Monday, December 19, 2016

आपने अपना घर खुद छोड़ा या घर वालो ने निकाल दिया?
ही मैंने खुद घर छोड़ा और ही घरवालों ने निकाला। हालात कुछ ऐसे पैदा हो चुके थे कि मुझे घर छोड़कर चले जाना पड़ा, जैसी मैं थी मेरे घरवालों के लिए मुझे उस रूप में अपना पाना बहुत ही मुश्किल था, मुझे बात-बात पर टोकना और मुझ में कमीयां निकालना उनकी रोज की आदत हो चुकी थी, वो कभी ये समझ ही नहीं पाये कि मैं ऐसी हूँ तो ये भगवान की मर्जी है, उन्होंने मुझ में वो हाव-भाव या जैसी भी मैं थी, उन्होंने मुझे जन्म से ऐसा ही बनाया है और फिर ऊपर से गली मोहल्ले वालों द्वारा मेरा बार- बार मजाक उड़ाना, मैं इन सब से बहुत तंग चुकी थी, कोई घर, कोई बाहर, कोई ऐसा नहीं था जिसको मैं अपना दर्द सुना सकूँ, बहुत कोशिश की मैंने अपने आप को बदलने की लेकिन चाहकर भी मैं अपने आपको नहीं बदल पायी, मेरे घरवाले भी मुझे समझा समझा कर थक चुके थे, लेकिन मैं करती तो क्या करती, इस शरीर के साथ तो फेर बदल किये जा सकते है, लेकिन मैं अपनी आत्मा को कैसे बदलती, मेरे अन्दर की आत्मा पूरी तरह लड़की वाली थी और मैं चाहकर भी उसको लड़का नहीं बना पायी, कोई मित्रा, कोई दोस्त, कोई मुझे घर में समझने वाला और कोई बाहर, मैं इस अकेलेपन से बहुत तंग चुकी थी, मैं अकेली बैठकर रोती और सोचती कि आखिर भगवान ने मुझे ही ऐसा क्यों बनाया है, कभी भी कोई भी नहीं समझ पाया मुझे, मैं सोचती काश मैं भी मेरे दूसरे दोस्तों की तरह सामान्य होती, बहुत सी बातें हुई जिनसे तंग आकर मैंने अपना घर छोड़ दिया और चली आई उस दुनिया में जहाँ कोई मेरा मजाक उड़ाने वाला नहीं था और ही कोई मुझे ये कहने वाला था कि तुम ऐसे क्यों हो, ही वहाँ कोई मुझे लड़का बन कर रहो, ऐसा कहने वाला भी कोई नहीं था, यहाँ सब मुझ जैसे ही थे, शायद ये दुनिया मेरे लिए ही बनी थी, फिर जब मेरे घरवालों को इस बात का पता चला तो उन्होंने कानूनी तौर पर एक गौद नामे का कागज बनाकर मुझे उन लोगों को ही सौंप दिया जिनके लिए शायद भगवान ने मुझे बनाया था, मैंने जिन्दगी में सिर्फ दर्द सहना सिखा है, जब से होश सम्भाला है और अब तो इसकी आदत हो चुकी है।
क्या आपको पढ़ने-लिखने की रुचि थी?
बिलकुल थी, मुझे पढ़ने में रुचि थी, आखिर मेरे भी कुछ सपने थे, मेरे भी कुछ अरमान थे, मैं भी पढ़-लिखकर कुछ बनना चाहती थी, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मन्जूर था, लेकिन आज मैं जैसी भी हूँ, खुश हूँ, लोगों की खुशियों में ही मेरी खुशी है, और मैं भगवान से सबके लिए दुआ करती हूँ कि भगवान सबको खुश रखे।
जब से आपने अपना घर छोड़ा है तब से क्या किसी परिवार वालों से मुलाकात हुई?
जी बहुत बार हुई, कई बार मिली हूँ उस सब के बाद। और बहुत ही प्यार और इज्जत से पेश आते हैं अब वो मेरे साथ कद्र करते हैं अब ये सोचकर कि ये तो फकीर इन्सान हैं।
आपके रिश्तेदारों का व्यवहार आपके साथ कैसा रहा है?
पहले तकरीबन सभी का एक जैसा ही था, लेकिन अब मैं किसी भी रिश्तेदारों के घर नहीं जाती हूँ तो कुछ नहीं कह सकती किसी के बारे में
आपके डेरा में कुल कितने सदस्य है और उनको काम क्या रहता है?
मेरे डेरे में सिर्फ मैं ही रहती हूँ, वैसे ढोलक वगैरह वाले आते हैं, मेरे साथ बधाई वगैरह पर जाने के लिए, लेकिन वो शाम को ही अपने-अपने घर चले जाते हैं, वैसे डेरे में तकरीबन कोई कोई गाँव या मौहल्ले पड़ोस वाले आते-जाते रहते है।
आपके समाज में गुरुओं का क्या महत्त्व होता है?
मुझे ऐसा लगता है कि हमारे ही नहीं बल्कि किसी भी सभ्य और संस्कारी समाज में गुरु का एक विशेष महत्त्व होता है, हमारी भारतीय संस्कृति में गुरु को भगवान का रूप बताया गया है और कहा जाता है कि गुरु ही वो रास्ता है जो कि देर-सवेर हमें उस ईश्वर के द्वार तक ले के जाता है! गुरु की श्रेष्ठता संत कबीर साहेब जी के इस दोहे से साफ झलकती है  ‘‘गुरु र्गोवंद दोउ खड़े काके लागू पाएँ, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताएं“  कुछ ऐसा ही दर्जा हम अपने गुरु को देते हैं, हमारे लिए गुरु बहुत महत्त्व रखते है।
आपके गुरु का क्या नाम है? क्या गुरु का आदेश सर्वोपरि होता है?
मेरे आदरणीय और सम्मान योग्य गुरु जी का नामश्री मनजीत महंत जीहै और रही बात कि गुरु के आदेश के सर्वोपरि होने कि तो बिल्कुल गुरु जी का आदेश ही  हमारे लिए सर्वोपरि होता है, लेकिन वो हालात और उस आदेश पर निर्भर करता है जो कि गुरु जी का दिया हुआ है। कुछ आदेश ऐसे भी हो सकते हैं जिनसे कि शायद हम सहमत भी हों, एक गुरु-चेला संस्कारी सभ्यता से अलग हर इन्सान की अपनी सोच और विचार भी होते हैं और हर इन्सान को अपनी सोच और विचार किसी के भी सामने रखने का पूरा-पूरा अधिकार है।
गुरु-चेला की परंपरा के बारे में बताइये?
मुझे लगता है कि अगर आप भारतवासी हैं तो आपको गुरु चेला प्रथा के बारे में कुछ पूछने की जरूरत ही नहीं। क्योंकि भारतीय संस्कृति और इतिहास में गुरु-शिष्य परंपरा के कई उदाहरण मौजूद है। लेकिन हमारे लिए हमारे गुरु और उनका आदेश सर्वाधिक सर्वोपरि होता है। हम अपने गुरु को ही माता-पिता एवं भगवान का दर्जा देते हैं। इसलिए हमारे द्वारा किये जाने वाला शृंगार हमारे गुरु को समर्पित होता है, मंगलसूत्रा पहनना, माँग भरना, चूड़ियां डालना सब हम हमारे गुरु की लम्बी उम्र की कामना के लिए करते हैं।
क्या आपने अपने गुरु से दीक्षा ली है। अगर ली है तो यह दीक्षा किस तरह की होती है?
जी बिल्कुल हमने अपने गुरु जी से दीक्षा ली है और इसमें होता ये है कि जब कोई किन्नर किसी गद्दीनशीन किन्नरों के डेरों में चेला होता है तो उसको 7-8 दिन तक नई नवेली दुल्हन की तरह हल्दी लगाई जाती है, और तैयार करके उसको दीक्षा दी जाती है और माता-पिता द्वारा रखे हुए नाम को बदलकर एक नया नाम दिया जाता है, और खूब खुशियाँ मनाई जाती है और सब किन्नर उसको अपनी-अपनी तरफ से शगुन देते है, फिर उसके बाद उसको बताया जाता है कि तुम किस इलाके में बधाई वगैरह माँग सकते हो और फिर उसको उस इलाके का गद्दीनशीन महंत बना दिया जाता है।
क्या किन्नर लोग गुरु को पति परमेश्वर के रूप में मानती है?
जी! किन्नर अपने गुरु को पति कैसे मान सकती हैं, गुरु तो गुरु होता है। लेकिन हाँ, मायने कुछ ऐसे ही है। क्योंकि किन्नर सजना-संवरना और हार-शृंगार, चूड़ा डालना, माँग भरना। ये सब तभी तक करती है जब तक गुरु जीवित हो। लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि वो अपने गुरु को पति मानती है।
आप जिस गाँव में रह रहे हैं वहाँ के लोगों का व्यवहार आप के प्रति कैसा है। शुरू से लेकर अब तक?
जिस गांव में मैं रह रही हूँ वो हरियाणा राज्य के जिला कैथल का भून्ना गाँव है और पंजाब के बिलकुल नजदीक है और इस गाँव के लोग तकरीबन बहुत अच्छे है और सब मेरे साथ बहुत प्यार और इज्जत से पेश आते हैं, बाकि आपको पता ही है कि दुनिया सभी तरह की होती है सबकी अपनी अपनी सोच और नजरिया होता है, लेकिन हम तो साधु संत और फकीर इन्सान है हमें किसी से क्या! कोई कैसा भी व्यवहार करे लेकिन हमें तो सबको दुआ देनी है और सबका भला माँगना है और जहाँ मैं रहती हूँ तो मैं उस गाँव के अच्छे और बुरे सभी इन्सानों को दुआ देना और भगवान से उनके लिए खुशी माँगना ही मेरा कर्म है।
किन्नरों की खराब स्थिति के लिए किसको जिम्मेदार माना जा सकता है और उसका कोई हल है?

किन्नरों की खराब स्थिति के लिए सबसे पहले तो हमारा महिला-पुरुष प्रधान समाज है क्योंकि ये लोग कभी किन्नरों के साथ मित्रातापूर्ण व्यवहार करते ही नहीं, मुझे तो ऐसा लगता कहीं कहीं ये किन्नरों को इन्सान ही नहीं समझते, इनको उनके चेहरे की मुस्कान तो नजर आती है, लेकिन आँखों के सूख चुके आँसुआें का दर्द नहीं, ये लोग कुछ पैसे बधाई के रूप में देकर ये सोच लेते है की चलो शायद इन पैसों से ही इनका कल्याण हो जाएगा, लेकिन इन लोगों को ये कौन समझाए कि सबकुछ पैसा ही नहीं होता, आप बधाई के अलावा उन्हें अपनापन और प्यार भी दो, जिसके लिए वो बचपन से तरस रहे है और कुछ लोग तो उनको बधाई देते हुए भी चिढ़ते हैं, अब इनको ये कौन समझाए कि आपके बच्चों के हर समय दुआ माँगने वाला ये फकीर इन्सान जाए तो जाए कहाँ? आप जो बधाई देते हो उसके कारण ही बेचारे भरपेट रोटी खा पाते है। दूसरा हमारी भारत सरकार ने किन्नरों को हमेशा से ही नजरअंदाज किया है और किसी भी कल्याणकारी सरकारी योजनाओं में किन्नरों के हित का तो जिक्र किया जाता और ही ध्यान दिया जाता। किसी किन्नर से गरीब कौन होगा जो दूसरे के आसरे पर निर्भर है, बधाई मिल गई तो रोटी खा ली, नहीं  तो भूखे मरने जैसे हालात पैदा हो जाते हैं, बावजूद इसके किसी भी किन्नर का पीला या गुलाबी राशन कार्ड तक नहीं बनाया जाता! सरकार सभी को मकान बनाने के लिए जगह और पैसे उपलब्ध करवाती है लेकिन सिर्फ किन्नरों को नहीं! आखिर क्यों ? भारत देश में पैदा हुए, भारत सरकार को ही वोट देते है फिर भी इन बेसहारा लोगों के साथ सौतेला वाला व्यवहार क्यूँ? क्या किन्नर कोई बिजनेस करते हैं ? क्या वो खेती-बाड़ी करते हैं? आप सब कुछ जानकर भी इन लोगों के लिए कोई काम नहीं करते। बस अब हम इससे ज्यादा क्या कहें और किसको दोष दें? बाकि आप सब खुद समझदार हो।

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