Saturday, February 28, 2009

राही मासूम रजा की कहानियां: मनुष्य के ख्वाबों की तावीर

राही मासूम रजा की कहानियां: मनुष्य के ख्वाबों की तावीर
(का शेष भाग)

- प्रताप दीक्षित


सपनों की रोटी व्यवस्था के शव विच्छेदन की कहानी हैं । समाज, राजनीति और व्यवस्था के अन्तविरोधों पर व्यंग्य कथा लगती यह कहानी राही की अन्य रचनाओं की भाँति मनुष्यता की तलाश कहानी है। अथवा कहा जाए कि एक प्रकार से मनुष्य के सपनों की अथवा स्वयं की खोज की कहानी है।
कहानी का कथानक छोटा लेकिन इसका फलक बड़ा है। कहानी का मुख्य पात्र एक लेखक है जिसकी एक जेब में पी-एच०डी० की डिग्री और दूसरी में उसके लिखे नए उपन्यास के कुछ पन्ने हैं। वह स्वयं कहीं गुम हो गया है। तलाश उसी को करनी है। लेखक इस खोज के माध्यम से राजनीति, मंहगाई, सरकारी तन्त्र, भ्रष्टाचार, सरकारी नौकरियों की स्थिति और यथार्थ, लोगों की सोच का यथार्थ विश्लेषण करता नजर आता है। अपने को कहीं न पाकर अन्त में वह सोचता है कि शायद वह मर चुका है जिसकी उसे ख़बर नहीं हुई हैं। वह निराश लौट कर पलंग पर अपने को सोए हुए पाता है। उसे इत्मीनान होता है कि यदि वह सो रहा है तो वह सपने भी देख रहा होगा। ग़नीमत है कि उसके सपने तो सुरक्षित हैं।
लेखक इस कहानी में व्यवस्था पर निरन्तर कटाक्ष करता है-अगर मुसलमान अपना घर जलवाने, अपने आपको कत्ल करवाने के लिए दंगा शुरू कर सकते हैं तो, सरकारी नौकरी क्यों नहीं कर सकते।''
ज्ञातव्य है कि मुसलमानों पर इस तरह के आरोप केवल साम्प्रदायिक पार्टियों द्वारा ही नहीं वरन्‌ प्रशासन द्वारा भी लगाए जाते रहे हैं। (संदर्भ-विभूति नारायण राय द्वारा इस विषय पर लिखा गया शोध प्रबंध )
इसी प्रकार जातिवाद पर व्यंग्य है-जातिवाद तो साहब हजारों बरस पुराना है। पुरानी शराब है, छूटती नहीं है मुंह से काफी लगी हुई। लेखक बीसवीं सदी में वैज्ञानिक सोच की जगह धर्म की विडम्बना पर व्यंग्य करता है, नौकरी तो उन्हें मिलेगी तो ब्लैड बोर्ड पर श्री, ऊँ० या बिस्मिल्लाह लिख कर फिजिक्स पढ़ाना शुरू करें।
त्रासदी तो यह है कि आम आदमी ने यह दंद फंद सीखे नहीं हैं। सपने देखने के सिवा। लेकिन अब तो सपनों का बाजार भी मंदा पड़ रहा है। जिंदगी बाजार का उतार चढ़ाव होकर रह गई है। यह विडम्बना ही तो है कि मनुष्य की पहचान के लिए जाति और धर्म ही सबसे बड़े गुण बन गए हैं। उसका सिर्फ़ मनुष्य रहना महत्त्वहीन है। जरूरी है कुछ और होना।
सपने, ख्वाबों की तासीर, आत्मा, चीनी मिठास के लिए आदि राही के प्रिय प्रतीक हैं। अपने अंदर गहरे अर्थ और संदर्भ संजोए हुए ऊपर से साधारण से दिखते शब्द मात्र। चीनी की मिठास आत्मीयता की तलाश है। वह रोटी से ज्+यादा सपनों को मनुष्य के लिए आवश्यक मानते हैं। रोटी के बिना मनुष्य कुछ दिन जिंदा रह सकता है। न मिलने पर वह, अधिक से अधिक मर जाएगा। परन्तु यह मृत्यु मनुष्य की होगी। परन्तु सपनों के बिना मनुष्यता ही मर जाएगी। तभी मनुष्य के लिए सपने ज्यादा जरूरी हैं। सपनों के जिन्दा रहने पर बदलाव की संभावना तो रहेगी।
राही की कहानियों में मानवीय जिजीविषा बरकरार रहती है। कहानी के अंत में कहीं चीनी मीठी हो जाती है, कहीं विषम से विषम स्थिति में वह सपनों में खो जाता है।
कथायात्रा के इस क्रम में लेखक की अगली कहानी जो इसी भावभूमि की है वह है-खुश्की का टुकड़ा। यह कहानी मनुष्य के अकेलेपन, उसकी खो गई हँसी, आत्मा की तनहाई के साथ-साथ पूरी उदास पीढ़ी की कहानी है।
कहानी का कथ्य कुछ यूं है-यह उस अकेले और उदास नायक की कहानी है जिसकी आत्मा की तनहाई उसकी पीढ़ी की तकदीर है। इस अकेलेपन से बचने का एक ही उपाय है-यादों में जो खो जाना। अकेलेपन से उदासी और झुंझलाहट रूप बदल-बदल कर आते हैं। रूप बदलना और चेहरे पर चेहरे लगा लेना तो मनुष्य की नियति हो गई है। वह इतना कृत्रिम हो गया है कि बिना मुखोटों के वास्तविक रूप में तो उसे कोई पहचानता भी नहीं। सबके चेहरे, मुस्कानें, हंसी सब नकली हैं। उस आम आदमी की आत्मा को शायद यह नकलीपन गवारा नहीं। वह अपनी नकली मुस्कान एक कबाड़ी को बेच देता है। फिर एक दिन बेइन्तिहा-सा हंसना शुरू कर देता है। शायद यही उसकी असली हंसी है। एक दिन उसकी पत्नी उसकी वही नकली हंसी कबाड़ी से वापस ले आती है। परन्तु कथानायक को वह नकली, एडेल्ट्रेड, इन्फीरियर हंसी नहीं पसंद है। पत्नी रूठ कर मायके चली जाती है। नायक रूठी पत्नी को मनाने के लिए पत्र लिखने के लिए काग़ज ढूढ़ रहा है तभी उसके हाथ पत्नी के कहकहों का सेट'' लग जाता हैं, जो वह भूल गई है। कहकहों का सेट उसके हाथ से फिसल जाता है और हंसी रोशनी की लकीर की तरह निर्बाध बहती रहती है। वह बचाने के लिए हाथ बढ़ाता है परन्तु हंसी का सेट हाथ नहीं आता परन्तु सड़क उससे टकरा कर टूट जाती है।
लेखक की इस कल्पना ,फैंटेसी में कई आयाम हैं। एक ओर यह आदमी के मौलिक अकेलेपन की गाथा है। परन्तु इसमें नई कहानी आन्दोलन के बाद की कहानियों की तरह अकेलेपन को ग्लोरीफाई नहीं किया गया है। यह परिस्थितियों के कारण उस पीढ़ी की नियति बन गई है। हर पीढ़ी के साथ उसकी उदासी जन्म लेती है। इससे निजात तो यादों में ही मिलेगी। लेखक आज की दुनिया में जिस विडम्बना की ओर इंगित करता है कि उसे उसके वास्वतिक स्वरूप में नहीं पहचाना जाता। लेखक बिटविन दी लाइन्स मानो कहना चाहता है कि जाति,धर्म पद, प्रतिष्ठा आदि उसकी पहचान बन गए हैं। लोग एक दूसरे को चेहरे पर चढ़ाए चेहरों से पहचानते हैं। चेहरे ही नहीं लोगों की हंसी, मुस्कान भी नकली हैं।
इस अकेले और अजनबी व्यक्ति के पास है अपना कहने को तो उसकी यादें और अपना एकांत सुख, अपनी हंसी। अगर वह भी खो जाए तो वह क्या करें। हर एक तो नकली चेहरे और नकली मुस्कान के साथ जिंदा नहीं रह सकता। परन्तु उसकी असली हंसी कहीं न कहीं सुरक्षित तो रहती है। यही लेखक का मंतव्य है। कहानी में रिश्तों की कोमलता बरकरार रखने और उसमें ताजगी के लिए कथानायक की पत्नी का कथन न केवल मौजू है बल्कि दिशा भी देता है-दिल में हाथ डाल कर नया पति तुमसे भी एक दिन पुराना पति निकाल लेती हूँ। शायद पे्रम में ही तासीर है कि जैसे-जैसे पुराना होता है वैसे गहरा होता है। यही कारण है कि हंसी न केवल पति पत्नी के बीच वरन्‌ इस दुनिया में भी रोशनी की लकीर की मानिन्द होती है। इसीलिए उसको तो इस दुनिया में बचाना ही होगा। कहकहों के सेट के लिए चाहे जिस हद तक झुकना पड़े। मनुष्य की हंसी से टकरा कर परिवेश-सड़क-इसमें बाधक ही टूटेगें। मनुष्य की हंसी नहीं। अपने समस्त अकेलेपन, कृत्रिमता, अभावों के बाद भी नायक, उपेक्षित-द्विविधाग्रस्त सही, अपनी मानवीय हंसी के कारण अपराजेय है। कबीर भी कब मरा है। हम न मरिब, मरिहै संसारा
एक जंग हुई थी कर्बला में- प्रकाशन सारिका-जून, १९७० इतिहास का वह कारुणिक प्रसंग जो काल के प्रवाह में पौराणिक आख्यान एवं मनुष्य की श्रद्धा और आस्था का संबल बन चुका है। उसको लेखक ने एक संवेदनशील कथा माध्यम से प्रस्तुत किया है। यह छोटी-सी रचना संसार के तमाम महाकाव्यों की गइराई समेटे हुए है जिनमें शिखर पर आसीन ज्योतिपुंजों के जीवन को इतनी निकट से देखकर रचा गया है।
कहानी का मदीना संसार के कोटि-कोटि जनों की आस्था का केन्द्र जैनब के नाना मुहम्मद का मदीना है। यह मदीना नहीं जैसे बाहें फैलाए खड़ी माँ है। जैनब की आँखें भर आती हैं। पर रोना किस लिए? आँसुओं की नदियों तो सूख चुकी हैं। ऐसी माएँ ही बहादुर संतानो को जन्म देती है। सिर न झुकाने वाले हुसैन, जिनका नाम ही अमृत बन कर रगों में दौड़ने लगा है, वह कभी मर कैसे सकता है? ऐसे ही शहीदों की शहादत मृत्यु से अमृत की ओर गमन करती है। इसमें उस माँ फातिमा की यश गाथा है जिसने बेटे को चक्की पीस-पीस कर पाला है और सिर बुलंद करने का सबक सिखाया है। उस बहन जैनब का त्याग औेर हिम्मत की जिसने अपने पुत्रों का बलिदान कर दिया और चाहती थी यह सब अपनी आँखों से देखें।
इस छोटी-सी रचना में मनुष्यता, उसके संघर्ष, जिजीविषा और अपराजेयता का इतिहास संजोया गया है। रचना का आप्त वचन है-सिर न झुकाना मनुष्य का अधिकार है। मैं केवल इस अधिकार के लिए लड़ना चाहता हूँ।
यह एक ऐसा युग सत्य है जो सदा सदा सृष्टि के अस्तित्व तक मनुष्य को प्रेरणा देता रहेगा। मृत्यु पर विजय का घोषणापत्र बना रहेगा। इसके साथ ही एक करूण त्रासदी भी है कि न्यायपथ पर चलने वाले को अकेला रह जाना पड़ता है। खुद जल कर दूसरों को रोशनी देनी होती है। चाहे वह आसमान में सूरज हो या कर्बला में हुसैन। अन्याय के सामने सिर न झुकाने वाले हुसैन का सिजदे में झुका सिर कटने के बाद भी नीचा नहीं होता। सूरज के मानिंद आसमान पर बुलन्दियों पर दिखाई देता है।
सहज संवेदनशील कहानी न केवल इतिहास पर नए दृष्टिकोण से प्रकाश डालती है वरन्‌ अपराजेयता का संदेश भी देती है।
राही मासूम रजा ने कहा है कि उनकी कहानियों का आधार व्यक्ति होता है। व्यक्ति केन्द्रित कहानियों में लेखक कहानी के पात्र अथवा चरित्र की पहचान उसके परिवेश, जीवन दशाओं और उसके विचारों में आए परिवर्तनों का समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक अध्ययन करके करता है। इस प्रकार की कहानियों में कहानी और रेखाचित्र का अंतर बनाए रखना, रचनाकारों के लिए मुश्किल होता है। कहानी जब पात्र के माध्यम से व्यापक संदभोर्ं से जुड़ती है तब वह कहानी का अस्तित्व लेती है। राही मासूम रजा की खलीक़ अहमद बूआ और एम०एल०ए० साहब ऐसी ही कहानियाँ है।
खलीक़ अहमद बूआ-लीक से हट कर अनोखी -प्रेमकथा कही जा सकती है। लौकिक से इहलौकिक पे्रम तक की पे्रम गाथाओं से विश्व साहित्य भरा हुआ है। परन्तु यह अपने ढंग की अलग कहानी है। समाज के लिखित अलिखित विधानों के अनुसार एक अप्राकृतिक संबंधों की प्रेमकथा। समाज में निषिद्ध होने पर भी ऐसे संबंध कमोबेश हर समाज और युग में रहे हैं। कहानी में मूल प्रश्न नैतिकता का नहीं बल्कि निष्ठा, विश्वास, समर्पण और संबंधों की नैतिकता का है।
कहानी का मुख्य पात्र खलीक़ अहमद एक हिजड़ा है जो एक नवजवान रुस्तम को कहीं से भगा कर लाए हैं। पति-पत्नी संबंधों में खलीक़ एक समर्पित पतिव्रता की तरह संबंध निर्वाह कर रहे हैं। वह पाँचों वक्त की नमाज पढ़ने के साथ ही अपने सुहाग रुस्तम के लिए चौथ का व्रत भी रहते हैं। उनको दो ही भय हैं। एक मौत का, दूसरा रुस्तम की बेवफाई की आशंका। बच्चों द्वारा चिढ़ाए जाने, खलीक़ अहमद बूआ मर गई पर वह बच्चों को कोसते, गाली देते हैं। परन्तु उन्हीं बच्चों का चुप रहना, उनका न चिढ़ाना भी नहीं भाता। रुस्तम के संबंध एक वेश्या से हो जाते हैं। खलीक़ अहमद निराश हो शहर छोड़ने की तैयारी में है। तभी एक दिन वह रुस्तम को पीछे के दरवाजे से वेश्या पुखराज के कोठे पर जाते देखते हैं। वह कोठे पर जाते हैं, रुस्तम की हत्या कर देते हैं। वह पकड़े जाते हैं और उन्हे फाँसी हो जाती है। थोड़े दिन बाद लोग उन्हें भूल जाते हैं।
कहावत है कि प्रेम और जंग में सब कुछ जायज है। ऐसी स्थिति में पे्रम के चरम अथवा नफ़रत में मनोवैज्ञानिकों के अनुसार दोनों के पीछे एक ही भावना होती है। खलीक़ द्वारा रुस्तम को मार दिया जाना अनहोनी नहीं लगता क्योंकि प्रेम विकल्पों के द्वन्द्व में नहीं उलझता।
लेखक ने पात्र का भरपूर मनोवैज्ञानिक अध्ययन किया है। चिढ़ाए जाने पर ख़लीक़ बच्चों को कोसते, बिगड़ते दिखाई देते हैं। परन्तु यह उनका ऊपरी दिखावा है। वीरान सड़क पर किसी की आवाज न सुनाई देने पर वही ख़लीक़ बड़बड़ाते नजर आते हैं,आज कौनों हरामजादे की आवाज नहीं आ रही। मर बिला गए सब। सन्नाटा उन्हें डराता है। क्योंकि वह मौत से जितना नहीं डरते, उतना सन्नाटे, तनहाई से डरते हैं। वास्तव में मौत का डर भी तो उसी तनहाई के कारण ही होता है। सच तो यह है कि बेपनाह मोहब्बत करने वाले खलीक़ के बच्चे अजीज हैं। उन पर उनका गुस्सा एक दिखावा है। रुस्तम की बेवफाई से दुःखी खलीक़ से पूरे शहर को हमदर्दी हैं। खलीक़ ने रुस्तम का पुखराज के कोठे पर जाना सुना है। रुस्तम ने उनके पास आना भी छोड़ दिया है। यह शहर छोड़ने की तैयारी भी कर रहे हैं। परन्तु वह उस वक्त रुस्तम को मारते हैं जब वह स्वयं उसे अपनी आँखों से पुखराज के कोठे पर जाते देखते हैं। पे्रम में शायद ऐसा ही होता है। बात बेपर्दा न होने तक मन के किसी कोने में संदेह बना रहता है। दिल बेवफाई का यक़ीन नहीं करता।
भाषा की खूबसूरती, रवानगी, अप्रतिम प्रयोग यथा सड़क जाग जाती है। धूप मुंह फेर हंसने लगती है। नीम और पीपल के पेड़ मुंह फेर मुस्कराने लगते, मुंडेर पर बैठी वुजू करती मस्जिद आँखें उठा देखने लगती। लेखक परिवेश का मानवीकरण कर देता है। बिंबों को जीवंत कर चित्र उपस्थित कर देता है।
कहानी के अंत में लेखक समय की इस कटु लेकिन अनिवार्य सच्चाई की ओर इंगित करना नहीं भूलता, फिर वह भी खलीक़ अहमद बूआ को भूल गए।
मार्मिक से मार्मिक चरित्र के लिए लोगों द्वारा भूला दिया जाना समय की नियति है। एक लेखक ही है कि पूरे अमृत या विष को पीकर विभिन्न रूपों में इन्हें सृजित करता है।
इसी क्रम की एक और महत्त्वपूर्ण कहानी है-एम०एल०ए० साहब। कहानी राजनीतिक विसंगतियों पर तीखा व्यंग्य है। मतदाताओं को बेवकूफ़ बनाने का सिलसिला चुनावों का अहम्‌ हिस्सा है।
कहानी का मुख्य पात्र एम०एल०ए० साहब कहीं के विधायक नहीं बल्कि मौलाना लतीफ अहमद है, जिन्हें संक्षेप में एम०एल०ए० साहब कहा जाता है। परन्तु इस बात को कोई नहीं जानता। एम०एल०ए० साहब का काम चुनावों में अपने तरीके से प्रचार और तकरीरें करना है। उनके लिए पार्टी महत्त्वपूर्ण नहीं। उम्मीदवार चाहे किसी पार्टी से हो या आजाद, जो उन्हें पैसा/पारिश्रमिक देगा उसके लिए वह हाजिर हैं। भोले मतदाताओं को समझाने और उनके प्रचार करने के तरीके ऐसे अनोखे हैं कि माहिर राजनीतिक भी मात खा जाते हैं। राजनीति का इतिहास ऐसे चरित्रों से भरा हुआ है। यह लेखक की खूबी है कि इस चरित्र के परिपे्रक्ष्य में वह राजनीतिक विसंगतियों को ही नहीं उजागर करता बल्कि ऐसे चरित्र को उसकी विवशता, अभावों और करुणा के साथ प्रस्तुत करता है।
कहानी के अनुसार राजनीतिकों की ओर से आम आदमी का मोहभंग तभी हो गया था, आज एम०एल०ए० होने में क्या बड़ाई है। हर सातवां, आठवां आदमी या तो एम०एल०ए० है या होना चाहता है। इसमें कोई नयापन नहीं रह गया है। लेखक इस राजनीति का कोयले की दलाली मानता है। इसमें मुंह तो ज+रुर काला होता है, लेकिन मुट्ठी गरम रहती है।
विडम्बना तो यह है कि मुंह जो मनुष्य के सम्मान, नैतिकता और मूल्यों का प्रतीक है उसकी क्या सिफत! महत्त्वपूर्ण तो मुट्ठी है। अर्थात्‌ धन के आगे मनुष्य का सम्मान, इंसानियत, मूल्य सब व्यर्थ हैं। इस हम्माम में सभी नंगे हैं। काले लोगों के देश में मुंह की कालिख किसे दिखाई देगी। शायद लेखक का मंतव्य है कि जब लिप्सा और अनैतिकता को सामाजिक स्वीकृति मिल जाती है तब मानवीय मूल्य अपना अस्तित्व खो देते हैं।
जनसंघ और मुस्लिम लीग के प्रति लेखक की नापसंदगी एम०एल०ए०साहब की तकरीर में प्रकट होती है नफ़रत के इन ताजिरों से हमें या आपको क्या लेना देना।लेखक इन दोनों ही को साम्प्रदायिक मानता है। मतदाताओं को बरगलाने के सिलसिले में, पानी की बिजली निकाल लिए जाने'' जैसे विनोदात्मक प्रसंग इस बात का प्रतीक हैं। प्रसंग बदल जाते हैं। अभावों, वायदों से मुकरने के निदान के लिए नए-नए बहाने बनाए जाते हैं। एम०एल०ए० साहब की प्रधानमंत्री से वाकी टाकी पर बात, फ्लोर क्रास करने की बात, चुनाव के टिकट को अस्वीकार करने की गप्प आज के परिदृष्ट में सिफारिस के लिए झूठे फोन, पार्टी बदलने की गीदड़ भभकियां, हाईकमाण्ड पर रोब की कहानियां का पूर्वाभास है। लेखक भारतीय प्रजातंत्र की विडम्बनाओं को कहानी के माध्यम के प्रकट करता हैं। कैसी विडम्बना है जो चुनाव जीतते है धूस खाना शुरू कर देते है और हारने वाले प्रजातंत्र बचाओ आंदोलन चलाने में। जब तक वह खुद न जीत लें और घूस खाने में लग जाएं। भारत में प्रजातंत्र हारने वाले की कोशिशों से ही बचा हुआ है।
राजनीतिक विसंगतियों, भ्रष्टाचार, विद्रूपताओं को कथा प्रसंगों, मुहावरों और भाषा संदर्भों के प्रयोग से उद्घाटित किया गया है-धूल में रस्सी बटना, रंडियों के मुजरे की तरह चुनाव का बीड़ा लेना, एक ही चुनाव क्षेत्र में दो-दो उम्मीदवारों से पैसा ले लेना आदि।
कहानी का मुख्यपात्र एम०एल०ए० साहब आम आदमी की तरह इस भ्रष्ट राजनीतिक परिदृश्य का हिस्सा बनने के लिए अभिशप्त हैं। वह सभी की असलियत जानता है इसीलिए किसी उम्मीदवार को वोट देने लायक नहीं मानता। कहानी में एक जीवन दर्शन है। आदमी जिससे मिलना चाहता है उसी से नहीं मिल पाता और जिससे नहीं मिलना चाहता उससे बार-बार मिलना पड़ता है। अथवा जन्मदिन शायद इसीलिए महत्त्वपूर्ण होता है कि उसके सहारे मरने के लिए दिन गिनने में आसानी होती है।
लेखक कहानी के माध्यम से राजनीति की पुनःव्याख्या कर उसकी पर्त दर पर्त उधाड़ता है, जिसकी देश-काल-वातावरण के अनुसार आज जरूरत है। राजनीति के साथ-साथ उन चरित्रों के रेश-रेशे को उधाड़ती यह कहानी आम आदमी के मोहभंग की कथा है। आजादी के बाद में राजनीतिक का जिस तरह स्वरूप विकृत हुआ उसकी यह पुनःव्याख्या करती है।
राही मासूम रजा की एक लंबी कहानी, उनकी श्रेष्ठ कहानियों में एक, सिकहर पर दही निकाह भया सही है। यह सत्तर के दशक के प्रारंभ में धर्मयुग में धारावाहिक रूप ही प्रकाशित हुई और चर्चित रही है।
राही का साहित्य समाज का आइना है। इनके पात्र समाज के हर वर्ग से उठाए गए हैं। प्रत्येक पात्र अपनी आकांक्षाओं, सपनों, कुण्ठाओं, अभीप्साओं के साथ अपने समय का प्रतिनिधित्व करता दिखाई देता है। यह सामाजिक और मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि यह पात्र अपने-अपने निजी इतिहास से जुड़े रहने को अभिशप्त हैं। भले ही प्रगति अवरुद्ध होती हो, परम्पराओं, सड़ी गली रूढ़ियों से चिपके रहना इनकी नियति है। अतीत से मुक्ति इन्हें असुरक्षा के गहरे अंधेरे में ढ़केल देती है। ऐसे लोगों, स्थितियों और एहसासों की कहानी है-सिकहर पर दही निकाह भया सही।
कहानी की कथावस्तु आजादी के तत्काल बाद की है। एक जमाने में मीर जामिन अली के निराले ठाठबाट थे। जमींदारी बड़ी न होने पर भी सभी सामंती विशेषताएं-संगीतकार, आसामियों की बेदखली, मुश्कें कसवाना, बेगार, गालियां आदि। उन्हें यकीन नहीं था लेकिन जमींदारी चली गई। वह अतीत की परछाईओं के डर से गाँव छोड़ कर शहर में एक छोटा मकान किराए पर लेकर रहने आ गए। साथ थी उनकी पत्नी अमीना, पुत्रियां रुकैय्या और रजिया। पुश्तैनी नौकरानी मत्तों और उसका पुत्र शौकत। उन दिनों के हिसाब से ग्यारह वर्ष की उम्र में ही जवान होती बड़ी बेटी रुकैय्या की शादी की चिंता से उन्हें नींद न आती। ऊंचे खानदान के लड़के बटवारे में पाकिस्तान चले गए हैं। छोटे खानदान में वह बेटी का विवाह करेंगे नहीं। अन्ततः अपने से केवल तीन-चार बरस बड़े शम्सू मियां से रुकैय्या का निकाह हो जाता है। समय काटने के लिए रजिया को स्कूल में पढ़ाया जा रहा है। शौकत को रजि+या बचपन से ही अच्छी लगती है। रजिया का बचपना, अकेलापन और चारों ओर होने वाले परिवर्तन उसे बेचैन करते गए। ऊपर कमरे की खिड़कियों से लाउडस्पीकर पर सिनेमा के एलान सुनती, रात में पानी पीने के बहाने उठकर बेखबर सोए शौकत को देखती। अनजाने ही रजिया और शौकत में प्यार हो जाता है। परन्तु बात खुलने और फैलने पर मत्तों की अपने मालिक के प्रति नमक हलाली और मीर जामिन अली की खानदानी हैसियत की वजह से शादी उनके बीच हो नहीं सकती थी। रजि+या की शादी बासठ साल के रंडुए लड़के से तय होती है। जो रजिया की फोटो देख कर शौकत और रजिया के संबंध में, चार-चार खतों के पहुंचने पर भी लट्टू है। खतों की लिखावट की तहरीर रजिया के हाथों की हैः परन्तु निकाह के पहले ही एक रात रजिया और शौकत परछाई बन कर कहीं चले जाते है। जिसमें पहल रजिया की तरफ से होती है।
कहानी समय के परिवर्तनों को आत्मसात्‌ करने की द्विविधा, बदलते मूल्यों और मान्यताओं एवं रूढ़िग्रस्त मानसिकता के अन्तर्द्वन्द्व को व्यक्त करती है। दरअस्ल परिवर्तन में ध्वंस व टूटने और निर्माण दोनों की प्रक्रियाएं साथ-साथ काम करती हैं। इसके साथ चलने से जो लोग छूट जाते हैं। वे निरन्तर पीछे पड़ते जाते हैं। इस अनिवार्य और निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया में परम्पराओं और सड़ी गली रूढ़ियों में देश-काल-गत बहुत सूक्ष्म अन्तर होता है। जो व्यक्तिपरक आधार पर तय होतां हैं। पूर्वोग्रहो के कारण समायोजन न करने वाले लोग, पीढ़ियों, संस्थाएं कालातीत होने को विवश हो जाती हैं।
राही समय से सीधा साक्षात्कार करते हैं। आजादी के आस-पास का समाज आन्तरिक और वाह्‌य दोनों तरह से एक जटिल समाज था। इसमें बदलाव के दौर में अकेले छूट गए लोग निर्वासन भोगने को विवश थे।
परन्तु यह कहानी अकेले, निर्वासित, टूटे हुए लोगों की ही नहीं हैं। इसमें नई रोशनी के नायकों की कहानी भी है। वे क्रान्ति नायक जो मुखर और सक्रिय नहीं होते बल्कि परछाई बन कर अपनी असहमति और प्रतिरोध व्यक्त करते है। कहानी का शिल्प, भाषा और प्रस्तुतिकारण उसकी रवानगी, मार्मिकता और खूबसूरती का एहसास हर पल कराता रहता हैं। राही अपनी भाषा से कहानी का दृष्टिकरण उपस्थित करते हैं। राही नए मुहावरे गढ़ते हैं। घर में छह शताब्दियां रहती थी।...गलियां रहती थीं...किसानों की सिसकियां रहती थीं।
दीवारें गर्दन झुका-झुका कर उन्हें देख रही है। और आपस में इशारे कर के मुस्करा रही है।/ बेटी की उम्र बड़ी बेहया और बेदर्द होती है।
वह सुबह को शाम और रात को दिन कैसे बनाए सारे बदन में जैसे हजारों हजार दिल धड़कने लगते और इन हजार दिलों में लाखों लाख चिराग जल जाते और उनकी रग-रग में उजाला हो जाता/ छतनार बूढ़े पेड़ की तरह आंधी में टूट गए/ जैसे भाषिक संदर्भ कहानी की वेधकता कर्ई गुना बढ़ा देते हैं। राही की रचनाओं में प्रतीक आरोपित नहीं होते। बल्कि रचना के अंतर से निकलते हैं।
सदा की भांति राही कहानी में व्यंग्य के प्रसंग आने पर नहीं चूकते।-जामिन अली रख रखाव वाले आदमी थे। जिंदगी भर नमाज पढ़ते रहे, गालियां बकते रहे और गुनगुनाते रहे।/हिन्दू सोशल और मुस्लिम सोशल क्या होता है।/ हीरो यदि नवाब नहीं होता तो कवि अवश्य होता है।
कहानी अपने समय, स्थितियों, मानसिकता, और तत्कालीन विवरणों तक सीमित नहीं रहती बल्कि जीवन, उसकी जटिलताओं, मनुष्य की नियति और बदलती मान्यताओं को दस्तावेज बनने में सफल है।
इन कहानियों के विवेचन से विदित होता है कि राही की कहानियों में उनके अंदर का कवि मुखर होता हैं। न केवल कथ्य के अन्दर बहते भाव, पात्रों की मनः स्थिति के निरूपण में वरन्‌ भाषिक अभिव्यक्ति में भी। यद्यपि लेखक का स्वयं कहना है कि कविता की जबान नकली होती है। इसी में इसका हुस्न हैं। जीवन जटिल होता जा रहा है और कविता के माध्यम से इस जीवन को संपूर्णता से व्यक्त नहीं किया जा सकता। कथा भाषा यदि नकली हो जाए तो कहानी मारी जाती है।''
राही के साहित्य के गहन अध्ययन से मालूम होता है कि राही अपने संपूर्ण संघर्ष,असहमति, स्थितियों पर कटाक्ष, समस्त विरोध और युयुत्स भाव के बावजूद अंदर से स्वप्नदर्शी, कोमल सहज और तमाम प्रतिकूलताओं के बीच मानवीय मूल्यों के प्रति आस्थावान नज+र आते है।
कविता की एक विशिष्टता-मानवीय अस्मिता पर अगाध आस्था-ही उसे साहित्य की अन्य विधाओं से अलग पहचान देती है। यही कारण है कि राही के साहित्य पर, आने अनजाने ही, काव्यगत प्रभाव लक्षित होता है।
कथाकार का सरोकार भाषा से भी होता है। हर कथाकार अपनी कथा भाषा अथवा कहा जाय कि हर रचना अपनी भाषा प्रवृत्ति लेकर आती है। राही भाषा को अपनी जमीन की सोच से जोड़ने का काम करते हैं।
राही बहुत स्पष्ट रूप से कहते हैं कि भाषा और धर्म का रिश्ता जोड़ना ही ग़लत है। क्योंकि कुछ लोगों में भाषाओं को धर्म से जोड़ कर देखने की प्रवृत्ति है। वह उर्दू को देवनागरी लिपि में लिखने के समर्थक थे। उर्दू साहित्य की भाषा अपने आलेख में वह स्पष्ट करते हैं-मैं भविष्य में इतनी दूर तो देख ही सकता हूँ कि यह कह सकूँ कि उर्दू लिपि थोड़े दिनों की मेहनत है।
वह अपने संबंध में कहते हैं-मैं भी उर्दू वातावरण में पला बढ़ा हूँ। मैं उर्दू में ही ख्+वाब देखता हूँ। परन्तु मैं इस लिपि को भाषा नहीं मानता। मेरी भाषा वही है जो कबीर, सूर, तुलसी, जायसी, यशपाल, ड्डष्णचन्दर की है।
राही मासूम रजा की भाषा पाठको को न केवल बाधे रहती है बल्कि वह अपनी सादगीपूर्ण, सहज, गुदगुदाने वाली व्यंग्यात्मक और शब्दों के पारदर्शी स्वरूप जो जीवन के अनुभवों को कलात्मक ढंग से व्यक्त करते हैं, भाषा से पाठकों के हृदय पर अमिट छाप छोड़ने में सफल होते हैं।
राही मासूम रजा की कहानियां जीवन की तमाम प्रतिकूलताओं के मध्य जीवन के प्रति आस्था को बनाए रखती हैं। यह कहानियां जीवन के विभिन्न पहलुओं पर ऐसे कोण से प्रकाश डालती है कि वह एक बड़े परिदृश्य का हिस्सा लगती हैं। वह अपनी कहानियों से आज के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक ढांचे में व्याप्त विकृतियों पर करारी चोट करते हैं। यह उन्हीं की हिम्मत थी कि साम्प्रदायिक शक्तियों, उनके नेताओं को नाम लेकर जिम्मेदारों ठहराते रहे। उनका मानना था इन सभी साम्प्रदायिक शक्तियों का मूल चरित्र और उद्देश्य एक है।
राही न केवल साहित्यकार बल्कि एक चिंतक के रूप में सामने आते हैं। राष्ट्रीय, सामाजिक,सांस्कृतिक,राजनीतिक और मानव व्यवहार के विषय में उनका चिंतन वस्तुपरक, निरपेक्ष और संतुलित और निर्भीक दिखाई देता है। साम्प्रदायिकता पर उनके विचार क्रांतिकारी हैं।

Friday, February 27, 2009

राही मासूम रजा की कहानियां: मनुष्य के ख्वाबों की तावीर

- प्रताप दीक्षित


राही मासूम रजा के निधन के १६ वर्षों बाद उनकी याद और उनके साहित्य का पुनर्मूल्यांकन इसलिए और महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि आजादी के ६० साल बाद भी वे दारूण स्थितियां, जिनके विरुद्ध राही ने कलम उठाई थी ज्यों की त्यों मौजूद हैं। आजादी का वास्तविक स्वरूप और मूल्य स्थापित नहीं हो सके। मनुष्य के विरोध में उभरने वाली शक्तियां और प्रखर हुई हैं। सामाजिक-राजनीतिक मूल्य लगातार विघटित हुए हैं। जातिवाद और साम्प्रदायिकता की स्थितियां बद से बदतर होती गई। प्रगति, आर्थिक विकास और धर्म के नाम पर किया जाने वाला शोषण और आम मनुष्य की उपेक्षा युग सत्य बन गए। ऐसी स्थिति में राही मासूम रजा का साहित्य इसलिए आवश्यक हो जाता है क्योंकि उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से इन स्थितियों के खिलाफ संघर्ष ही नहीं किया, बल्कि व्यक्तिगत जीवन में भी देश और समाज को जाति, धर्म, सम्प्रदाय और भाषा के आधार पर विभाजित करने वाले राजनीतिकों, तथाकथित समाजसेवियों और छद्म बुद्धि जीवियों का सतत्‌ विरोध करते रहे। अपनी बेबाक टिप्पणियों के कारण उन्हें हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही सम्प्रदाय के कट्टरपांथियों के विद्वेश का शिकार होना पड़ा। साहित्य के इतिहास में, संभवतः कबीर के बाद, राही पहले साहित्यकार है जिन्हें ऐसी हालातों से गुजरना पड़ा। उनके संघर्ष के अनेक प्रसंग हैं। अपने विचारों के चलते मुस्लिम विश्वविद्यालय की नौकरी उन्हें छोड़नी पड़ती है। मुफलिसी के दिनों में पत्नी प्रसव हेतु अस्पताल में थी। लेखक मित्रों कमलेश्वर, भारती, कृष्णचन्दर की मदद से अस्पताल का बिल भरा गया। बम्बई में किसी तरह काम मिलने का सिलसिला शुरू होता है लेकिन न तो राही की बेबाकी कम होती है न ही संघर्ष। यहाँ तक कि हिन्दी के एक प्रसिद्ध लेखक द्वारा संचालित प्रकाशन समूह द्वारा प्रकाशित उनके उपन्यास आधा गाँव की पूरी रायल्टी भी नहीं दी जाती। जोधपुर विश्वविद्यालय में उनके उपन्यास ''आधा गाँव'' को तत्कालीन विभागाध्यक्ष नामवर सिंह के समर्थन के बाद भी बिना नामवर सिंह की सहमति के पाठ्यक्रम से हटा दिया जाता है। राही बदनीयती से कभी समझौता नहीं कर पाए। कम्युनिष्ट पार्टी के सदस्य होते हुए भी जब केरल में साम्यवादी पार्टी द्वारा सरकार बनाने के लिए मुस्लिम लींग से गठबंधन किया गया तब पार्टी मेंबर होते हुए भी उन्होंने इस गठबंधन का कड़ा विरोध किया। जनसंघ और मुस्लिम लींग दोनों ही उनकी दृष्टि में साम्प्रदायिक हैं। उनकी साफगोई दूसरों के लिए ही नहीं वरन्‌ स्वयं के संबन्ध में भी है। एक साक्षात्कार में वह अपने फ़िल्मी लेखन के संबन्ध में स्वीकार करते हैं...मैं जानता हूँ कि फ़िल्मों में घटिया लेखन कर रहा हूँ। सब-स्टैर्ण्ड काम करता हूँ ताकि जी सकूं। जियूंगा तभी तो कुछ लिख सकूंगा। मुझे इसकी कोई शर्म नहीं। परन्तु फ़िल्मों में जो लिखना चाहता हूँ वह तो अभी लिख ही नहीं सका।
राही मासूम रजा के साहित्य के विवेचन के परिप्रेक्ष्य में इन स्थितियों और संघर्षों का आकलन इसलिए आवश्यक प्रतीत होता है कि किसी साहित्यकार का संपूर्ण लेखन उसके विचारों, जीवन-दर्शन और संघर्षों का ही आइना होता है।
राही मासमू रजा मूलतः उपन्यासकार के रूप में जाने जाते हैं। यह अल्पज्ञात तथ्य है कि वह एक संवेनशील कवि और सशक्त कहानीकार भी थे। उनकी कविताओं का प्रभाव उनके उपन्यासों, उनके पात्रों और कहानियों पर परिलक्षित होता है। अपने उपन्यासों के प्रकाशन के पूर्व वह कवि के रूप में प्रसिद्ध हो चुके थे।
राही का कोई कहानी संग्रह संभवतः प्रकाशित नहीं हुआ है। राही साहित्य के अध्येताओं और शोध करने वालों ने भी उनकी कहानियों के संबंध में कोई चर्चा नहीं की है। राही की कहानियां तत्कालीन पत्रिकाओं सारिका, धर्मयुग, रविवार आदि में बिखरी हुई हैं। राही की पहली कहानी तन्नू भाई शीर्षक से है जो उन्होंने १७ वर्ष की आयु में १९४४ में लिखी थी। पाठकों को ज्ञात होगा कि तन्नू भाई उनके उपन्यास आधा गाँव का एक पात्र है। साहित्य के अध्येता जानते हैं कि प्रत्येक कहानी में एक उपन्यास की संभावना और हर उपन्यास के प्रत्येक पात्र की अपनी कहानी होती है।
कहानी और उपन्यास के बीच अन्तर के सैद्धन्तिक प्रश्न को यदि विद्वजनों के लिए छोड़ दिया जाए और विषय को केवल लेखक की कहानियों तक सीमित करें तब भी यह तो तय है कि समय के संग्रहलय में किसी रचनाकार की एक रचना भी बची रह जाती है तो साहित्य के इतिहास में लेखक का नाम अक्षुण्ण हो जाता हैं।
समीक्षकों ने राही मासूम रजा के साहित्य को साम्प्रदायिकता के विरूद्ध एक जेहाद के रूप में परिभाषित किया है। इस कथन से असहमत नहीं हुआ जा सकता। परन्तु राही की कहानियों से लेखक की संवेदना के विविध आयाम उद्घाटित होते हैं। मनुष्य के स्वप्न, अभाव, शोषण, रिश्तों की संवेदनहीनता, मनुष्यता की अवमानना तज्जनित उसके अकेलेपन का चित्रण उनकी कहानियों में मिलता हैं। यहाँ तक कि आज की सर्वग्रासी विभीषिका बाजारवाद का भी उन्होंने पूर्वालोकन कर लिया था।
दरअसल किसी साहित्यकार के रचनात्मक संघटन में इतिहास, परिवेश और उसकी वैचारिक पृष्ठभूमि का प्रभाव होता है। परन्तु सभी के लिए अपने समय के दौर की रचनात्मकता के साथ आसान नहीं होता। कारण इतर हैं। जरूरत होती है। संघर्षगामिता, प्रखर दृष्टि और ईमानदारी की। राही नई-नई मिली आजादी या कहा जाए सत्तापरिवर्तन के समय युवा हुए थे। वह देश के बटवारे को कभी स्वीकार नहीं कर सके। आजादी के बाद के हालातों साम्प्रदायिकता, विषमता, शोषण, भ्रष्टाचार के कारण आम आदमी के लिए जलालत के अतिरिक्त कुछ बचा था तो उसकी आँखों में अधखिले सपने और एक विशाल जनसमूह उन सपनों की भी असामयिक मृत्यु के लिए अभिशप्त हो गया। राही की कहानियां इन सबके लिए जिम्मेदार शक्तियों को कटघरे में खड़े करने की कोशिश हैं।
राही मासूम रजा की कहानियों के परिपे्रक्ष्य में उनका साहित्य दो ध्रुवों पर स्थित दिखाई देता हैं। एक छोर पर उनकी कहानियाँ साम्प्रदायिकता, सामाजिक-राजनीतिक असमानताओं, पूंजीवादी पतनशीलता से जुड़े उपभोक्तावादी मूल्यों के खिलाफ एक अनवरत युद्ध है जो सपनों को सच करने के लिए लड़ा जा रहा है। क्योंकि कोई भी व्यवस्था स्वतंत्रता, न्याय, समता आदि की व्याख्या अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए अपने ढंग से करती है। लेखक की नियति उससे टकराना है।
दूसरी ओर उनकी कहानियों में जगह-जगह पर ख्वाबों, परछाइयों,धुंध और सन्नाटे हैं। इन प्रतीकों के माध्यम से वह मिथक, इतिहास और संस्कृति में मानवीय अस्मिता की तलाश करते नजर आते हैं। चम्मचभर चीनी में पौराणिक प्रसंग को लेखक वर्तमान संदर्भों से जोड़ता है। देवताओं ने समंदर को मथा/जहर भी अमृत भी मिला/ मथे मेरी तरह/एक कतरे को जरा/किसने अपने को मथा/मेरे सिवा/मेरे ही जैसे दीवानों की तरह।
दिल एक सादा काग़ज-खोए हुए सपनों और परछाइयों की तलाश का प्रयास है। जैदी विला एक ऐसा प्रतीक है जिसके माध्यम से लेखक अपनी आत्मा, जमीन, इसांनियत खोज रहा है।
राही की कहानियों में आत्मा पर चढ़ी धूल है, खुशबू में बसा अंधेरा है, यादे हैं, चाँदनी आँखों की अफ्‌सुरदा है, बिछुड़ गई परछाइयाँ है, सहमी खामोशी है, सिकुड़ गए सपने हैं, चुटकी भर नींद है। परन्तु मंजिल दूर है। अब तो कृष्ण भी परदेश गया है। राही को ही अपने खूने दिल से राहों पर फूल खिलाने हैं।
प्रेमचन्दोत्तर कहानी ने कई पड़ाव पार किए। उस समय समाज जिस ध्रुवहीनता में धूम रहा था, कहानी उसी में रास्ता तलाश रही थी। कहानी की अन्तर्वस्तु और स्वरूप में व्यापक परिवर्तन आए। तमाम कथा आन्दोलनों से परे कहानियों के संबंध में राही की अपनी मान्यताएं हैं उनका मानना है कि कथाकार के लिए जरूरी है कि वह उन लोगों को अच्छी तरह जानता हो जिनकी वह कहानी सुना रहा है। वह यह भी मानते हैं कि साहित्य में मूल प्रश्न वास्तविकता का नहीं बल्कि वास्तविकता की तरफ़ लेखक के दृष्टिकोण का होता है। राही के कथा साहित्य के विश्लेषण से मालूम होता है कि उन्हें इतिहास और संस्कृति की गहरी समझ है। उनकी रचनाओं में मूल्यों की स्थापना का कथात्मक प्रयास है। उनकी कहानियों में जीवन की गहरी और व्यापक समझ पाई जाती है।
उनकी कहानियों की रचना प्रक्रिया के संबंध में राही की पहले प्लाट सोच कर कहानी लिखना नहीं पसंद करते। दृष्टव्य है कि फ्रांसिस विवियन ने भी दृढ़ता से प्लाट का विरोध किया था। उनकी कहानियों के केन्द्र में कोई व्यक्ति या चरित्र होता है। लेखक की श्रद्धा मानवीय संवेदना में है जिसका केन्द्र मनुष्य होता है। विचार भी इसी माध्यम से आते हैं। राही के अनुसार जीवन के विषय में एक दृष्टिकोण के बिना अच्छी कहानी नहीं लिखी जा सकती। वह कहते हैं कि यदि कहानी युग की सीमाओं को नहीं पार कर पाती तो समाप्त हो जाती है।
राही मासूम रजा की जो भी कहानियां उपलब्ध हो सकी हैं ये उनके कथा साहित्य का प्रतिनिधित्व तो नहीं करती परन्तु इनके आधार पर उनके सपनों, संघर्ष और विचारों की बानगी अवश्य मिलती है।
चम्मचभर चीनी राही मासूम रजा की १९७६ में प्रकाशित कहानी है। फंतासीनुमा इस कहानी में जीवन की कड़वाहटें, टूटते सपने और अभाव हैं। एक ओर यह मनुष्य के मोहभंग की कहानी है तो दूसरी ओर अटूट जिजीविषा की।
कथ्य की दृष्टि से यह लेखक और उसके मित्र की कहानी है। मित्र जीवन की विसंगतियों और अभावों को स्वीकार नहीं कर पाता। कड़वाहट मिटाने के लिए चम्मचभर चीनी की ही दरकार है, जो है वह चाय के प्याले में मिठास भरने के लिए पर्याप्त नहीं है। लगता है कि यह मित्र लेखक का अपना ही अक्स है। अन्त में लेखक आजिज आकर आइने पर दावात फेंककर मारता है। आइना टूटने से वह राहत महसूस करता है। सन्नाटा चम्मचभर चीनी बन जाता है और चाय मीठी हो जाती है।
चम्मचभर चीनी जीवन के अभावों, कड़वाहटों और मनुष्य के टूटते सपनों को बचाने की कोशिशों का प्रतीक है। बंद आँखों से देखे गए ख्+वाबों की कहानी। क्योंकि खुली आँखों के सामने जो यथार्थ आता है उसमें जीना मुश्किल हो गया है। समय या तो स्थगित हो गया है या अतीत की ओर चलने लगा है। भविष्य की ओर जाने वाले सभी रास्ते बंद हो चुके हैं। आम आदमी विवश हो गया है ख्वाबों और कविता के अन्दर जीने के लिए। इनके बाहर जो यथार्थ है उसका सामना वह नहीं कर सकता। कविता के बाहर की जि+न्दगी उसके लिए नहीं है।
मंहगाई के बीच सस्ता सिर्फ़ मनुष्य हुआ है। एक चम्मच में बोरी की बोरियां चीनी समा जाती है लेकिन चम्मच नहीं भरती। इस बाजार में हाथ की कीमत एक चम्मच चीनी है। जो कभी भरती नहीं। यह एक चम्मच चीनी मनुष्य की अस्मिता, आत्मा और सपने हैं जिसकी कीमत किसी बाजार में नहीं लगाई जा सकती। जिसका खालीपन कोई बाजार व्यवस्था नहीं भर सकती। बाजारवाद के विरुद्ध, लिखी गई, संभवतः पहली कहानी है।
लेखक बायां हाथ खरीदना चाहता है। क्योंकि उसका बायां हाथ बरसों हुए सुन्न हो चुका है। दाहिना तो पहले ही सलाम करते करते थक चुका है। उससे तो उम्मीद की नहीं जा सकती। लेखक का यह व्यंग्य उन छद्म वामपंथियों पर प्रतीत होता है जो स्वयं जमाने से इस बाजार संस्कृति का हिस्सा बनते जा रहे हैं। लेखक पूंजीवादी पतनशीलता से जुड़े उपभोक्तावादी मूल्यों पर प्रश्न खड़े करता है।
अंत में मिठास आती है, हाथ में जान भी। परन्तु आइना टूटने के बाद। आइना ही तो आत्म साक्षांत्कार है। आइने में व्यक्ति अपनी ही शक्ल देखता है। आत्ममोह व्यक्तिवाद की ओर ले आता है। बाजार का दबाव भी यही करता है। मनुष्य को खण्डों में विभाजित करता है। आत्ममोह के आइने को तोड़ कर ही बूंद और अपने को मथा जा सकता है। जीवन में मिठास भरने के लिए अपने से बाहर आना ही होगा।
यह छोटी-सी कहानी गहरी विचार दृष्टि और महाकाव्यों की गइराई अपने में संजोए हुए है।

चुनावी गणित

नदीम अहमद नदीम






मंगतू का नाम निर्दलीय प्रत्याशियों में देखकर मुझे बहुत हैरत हुई क्योंकि मंगतू तो पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी खास गुर्गा हुआ करता था। अब उन्हीं को गालियां बकते हुए चुनाव मैदान में.....।
मेरे मित्र ने लापरवाही से कहा सब चुनावी गणित है।
वो कैसे?
मंगतू की जाति बिरादरी वालों के इस क्षेत्र में खासे वोट हैं जो इस बार मिस्टर एक्स से नाराज हैं। इसलिए मिस्टर एक्स ने ही मंगतू को सिखा पढ़ाकर निर्दलीय प्रत्याशी बनाया ताकि नाराज वोटों को विरोधी खेमे में जाने से रोका जा सके।
चुनावी गणित की यह आंकड़ेबाजी क्या वाकई लोकतंत्र को मजबूत कर रही है अगर सोचता रहूं तो बस सोचता ही रहूं।

जैनब कॉटेज, बड़ी कर्बला मार्ग, चौखूंटी, बीकानेर-०१

Thursday, February 26, 2009

हश्र

नदीम अहमद नदीम




शेयर मार्केट के ओंधे मुंह गिरने की ख़बर से मैं बहुत खुश था। मुझसे अपनी खुशी छिपाये नहीं छिप रही थी।
पत्नी ने आख़िर पूछ लिया क्या बात है इतनी खुशी का सबब?
बात ही खुश होने की है। मनोज कई दिन से शेयर मार्केट में इन्वेस्ट करने के लिए मुझे प्रोत्साहित कर रह था लेकिन मैं टाल रहा था, मनोज ने चार लाख का इन्वेस्टमेन्ट कर रखा था।
लेकिन मनोज तो दुखी हो रहा होगा
फटाफट दौलतमन्द बनने की चाह का यही हश्र होना चाहिए।'' कहकर मैंने अख़बार उछाल दिया।

Wednesday, February 25, 2009

एहसास

NAGMA JAVED

बेटियां!
खामोश रहती हैं
बेटियां!
माँओं का मुँह देखती हैं -
रोती हैं चुपके-चुपके
सोचती हैं
मांएँ, क्यों नहीं करती
उन्हें
बेटों जितना प्यार!

हिंन्दी विभाग, एन०एस०डी०टी०, महिला महाविद्यालय, मुम्बई।

Tuesday, February 24, 2009

गर्व और शर्मिन्दगी

नदीम अहमद नदीम

काफ़ी देर तक दोनों चुपचाप बैठे रहे।
पतिदेव बार-बार टी.वी. चैनल बदल रहे थे। फिर झुंझलाकर टी.वी. बंद ही कर दिया।
आख़िर तुम्हीं बताओ मेरी क्या ग़लती थी
पत्नी ने कहा।
ग़लती तो तुम्हारी ही थी अपनी ही बेटी को सास-श्वसुर से अलग होने की सलाह देनी ही नहीं चाहिए। ये तो हमारी बेटी समझदार थी जो तुम्हारी सलाह नहीं मानी और तुमसे झगड़ा करके चली गई। मुझे अपनी बिटिया की समझदारी पर गर्व है और तुम्हारी सोच पर शर्मिन्दा हूँ।

Wednesday, February 11, 2009

ममता

नदीम अहमद नदीम
उस माँ का रोना बिलखना पत्थर दिल इंसानों से भी देखा नहीं जा रहा था। पूरा मुहल्ला ग़मगीन था। पुलिस की ग़फलत से एक मासूम निर्दोष बच्चा गोली का शिकार हो गया था।
मंत्रीजी की गाड़ियों का काफिला घर के आगे रुका। मंत्री महोदय ने रोनी सी सूरत बनाई और टी.वी. चैनल वालों को इशारा किया। उनका नाटक शुरू आपके होनहार बच्चे की असामयिक मृत्यु पर हमें बहुत दुःख है। ईश्वर की मर्जी के आगे.....!
यह एक लाख का चैक सरकार ने......
अचानक बिलखती हुई मां ने मंत्री का गिरेबां पकड़ लिया ला, मुझे तेरा बेटा दे दे। मैं तुझे दो लाख रुपया देती हूं, तुम्हें शर्म नहीं आती मेरे बेटे की लाश की बोली लगाते हुए।
मंत्री अपना गिरेबां छुड़ाकर गाड़ी में सवार हो गया। एक मां का सामना करने की हिम्मत उसमें नहीं थी।

Monday, February 9, 2009

मै डरती हूँ

SEEMA GUPTA

मै जानती हूँ .........

मेरे खत का उसे इंतजार नही

मेरे दुख से उसे सरोकार नही ,
मेरे मासूम लफ्ज उसे नही बहलाते
मेरी कोई बात भी उसे याद नही.

मेरे ख्वाबों से उसकी नींद नही उचटती

मेरी यादो मे उसके पल बर्बाद नही

मेरा कोई आंसू उसे नही रुलाता

उसे मुझसे जरा भी प्यार नही

कोई आहट उसे नही चौंकाती

क्योंकि उसे मेरा इन्तजार नही

मगर मै डरती हूँ उस पल से

जब वो चेतना में लौटेगा और

पश्चाताप के तूफानी सैलाब से

गुजर नही पायेगा ...जड हो जाएगा

मै डरती हूँ ....बस उस एक पल से

Saturday, February 7, 2009

हिन्दी साहित्य ने मुसलमानों को अनदेखा क्यों किया?

नामवर सिंह ने कभी कहा था कि हिंदी साहित्य से मुसलमान पात्र गायब हो रहे हैं। १९९० में शानी ने इसी प्रश्न को एक बातचीत के दौरान और प्रखर ढंग से पेश किया कि हिंदी साहित्य में मुसलमान पात्र थे ही कहा जो गायब होंगे। शानी का तर्क था कि तेलुगु,असमिया और बंगला के साहित्यकार जब इनसाइडर की तरह मुसलमान पात्रों का चित्रण कर सकते हैं तो हिंदी साहित्यकार क्यों नहीं कर सकते। शानी ने पांच साल पहले नामवर सिंह, विश्वनाथ त्रिपाठी और काशीनाथ से सवाल पूछा था कि क्या हिंदी हिंदू साहित्य की समानाथीं नहीं हो गई है? साम्प्रदायिकता से आक्रांत आज के सामाजिक माहौल में शानी का यह सवाल और भी प्रासंगिक हो गया है।
शानीः आपने अमरकांत की कहानी और रघुवीर सहाय की कविता का उदाहरण देते हुए पिछली मर्तबा चर्चा में यह बात ज्यादा स्पष्ट की थी कि कैसे रघुवीर सहाय की कविता और अमरकांत की डिप्टी कलक्टरी में बहुत जबरदस्त अंतर है और एक जगह यथार्थ का वह निरूपण नहीं है जो अमरकांत को डिप्टी कलक्टरी में है। मैं एक बात जानना चाहूंगा नामवर जी, कि नई कहानी पर चर्चा करते हुए आपको या दूसरे आलोचकों को स्वतंत्रता के बाद सामाजिक यथार्थ में यह अनुभव कैसे हुआ कि विभाजन के बाद के भारतीय मुसलमान और उसकी मर्मांतक पीड़ा को अनदेखा कर दिया गया। हिंदी साहित्य कभी भी केवल हिंदू साहित्य नहीं रहा। क्या इस कारण साहित्य हिंदू संवेदना से सताया हुआ और निरपेक्ष तो नहीं है और अगर ऐसा है तो आपने मुस्लिम अनुभव को देखने-जानने और परखने को कोशिश क्यों नहीं की? क्या किसी भी देश का भौगोलिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक मानचित्र १२-१५ करोड़ मुसलमानों के वजूद को झुठलाकर पूरा हो सकता है? खासकर तब जब आधी आबादी ने देश के दो टुकड़े कर दिए हैं और इसकी सजा आज तक हम आप सारे के सारे लोग अभी तक भुगत रहे हैं और आगे आने वाली पीढ़ियाँ भी लगातार भुगतेंगी। आप ही हैं नामवर जी, कई वर्ष पहले आपने कहा था कि हिंदी साहित्य से मुस्लिम पात्र गायब हो रहे हैं। मुस्लिम पात्र जब थे ही नहीं तो गायब कहां हो रहे हैं। प्रेमचंद में नहीं थे, यशपाल में आंशिक रूप से थे। अज्ञेय, नागर जी, जैनेन्द्र कुमार और दूसरे लेखकों में नहीं है। और तो और स्वतंत्रता के बाद से लेकर आज तक के कहानीकारों में कहीं नहीं हैं। हिंदी में ही क्यों नहीं हैं जबकि तेलुगु में हैं, असमिया में हैं, बंगला में है। वह अलग बात है कि बंकिमचंद्र में नहीं हैं। अलग बात है कि रवींद्रनाथ टैगोर में नहीं हैं या शरद बाबू में नहीं हैं लेकिन गौरकिशोर घोष के उपन्यास प्रेम नेई में हैं। तेलुगु के विश्वनाथ रेड्डी जैसे कहानीकार आज भी पंजाखाना जैसी कहानी लिखते हैं, इनसाइडर की तरह लिखते हैं। आज भी सारा अबूबकर जैसी लेखिका जो कन्नड़ भाषा में लिखती हैं, हिंदी वालों से ज्यादा सच्ची और जिंदगी से जुड़ी है। ऐसा क्यों है? क्या हिंदी भाषा का लेखक अपने आपमें इतना महदूद है या दूसरे शब्दों में क्या हिंदी हिंदू साहित्य की समानार्थी हो गई है। हमारी तो जो परंपरा है उसमें मलिक मोहम्मद जायसी हैं, रहीम हैं, अमीर खुसरो हैं। क्या यह सवाल आप अनदेखा कर सकते हैं नामवर जी?
नामवर सिंहः शानी भाई, यह एक ऐसा सवाल है जो आईने के सामने अपने आपको रूबरू खड़ा करने वाला है। कठघरे में खड़ा करता है हम सबको। मुझे याद नहीं कि इससे पहले भी यह सवाल मुझसे किसी ने पूछा तो। हां, स्वयं मैंने ही यह सवाल कभी पूछा था कि क्यों हिंदी साहित्य से मुस्लिम चरित्र गायब हो गए? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम लोग हिंदू संप्रदाय के शिकार हो गए हैं?
शानीः नामवर जी, मुझे खुशी है कि आप इसके प्रति पूरी तरह सजग और जागरूक हैं। आपको याद होगा कुछ अर्सा पहले दौलतराम कालेज में जहां एक संगोष्ठी थी और जिसमें आप चेयरमैन थे। दो-तीन लेखकों की तरह मैं भी वहां मौजूद था। वहां मैंने यही प्रश्न उठाया था प्रेमचंद के गोदान से। आप कैसे एक इतनी बड़ी आबादी को अनदेखा कर देंगे। जब आप अनदेखा कर देते हैं तो उसका नतीजा भी आपको सामने नजर आता है।
काशीनाथ सिंहः यह सवाल आलोचक से तो पूछा ही जा रहा है रचनाकारों से भी किया जाना चाहिए।
नामवर सिंहः मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि आजादी के बाद हिंदी में आने वाले लेखकों में और आजादी के पहले के लेखकों में इस विषय को लेकर एक अंतर है। १९४७ के पहले जो आजादी की लड़ाई से जुड़े हुए लेखक थे वो एक जुड़े हुए हिंदुस्तान से वाकिफ थे। इसलिए बंटवारे के बाद भी उसी हिंदुस्तान का ख्वाब देखते थे और वह हिंदुस्तान उनके अंदर मौजूद भी था। प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े लेखकों में इस मिले-जुले हिंदुस्तानी समाज की चेतना ज्यादा आज भी है। जैसे भीष्म साहनी में, अमरकांत में, हरिशंकर परसाई में।
शानीः उनकी कहानियों में भी नहीं हैं, कहीं नहीं है। यही तो मैं कहता हू कि बिलकुल नहीं है। मैंने कहा था कि गोदान जो लगभग क्लासिकी पर जा सकता है और हमारे भारतीय गांव का जीवंत दस्तावेज है, उसमें गांव का कोई मुसलमान पात्र क्यों नहीं है? क्या अपने देश का कोई भी गांव इनके बिना पूरा होता है? प्रेमचंद फिर भी उदार हैं, जबकि यशपाल के झूठा सच में नाममात्र के मुस्लिम पात्र नहीं हाड़-मांस के जीवंत लोग हैं। लेकिन उसके बाद? अज्ञेय, जैनेंद्र, नागर जी या उनकी पीढ़ी के दूसरे लेखकों में क्यों नहीं? और उससे भी ज्यादा तकलीफ़देह यह कि आजादी के बाद के मेरी पीढ़ी के कहानीकारों में और उसके बाद के कहानीकारों में भी नहीं है। यह सोचने की बात है कि क्यों नहीं है और यह भी सोचने की बात है कि प्रेमचंद और यशपाल में आए इक्के-दुक्के मुस्लिम पात्र हमारे सामाजिक जीवन में इतने अंतर्गुम्फित लोग क्यों नहीं हैं जितने कि वे वास्तविक जीवन में हैं या होते हैं। कितनी बड़ी विडंबना है कि ६५ वर्ष पहले अंग्रेजी उपन्यासकार ईएम फास्टर ने ए पैसेज टु इंडिया' में हमारे सामाजिक जीवन से अजीज जैसा जीवंत और प्रासंगिक पात्र उठाया था, ऐसा पात्र जो आज तक किसी भारतीय लेखक के यहां नहीं है। नामवर जी, मुझे तो लगता है यह अंदाज भी वही तरस खाने वाला और मालिकाना है, वही जिसे आप रिप्रेसिव टॉलरैंस कहते हैं और जो हिंसा से कम मारक नहीं है। जब अमेरिका का ब्लैक एक्सपीरियस' हो सकता है यूरोप का यहूदी अनुभव हो सकता है और हो सकता है वे आपको मार्मिक लग सकते हैं तो मुस्लिम अनुभव क्यों नहीं और वह भी विभाजन के बाद? और आप उसे क्यों नहीं जानते?
विश्वनाथ त्रिपाठीः जहां तक मैं समझ पाया हूं यशपाल की पर्दा' कहानी की ये बड़ी तारीफ करते हैं। और यशपाल को पर्दा' कहानी को आदर्श के रूप में मानते हैं। ऐसी कहानियां अगर हिंदी लेखकों ने लिखी होतीं तो इनको यह शिकायत नहीं रहती।
शानीः प्रेमचंद की १९२५ की कहानियों में मंदिर-मस्जिद नाम की कहानी है। ऐसा लगता है प्रेमचंद ने ६५ वर्ष बाद भी आज ही लिखी हो। वो कांशीनाथ सिंह ने नहीं लिखी, वो राजेन्द्र यादव या ज्ञानरंजन ने भी नहीं लिखी।
विश्वनाथ त्रिपाठीः हम मुसलमानों की जिंदगी को शायद बहुत दूर तक जानते भी नहीं हैं और यह मुझे शानी की कहानियां पढ़कर लगा। जैसे तकियादार जिसका मतलब मैं पहले नहीं जानता था। फातिहा क्या होता है? खुदा को रज्जाक क्यों कहते हैं? अब आप देखें कि गांव में जो सबसे नीचे तबके का मुसलमान होता है वो तो एक-दूसरे की जिंदगी में खास तरह का कल्चरल एका होता है। आजादी के बाद पॉलिटिक्स में जो अलगाव आया और उसको प्रतिबिंबित करती जो कहानियां लिखी गयीं उनसे अलग हिंदी के दो कहानीकारों का नाम लिया जा रहा है जिनसे शानी संतुष्ट हैं यानी जिनको आदर्श के रूप में मानते हैं। एक प्रेमचंद हैं दूसरे यशपाल हैं।
नामवर सिंहः शानी साहब, मुस्लिम समाज के अंदर की जानकारी सचमुच ही हमें बहुत कम है। आपका काला जल उपन्यास पढ़ते समय अक्सर मुझे अपनी इस कमी का अहसास हुआ है।
शानीः नामवर जी, कहीं ऐसा तो नहीं है कि संवेदना की एक परिधि होती है और मुस्लिम अनुभव के अभाव में आप उस संवेदना की परिधि से बाहर रह जाते हैं। ऐसे में मुस्लिम अनुभव मुस्लिम साइकी या उसकी परस्पर विरोधी तकलीफें आपको छू नहीं पा रहीं। जब भी ऐसे अनुभव कहानी या उपन्यास के जरिए आप तक पहुंचते हैं आप उन्हें रद्द करते चलते हैं जाने या अनजाने में। लिहाजा जाहिर है कि जो आपको छूता ही नहीं वह आपके अंदरूनी अनुभव का हिस्सा कैसे बन सकता है? एक और बात मुझे लगती है कि यह आकस्मिक नहीं है कि कई मर्तबा बड़ी महत्त्वपूर्ण कहानियां या ऐसी कहानियां भी जो तत्कालीन लोगों की संवेदना परिधि या रुचियों-अभिरुचियों के आसपास नहीं पहुंचती, उन पर धूल पड़ती जाती है जैसे प्रेमचंद की मंदिर-मस्जिद और यशपाल की पर्दा।
नामवर सिंहः शानी भाई एक प्रश्न-प्रेमचंद का मुस्लिम चरित्रों के परिचय शायद इसलिए भी था कि वे उर्दू में भी लिखते थे और उनका समाज इस तरह का था जहां एक-दूसरे से जुड़े हुए लोग थे। यशपाल भी संभवतः उर्दू जबान से परिचित थे। प्रेमचंद और यशपाल ये दोनों उर्दू भाषा जानने के कारण मुस्लिम चरित्रों को जानते थे, उनके बारे में लिखते थे। उनके संघर्ष, उनकी पीड़ाओं का चित्रण करते थे या उस समय बंटवारे के पहले का भारत ऐसा था कि हिंदू और मुसलमान दोनों एक-दूसरे के ज्+यादा निकट थे।
शानीः मैं नहीं समझता कि किसी जाति की भाषा को जानना उसके जीवन को जानना है। एक हद तक भाषा जाति की संस्कृति की पहचान करा देती है लेकिन जिंदगी एक-दूसरे से दो-चार होने और एक-दूसरे के रूबरू टकराव से ही समझ में आती है या उसका अनुभव होता है। अगर ऐसा न होता तो राजेन्द्र सिंह बेदी जैसे बड़े लेखक ने उर्दू के शिखर पर पहुंचकर भी मुस्लिम जीवन को कहीं नहीं छुआ। ÷ए पैसेज टू इंडिया' में अजीज जैसा चरित्र निरूपित करने के लिए ईएम फास्टर को उर्दू जानने की ज+रूरत नहीं पड़ी और न उन्होंने सीखी। शायद उन्हें भारतीय जीवन की सामाजिक विसंगतियों में से ज्यादा तार्किकता और गहराई के साथ देख सकने का गहरा माद्दा था बावजूद इसके के वे एक बाहरी आदमी थे। रहा आपका दूसरा सवाल, मुझे लगता है कि बंटवारे के पहले का भारत आज से बहुत भिन्न था और उसका भी उदाहरण ईएम फास्टर का ए पैसेज टु इंडिया' है।
विश्वनाथ त्रिपाठीः मैं यह कह रहा था, जैसे आपने कहा, कहानी में तो इसको ऊर्जा समाप्त-सी लगती है। जो पहले से लिख रहे हैं उनमें से वे लोग जो समीक्षात्मक दृष्टि से देखते रहे उनकी अलग बात है लेकिन ज्यादातर लोगों की ऊर्जा समाप्त हो गई। कहानी के क्षेत्र में नये कहानीकार आए, नए उपन्यासकार आए। रेणु जैसे लोग आए। कविता में कहने के लिए बहुत कवि आए जिनको सराहा-माना भी गया। लेकिन कविता के क्षेत्र में जो पहले से लिख रहे थे नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन, शमशेर ये सब आजादी से पहले लिख रहे थे। वो लोग, बल्कि जो बाद में आए उनसे ज्यादा नये मालूम पड़ रहे हैं।
नामवर सिंहः त्रिपाठी जी, यूं देखें तो कविता में तो छाए हुए थे पंत, बच्चन, नरेन्द्र शर्मा, दिनकर मुख्य रूप से। पुराने प्रतिष्ठित लोग ये थे। थे निराला भी। इनकी तुलना में शमशेर, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, अज्ञेय आदि युवा समझे जाते थे कविता में। पुराने लोगों की सृजनात्मक क्षमता जैसे कथा-साहित्य में क्षीण हुई वैसे ही कविता में भी क्षीण हुई। अकेले बचे रहे निराला, जैसे कथा-साहित्य में अकेले बचे रहे यशपाल। नये रचनाकार के नये सृजन से इन्हें पुनर्नवता प्राप्त हुई।
विश्वनाथ त्रिपाठीः नामवर जी, मैं यह कहना चाहता हूं, कि आजादी के बाद जैसे कहानी शुरू हुई, नये ढंग से नयी ऊर्जा के साथ, वैसे ही कविता के क्षेत्र में भी कुछ कवियों ने लिखना शुरू किया, नयी ऊर्जा के साथ आजादी के बाद। और तो और उसी में हमारे प्रिय मित्र केदारनाथ सिंह आते हैं। उसी में रघुवीर सहाय आते हैं। उसी में कुंवरनारायण आते हैं और आपने भी अभी इसके पहले बहस में सबका नाम गिनाया। तो जैसे कहानी के क्षेत्र में लोग आए नयी ऊर्जा के साथ, वैसे कविता के क्षेत्र में भी लोग आए नयी ऊर्जा के साथ और कहानी और कविता दोनों में आंचलिकता आई। शुरू में आजादी के बाद कुछ नये गीत लिखे गए। लेकिन ये कैसे हुआ कि कविता में जो आजादी के पहले से लिखकर रहे थे वे लगभग प्रतिष्ठित हो चुके थे। जो नयी पीढ़ी कविता में आजादी के बाद एक नई ऊर्जा वो इतनी दूर तक क्यों नहीं चल पाई। और जो आजादी के पहले से लिख रहे थे वो आज भी नये लगते हैं।
काशीनाथ सिंहः मैं इसमें एक प्रश्न और जोड़ दूं। लिख तो रहे हैं वे आज भी। जब उपन्यास की चर्चा होती है तो बात रेणु तक ही आकर रह जाती है। श्रीलाल शुक्ल भी हैं। ठीक है। लेकिन एक ÷माइल स्टोन' की तरह मैला आंचल तक। यानी उपन्यास लिखे जा रहे हैं। कहानियां भी लिखी जा रही हैं। लेकिन हम जानना चाहते थे कि कौन-सी बातें हैं जिनके चलते देखने वालों की नजर पीछे की तरफ जा रही है अपने पास या सामने की तरफ नहीं आ रही।
विश्वनाथ त्रिपाठीः देखिए उपन्यास में भी रेणु की ऊर्जा बहुत जल्दी समाप्त हो गई। खुद रेणु ने भी मैला आंचल जैसा कोई उपन्यास नहीं लिखा।
शानीः हां, परती परिकथा', दीर्घतपा कमतर उपन्यास थे।
विश्वनाथ त्रिपाठीः लेकिन साहब आप नागार्जुन और त्रिलोचन के बारे में वो बात नहीं कहते तो आप मैला आंचल' के रचनाकार के बारे में कह सकते हैं।
नामवर सिंहः इस बहस में एक महत्त्वपूर्ण विधा छूट ही गई और एक बड़ा लेखक भी छूट गया। हरिशंकर परसाई, जिनके बगैर स्वाधीन भारत के हिंदी साहित्य की चर्चा अधूरी है। कहानियां तो कम लिखीं उन्होंने। रानी नागफनी का कहानी' नामक एक उपन्यास भी लिखा है लेकिन जाने जाते हैं वो मुख्यतः अपने तीखे व्यंग्य वाले निबंधों के लिए। उनके निबंध अनाहत रूप से बिना किसी भटकाव के सैकुलर मूल्यों के लिए संघर्ष करते हैं वह राजनीतिक विवेक जो हिंदी लेखकों में कम ही पाया जाता है, परसाईं जी उसकी मिसाल आप हैं। शानी भाई, यह हिंदी की अपनी १९वीं सदी की परंपरा का विकास है। आज के समूचे भारतीय साहित्य में ऐसा विवेकवान व्यंग्यकार-निबंधकार शायद ही दूसरा मिले। आजादी के बाद बढ़ते हुए हिंदू संप्रदायवाद के विरु( संघर्ष में परसाई के गद्य ने जो भूमिका निभाई है वह बेजोड़ है। इसके अलावा उनके निबंधों ने हमारे सामाजिक-राजनीतिक जीवन के अन्य छद्मों का भी उद्घाटन किया है। जाने क्या उन्हें हास्य-व्यंग्य का लेखक कहकर लोगों ने टाल देने की कोशिश की है। वह खाली हास्य-व्यंग्य नहीं है।
विश्वनाथ त्रिपाठीः ये नहीं है कि परसाई हास्य-व्यंग्य के रचनाकार नहीं है। परसाई हास्य-व्यंग्य के ऐसे विरले रचनाकार हैं जिनकी दृष्टि में अद्भुत व्याप्ति है इतना ही नहीं मेरे ख्+याल से परसाई सामाजिक चेतना में स्वातंत्रयोत्तर भारत की एक नैतिक आवाज हैं।
नामवर सिंहः मैं यहां यह बात और कह दूं कि यह सही है कि आजादी के बाद देश का जब बंटवारा हुआ तो कहीं देश के दिल और दिमाग के भी दो टुकड़े हुए। इस त्रासदी का प्रभाव अगर साहित्य पर न पड़ा होता तो आश्चर्य होता। इस त्रासदी के कारण हिंदी साहित्य अपनी परंपरा से टूटा है। फिर ऐसे दबाव भी पड़ते रहते हैं जिनके तहत हिंदी साहित्य में बदल देने की कोशिश होती रही हैं। ये कोशिशें पूरी तरह कामयाब न हुईं, यह और बात है। हिंदुत्व के शिकार ज्यादातर रूपवादी साहित्यकार हुए हैं जिनके साहित्य से मुसलमान एकदम बाहर हैं। जहां रूपवाद है हिंदुत्व परोक्ष रूप से, अंतर्निहित रूप से प्रवेश करता है। लेकिन हिंदी में रूपवाद के विरुद्ध संघर्ष करने वाली एक व्यापक सामाजिक चेतना भी है। मैं उसके केवल प्रगतिशीलता या जनवाद तक सीमित नहीं रखना चाहता। इनमें अनेक गैर-वामपंथी मानववादी भी हैं। उन लोगों में और कुछ नहीं तो कम से कम एक अपराधबोध बचा रह गया है। मैं इसे गनीमत मानता हूं। मेरे जिस भाषण का आपने जिक्र किया है वह अपराधबोध का एक उदाहरण है। जिस रिप्रैसिव टालरैंस' की बात आप कर रहे हैं वह, क्षमा किया जाए, हमारे अत्यंत श्रद्धेय नेता जवाहरलाल नेहरू के युग की देन है।
विश्वनाथ त्रिपाठीः मैं एक चीज कहना चाहता हूं अगर एक अपराधबोध आज बचा हुआ है तो वह कम से कम जवाहरलाल नेहरू की वजह से है।
नामवर सिंहः देखिए विश्वनाथ जी, पंडित जी की अपनी ईमानदारी में रत्ती भर संदेह मुझ कभी नहीं रहा और न है लेकिन जो हिंदुस्तान उन्होंने बनाया और जिस तरह से बनाया उस हिंदुस्तान में मुसलमान की औकात उन्होंने यही रखी कि उस पर दया, कृपा का भाव रखा जाए। जबकि सवाल अस्मिता का है - स्वाभिमान की जिंदगी जीने का है। यह काम पंडित जी कर सकते थे और अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि न कर सके। मैं यह कह रहा था कि आजाद हिंदुस्तान का समूचा साहित्य किस उत्साह, उमंग, नई सृजनात्मक ऊर्जा के साथ शुरू हुआ था और वह आजादी का पहला दशक था। वह साहित्य-सृष्टि आज भी हमको प्रेरणा देता है। उसमें अनेक अंतर्विरोध थे, खामियां भी थीं, जिनका कुछ ताल्लुक देश के बंटवारे से था, कुछ विकास के लिए अपनाए गए पूंजीवादी रास्ते से था, कुछ सामंती जीवन-पद्धति के अवशेषों के विरुद्ध संघर्ष करने में शिथिलता से था पर इन सबके बावजूद उस दशक को साहित्य अपनी उपलब्धियों में ठीक पहले के दशक से भी कहीं अधिक समृद्ध और श्रेष्ठ प्रतीत होता है। इस दशक के साहित्य का सबसे शुभ पक्ष है उसका आलोचनात्मक स्वर। आजादी के प्रथम दशक में सबसे बड़ा प्रलोभन नई राजसत्ता और व्यवस्था के अंध-समर्थन का था। हिंदी साहित्य ने उस प्रलोभन से अपने को बचाया और जनता के पक्ष से आलोचनात्मक यथार्थ के साहित्य का सृजन किया-यह हिंदी लेखकों की दृढ़ प्रतिबद्धता का प्रमाण तो है ही, हिंदी साहित्य की सदियों लंबी गौरवशाली परंपरा के अनुरूप भी है। साहित्य का यह दौर १९६४ तक चला। इसके बाद दूसरे दौर की शुरुआत होती है, जिसकी चर्चा अलग से की जानी चाहिए।

Wednesday, February 4, 2009

"एहसास"

SEEMA GUPTA

हर साँस मे जर्रा जर्रा
पलता है कुछ,
यूँ लगे साथ मेरे
चलता है कुछ.
सोच की गागर से
निकल शब्द बन
अधरों पे खामोशी से
मचलता है कुछ.
ये एहसास क्या ...
तुम्हारा है प्रिये ???
जो मोम बनके मुझमे ,
बर्फ़ मानिंद ...
पिघलता है कुछ