुरू कर चुका था..............

क्योंकि .... छठा तत्त्व जिनके मध्य जन्म ले लेता है, वे मिलते ही हैं फिर, उन्हें मिलना ही होता है, “मिलन” उनकी “नियति” हो जाती है।



ना एक दूसरे को देखा है अभी तक ना एक दूसरे की आवाज़ ही सुनी है फिर भी लगता था जैसे जन्मों से साथ है...........

रोज़ की तरह नायिका पाठको और नायक के खतों के बीच बैठी थी..........अपने पिछले खत में नायिका ने उत्सुकता जताई थी कि कहाँ आप सात समन्दर पार बैठे हैं और कहाँ मैं...न आपको देखा है, न सुना है फिर भी लगता है जैसे जन्मों से साथ है, ऐसा क्यूँ?

नायक का जवाब कुछ यूँ आता है.............
काया विज्ञान कहता है: यह काया पंचतत्वों से मिलकर बनी है- पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश।
लेकिन इन पाँचों तत्त्वों के बीच इतना गहन आकर्षण क्यों है कि इन्हें मिलना पड़ा?
कितने तो भिन्न हैं ये...कितने विपरीत......
कहाँ ठहरा हुआ-सा पृथ्वी तत्व, तरंगित होता जल तत्त्व,
प्रवाहमान वायु तत्व,
और कहाँ अगोचर आकाश तत्त्व,
कोई भी तो मेल नहीं दिखता आपस में....
ये कैसे मिल बैठे....? कौन-सा स्वर सध गया इनके मध्य....? निश्चित ही इन्हें इकट्ठा करनेवाला, जोड़नेवाला, मिलानेवाला कोई छठा तत्त्व भी होना चाहिए....
यह प्रश्न स्पन्दित हुआ ही था कि दशों दिशाएँ मिलकर गुनगुनाईं....”प्रेम”....वह छठा तत्त्व है, “प्रेम”।
ये सभी तत्त्व प्रेम में हैं एक-दूसरे के साथ, इसलिए ही इनका मिलन होता है।
यह छठा तत्त्व जिनके मध्य जन्म ले लेता है, वे मिलते ही हैं फिर, उन्हें मिलना ही होता है, “मिलन” उनकी “नियति” हो जाती है।

“मिलन” घटता ही है,..... कहीं भी... किसी भी समय ....इस “मिलन” के लिए “स्थान” अर्थ खो देता है और “काल” भी।
फिर किसी भी सृष्टि में चाहे किसी भी पृथ्वी पर, चाहे फिर पैरों के नीचे “कल्प” दूरी बनकर बिछे हों, निकट आना ही होता है उन्हें......



नायिका की आँखें आज भी पथरा गई थी....निश्चित ही नायक के इस खत से...जिसमें हूबहू वही पंक्तियाँ थी जो उस किताब के पहले पन्ने पर ही नहीं नायिका की आत्मा पर लिखी थी.............

फोन नंबर बहुत पहले ही दिया जा चुका था जिसे नायिका ने कभी उपयोग नहीं किया ये सोचकर कि सात समन्दर पार कोई रिश्ता जोड़कर क्या करना है जब पता है कि रूह से उठती वो हूक और पुकार किसी से भी रिश्ता जोड़ने की अनुमति नहीं दे रही.......लेकिन आज कारण बहुत बड़ा था और जिज्ञासा भी अपना नियंत्रण खो चुकी थी..........जब नायिका ने पहली बार फोन लगाया तो वहाँ से कोई आवाज़ नहीं आई.....नायिका ने कहा अपनी आवाज़ नहीं सुनाओगे? तो दूसरी ओर से नायक ने कहा कई जन्मों से तो पुकार रहा हूँ ................

अचम्भित होने के कई कारण थे...कैसे वो पंक्तियाँ नायक की ज़ुबां पर आई, क्या वो भी उसी पुस्तक को पढ़ता आया है? नायिका ने किसी भी ख़त में उस किताब का या उन पंक्तियों का ज़िक्र नहीं किया है ऐसा नायिका को पूरा यकीन है।

नायिका से पूरी बात सुनने के बाद नायक की ओर से सिर्फ़ एक ही जवाब था मैं नहीं जानता ये पंक्तियाँ क्यूँ और कैसे उसकी ज़ुबाँ पर आई है वो तो बस यूँ ही कह गया।

एक गहरे मौन के बाद नायिका के सामने उस किताब की अंतिम पंक्तियाँ थी........
......और नियति भी मौन खड़ी थी लेकिन अपराधी की तरह....जैसे कोई पाप हो गया हो उससे।
किसी मासूम रिश्ते को उसकी जगह न रख ग़लत जगह रख देना पाप ही तो है..........


दोनों जानते थे कि दोनों इस दुनियावी और सामाजिक रिश्तों के भँवर में फँसे हुए-से है...जिससे बाहर निकलना एक भीषण युद्ध-सा है क्योंकि इंसान दूसरों से तो लड़ ले लेकिन ये लड़ाई तो उनकी ख़ुद से थी और अपनी लड़ाइयाँ हमें ख़ुद ही लड़ना होती है, वहाँ ये दुनियावी या सामाजिक रिश्ते या उस स्तर पर बनी कोई भी व्यवस्था हमारी कोई मदद नहीं कर सकती।

सात समन्दर पार बैठा कोई व्यक्ति जिससे कभी मिली नहीं जिसको देखा नहीं वो कैसे आज पूरी तरह से उसकी कायनात बन गया, और जो ये कायनाती रिश्ता है जो समाज के तथाकथित नियमों से कहीं उपर है वो कैसे खुद को लाचार और मजबूर महसूस कर रहा है........... क्या ये वही प्रेम है जो एक इंसान से दूसरे इंसान का होता है? क्या ये वही बंधन है ? नहीं...........
जब प्रेम इंसान और इंसान के बीच जन्मता है तो बाँध लेता है। और जब इंसान और कायनात के बीच फैलता है तो मुक्त कर देता है......प्रेम ही बन्धन......प्रेम ही मुक्ति......

नायक और नायिका दोनों उस दोराहे पर खड़े हैं जहाँ प्रेम ही बंधन है और प्रेम ही मुक्ति....

उन दोनों को लग रहा था जैसे नियती ने धीरे से फिज़ा के कान में उन दोनों की जुदाई की कहानी कह दी थी ........और विज्ञान के नियमानुसार ऊर्जा न कभी खत्म होती है न बनाई जा सकती है, वो तो बस एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होती रहती है। नियति क्या जाने विज्ञान के इस नियम को उसने कहते समय सोचा भी न होगा कि उसके मुँह से निकली ध्वनि ऊर्जा पूरे ब्रह्माण्ड में घूमकर नायिका की तड़प में परिवर्तित हो जाएगी और वो तड़प और प्यास की ऊर्जा... नायक की तलाश में..............

नियति ने दोनों को मिलवाकर अपना पल्ला झाड़ लिया था, लेकिन तलाश खत्म होने के बाद की जो पीड़ा उन दोनों को भोगनी थी उसका ज़िक्र उस किताब के किसी भी पन्ने पर नहीं था। कहा ना इंसान को अपनी लड़ाइयाँ खुद लड़नी होती है नियती तो बस एक झलक दिखला जाती है कभी किसी किताब पर लिखी पंक्तियों के रूप में, कभी किसी घटना के रूप में तो कभी आधी रात को अर्धनिन्द्रा में देखे किसी स्वप्न के रूप में.......
एक स्वप्न नायिका ने भी देखा............ उस अनदेखे नायक का हाथ थामे घने जंगलों में भाग रही है....और कुछ साये हाथों में मोटी-सी किताबें लिए उनके पीछे भाग रहे हैं........नायिका एक बार पलटकर देखती है ....शायद कानून की कोई मोटी-सी किताब किसी के हाथ में दिखाई देती है.............पीछे देखने की कोशिश में उसका पल्लू चेहरे पर आ जाता है और उसे आगे वो ईंटें दिखाई नहीं देती जो इस तरह पड़ी हुई होती है जैसे कोई विवाह की वेदी बनाई गई हो...........नायिका का पैर उससे टकरा जाता है, नायक का हाथ उससे छूट जाता है, जो साये उनका पीछा कर रहे थे अब वो उनके करीब आ चुके हैं, और सब लोग मिलकर कानून की मोटी-मोटी किताबों से नायक के सिर पर वार कर रहे हैं, नायक की वहीं मृत्यु हो जाती है...
नायिका अचानक हड़बड़ाकर उठती है.....ऐसा अजीब सपना उसने पहली बार देखा था.....सुबह होने तक सिर भारी हो चुका था, तबीयत भी खराब-सी होने लगती है........
सुबह हाथ में अखबार लेते से ही पहली नज़र जाती है उस विमान दुर्घटना पर जाती है... न्यूजर्सी से आ रहा एक प्लेन क्रेश, सभी यात्रियों की मौत................यात्रियों के नाम दिए गए हैं जिसमें एक नाम नायक का भी है..............नायिका खबर पढ़ते से ही बेसुध होकर गिर जाती है....जब आँख खुलती है तो ख़ुद को अस्पताल में पाती है और चारो ओर रिश्तेदार चेहरे पर मोहक मुस्कान के साथ खड़े हैं और बधाई दे रहे हैं.... नायिका शादी के पूरे 10 साल बाद माँ बननेवाली है.......

नायिका की आँखों में तलाश खत्म होने का और नायक को पुत्र के रूप में पा लेने का सुकून था.................. एक जीवन गुज़ार लेने के लिए काफी था....................
लेकिन उन्हीं आँखों में नियती से अगले जन्म में यही गलती न दोहराने की विनंती भी थी.......

अपेक्षा

 महेंद्रभटनागर 

.
कोई तो हमें चाहे
गाहे-ब-गाहे!
.
निपट सूनी
अकेली ज़िन्दगी में,
गहरे कूप में बरबस
ढकेली ज़िन्दगी में,
निष्ठुर घात-वार-प्रहार
झेली ज़िन्दगी में,
कोई तो हमें चाहे,
सराहे!
किसी की तो मिले
शुभकामना
सद्भावना!
अभिशाप झुलसे लोक में
सर्वत्र छाये शोक में
हमदर्द हो
कोई
कभी तो!
.
तीव्र विद्युन्मय
दमित वातावरण में
बेतहाशा गूँजती जब
मर्मवेधी
चीख-आह-कराह,
अतिदाह में जलती
विध्वंसित ज़िन्दगी
आबद्व कारागाह!
.
ऐसे तबाही के क्षणों में
चाह जगती है कि
कोई तो हमें चाहे
भले,
गाहे-ब-गाहे!

Monday, March 23, 2009

चिर-वंचित

महेंद्रभटनागर
.
जीवन - भर
रहा अकेला,
अनदेखा -
सतत उपेक्षित
घोर तिरस्कृत!
.
जीवन - भर
अपने बलबूते
झंझावातों का रेला
झेला !
जीवन - भर
जस-का-तस
ठहरा रहा झमेला !
जीवन - भर
असह्य दुख - दर्द सहा,
नहीं किसी से
भूल
शब्द एक कहा!
अभिशापों तापों
दहा - दहा!
.
रिसते घावों को
सहलाने वाला
कोई नहीं मिला -
पल - भर
नहीं थमी
सर - सर
वृष्टि - शिला!
.
एकाकी
फाँकी धूल
अभावों में -
घर में :
नगरों-गाँवों में!
यहाँ - वहाँ
जानें कहाँ - कहाँ!

Sunday, March 22, 2009

अतिचार

महेंद्रभटनागर


.
अर्थहीन हो जाता है
सहसा
चिर-संबंधों का विश्वास -
नहीं, जन्म-जन्मान्तर का विश्वास!
अरे, क्षण-भर में
मिट जाता है
वर्षों-वर्षों का होता घनीभूत
अपनेपन का अहसास!
.
ताश के पत्तों जैसा
बाँध टूटता है जब
मर्यादा का,
स्वनिर्मित सीमाओं को
आवेष्टित करते विद्युत-प्रवाह-युक्त तार
तब बन जाते हैं
निर्जीव अचानक!
लुप्त हो जाती हैं सीमाएँ,
छलाँग भर-भर फाँद जाते हैं
स्थिर पैर,
डगमगाते काँपते हुए
स्थिर पैर!
भंग हो जाती है
शुद्ध उपासना
कठिन सिद्ध साधना!
धर्म-विहित कर्म
खोखले हो जाते हैं,
तथाकथित सत्य प्रतिज्ञाएँ
झुठलाती हैं।
बेमानी हो जाते हैं
वचन-वायदे!
और —
प्यार बन जाता है
निपट स्वार्थ का समानार्थक!
अभिप्राय बदल लेती हैं
व्याख्याएँ
पाप-पुण्य की,
छल -
आत्माओं के मिलाप का
नग्न सत्य में / यथार्थ रूप में
उतर आता है!
संयम के लौह-स्तम्भ
टूट ढह जाते हैं,
विवेक के शहतीर स्थान-च्युत हो
तिनके की तरह
डूब बह जाते हैं।
जब भूकम्प वासना का
‘तीव्रानुराग’ का
आमूल थरथरा देता है शरीर को,
हिल जाती हैं मन की
हर पुख़्ता-पुख़्ता चूल!
आदमी
अपने अतीत को, वर्तमान को, भविष्य को
जाता है भूल!

Saturday, March 21, 2009

जीवन्त

महेंद्रभटनागर
.
दर्द समेटे बैठा हूँ!
रे, कितना-कितना
दुःख समेटे बैठा हूँ!
बरसों-बरसों का दुख-दर्द
समेटे बैठा हूँ!
.
रातों-रातों जागा,
दिन-दिन भर जागा,
सारे जीवन जागा!
तन पर भूरी-भूरी गर्द
लपेटे बैठा हूँ!
.
दलदल-दलदल
पाँव धँसे हैं,
गर्दन पर, टख़नों पर
नाग कसे हैं,
काले-काले ज़हरीले
नाग कसे हैं!
.
शैया पर
आग बिछाए बैठा हूँ!
धायँ-धायँ!
दहकाए बैठा हूँ!

Friday, March 20, 2009

अवधूत

महेंद्रभटनागर


.
लोग हैं —
ऐसी हताशा में
व्यग्र हो
कर बैठते हैं
आत्म-हत्या!
या
खो बैठते हैं संतुलन
तन का / मन का!
व हो विक्षिप्त
रोते हैं - अकारण!
हँसते हैं - अकारण!
.
किन्तु तुम हो
स्थिर / स्व-सीमित / मौन / जीवित / संतुलित
अभी तक
.
वस्तुतः
जिसने जी लिया संन्यास
मरना और जीना
एक है उसके लिए!
विष हो या अमृत
पीना
एक है उसके लिए!

Thursday, March 19, 2009

पूर्वाभास

महेंद्रभटनागर

बहुत पीछे
छोड़ आये हैं
प्रेम-संबंधों
शत्रुताओं के
अधजले शव!
.
खामोश है
बरसों, बरसों से
तड़पता / चीखता
दम तोड़ता रव!
इस समय तक -
सूख कर अवशेष
खो चुके होंगे
हवा में!
बह चुके होंगे
अनगिनत
बारिशों में!
.
जब से छोड़ आया
लौटा नहीं;
फिर, आज यह क्यों
प्रेत छाया
सामने मेरे?
.
शायद,
हश्र अब होना
यही है —
मेरे समूचे
अस्तित्व का!
.
हर ज्वालामुखी को
एक दिन
सुप्त होना है!
सदा को
लुप्त होना है!

सार-तत्त्व

महेंद्रभटनागर

.
सकते में क्यों हो,
अरे!
नहीं आ सकते
जब काम
किसी के तुम -
कोई क्यों आये
पास तुम्हारे?
चुप रहो,
सब सहो!
पड़े रहो
मन मारे,
यहाँ-वहाँ!
.
कोई सुने
तुम्हारे अनुभव,
कोई सुने
तुम्हारी गाथा,
नहीं समय है
पास किसी के!
निष्फल -
ऐसा करना
आस किसी से!
.
अच्छा हो
सूने कमरे की दीवारों पर
शब्दांकित कर दो,
नाना रंगों से
चित्रांकित कर दो
अपना मन!
शायद, कोई कभी
पढ़े / गुने!
या
किसी रिकॉर्डिंग-डेक में
भर दो
अपनी करुण कहानी
बख़ुद ज़बानी!
शायद, कोई कभी
सुने!
.
लेकिन
निश्चिन्त रहो —
कहीं न फैले दुर्गन्ध
इसलिए तुरन्त
लोग तुम्हें
गड्ढ़े में गाड़ / दफ़न
या
कर सम्पन्न दहन
विधिवत्
कर देंगे ख़ाक / भस्म
ज़रूर!
विधिवत्
पूरी कर देंगे
आख़िरी रस्म
ज़रूर!

Friday, March 6, 2009

दरकते पल

विमला भंडारी

धुंधला रही है अब याद तुम्हारी
राख के नीचे दब गई चिंगारी
पेड़ों के पत्ते हुए अब पीले
झड़ने लगे है वो फूल
जो कभी थे अधखिले

तुमसे झुठला न पाउंगी इस सच्चाई को
झेलनी होगी तुम्हें मौसम की इस रूसवाई को
तुमसे ही शुरू होकर तुम ही पर खत्म होती थी
उन कहकहों की गूंज अब धूमिल पड़ने लगी है

तकती थी निगाहे सूनी राह को
जिन पथों पर कभी पैर हमने धरा था
चलते है आज भी, खुद-ब-खुद उघड़ आते है
कदमों के निशां, कहो इसमें मेरी क्या खता

गुनगुनाने को बहुत कुछ था बाकी
अभी तो खाली जाम था साकी
रोशन चिराग सब गुल हुए
वज्र से सबके दिल हुए

ऐसे गाफिल जिंदगी से
हम हुए चंद इबादत मे कैद
हम हुए किन्तु इनके बीच
धड़कता है वो प्यार
जो कभी हमारी
रगों में तुमने
रोपा था

तुम बिन न जी पायेंगे
ऐसा भी दौर कभी गुजरा था
पर जी ली तमाम जिंदगी तुम्हारे बिना
अब ये ना पूछो वो जीना कैसा था



Thursday, March 5, 2009

निराशा और बुद्धिवाद के समानांतर एक रागमय संसार की रचना

कवि महेंद्रभटनागर-विरचित ‘राग-संवेदन’
निराशा और बुद्धिवाद के समानांतर एक रागमय संसार की रचना
— डा. जगन्नाथ पंडित


उत्तर-आधुनिक और भूमण्डलीकरण के इस युग में राग और संवेदना को दरकिनार कर बौद्धिक, अमानुषिक और स्वार्थ-प्रेरित नितान्त व्यावसायिक प्रवृत्तियाँ जन्म ले रही हैं तथा मनुष्य की भौगोलिक दूरी घटने के बावज़ूद उसकी आत्मिक और भावनागत दूरी बढ़ती जा रही है। आदमी संवेदना से कम, बुद्धि से अधिक काम लेता है; जिससे उसकी संवेदना छीजती जा रही है। जो एक वैश्विक संकट या संकट का वैश्वीकरण है। बुद्धि तो जीवन के लिए आवश्यक है, किन्तु बुद्धिवाद की भागाभाग में संवेदना का निर्ममता से कुचला जाना तथा मनुष्य का राग और संवेदना से सतत शून्य होते जाना शुभ संकेत नहीं है। यह अतिशय स्वार्थ और बौद्धिकता का ही प्रभाव है कि इतनी अमानवीयता बढ़ रही है तथा अनात्मीयता और दुष्प्रवृत्तियों का बाज़ार गर्म होता जा रहा है। बावज़ूद इसके, इन मानव-विरोधी तत्वों के विरोध में लोग सक्रिय नहीं हैं। इन्हीं भयानक और त्रासद स्थितियों को भाँपकर महेंद्रभटनागर ने अपनी काव्य-कृति ‘राग-संवेदन’ में राग और संवेदना का एक मधुर, कोमल और जीवन्त संसार रचने की कोशिश की है। गहन मानवीय मूल्यों को अन्तर्मन का अविभाज्य अंग बताते हुए व राग और संवेदना की प्रासंगिकता सिद्ध करते हुए उसके बचाव की ज़ोरदार हिमायत की है। ‘राग-संवेदन’ की कविताओं में वैयक्तिक और सार्वभौम अनुभूतियों का संतुलन है, संवेदना-विरोधी इस युग में अतिशय बुद्धिवाद और स्वार्थवृत्ति के विरुद्ध एक भाववादी विद्रोह है; जो अत्यन्त प्रासंगिक है।
‘राग-संवेदन’ के पूर्व प्रकाशित महेंद्रभटनागर की ‘मृत्यु-बोध: जीवन-बोध’ कृति में मृत्यु से जुड़ी संवेदना तो है किन्तु वहाँ कवि मृत्यु-बोध से आक्रान्त और बेचैन नहीं है। वहाँ मृत्यु का अहसास-भर है। मृत्यु की नित्यता, अकाट्यता और सार्वभौमिकता का उद्‍घोष है। साथ ही, मृत्यु-संबंधी भारतीय अवधारणा को प्रस्तुत करके जीवन के प्रति गहरा लगाव व्यक्त किया गया है। मृत्यु संबंधी उपर्युक्त अवधारणा कवि को आस्थावान बनाती है और यह संदेश देती है कि मृत्यु जीवन का अन्त न होकर एक नये जीवन का आरम्भ है। मृत्यु और जीवन संबंधी इतनी अधिक कविताएँ एक स्थान पर सम्भवतः कहीं नहीं हैं। सम्पूर्ण नयी कविता में भी मृत्यु संबंधी इतनी कविताएँ शायद ही होंगी। यहाँ कवि मृत्यु को सहजता से अंगीकार करता हुआ जीवन को अपनी पूरी सामर्थ्य के अनुरूप सम्पूर्णता में जीना चाहता है। कवि की मान्यता है कि जीवन और मृत्यु में अद्भुत साम्य है, मृत्यु-भय जीवन-सौन्दर्य को सँवारता है। चूँकि मृत्यु निश्चित और अटल है इसलिए कवि मृत्यु से न आशंकित होता है न आतंकित। वह मृत्यु को चुनौती देता है कि उसे जब आना हो आये। अतः ‘मृत्यु-बोध: जीवन-बोध’ की कविताओं में मृत्यु और जीवन का दर्शन है। कवि जीवन और मृत्यु के प्रति एक गंभीर दार्शनिक मुद्रा अपनाता है — जहाँ न कोई उद्विग्नता है, न हलचल।
प्रायः देखा जाता है कि जीवन के सांध्यकाल में आदमी मृत्यु से भयभीत होकर अपना परलोक सुधारने हेतु वैराग्य को अंगीकार करता तथा जीवन-संघर्ष से पलायन का रास्ता ढूँढ़ता है। किन्तु इक्यासी वसन्त पार करने के बाद भी, महेंद्रभटनागर में जीवन के प्रति आकर्षण ख़त्म नहीं होता। वे उन नकारवादियों और वैरागियों के समक्ष एक चुनौती रखते हैं जो संसार को क्षणभंगुर, नीरस और सौन्दर्यविहीन मानते हैं। अतः ‘राग-संवेदन’ की कविताएँ , ‘मृत्यु-बोध: जीवन-बोध की कविताओं में निहित कवि की संवेदना का विस्तार और उसे पुख़्ता करने का प्रयास है। महेंद्रभटनागर इस बात के लिए चिन्तित नहीं हैं कि संसार में उनकी भौतिक उपलब्धियाँ क्या है, उन्होंने कौन-से बड़े ओहदे प्राप्त किये हैं, बल्कि उन्हें चिन्ता इस बात से है कि राग, संवेदना और सौन्दर्यचेतना की हिफ़ाजत कैसे की जाए जो; आज ख़्त्म होती जा रही है।
‘राग-संवेदन’ कृति में मूलतः तीन तरह की कविताएँ हैं — वैयक्तिक अनुभूतियों से युक्त, राग-बोध और प्रकृति संबंधी तथा सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक चेतना संबंधी। कवि समय की लघुतम इकाई क्षण की भी उपेक्षा नहीं करता, उसका महत्त्व घोषित करता है। इस दृष्टि से ‘एक लमहा’ कविता उल्लेख्य है जिसमें यह स्थापित है कि एक क्षण यदि कभी ज़िन्दगी छीन लेता है, तो कभी एक सम्पूर्ण इतिहास भी रच डालता है; इसलिए कवि प्रत्येक क्षण को सम्पूर्ण रूप में जीकर उसका सदुपयोग करना चाहता है। यह जीवन के प्रति एक सहज आकर्षण का साक्ष्य देता
है :
.
हर लमहा / अपना गूढ़ अर्थ रखता है,
अपना एक मुकम्मिल इतिहास सिरजता है
बार-बार बजता है!
इसलिए ज़रूरी है —
हर लमहे को भरपूर जियो
जब-तक, कर दे न तुम्हारी सत्ता को चूर-चूर वह!
.
‘राग-संवेदन’ कृति में प्रिया को सम्बोधित ‘राग-संवेदन — 2’, ‘वरदान’, ‘स्मृति’, ‘बहाना’, ‘दूरवर्ती से’ जैसी कविताएँ हैं; जिनकी अन्तर्वस्तु में कवि की एकदम निजी, आत्मगत और गोपनीय कही जानेवाली अतीत की मधुर स्मृतियाँ हैं। वहाँ प्रिया से एकाग्र मधुर संवाद हैं। कहीं प्रिया का रूठना, कहीं उसके सांत्वना-बोल, कहीं उसका प्यार; जो अब-तक स्मृतियों में दर्ज़ था, शब्द बनकर फूट पड़े हैं। ‘वरदान’ कविता का यह अंश: ‘याद आता है / तुम्हारा प्यार’ नागार्जुन की ‘याद आता तुम्हारा सिन्दूर तिलकित भाल’ से भावसाम्य रखता है। वास्तव में नितान्त एकान्त समय में प्रिया से जुड़ी अनुभूतियाँ उन्हें अपार आन्तरिक ऊर्जा देती है जिसे पा वह जीवन के प्रति आसक्त होकर, शेष जीवन दोगुने उत्साह से सुख से जी लेने की तमन्ना प्रकट करता है। यहाँ प्रेम के प्रति एक सकारात्मक और सर्जनात्मक दृष्टिकोण है। प्रेम-संवेदना सृष्टि के प्रत्येक हृदय को एक दूसरे से जोड़ती है इसलिए कवि सृष्टि में प्रेम को एकमात्र वरेण्य मानता है :
.
सृष्टि में वरेण्य‘
एकमात्र / स्नेह-प्यार भावना!
मनुष्य की / मनुष्य-लोक मध्य
सर्वजन-समष्टि मध्य, / राग-प्रीति भावना!
.
कहना न होगा कि विवेच्य कृति की सम्पूर्ण कविताओं का आधार प्रेम है। प्रिया, प्रकृति, जीवन तथा सम्पूर्ण मानवता तक प्रेम का विस्तार है। प्रेम-संवेदना को कवि ने व्यक्ति के साथ चेतनशील प्रकृति-जगत तक फैलाया है। प्रकृति से कवि का अभिन्न नाता है, उसके साथ निरन्तर आत्मीय संवाद हैं। प्रकृति से मनुष्य को अलग करना किसी यातना से कम नहीं; ख़ासकर एक संवेदनशील मनुष्य के लिए। ‘आह्लाद’, ‘आसक्ति’, ‘मंत्रमुग्ध’, ‘हवा’, आदि प्रकृति-चित्राण की कविताएँ हैं; जिनमें कहीं बदली का छाना, बिजली का कौंधना, मिट्टी की सोंधी गंध का महकना है तो कहीं सीधी सरल चिड़िया कवि को सोने से जगाती है, झींगुर-दादुर का संगीत गूँजता है और कहीं चमेली की सुवास में कवि संसार और स्वयं को भूलकर मंत्रमुग्ध हो जाता है। कहीं हवा से निवेदन है कि वह उनके तन और मन को जल के शीतल छींटों से भिगो दे। प्रकृति के ये सौम्य और निश्छल रूप बड़े आकर्षक और मोहक हैं; जिनके साथ कवि एकात्म होना चाहता है।
महेंद्रभटनागर प्रगतिशील आन्दोलन से भी गहरे रूप में जुड़े थे। विवेच्य कृति में प्रगतिशील चेतना की अनेक कविताएँ उपलब्ध हैं। प्रगतिशील होने की पहली शर्त है — इस दृश्य संसार को सत्य और यथार्थ मानना तथा उसके नश्वरता और मिथ्यात्व के भ्रमजाल से मुक्त होना। इसकी अनुगूँज प्रस्तुत कृति की अधिकांश कविताओं में सुनायी देती है। इसके बाद प्रगतिशील कवि समाज के शोषण, सामाजार्थिक विसंगतियों, व्यवस्था के कुप्रबन्ध के प्रति असहमति दिखाता है। इसके दृष्टान्तस्वरूप ‘दो ध्रुव’, ‘समता-स्वप्न’ जैसी कविताएँ पेश की जा सकती हैं। ‘दो ध्रुव’ कविता में समाज के शोषक और शोषित दो स्पष्ट वर्ग हैं जो आपस में विभक्त तथा दो ध्रुवों की तरह दो विपरीत छोरों पर रहकर आपसी एकता और समता के अभाव को सूचित करते हैं :
.
हैं एक ओर —
भ्रष्ट राजनीतिक दल, / उनके अनुयायी खल,
सुख-सुविधा साधन-सम्पन्न / प्रसन्न ....
दूसरी तरफ़ —
जन हैं — भूखे-प्यासे दुर्बल, अभावग्रस्त,
त्रस्त, अनपढ़, दलित, असंगठित,
खेतों-गाँवों, / बाज़ारों-नगरों में
श्रमरत / शोषित / वंचित / शंकित!
.
आर्थिक और सामाजिक स्तर पर विभाजन इतना तीखा है कि कवि बेचैन हो उठता है। इस वैषम्य को वह समता-मूल्य के प्रतिष्ठापन में बाधक मानता है। साम्यवादी इमारत के ढह जाने का यह अर्थ नहीं कि साम्यवादी विचारधारा समाप्त हो गयी या समता और समाजवाद के सपने छोड़ दिए जाएँ, या साम्यवाद शब्द के समक्ष मुँह बिदका दिया जाए, बल्कि बदली हुई परिस्थितियों में उसे पुनर्व्याख्यायित करके उसकी मानवीय और सर्जनात्मक भूमिका की सार्थकता सिद्ध करने की आवश्यकता है। जब-तक स्वप्न नहीं होगा, महत्त्वाकांक्षा नहीं होगी तब-तक मनुष्य किसी गंभीर लक्ष्य तक पहुँचने में असमर्थ रहेगा। महेंद्रभटनागर असामनापूर्ण क्रूर व्यवस्था की जगह समानतापूर्ण व्यवस्था के हिमायती हैं; जिसमें उनका प्रगतिशील दृष्टिकोण व्यक्त हुआ है। उनकी ‘समता-स्वप्न’ कविता उस भयानक त्रासदी को प्रस्तुत करती है जिसमें श्रमरत आम आदमी अन्याय से लड़ता हुआ अपने यौवन का हवन करता है, क़दम-क़दम पर छल, क्रूरता और चतुर्दिक शोषण का शिकार बनता है, वह लाभान्वित नहीं हो पाता तथा तमाम विषमताएँ बढ़ती जाती हैं। लेकिन समता-प्राप्ति को कवि असमाप्य, अजेय और मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार मानता है जो साम्यवाद के प्रति उसकी दृढ़ आस्था को दर्शाता है :
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परस्पर साम्यवादी भावना इंसान की
निष्क्रिय नहीं होगी / न मानेगी पराभव!
लक्ष्य तक पहुँचे बिना होगी नहीं विचलित
न भटकेगा / हटेगा / एक क्षण अवरुद्ध हो लाचार
समता-राह से मानव!
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आज की जटिल ज़िन्दगी में आदमी कितना असुरक्षित है, यह चिन्ता का विषय है। आज व्यक्ति के नाम या उपनाम (सरनेम) से प्रकट होने वाली जाति का अहसास-मात्र उसकी मौत का कारण बन सकता है। आज गुण की पूजा का आदर्श ख़त्म हो गया है और जाति की पूजा प्रधान हो गयी है। जातिगत और धर्मगत विभीषिका को लोग सदियों से झेल रहे हैं। कवि उस तीव्र वेदना का अनुभव करता है :
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वंश हमारा / धर्म हमारा
जोड़ा जाता है क्यों नामों से? / उपनामों से?
कोई सहज बता दे —
इसाई हूँब् या मुस्लिम / या फिर हिन्दू हूँ ...
कहा करे कि ‘नाम है मेरा — महेंद्रभटनागर,
जिसमें न छिपा है वंश, न धर्म
न कोई मर्म!
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और अन्त में कवि सर्वज्ञ इलाही को ही कठघरे में खड़ा कर देता है :
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शिक्षित समाज में / सभ्य सुसंस्कृत समाज में
आदमी — सुरक्षित है कितना
आदमी — अरक्षित है कितना?
हे सर्वज्ञ इलाही, / दे सत्य गवाही!
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आज का मनुष्य शिक्षित, सभ्य और सुसंस्कृत तो है किन्तु आम आदमी असुरक्षित हैं; जो परिवेश की हिंस्रता का सूचक है। जिजीविषा और आस्था के बिना न जीना सम्भव है और न ही किसी प्रकार का सृजन; किन्तु विडम्बना यह है कि आज के संकटापन्न और निराशा के माहौल में मनुष्य की जिजीविषा भी समाप्त होती जा रही है। जीवन में सफल होने और आगे बढ़ने हेतु जिजीविषा पहली शर्त है। इसके अभाव में व्यक्ति युद्धभूमि में पहुँचने से पहले ही हथियार डालकर विरोधी परिस्थितियों के समक्ष आत्म-समर्पण कर देता है। यह जीवन के प्रति एक निषेधात्मक दृष्टिकोण है। व्यक्ति की क्षीण होती जा रही जिजीविषा और विश्वास को जिलाये रखने का एक सार्थक प्रयास है ‘आसक्ति’ कविता। प्यार और जीवन के प्रति कवि का इतना गहरा लगाव है कि उनमें तमाम विद्रूपताओं के बावज़ूद वह उन्हें अतिशय सुन्दर और आकर्षक लगते हैं। बिना किसी दुराव के अकुंठ भाव से वह व्यक्त करता है :
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ऐसे प्यार से मुँह मोड़ लूँ कैसे?
धरा इतनी मनोहर, छोड़ दूँ कैसे?
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पराजय जीवन का एक पड़ाव है; किन्तु उस पराजय से एक नयी ऊर्जा और अदम्य साहस लेकर आगे बढ़ना एक संघर्षधर्मी योद्धा का लक्षण है। प्रतिकूल परिस्थितियाँ मनुष्य का निकष होती हैं जिनसे गुज़रकर वह अधिक सशक्त बनता है। इसलिए जहाँ त्रिलोचन जीवन की बाधाओं के आभारी हैं; वहीं महेंद्रभटनागर का अनुभव है कि कड़वे अनुभवों ने ही उन्हें परिपक्व बनाया है, अपने-परायों से मर्माहत होकर ही वे जीवन का मर्म जान सके हैं। इसलिए ‘दृष्टि’ कविता में संघर्ष से पराजित, दुर्भाग्य के शिकार असहायों को वे रोने को नहीं, खम ठोंककर जीवन-संग्राम में उतरने की प्रेरणा देते हैं तथा पराजय को एक निकष और विजय की भूमिका रचने वाली स्थिति के रूप में देखते हैं :
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पराजय को / विजय की सूचिका समझो,
अँधेरे को / सूरज के उदय की भूमिका समझो!
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सरल शब्दों में गूढ़ और गूढ़तम विचारों तथा भावों की अभिव्यक्ति, परिपक्व अनुभवों और सृजन सातत्य का परिणाम है; जिसे ‘राग-संवेदन’ की कविताओं में देखा जा सकता है। अधिकांश कविताओं में लय की रक्षा की पूरी कोशिश है: जो निराला द्वारा निर्दिष्ट मुक्तछंद के मॉडेल हैं। ये कविताएँ बनावटीपन और शिल्पगत जटिलता से मुक्त हैं।
इस प्रकार महेंद्रभटनागर का रचना-संसार बड़ा व्यापक है। विचार और जीवन-दृष्टि को लेकर वहाँ कोई अस्पष्टता नहीं है। ‘राग-संवेदन’ शीर्षक ही इस तथ्य का साक्ष्य देता है कि प्रेम और संवेदना को केन्द्र में रखकर, उसके इर्द-गिर्द मँडराने वाले संकट तथा हिंस्र स्थितियों का जायज़ा लिया गया है। कहना न होगा कि इन कविताओं में राग और संवेदना की पराजय और उसके अस्त होने का तीव्र दंश मौज़ूद है। बौद्धिकता, व्यावसायिकता और स्वार्थ की झंझा ने तमाम मावन-मूल्यों को तिरोहित कर दिया है। आज की सबसे बड़ी इस चुनौती से महेंद्रभटनागर जूझते हैं। उनमें उन मूल्यों के बचाव की व्यग्रता है। छल, धोखा, स्वार्थ और बौद्धिकता की चोट से आहत हृदय पर ये कविताएँ शीतल लेप की तरह हैं। आज के विषम, विकट, क्रूर तथा आस्थारहित माहौल में ‘राग-संवेदन’ की कविताएँ एक रागमय संसार की रचना करती हैं। प्रेम, संवेदना और जिजीविषा को मानव-मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित किये जाने को लेकर महेंद्रभटनागर याद किये जाएंगे।

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Wednesday, March 4, 2009

लाडली बिटिया

विमला भंडारी

तेरी सूरत....
जैसे मन में बसी कोई मोहनी मूरत
बेटी! तू है जहां में, मेरे लिये -
सबसे खूबसूरत !

तेरी आवाज...
बज उठते है
मानों सारे साज
मेरे लिये -
तू है सबसे खास !

तेरी आंखे...
जैसे मेरी चाहतो
की पांखे
गुजरती है जिनसे
मेरे ख्वाबों की राहें !

तेरे बाल...
जैसे उड़ी हो
बादलों से मस्त गुलाल,
जिनकी खुशबू से
सदा महके मेरे ख्याल !

तेरा चेहरा...
जैसे सूरज हो मेरा
जिससे हुआ
मेरा जीवन सुनहरा !

मेरी सांस-सांस में है तेरी धड़कन, मेरी आस-आस में तेरा ही रूपरंग
तेरा प्यार ही जीवन का सहारा, तुझे पाकर ही मिला मुझे किनारा

अपना प्यार ...
इसी तरह
सजाए रखना,

यूं ही सदा ...
मुझकों अपना
बनाए रखना।

तुम्हारा जन्मदिन...
आये बार-बार
खुशिया लाये हजार
सब मिलकर झूमे-नाचे गाये
तुम्हार जन्मदिन मनाये.


Tuesday, March 3, 2009

आदमी की औकात

विमला भंडारी

अपनों के घरौंदे
और रेत के महल
दोनों में साम्य देखो
ढ़हना और फिर बनना
आदमी की औकात देखो

गुजरता है आदमी
आपदाओं के बीच
धूमिल होता है
निस्तेज होता है
फिर उठता है
उठने और गिरने
बनने और बिगड़ने का
भूकम्पी दौर से गुजरने का
यह अभ्यास देखो
क्षुद्रताओ के बीच
÷मोती' चुगने का
अनोखा प्रयास देखो
तकदीर और तदबीर से
जूंझते देखो
हर लम्हें पर चस्पा,
बाजुओं पर जमी फौलाद देखो
आदमी की औकात देखो

Monday, March 2, 2009

वो लड़कियां

विमला भंडारी

लड़कियां जायेगी अब स्कूल
किन्तु
वो लड़कियां
जिन्हें जाना चाहिए था ÷स्कूल'
आज भी
हांकती है
उसी तरह
ढ़ोर डंगर
काटती है
जंगलों में लकड़ियां
बीनती है सूखे कण्डे
और
टोपले में भर
ईंधन का बोझा
ढ़ोती है हर रोज
वो लड़कियां
ताकि
सिक सके घर परिवार की
÷रोटियां'


वो लड़कियां
जिन्हें जाना चाहिये था स्कूल
प्रतिदिन
चमकाती है
बर्तनों को
भरती है पानी
करती है
झाडू पौंछा
पौंछती है
भाईयों की बहती नाक
और/फोड़ती है पत्थरों को
मजूरी देती रहे उन्हें
रोटियां

वो लड़कियां
जिन्हें जाना चाहिये था स्कूल
प्रतिवर्ष
आखा तीज पर
गणगौर सी
सजाकर
युवा होने से पूर्व ही
ब्याह दी जाती है
किशोरी कोख से
किल्लोलती
जनमती है/फिर
वो लड़कियां
जिन्हें जाना चाहिये था स्कूल
किन्तु कभी नहीं
जा पायेगी वो स्कूल

Sunday, March 1, 2009

आदमी का अहसास

विमला भंडारी

जिन्दगी की किताब पर
रोज होते है
हास परिहास
नित नये रूप में
छपते है
संवाद
चाय के पानी की तरह
खौलते है गैस पर
फ्र्रिज में रखे
दूध का ठण्डापन
जमने न देता
डिब्बे में बंद
चीनी की मिठास
जागता है फिर गर्म अहसास
मुंह के सामने
लगी प्याली की तरह
गर्म धुंए से
लौटता है फिर
आदमी का विश्वास