Monday, December 19, 2016

आम लोगों की अवधारणा है कि किन्नर का जनाजा या अन्तिम संस्कार के लिए ले जाते हैं तो उसको मारते हुए ले जाते हैं। इसमें कितनी सच्चाई है?
हा हा हा हा, नहीं नहीं ऐसा कुछ नहीं है, ये धारणा आम लोगों द्वारा बनाई हुई है, ये सिर्फ एक अफवाह मात्रा है, किसी किन्नर की मृत्यु या इंतकाल होने पर उसको उसके परिवार और रिश्तेदारों की मौजूदगी में दफनाया जाता है या अंतिम संस्कार किया जाता है, किसी किन्नर की मृत्यु होने पर उसके परिवारजनों जैसे कि माँ-बाप, भाई-बहन सबको बुलाया जाता है, भला कोई परिवार वाला अपने किसी अपने के साथ ऐसा करने देगा क्या? जहाँ किसी किन्नर का डेरा होता है, वहाँ भी उसके चाहने वाले या शुभचिंतक होते है, भला कोई अपने किसी चाहने वाले के साथ ऐसा करने देगा क्या? ये आम लोगों द्वारा बनाई हुई एक अफवाह मात्रा है, सिर्फ एक धारणा है। किन्नर एक साधू-संत और फकीर होता है तो इसलिए उसको भी दूसरे साधू संतां की तरह ही बहुत ही सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी जाती है, जो किन्नरों के डेरों से दूर रहते है ये सिर्फ उनकी सोच और सुनी-सुनाई बात है, बाकि जो किन्नरों के डेरों के आस-पास रहते है वो तो कई बार किन्नरों कि अंतिम विदाई में शामिल हो चुके होते है तो उनके मन में ऐसी कोई धारणा नहीं होती है क्योंकि वो सबकुछ अपनी आँखों से देख चुके होते है। इसलिए ऐसा कुछ नहीं है।
किन्नरों में अन्तिम संस्कार क्या रात में ही होता है?
नहीं-नहीं हम कोई क्रिमिनल या चोर डाकू थोड़े ही हैं, हमें भला किसका डर है! हम क्यों रात के अंधेरे में किसी का संस्कार करेंगे। किसी भी किन्नर का संस्कार दिन के उजाले में और उसके परिवारजनों और शुभचिंतको की मौजूदगी में होता है।
किसी किन्नर की मौत होने के बाद पूरा किन्नर समुदाय एक हफ्ते तक भूखा रहता है। ये बात कहाँ तक सही है।
हा हा हा हा पता नहीं लोगों ने कैसी-कैसी बातें बना रखी हैं। बाकि का तो पता नहीं लेकिन मैं एक दिन से ज्यादा भूखी नहीं रह सकती। जहाँ तक मुझे इतने साल हो गये तो मैंने कभी किसी किन्नर को किसी दूसरे किन्नर की मौत पर दो दिन भी भूखा रहते नहीं देखा। सब बकवास है ये बातें।
बहुचरा माता के बारे में कुछ बताइये?
माता बहुचरा हिन्दू धर्म की प्रमुख देवियों में से एक है और देवी-देवता या किसी भी पैगम्बर की इन्सान के पास प्रमुख जानकारी नहीं होती, वो सिर्फ उनके के बारे में उतना ही बता सकते हैं जितना उन्होंने पढ़ा या सुना होता है। माता बहुचरा जी तकरीबन सारे भारत में पूजी जाती है और इन्हें खासतौर पर किन्नर समाज से जोड़कर देखा जाता है, क्योंकि ये किन्नर समाज की इष्टदेवी मानी जाती है और किन्नर चाहे किसी भी जाति या धर्म से ही क्यों हो, वो माँ बहुचरा जी की पूजा उपासना करता ही है, माँ बहुचरा जी का प्रमुख मन्दिर गुजरात के संथोल में है और ये गुजरात की प्रमुख कुलदेवियों में से एक है, कहते है कि किसी राजा के घर एक संतान थी, वो बचपन में तो सामान्य बच्चों की तरह ही थी और देखने में बिल्कुल लड़की की तरह ही लगती थी, लेकिन जैसे जैसे वो जवान होती गई तो उसकी आवाज लड़कों की तरह भारी होती गई और उसके चेहरे पर किसी भी सामान्य लड़कों की तरह ही बाल उगने शुरू हो गए। वो शक्लो-सूरत, चाल-ढाल और कुदरती तौर पर शारीरिक रूप से तो लड़की प्रतीत होती थी, लेकिन चेहरे पर उग चुके अनचाहे बालों और आवाज से लड़का लगती थी, राजा उसको राजमहल से बहुत ही कम बाहर निकलते देते थे, उस पर तरह-तरह की पाबंदियां थी, क्योंकि उसको देखकर राज्य के लोग तरह तरह की बातें करते थे। राजा के कई बड़े-बड़े वैद्य -हकीमों को बुलाया और अंततः पता लगा कि राजा कि इकलौती संतान तो लड़का थी और ही लड़की। इस बात को जानकर राजा और रानी बहुत उदास हुए और अपनी फूटी किस्मत को कोसने लगने, ये सब देखकर राजा की उस इकलौती संतान को बहुत दुःख हुआ और मन ही मन रोज भगवान को और अपनी फूटी किस्मत को कोसती, एक दिन अचानक से उसके सपने में एक देवी आई और कहने लगी कि उदास मत हो और जाओ फलाँ जगह पर किन्नरों का डेरा है और वहाँ एक तालाब है। अगर तुम उस में स्नान करोगे तो तुम्हें जो दुख है वो मिट जायेगा, कहते है राजा की उस पुत्रा या पुत्रा ने वहाँ जाने का फैसला किया और पहुँच गया वो उसी जगह पर जो उसे सपने में उस देवी ने बताई थी और वो क्या देखता है कि वहाँ किन्नर नाच-गा रहे है और किसी देवी की उपासना कर रहे है, तभी उसके सामने से एक कुत्तिया भागती हुई गई और तालाब में घुस गई और जब वो बाहर निकली तो मानो उसका दूसरा जन्म हुआ हो, क्योंकि वो अब कुत्तियां नहीं बल्कि एक कुत्ता थी, उसको बहुत हैरानी हुई और अंततः उसने भी तालाब में स्नान किया और जब वो स्नान करके तालाब से बाहर निकला तो वो माँ बहुचरा की कृपा से किन्नर योनि से मुक्त हो, पूर्णतः एक राजकुमार बन चुका था
किन्नरों के रीति-रिवाज के बारे में कुछ बताइये?
किन्नरों में भी अलग अलग रिति-रिवाज है, जैसे हरियाणा के अलग, पंजाब के अलग। ऐसे हर राज्य के किन्नरों के अपने अपने रिति-रिवाज है और अपना-अपना इतिहास और अपनी-अपनी सभ्यता है।
किन्नर कभी अपनी हार नहीं मानता है। क्या ये कथन सही है? ये स्वभाव से जिद्दी होते हैं?
मुझे ऐसा लगता है कि जब तक मंजिल मिल जाए तब तक हार किसी को नहीं माननी चाहिए, हाँ ये सच है कि किन्नर इतनी जल्दी हार नहीं मानते हैं और स्वभाव की भी थोड़ी जिद्दी होती है। लेकिन अगर प्यार से पेश आए तो वो हार जाती है हर किसी से! क्योंकि वो प्यार की भूखी होती है, अगर आप कोई बात उनको सहज स्वभाव से समझाएगे तो वो समझ जाएँगी, लेकिन अगर आपने अकड़ दिखाई तो बस फिर आपकी खैर नहीं।
एक किन्नर की ख्वाहिश क्या होती है?
इस बारे में हम कुछ नहीं कह सकते, किन्नर किसी एक शख्स का नाम नहीं, जिसके बारे में हम सबकुछ बता सकते हैं। एक समुदाय है, एक वर्ग है और इसमें लाखों लोग हैं। सबकी अपनी अपनी सोच और ख्वाहिश हो सकती हैं।
आपको आम लोगों को देखकर कैसा लगता है?
शायद आपको लगता है कि हम किसी दूसरी दुनिया के लोग हैं  या एलियन हैं। आम लोगों को तो हम हर रोज देखते है और जाने कितनों को देखते हैं, लेकिन किसी के बारे में हम तब सोचते हैं जैसा कि उसका व्यवहार होगा हमारे साथ।
किन्नर भी समाज में ही पैदा होता है फिर क्यों समाज किन्नरों के साथ सौतेला व्यवहार करता है?
किन्नर भी इसी समाज में पैदा होती है और उनके साथ सौतेला वाला व्यवहार क्यूँ होता है? मुझे लगता है ये आपको और आपके उन लोगों को सोचना चाहिए। जो आपके प्रश्न और मेरे उत्तर पढ़ रहे होंगे कि ऐसा हम और हमारी भारत सरकार उन लोगों के साथ ऐसा क्यों कर रही है।
क्या आपने गिरिया के बारे में सुना है?
जी माफ करना हमें इस शब्द का मतलब नहीं पता। ये सड़क छाप लोगों की भाषा का शब्द है और वो ही इस्तेमाल करते होंगे। हम या तो हिंदी भाषा जानते हैं या पंजाबी या फिर हरियाणवी। क्योंकि हम एक सभ्य और संस्कारी समाज में रहते है।
किसी किन्नर ने कहा है कि नेग लेना मेरा अधिकार है। ये किस तरह का अधिकार है?
बिल्कुल नेग लेना उस किन्नर का मौलिक अधिकार है, जिस किन्नर के इलाके में आप रहते है। आप मुझे ये बताइये आपके दिये हुए नेग के अलावा किन्नरों के पास और कौन-सा साधन आय का और कौन-सा जरिया है अपना और अपने समाज के लोगों का पेट भरने का। क्या उनके पास खेती-बाड़ी है? क्या कोई बिजनेस या कारोबार है? क्या कोई नौकरी है? क्या  है? उनके पास! आपके दिये हुए नेग से ही वो दो वक्त की रोटी खाते है और बधाई कौन-सी हर रोज होती है, कब बच्चा पैदा होता है और कब 20-25 साल में उसकी शादी होती है, तब कहीं जाकर उनको बधाई नसीब होती है। जिन्दगी में जो प्रमुख बधाई हम देते है वो जन्म और शादी की ही तो है। कौन-सा नेग के रूप में वो आपसे सारी उम्र की रोटी माँगते हैं। एक इन्सान आपके बच्चों के जन्म से लेकर उनके जवान होकर शादी होने तक दुआ करता है कि शायद जब ये बच्चा जवान होगा तो इसकी शादी होगी और हमें बधाई मिलेगी और फिर इसका बच्चा होगा और फिर हमें बधाई मिलेगी। वो सारी उम्र आपके बच्चों के लिए दुआ माँगता-माँगता मर जाता है और आपको उस फकीर को दी हुई कुछ या नेग भी दुःख देता है। वो अपने लिए कभी भगवान से कुछ नहीं माँगता, बस यही दुआ करता रहता है कि हे भगवान उसके घर में बच्चा नहीं उसको बच्चा देना, हे भगवान उसके लड़के की शादी हो जाए, हे भगवान उसका लड़का नौकरी में लग जाए तो हमें कुछ बधाई मिले। सारी उम्र आपके लिए दुआ माँग-माँग कर कहीं उसको बधाई नसीब होती है तो वो कैसे कह दे कि ये मेरा अधिकार नहीं। हाँ, ये हमारा अधिकार है। जिनके घर में भगवान सारी उम्र खुशियाँ नहीं देता वो उनसे क्यूँ नहीं माँगते बधाई? तो भैया आप खुद विचार करो कि उसने आपसे माँगा ही क्या है। उन लोगों का भी तो दिल देखो जो अपने माँ-बाप, भाई-बहन सबको छोड़कर एक नई दुनिया बसा लेते है सिर्फ आपके और आपके बच्चों की दुआ-खैर के लिए। सबकुछ छोड़कर  चले आते हैं ये सोचकर कि नहीं भगवान ने हमें सबकी खुशियाँ माँगने के लिए बनाया है। आप क्या सोचते हो, उनको उनके घर में दो रोटी नहीं मिल सकती थी। लेकिन वो कितने भी धनवान घर के ही क्यों हों, वो फिर भी आपके दरवाजे पर माँगने आते हैं। पता है क्यूँ ? क्योंकि वो फकीर है और उसे वो धर्म निभाना है जिसके लिए उसको अल्लाह, वाहेगुरु, भगवान, परमेश्वर ने बनाया है। तो वो कैसे कह दे कि बधाई माँगना मेरा अधिकार नहीं? जवाब दीजिये?
आपको नहीं लगता है कि कुछ किन्नरों ने नंग को अपना धंधा बना लिया है।
जी बिल्कुल मैं ये बात मानती हूँ कि जब कोई किन्नर किसी के घर में बधाई लेने जाती है तो कई बार छोटी-मोटी नोक-झोंक हो जाती है। कई बधाई देने वाले की तरफ से तो कई बार किन्नरों की तरफ से। कई बार किन्नर भी जिद्द कर लेते है अधिक नेग की जो कि गलत है।
मान्यताओं के मुताबिक किन्नर को ये वरदान मिला है कि उनकी हर दुआ/ बद्दुआ जल्दी पूरी होती है। आपको क्या लगता है।

जिस प्रकार हवा को कैमरे में कैद नहीं कर सकते, उसको देख नहीं सकते। ठीक उसी प्रकार दुआ और बद्दुआ को स्पष्ट नहीं किया जा सकता सिर्फ उसके अच्छे और बुरे परिणाम को महसूस किया जाता है। दुआ और बद्दुआ वो लफ्ज हैं जिनको अल्लाह, वाहेगुरु भगवान, परमेश्वर ने अपने चाहने वालों के लिए बनाया है बशर्ते उस अल्लाह, वाहेगुरु, भगवान, परमेश्वर को अपने आप को समर्पित करना पड़ता है, दुआ और बद्दुआ का असर करना इस बात पर निर्भर करता है कि दुआ माँगने वाला हो या बद्दुआ देने वाला, वो जो कुछ भी मालिक से माँगे पर माँगे दूसरों के लिए। ये बात किन्नर समाज पर पूर्ण रूप से लागू होती है, क्योंकि वो अपने लिए उस मालिक से बहुत कम ही कुछ माँगते हैं और पूरा जीवन सिर्फ दूसरों के लिए माँगते-माँगते बिता देते है। दुआ और बद्दुआ का असर इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस भावना से किसी किन्नर से दुआ मंगवा रहे है अपने लिए या किसी और के भी लिए बद्दुआ का असर इस बात पर निर्भर करता है कि आपने उसकी रुह या आत्मा को कितना दर्द पहुँचाया है या उसको किस हद तक अपमानित किया कि वो आपको बद्दुआ देने पर मजबूर हो गया। बिल्कुल सत्य है ये बात कि किन्नरों कि दुआ और बद्दुआ बहुत जल्दी ही असर करती हैं। क्योंकि किन्नर ही एकमात्रा वो शख्सियत है जिसको मालिक, अल्लाह, वाहेगुरु, भगवान, परमेश्वर ने जन्म से फकीर बनाया है अपनी मर्जी से। उस मालिक ने उन्हें खुद चुना है अपने बनाए हुए लोगों के लिए दुआ और बद्दुआ माँगने के लिए। किन्नर कभी किसी को बद्दुआ नहीं देते जब तक कि सामने वाला हद से ज्यादा उनको दुखी कर दे या जब कोई ऐसी बात कह दे जिससे कि उनका दिल दुखे।

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