Thursday, November 18, 2010

नासिरा शर्मा एक मूल्यांकन

नासिरा शर्मा एक मूल्यांकन


अनुक्रम



सम्पादकीय


नासिरा शर्मा : मेरे जीवन पर किसी का हस्ताक्षर नहीं


सुदेश बत्राा : नासिरा शर्मा - जितना मैंने जाना


ललित मंडोरा : अद्भुत जीवट की महिला नासिरा शर्मा


अशोक तिवारी : तनी हुई मुट्ठी में बेहतर दुनिया के सपने


शीबा असलम फहमी : नासिरा शर्मा के बहाने


अर्चना बंसल : अतीत और भविष्य का दस्तावेज : कुइयाँजान


फज+ल इमाम मल्लिक : ज+ीरो रोड में दुनिया की छवियां


मरगूब अली : ख़ाक के परदे


अमरीक सिंह दीप : ईरान की खूनी क्रान्ति से सबक़


सुरेश पंडित : रास्ता इधर से भी जाता है


वेद प्रकाश : स्त्री-मुक्ति का समावेशी रूप


नगमा जावेद : जि+न्दा, जीते-जागते दर्द का एक दरिया हैः


जि+न्दा मुहावरे


आदित्य प्रचण्डिया : भारतीय संस्कृति का कथानक जीवंत अभिलेखः अक्षयवट


एम. हनीफ़ मदार : जल की व्यथा-कथा कुइयांजान के सन्दर्भ में


बन्धु कुशावर्ती : ज+ीरो रोड का सिद्धार्थ


अली अहमद फातमी : एक नई कर्बला


सगीर अशरफ : नासिरा शर्मा का कहानी संसार - एक दृष्टिकोण


प्रत्यक्षा सिंहा : संवेदनायें मील का पत्थर हैं


ज्योति सिंह : इब्ने मरियम : इंसानी मोहब्बत का पैग़ाम देती कहानियाँ


अवध बिहारी पाठक : इंसानियत के पक्ष में खड़ी इबारत - शामी काग़ज+


संजय श्रीवास्तव : मुल्क़ की असली तस्वीर यहाँ है


हसन जमाल : खुदा की वापसी : मुस्लिम-क़िरदारों की वापसी


प्रताप दीक्षित : बुतखाना : नासिरा शर्मा की पच्चीस वर्षों की


कथा यात्राा का पहला पड़ाव


वीरेन्द्र मोहन : मानवीय संवेदना और साझा संस्कृति की दुनियाः इंसानी नस्ल


रोहिताश्व : रोमांटिक अवसाद और शिल्प की जटिलता


मूलचंद सोनकर : अफ़गानिस्तान : बुज+कशी का मैदान- एक महादेश


की अभिशप्त गाथा


रामकली सराफ : स्त्रीवादी नकार के पीछे इंसानी स्वर : औरत के लिए औरत


इकरार अहमद : राष्ट्रीय एकता का यथार्थ : राष्ट्र और मुसलमान


सिद्धेश्वर सिंह : इस दुनिया के मकतलगाह में फूलों की बात


आलोक सिंह : नासिरा शर्मा का आलोचनात्मक प्रज्ञा-पराक्रम


मेराज अहमद : नासिरा शर्मा का बाल साहित्य : परिचयात्मक फलक


ग़ज+ाल जैग़म : या रब किसी का बाग-ए-तमन्ना खिज+ा न हो


साक्षात्कार


नासिरा शर्मा से मेराज अहमद और फ़ीरोज+ अहमद की बातचीत


नासिरा शर्मा से प्रेमकुमार की बातचीत

Tuesday, November 16, 2010

स्त्री-विमर्श

मधुरेश : नारीवादी की विचार-भूमि



सुरेश पण्डित : बाजार में मुक्ति तलाशती औरतें


शिव कुमार मिश्र : स्त्री-विमर्श में मीरा


कमल किशोर श्रमिक : स्त्री मुक्ति का प्रश्न


मूलचन्द सोनकर : स्त्री-विमर्श के दर्पण में स्त्री का चेहरा


शशि प्रभा पाण्डेय : नारीवादी लेखन : दशा और दिशा


हरेराम पाठक : स्त्रीवादी लेखन : स्वरूप और सम्भावनाएँ


जय प्रकाश यादव : आधुनिक समाज में नारी-मुक्ति का प्रश्न


वी.के. अब्दुल जलील : स्त्री-विमर्श ÷समकालीन हिन्दी कथा साहित्य


के संदर्भ में'


जगत सिंह बिष्ट : स्त्री-विमर्श और मृणाल पाण्डे का कथा साहित्य


शोभारानी श्रीवास्तव : महादेवी वर्मा का नारी विषयक दृष्टिकोण


रामकली सराफ : स्त्री जीवन का यथार्थ और अन्तर्विरोध


ललित शुक्ल : संवेदना और पीड़ा की चित्राकार मुक्तिकामी


रचनाकार : नासिरा शर्मा


आदित्य प्रचण्डिया : हिन्दी कहानी में नारी


उमा भट्ट : सुभद्रा कुमारी चौहान की कहानियों में स्त्री


रमेश शर्मा : मध्यकालीन हिन्दी भक्तिकाव्य और नारी-विमर्श


के आयाम


सुनीता गोपालकृष्णन : नारी शोषण की अनंत कथा


तारिक असलम : मुस्लिम स्त्रियाँ : स्वप्न और संघर्ष


फ़ीरोज खान : दुर्दशा से लड़ती मुस्लिम औरतें


साक्षात्कार


नासिरा शर्मा से शीबा फहमी एवं मेराज अहमद की बातचीत


मैत्रेयी पुष्पा से उजैर खाँ की बातचीत


विजय लक्ष्मी से हनीफ मदार की बातचीत

दलित साहित्य

अनुक्रम






आलेख


शिव कुमार मिश्र


- दलित साहित्य अंतर्विरोध के बीच और उनके बावजूद


माता प्रसाद


- दलित साहित्य, सामाजिक समता का साहित्य है


शुकदेव सिंह


- दलित-विमर्श, दलित-उत्कर्ष और दलित-संघर्ष


धर्मवीर


- डॉ० शुकदेव सिंह : पालकी कहारों ने लूटी


रामदेव शुक्ल


- कौन है दलितों का सगा?


मूलचन्द सोनकर


- रंगभूमि के आईने में सूरदास के नायकत्व की पड़ताल


सुरेश पंडित


- दलित साहित्य : सीमाएं और सम्भावनाएँ


रामकली सराफ


- दलित विमर्श से जुड़े कुछ मुद्दे


कमल किशोर श्रमिक


- अम्बेडकर की दलित चेतना एवं मार्क्स


ईश कुमार गंगानिया


- दलित आईने में मीडिया


सूरजपाल चौहान


- दलित साहित्य का महत्त्व एवं उसकी उपयोगिता


अनिता भारती


- दलिताएँ खुद लिखेंगी अपना इतिहास


हरेराम पाठक


- दलित लेखन : साहित्य में जातीय सम्प्रदायवाद का संक्रमण


तारा परमार


- दलित महिलाएं एवं उनका सशक्तिकरण


तारिक असलम


- दलित मुसलमानों की सामाजिक त्रासदी


मानवेन्द्र पाठक


- साठोत्तरी हिन्दी कविता में दलित-चेतना


जगत सिंह बिष्ट


- शैलेश मटियानी के कहानी साहित्य में दलित संदर्भ


जसराम हरनोटिया


- निजीकरण और दलित


निरंजन कुमार


- दलित साहित्य में दलित : एक विमर्श


साक्षात्कार


- डॉ. जय प्रकाश कर्दम से डॉ. पूरन सिंह की अन्तरंग बातचीत


- तीन आम दलित व्यक्तियों से डॉ. मेराज अहमद की बातचीत


- रमणिका गुप्ता से डॉ. शगुफ्ता नियाज की अन्तरंग बातचीत


- डॉ. श्योराज सिंह बेचैन से मिर्जा गौहर हयात की बातचीत











मुस्लिम साइकी

अनुक्रम







दो शब्द


साइकी का स्वरूप एव अवधारणा


हिन्दी उपन्यास में व्यक्त मुस्लिम साइकी : अनुभूति पक्ष


हिन्दी उपन्यास में व्यक्त मुस्लिम साइकी : व्यवहारिक पक्ष


हिन्दी उपन्यास में व्यक्त मुस्लिम साइकी : विचारात्मक पक्ष


मुस्लिम साइकी विषयक अवधारणात्मक का तुलनात्मक अध्ययन


मूल्यांकन


सन्दर्भ ग्रन्थ-सूची



Friday, November 12, 2010

नासिरा शर्मा का कहानी संसार - एक दृष्टिकोण

सग़ीर अशरफ़

भाषा के स्तर पर जब लोककथाओं के क़दम आगे बढ़े तो कहानी दिखाई देने लगी और आधुनिक रूप में स्थापित होने के साथ ही भौगोलिक सीमाओं को तोड़कर चारों ओर अपने छींटे बिखेरती नज़र आने लगी।... अपने तलुवों में धरती को छूती हुई कहानी, खेत-खलयानों से गुज़रती जागीदारों के शोषण, साहूकारों के अत्याचार, मज़दूरों के आंसुओं का अहसास दिलाती, गांव-नगर, महानगरों में विचरण करती हुई, पारंपरागत आंगन में टीस, कसक, कुण्ठा-शोषण आदि के धरातल पर सुख-दुख के हमसफ़र किरदारों को जीवंतता प्रदान करने लगी।

इस लंबी यात्रा के दौरान कहानी किसी भी रूप, भाषा-शैली या ‘क़िस्सागोई’ की शक्ल में ही क्यों न आई हो... विषय और विधा दोनों पहलुओं से विकसित होती रही। उसका शिल्प ‘कुछ नये’ के लिए व्याकुल होता रहा... और जीवन के उन महीन पलों को जो कविता, नाटक और उपन्यास के सांचे में ढलना संभव नहीं थे,... कहानी में स्थापित होते गये।

... कहानी ने पुरुष स्वभाव को ही स्वीकार नहीं किया बल्कि नारी के भी विभिन्न रूप-स्वरूप को अपनी ‘कहन’ में शामिल किया। आज शिक्षित और आधुनिक नारी किन परिवर्तनों से गुज़र रही है? उसका स्वभाव क्या है? उसकी मानसिकता किस रूप में करवट ले रही है? अनेक पहलुओं के दर्शन आज की कहानी में नज़र आते हैं।

उर्दू के मशहूर कहानीकार ‘हाजरा शकूर’ ने नारी की कुण्ठा को आधुनिक सोच के किस क़द्र महसूस किया है-‘‘हर साल नदी में सैलाब आता है..., हर साल उस पर बांध बंधता जाता है।... लेकिन कभी-कभी सैलाब इतना हो जाता है कि बांध को भी बहा ले जाता है।... मैंने तो बस यंू ही बात कही है, - मुझे किसी सैलाब का इन्तज़ार नहीं, - लेकिन बांध के ख़्याल के साथ मेरा ख़्याल क्यों जुड़ा हुआ है...?’’

उपरोक्त कहानी अंश के इस दर्पण में हमारा पूरा फोकस नासिरा शर्मा की कहानियों के इर्द-गिर्द केन्द्रित है। उनकी कहानियाँ मध्यवर्ग की उस नारी की कहानियाँ हैं, जो नारी त्रासदी एवं मनोवृत्तियों व मानसिकताओं के बीच से उभरी हैं -‘‘मेरी कहानियाँ मुहाजरत के दुख और मुजरों के सुख का मोहभंग करती हुई एक ऐसी गली की सैर कराती है जो ‘पत्थर गली’ है - इस पत्थर गली के रहने वाले अपने विकास के लिए जद्दोजहद के लिए छटपटाते नज़र आते हैं। अपनी पहचान के लिए जद्दोजहद के समुन्दर में गोते लगाते हैं। रूढ़िवादिता की बेड़ियों को तोड़कर खुले आसमान में उड़ना चाहते हैं...पंखों को पसार कर उसमें सूरज की गर्मी और रोशनी भरने के लिए तड़पते हैं...कशमकश में पत्थर से टकराकर लहूलुहान हो उठते हैं..।’’

‘पत्थरगली’ के माध्यम से उनकी जो भी कहानियां उपलब्ध हो सकी हैं उनमें नारी अस्मिता, उसके जीवन बिम्ब, रिश्तों की बेबसी, संबंधों का स्थायित्व, स्वार्थपरिता, आत्मीयता का आभाव, बाज़ार के से उतार-चढ़ाव की ज़िन्दगी, उदासियों का अंधेरापन, और कहीं कोई रोशनी की लकीर-सी निर्बाध बहती हंसी... जो नारी जीवन की लंबी-लंबी गलियों से गुज़रती, आंसू, दर्द, उत्पीड़न और शोषण की चिलमनों से सरकती हुई कागज़ के बदन को स्पर्श करती है।

रिश्तों के इन्हीं यथार्थ को उकेरती नासिरा शर्मा अपनी रचना-धर्मिता के बल पर पाठकों तक पहुंची है - ‘‘मैं अपने को हमेशा दूसरों में बांटती आई हँू। ठीक ‘बावली’ के पानी की तरह। जिस किसी को प्यास लगी, मेरे वजूद की सीढ़ियां उतरता

सीधे नीचे चला आया और अपना खाली बर्तन भरकर ले गया। मैं कुआं तो थी नहीं जो किसी को रस्सी और डोल डालने की ज़हमत उठानी पड़ती, मैं तो एक बावली थी,... पानी से भरी बावली, जिसके पानी को कोई भी अपने चुल्लुओं में भरकर अपने सूखे गले को तर कर सकता है।’’1

कहानी के विषय वस्तु अथवा घटनाओं का प्रस्तुतीकरण कैसे हो, शिल्प के स्तर पर कहानी का विकास कैसे हो? सीमाएं क्या हों? कहानी की आत्मा को, कला को, साहित्य विधा में क्या स्तर प्रदान किया जाय? इसकी प्रतिध्वनी नासिरा की कहानियों में सुनाई देती है - ‘‘मेरे वजूद की दीवारों पर बेशुमार ताक़ बने हुए थे उनमें विभिन्न कबूतरों ने बसेरा कर रखा था। ताक़ों पर बड़े-बड़े दरों में गर्मी में तपती दोपहर से थके परिन्दे मेरे ठंडे वजूद में आकर पनाह लेते थे... कभी ख़्याल ही नहीं आया कि मेरा अपना एकदम निजी भी कुछ हो सकता है।... मैं उनमें प्यार के रिश्ते के नाम पर बँटती रही।’’2.............................................शेष भाग पढ़ने के लिए पत्रिका देखिए





















संवेदनायें मील का पत्थर हैं

प्रत्यक्षा सिंहा

नासिरा शर्मा की ‘संगसार कहनी-संग्रह’, ईरान की पृष्ठभूमि में 1980 से 1992 के दरम्यान लिखी वो कहानियां हैं जिसके पात्रा और जिनकी स्थितियाँ किसी विदेशी ज़मीन के बावजूद हमारे ही इर्द- गिर्द से उपजी पनपी कहानियाँ लगती हैं। उनकी आकाँक्षायें, उनके सुख और उनके दुख -सब ऐसे हैं जो हमारे आसपास के देखे हुए महसूसे हुये हैं। इंसान की संवेदनाओं और इच्छाओं का ऐसा व्यापक फ़लक जो आसमान के फैलाव लिये होने के साथ ही फिर सिमटकर छाती के भारीपन और आँख के गर्म आंसू में सिमट जाये, ऐसी कहानियांँ है ‘‘संगसार’’ में।

ये कहानियाँ जगह, समय, धर्म के परे उन जज़्बातों की कहानियाँ हैं जो सदियों से आजतक विभिन्न रूपों और शक्लों में बार-बार दोहराई जा रही है। प्रेम की, बलिदान की, बुनियादी इंसानी ज़रूरतों की, छोटे-छोटे सहज भोले आकाँक्षाओं की, खुली हवा में फेफड़ा भर सांस लेने की नैसर्गिक चाहत की पिरोयी मालायें है। उन सभी एहसासों का दस्तावेज़ है जिनके अक्षर पढ़ मानव सभ्यता का विकास हुआ।

विदेशी सरोकारों वाली इन कहानियों के पीछे एक लेखक की तमाम वो संवेदनायें हैं जो देश काल के दायरे को तोड़ता हुआ उनको आमजन से जोड़ता है। किसी यात्रा संस्मरण की सीमा तोड़ती, इन कहानियों का स्वरूप दिल और दिमाग़ के उन तंतुआंे से एक तार कर देता है जो हरेक एहसास को वृहत मानव समाज से जोड़ता हुआ उसे इतना व्यापक बनाता है कि अंतः ये किसी देश, किसी काल, किसी स्थिति से बहुत ऊपर उठकर इंसानी आवेगों का ऐसा महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ बन जाती है जो ‘सच’ हैं किसी भी सभ्यता के लिए और इन्हीं वजहों से ये कहानियाँ होने के साथ-साथ एक व्यापक, वैश्विक स्तर की कहानियाँ बनते हुये बहुत ऊपर उठ जाती है ।

नासिरा जी ने पुस्तक के प्रारम्भ में ‘दो शब्द’ में कहा है, ‘कब्र में सोए उन कर्मठ, निष्ठावानों को जो आज भी दिलों के चिराग़ बन गरमी और रौशनी देते है।’

ये दो पंक्तियाँ बता देती हैं कि इन कहानियों का वास्तविक काल कौन-सा था। ये उन वक़्त की कहानियाँ है जब ईरान अपनी निष्ठा और बलिदान के चरम पर था। जब ऐसी स्थिति थी जिसमें लोग एक दूसरे को भय से, शक से, नफ़रत से देख रहे थे, चाहे इसकी वजह शाह हो, इस्लाम हो या साम्यवाद हो। ये उस समय की देन थी जब तानाशाही के विरोध में लोग उठ रहे थे जब ऐसे भी लोग थे जो तानाशाही बरक़रार रख उसमें अपना स्वार्थ तलाश रहे थे। ये ऐसे समय के तोड़-फोड़ वाली दुनिया, विध्वंस वाली दुनिया में कोमल राग तलाशने की जिजीविषा वाली कहानियाँ हैं, खूँख़ार समय में, टूटी इमारतों के अवशेेषों के किसी कोपल के सहसा उग आने का जीवन राग हैं।

कहानी ‘ख़लिश’ सोहराब की कहानी है जो हिन्दुस्तान जाना चाहता है आगे की पढ़ाई के लिये लेकिन साथियों के सोहबत में अपने भविष्य को अंधे कूँए में डाल आता है। बहाइयों के घर छापे में उसके साथी उनकी मजहबी किताबों को आग लगा देते हैं और सोहराब का दिल धुँआ- धुँआ हो जाता है। इसके साथ ही सोहराब के अब्बा उसकी पढ़ाई के पैसों का इंतज़ाम करने किसी बेेेसहारा बुढ़िया के मौत केे कारण बनते हैं और ये ग़लत काम उनको घुटन और उदासी में ठेल देता है। ‘ख़लिश’ के सोहराब और अब्बा हर उस जगह पाये जाते हैं जहाँ नेकनियति अब भी हज़ार दुश्वारियों के कायम है। यही आशा की किरण है।

इन कहानियों में कई ऐसी कहानियाँ हैं जो स्त्राी के बुनियादी अस्मिता की दास्तान हैं। इन भयानक उठापठक के समय में जो ख़ास संगदिली का सामना उनको करना पड़ता है उसका विस्तृत बयान है। स्त्रिायों की अधीनस्थ स्थिति वैसे ही उन्हंे दयनीय बनाती और बुरे कठिन वक़्तों में ये मार उन पर दोहरी पड़ती है। पर बावजूद कि इन कठिन हालातों का विस्तार से वर्णन है। एक बात जो हर कहानी में उभर कर आती है इन स्त्रिायों के अंदर, उनके बाहरी कोमल स्वरूप के भीतर एक ऐसा मज़बूत कोर है, जो उन्हंे हर तकलीफ़देह समय में अपना सर पानी के ऊपर उठाये रखने में कारगर साबित करता है। इन कहानियों की ‘आखि़री पहर’ की ज़ाहेदा हो या ‘संगसार’ की आसिया या ‘गूँगा आसमान’ की मेहरअंगीज़ या फिर ‘नमक का घर’ की शहरबानों, ये औरतें अपने वजूद की लड़ाइयाँ लड़ती हैं। शहरबानांे अपने खोये घर और गुमशुदा परिवार की त्रासदी झेलती औरत है जिसका तार अपने जड़ों से टूट गया है, इस खोये की तलाश में बेचैन परिन्दा है और इस मुग़ालते को जिलाये रखना उसकी ज़रूरत है, ‘‘ताकि मैं जीने के क़ाबिल अपने को बना सकूश्ं, वरना मुझे हर पल लगता है, मैं मर रही हूँ...’’

आसिया प्रेम की पवित्राता का सच्चा नमूना है। पति के साथ बेवफ़ाई के बावजूद उसके विवाहेतर प्रेम संबंध में बेपनाह जुदाई है, ऐसी सच्चाई है जो इस दोहरे मानदंड वाले पारंपरिक समाज में भी उसके मौत का फ़रमान जारी होने पर ये सच्चाई बयान करती है, ‘‘उस रात औरतों ने चूल्हे नहीं जलाये, मर्दांे ने खाना नहीं खाया, सब एक दूसरे से आँख चुराते है। यदि आसिया गुनाहगार थीं तो फिर उसके संगसार होने पर यह दर्द, यह कसक उनके दिलों को क्यों मथ रही थी।’’.............................................शेष भाग पढ़ने के लिए पत्रिका देखिए



















ज़ीरो रोड में दुनिया की छवियां

फ़ज़ल इमाम मल्लिक



नासिरा शर्मा से पहली और अब तक की आखि़री मुलाक़ात क़रीब पंद्रह साल पहले कलकत्ता में हुई थी। दिल्ली में सात साल होने को आए पर उनसे मिलना अब तक हो नहीं पाया। दिल्ली के साहित्यिक समारोहों में उनका आना-जाना न के बराबर होता है और यही हाल कुछ-कुछ मेरा भी है। इस तरह के सभा-समारोहों में एक तरह के चेहरे और एक तरह की बातें सुनकर बेइंतहा कोफ़्त होती है इसलिए कुछ परिचितों और मित्रों के अलावा साहित्य के अधिकांश समारोहों में जाने से गुरेज़ ही करता हँू। कमलेश्वर जी जब थे तो ज़रूर इस तरह के सभा-समारोहों में आना-जाना होता था। उसकी वजह भी थी। उन्हें हमेशा मैंने अभिभावक का दर्जा दिया है और उन कार्यक्रमों में जिनमें वे शिरकत करते थे ज़रूर हिस्सा लेता ताकि उनके साथ कुछ देर बिताने का मौक़ा मिले। पर उनके जाने के बाद अब दिल्ली की साहित्यिक मंडी के समारोहों का हिस्सा बनने की इच्छा नहीं होती। नासिरा शर्मा भी दिल्ली की साहित्यिक नौटंकी में नहीं शामिल होतीं इसलिए अब तक उनसे मिलना नहीं हुआ। वे दिल्ली के एक सिरे पर रहती हैं, उनसे नहीं मिल पाने की वजह यह भी हो सकती है। हो सकता है कि कुछ लोग कहें कि यह सब तो न मिलने का बहाना भर है, आदमी किसी से मिलना चाहे तो चांद पर कमंद डाल सकता है फिर नासिरा शर्मा तो दिल्ली में ही रहती हैं। यह बात सही भी है। नासिरा शर्मा रहतीं तो ‘छत्तरपुर की पहाड़ियों’ पर ही हैं, जहां जाना बहुत दुश्वार नहीं। उनके घर की राह पर चलते हुए कहकशां भले न हो पर पत्थर भी नहीं है जिन पर चल कर उन तक पहुंचा नहीं जा सकता है। यह बात दीगर है कि नासिरा शर्मा ने रहने के लिए जो जगह चुनी है वह पहाड़ी के नाम से ही जानी-पहचानी जाती है। पर मुझे पूरा यक़ीन है कि नासिरा शर्मा ने वहां घर बना कर पत्थरों को मोम में बदल डाला होगा। दरअसल नासिरा शर्मा की साहित्य की एक बड़ी ख़ूबी भी उसकी मासूमियत, उसकी नर्मी और धीमी-धीमी तपिश ही है जो आदमी को आदमी से जोड़ कर उसे बेहतर इंसान बनने के लिए प्रेरित करती है। यों भी दिल्ली में एक जगह से दूसरी जगह जाने के दौरान पत्थरों से होकर तो जाना नहीं पड़ता। यह ज़रूर है कि दर्जनों लाल बत्तियों, वाहनों के शोर, भीड़, उमस और जाम से गुज़रकर ही कहीं पहँुचा जा सकता है। ग़ालिब अगर आज होते तो इश्क़ में आग के दरिया से गुज़रने की जगह जाम और गाड़ियों की भीड़ से तैर कर निकलने को कहते। पर आज ग़ालिब नहीं है। पर ग़ालिब की उस दिल्ली में नासिरा शर्मा रहती हैं, जिनकी रचनाओं में अपनी सदी के अक्स को बहुत ही बेहतर ढंग से देखा जा सकता है। कभी-कभी तो लगता है कि नासिरा शर्मा की कहानियां, उनके उपन्यास आईना बन जाते हैं और जिनमें हम उस दुनिया के चेहरा ठीक उसी तरह देखते हैं जिस तरह वह है। बदरंग भी और खुशरंग भी। उसमें दुनिया का धूसर और मटमैला रंग भी आकार लेता है और इंद्रधनुष भी पसरा होता है। जूही, चंबेली, मोगरा और गुलाब की खुशबू भी फैली है तो नफ़रत की सड़ांध भी। ऐसा क्यों होता है कि हर बार नासिरा शर्मा को पढ़ते हुए नए अनुभव से गुज़रता हंू। उनका साहित्य उंगलियां पकड़कर ज़िन्दगी की संगलाख़ राहों पर भी ले जाता है और मोम के दरिया को भी पार कराता है। नासिरा शर्मा की उस दुनिया में जगह-जगह अपनेपन और मोहब्बत की छौंक मिलती है जो इस बदरंग और बदसूरत दुनिया में जीने को प्रेरित करती हैं।


कलकत्ता में दस-पन्द्रह साल पहले जब उनसे मिलना हुआ था तो उनकी एक अलग छवि मेरे दिलो-दिमाग़ में बसी थी। यह सही है कि उनसे मैं पहली बार रूबरू हो रहा था लेकिन उन्हें जानता काफ़ी पहले से था। पटना में उनका ग़ायबाना तआरुफ़ शंकर दयाल सिंह ने उनसे मिलने से भी दस-बारह साल पहले अपने ख़ास अंदाज़ में कराया था। उनके उस तआरुफ़ ने नासिरा शर्मा की एक अलग छवि बना डाली थी। तो क़रीब पच्चीस साल पहले, शंकर दयाल सिंह ने नासिरा शर्मा की जो छवि मेरे भीतर बना डाली थी वह आज भी जस की तस बरक़रार है। तब पटना के डाकबंगला रोड पर पारिजात प्रकाशन हुआ करता था। शंकर दयाल सिंह की वजह से प्रकाशन गुलज़ार रहा करता था। शंकर दयाल सिंह के ठहाकों के बीच एक अलग तरह की दुनिया आबाद रहती थी और उस दुनिया में जीतेन्द्र सिंह, गोपी वल्लभ सहाय, सत्यनारायण, रवींद्र राजहंस, परेश सिन्हा, भाई नरेंद्र, काशीनाथ पांडेय के साथ मैं भी आज़ादी के साथ सांसें लेता था। पटना के साहित्य समाज में प्रगतिशील और जनवादी सोच के साहित्यकारों के लिए शंकर दयाल सिंह और उनकी यह मंडली, जिसका मैं सबसे छोटा सदस्य था, अछूतों की तरह थी। अज्ञेय से लेकर जैनेंद्र और भवानी प्रसाद मिश्र से विद्यानिवास मिश्र और न जाने कितने नाम इस सूची में शामिल हैं, जिनकी मेहमाननवाज़ी शंकर दयाल सिंह ने नहीं की थी। तब वे पटना में साहित्यिक गतिविधियों का एक बड़े केन्द्र थे। बीच-बीच में कलकत्ता से बुद्धिनाथ मिश्र, रांची से किटू या चंपारण से पांडेय आशुतोष या दिनेश भ्रमर आते तो पारिजात प्रकाशन आना ज़रूरी था। रेणु सरीखे कथाकारों के लिए भी पारिजात प्रकाशन मिलने-मिलाने का एक अड्डा था। साहित्य और राजनीति से जुड़े बड़े से बड़े लोग पारिजात प्रकाशन आते और एक-दूसरे के साथ बोलते-बतियाते। आज वे पटना में नहीं हैं तो साहित्य की वह दुनिया बहुत ही वीरान और उदास है। शायद यही वजह है कि उन दिनों पटना में वामपंथी लेखकों ने हम लोगों का ‘सोशल बाॅयकाट’ कर रखा था जो शंकर दयाल के क़हक़हों में जीवन का विस्तार देखते थे। हो सकता है, मेरी इन बातों से मेरे वामपंथी लेखक और मित्रा बुरा मान जाएं पर यह सौ फीसद सही है कि शंकर दयाल सिंह ने कइयों की प्रतिभा को विस्तार देकर उसे जीवन के कठिन दिनों से जूझने और संघर्ष.............................................शेष भाग पढ़ने के लिए पत्रिका देखिए


Sunday, November 7, 2010

एक नई कर्बला

(नासिरा शर्मा की कहानियों में)

प्रो. अली अहमद फातमी

इंसान और इंसानियत के अनेक रूप होते हैं, लगभग यही सूरत होती है इंसानी रिश्तों की भी। रचना में वह कैसे दर्शन पायें उसका मामला उससे भी अजीब है। अंग्रेज़ी साहित्य में रोमानी शायर बर्डसवर्थ से किसी ने इंटरव्यू लेते हुए पूछा था कि आपने इतनी अच्छी रोमानी शायरी किस तरह की? जवाब मिला, अगर फ्राँस में इन्के़लाब न आया होता और अवामी ज़िन्दगी बर्बाद न हुई होती तो मैं एक नये और खुशहाल समाज का ख़्वाब न देख पाता। ज़रा बदली हुई भाषा में ‘फास्टर’ ने भी कहा था कि एक ऐसी दुनिया जो अदब (साहित्य) और आर्ट से ख़ाली हो मेरे लिये नाक़ाबिले क़ुबूल है। लेकिन यह बात ज़्यादा अहमियत रखती है जब वह यह भी कहता है कि इंसानी ताल्लुक़ात के एहसास और सरोकारों के बग़ैर आर्ट, अदब और ज़िन्दगी सभी बेमतलब व बेमानी होते हैं।

आर्ट पैदा होता है अहसास से और अहसास देन है ज़िन्दगी की, लेकिन इन तीनों का तालमेल, समन्वय के मामलात अजीब-व-ग़रीब होते हैं, इसका कोई पक्का पैमाना नहीं, साँचा नहीं। यही तलाश करना आलोचना का काम हुआ करता है।

हिन्दी कथा साहित्य की सुप्रसिद्ध और जानी मानी लेखिका ‘नासिरा शर्मा’ - उर्दू के सुप्रसिद्ध लेखक व शायर और उर्दू विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के भूतपूर्व अध्यक्ष प्रो. ज़ामिन अली की छोटी बेटी हैं। मुसलमानों के खाते पीते शिया घराने में पैदा हुई, जहाँ की एक विशेष तहज़ीब हुआ करती है। यह तहज़ीब उस समय और अहमियत और नज़ाक़त धारण कर लेती है। जब वह ज़मींदार व जागीरदार तबक़े की हो। घर में मरसिया व मजलिस के अलावा बाक़ायदा शेरो-शायरी का भी माहौल मिला हो, जैसा कि एक लेख में वह खुद लिखती हैं - ‘‘घर का माहौल अदबी था, मरसिया सोज़, नौहे लिखने-पढ़ने का रिवाज़ कई पुश्तों से था। ग़ज़ल कहना और सुनाना घर के आदाब में शामिल था। उस खानदान में क़लम उठाना उपलब्धि न था बल्कि कुछ ऐसा लिखना चुनौती था जो ख़ानदान के स्तर से नीचा न हो उसका अपना तनाव व लुत्फ़ दोनों हैं।’’ लुत्फ़ की बात तो बाद में आती है लेकिन अक्सर बाग़ियाना क़दम, बेचैनी व तनाव से ही उठता है। कमसिन नासिरा शर्मा अपने दूसरे भाई बहनों की तरह जीतीं, ज़िन्दगी का लुत्फ़ उठातीं जो अमीर घराने का वाक़ई बेफ्रि़करी से भरा लुत्फ़.............................................शेष भाग पढ़ने के लिए पत्रिका देखिए











‘ज़ीरो रोड’ का सिद्धार्थ

बन्धु कुशावर्ती

बीसवीं सदी के आखिरी दो तथा इक्कीसवीं सदी के इस पहले दशक तक पूरी दुनिया आधुनिकता, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, विचार आदि के स्तर पर न केवल बदली बल्कि बढ़ी और बेहद नयी हुई है। इसी कालखण्ड में दो-धु्रवीय दायरों वाला विश्व अन्ततः अनेकानेक तब्दीलियों के साथ ही कई खेमों से सिमट कर एकध्रुवीय हो गया है। देश से लेकर दुनिया तक में इस बीच होते परिवर्तनों, चुनौतियों, संघर्षों, तनावों, द्वन्द्वों आदि को दूर-नज़दीक देखने या उसमें धँसका जो कुछ लोग समानान्तर रूप से सृजनरत रहे हैं, नासिरा शर्मा उनमें एक अग्रणी नाम है। अपनी ज़मीन व जड़ों से भी उनका लगाव-जुड़ाव अत्यन्त सघन है। उनका लेखन वैश्विक-व्याप्ति लिये वैविध्यातापूर्ण है।

नासिरा शर्मा की अनेकानेक कहानियाँ और शामी काग़ज़, पत्थरगली, सबीना के चालीस चोर, खुदा की वापसी, दूसरा ताजमहल, बुतखाना आदि कहानी संकलन तथा शाल्मली, ठीकरे की मँगनी, अक्षयवट आदि उपन्यास हिन्दी में यदि देशज और अन्तर्देशीय जीवन व समाज की अन्तरंगता से पहचान कराते हैं तो ‘ज़िन्दा मुहावरे’ उपन्यास भारत-पाकिस्तान विभाजन की त्रासदी, साम्प्रदायिकता बनाम इंसानियत आदि की विडम्बनाओं को वाणी देता है। ‘संगसार’ व ‘इब्ने मरियम’ कहानी संकलनों एवं ‘सात नदियाँः एक समन्दर’, ‘कुइयाँजान’ तथा ‘ज़ीरो रोड’ उपन्यासों के कथा वितान ने नासिरा शर्मा की वैश्विक सरोकारों से संजीदा संलग्नता को प्रमाणित किया है।

बीते 30-35 वर्षों के दरम्यान नासिरा शर्मा के विदेश-प्रवास के अनुभवों, इराक़, ईरान, अफ़गानिस्तान आदि मध्य एशियाई देशों से जुड़ी भूमिकाओं, ईरान-क्रांति के दौरान उनकी सक्रियताओं तथा फ्रान्स, सीरिया, जापान, हांगकांग, बैंककाक, बांग्लादेश, नेपाल, दुबई आदि देशों व ग्रेटब्रिटेन के विभिन्न हिस्सों की यात्राओं के दौरान उनके साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं वैचारिक क्रियाकलापों की तारतम्यता ने भारतीय बुद्धिजीवी के रूप में उन्हें ‘हिन्दुस्तान की स्वायत्त-अन्तर्राष्ट्रीय राजनयिक’ की गरिमापूर्ण-छवि दी है। उनका सृजन लेखन मूलतः मानवधर्मी है। उसमें प्रगतिशीलता के व्यापक सरोकार सीधे संवाद करते मिलते हैं। इधर उनके तीनों उपन्यास अत्यन्त एकाग्रभाव से एक ओर ‘अक्षयवट’ (2003), ‘कुइयाँजान’ (2005) एवं ‘ज़ीरो रोड’ (2008) उस शहरी मध्यवर्गीय परिवार एवं जीवन को केन्द्र में रखते हैं, जिसे विख्यात हिन्दी कथाकार और उपन्यासकार अमृतलाल नागर ने अपने कोई 50 वर्षों के दौर के लेखन से ‘नगरीय सभ्यता और आंचलिकता’ की नयी पहचान के साथ हिन्दी में प्रतिष्ठित किया है तो दूसरी ओर नासिरा शर्मा के ये तीनों उपन्यास बीसवीं सदी के आखिरी दौर में शहरी मध्यवर्ग के नौजवान और नयी पीढ़ी को अपने आस-पास की स्थानीयता से लेकर भूमण्डलीकृत विश्व के बीच तक सीधे-जटिल द्वन्द्वों और संघर्षों से जूझते हुए अस्तित्व की कैसी लड़ाई लड़नी पर रही है, इससे भी रू-ब-रू कराते हैं।

नासिरा शर्मा के नयी सदी (21वीं) में आये उपर्युक्त तीनों उपन्यासों के केन्द्र में इलाहाबाद के मध्यवर्गीय शहरी हैं। उनका जीवन और उनकी स्थितियाँ-परिस्थितियाँ इस शहर की गंगा-जमुनी सांस्कृतिक-बौद्धिक माहौल से उपजी अन्तर्धारा की देन है। यहीं जन्मी और यहीं की खास इलाहाबादी रंगत, आबोहवा व मिजा के बीच दम भरते हुए खुद नासिरा शर्मा का भी इलाहाबाद छोड़ने तक विकास हुआ है। यही वजह है कि नासिरा शर्मा की अनेकानेक कहानियों व उपन्यासों के साथ ही इधर के कोई एक दशक में लिखे छपे तीनों उपन्यासों ‘अक्षयवट’, ‘कुइयाँजान’ और ‘ज़ीरो रोड’ में इलाहाबाद की अन्तर्धारा यहाँ से दूर और बाहर रहने के बावजूद उनके दृष्टिपथ में रही है। इनमें ‘ज़ीरो रोड’ कई कारणों से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और उल्लेखनीय है।

‘ज़ीरो रोड’ की मूल कथा इलाहाबाद के सिद्धार्थ, उसके मुहल्ले चक, ‘ज़ीरो रोड’, जैसी शहर की महत्त्वपूर्ण ज़ीरो रोड सड़क के आसपास से लेकर इलाहाबाद के कुछ अन्य इलाकों से जुड़ी हुई है किन्तु, सिद्धार्थ की बेरोज़गारी के माध्यम से ‘ज़ीरो रोड’ आज के भूमण्डलीकृत विश्व की ‘वैश्विक स्थानीयता’ के बड़े वितान से लेकर देश-दुनिया की साम्प्रदायिकता, आतंकवाद, एकधु्रवीय विश्व के वर्चस्ववाद और इस सब में जूझते-जीते, राह खोजते-बनाते या इस कोशिश में अपने को झोंक देते इंसान की कथा कहता है। इस सन्दर्भ में ‘ज़ीरो रोड’ का सिद्धार्थ, नासिरा शर्मा की क़लम से सिरजा हुआ है वैसा ही महत्त्वपूर्ण पात्रा है जैसे कि अमृतलाल नागर के ‘बँूद और समुद्र’ में ‘ताई’ और ‘नाच्यो बहुत गोपाल’ में निरगुनियाँ, जिन्हें हिन्दी के स्वातन्त्रयोत्तर उपन्यास साहित्य में विशेष रूप से चिद्दित-रेखांकित करते हुए अनेक कोणों से प्रक्षेपित किया गया है।

सिद्धार्थ को भी 21वीं सदी के पहले दशक के हिन्दी उपन्यासों में ‘गौरतलब’ और ‘महत्त्वपूर्ण’ पात्रा के रूप में पहचानना मुझे अपरिधर्म महसूस हुआ। यह कहते हुए मुझे सबसे पहले प्रेमचंद याद आए, जिन्होंने हाशिए के लोगों, किसानों, मज़दूरों वंचितों-शोषितों को सम्भ्रान्त और आर्थिक-सामाजिक रूप से प्रभावशाली हैसियत वाले लोगों के मुकाबले और समानान्तर खड़ा किया। ‘रंगभूमि’ का ‘सूरदास’ इस सिलसिले की बड़ी नज़ीर बन गया है।

ज़ीरो रोड में सिद्धार्थ की आद्योपान्त उपस्थिति उसे बेशक नायक का पद देती है परन्तु, नायकत्व का उसमें कोई उल्लेखनीय गुण नहीं है, विशेष रूप से इलाहाबाद में बेकारी.............................................शेष भाग पढ़ने के लिए पत्रिका देखिए

















Friday, November 5, 2010

जल की व्यथा-कथा ‘कुइयाँजान’ के संदर्भ में

एम. हनीफ़ मदार

रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून,

पानी गये न ऊबरे मोती, मानुष, चून।

बचपन में रहीम की इन पंक्तियों का कोई खास अर्थ समझ में नहीं आता था। लेकिन 2005 में एक अख़बार के लिए पानी को लेकर एक कवर स्टोरी लिखते समय रहीम की इन्हीं लाइनों ने दिमाग पर दस्तक दी। लगा कि इन दो लाइनों में रहीम ने इंसान को जीवन के मूलतत्त्व के प्रति सजग रहने का इशारा किया है, और वह भी तब जब न तो पानी की कहीं कमी थी और न ही ऐसी कोई चर्चा ही वजूद में थी। लेखक की यह चिन्ता निश्चित ही समाज के प्रति उसका उत्तरदायित्व थी। यह अलग बात है कि उनके पास दुनिया भर के तात्कालिक आंकड़े मौजूद नहीं थे और ऐसा होना इसलिए भी स्वाभाविक है कि तब मानव जीवन विकास पथ की अन्य प्राथमिकताओं की तरफ ज़्यादा चिंतित या अग्रसर रहा था।

इसके बरअक्स 2005 में ही नासिरा शर्मा का उपन्यास ‘कुइयाँजान’ प्रकाश में आया जो केवल प्रदेश या देश ही नहीं अपितु दुनिया भर के जलीय आंकड़े खुद में समेटे एक विशाल दस्तावेज के रूप में नज़र आया। निःसंकोच उपन्यास को उस लेखिका का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास घोषित किया जाना साहित्य आलोचकों की मजबूरी बन गयी। नामवर सिंह ने कुइयाँजान को 2005 का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास कहा भी।

सदियों से मानव विकास की शतत् प्रक्रिया से गुज़रते हुए हम वर्तमान आधुनिक युग में आ गये। हमने भौतिक सुख- सुविधाओं में अंबार खड़े कर दिये। हमारे विज्ञान ने चालक रहित विमान से लेकर मानव क्लोन तक ईजाद कर दिया। हम चाँद पर जा पहँुचे, जैविक और रासायनिक हथियार हमारी वैज्ञानिक उपलब्धि बने किन्तु जीवन का वह आवश्यक मूल तत्त्व जिसके बिना जीवन की संकल्पना करना ही बेमानी लगने लगता है, ‘स्वच्छजल’ इसके लिए इन तमाम वैज्ञानिक या मानवीय उपलब्धियों में कहीं कोई स्थान नज़र नहीं आता। जबकि जल स्वयं मानव इतिहास की वह पहली

उपलब्धि है जिसे पीकर गयी उसने अपनी प्राण रक्षा की। वह प्यास वह तृष्णा जिसकी तीव्रता मानव जीवन में आज भी कम नहीं है और न ही हो सकेगी। निश्चित ही इन्हीं चिन्ताओं ने लेखिका नासिरा शर्मा को भी व्यथित और विवश किया होगा- ‘कुइयाँजान’ लिखने को। क्योंकि पानी को लेकर नासिरा शर्मा के भीतर उठता भूचाल, एक वैचारिक द्वन्द्व के रूप में पूरे उपन्यास पर छाया रहता है। जल समस्या के संदर्भ में उपन्यास में बार-बार इस बात का उभरना कि - मनुष्य चाहे आधुनिक टैक्नाॅलौजी में कितना ही आगे क्यों न निकल जाय या फिर प्राकृतिम जल संपदा के अक्षय स्रोतों के साथ मानवीय महत्वाकाक्षाओं की खिलवाड़ भले ही क्षणिक सुख समृद्धि के रूप में नज़र आती हो किन्तु वह अपनी जिजीविषा के लिए भीषण और भयंकर परिणामों को भी आमंत्रित कर रहा है। लेखिका की सामाजिक सोच और अपनी दृष्टि में प्रकृति के प्रति मानव का उच्चछृंखल होना दर्शाता है। तब क्या वास्तविक से दूर जाया जा सकता है कि धरती का तीन चैथाई भाग पानी से घिरा होने के बावजूद भी आज हम प्यासे तड़पने को विवश हो रहे हैं? प्रकृति के प्रति बढ़ती हमारी बेरुखी और कुत्सित कार्यवाहियों के परिणामस्वरूप हम जिस प्राकृतिक वरदान जल संपदा को नष्ट कर रहे हैं तो समझ लें कि वह दिन दूर नहीं जब महज पानी को लेकर समूचा विश्व समुदाय एक महायुद्ध को तैयार होगा। दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों के साथ राजस्थान में और अब उत्तर प्रदेश के कुछ शहरों में जिनमें आगरा शहर ताजा उदाहरण हो सकता ह,ै में धरती से पीने को पानी का न निकलना समस्या की विकरालता को स्पष्ट करता है।

चार सौ सोलह पेजों में सिमटा उपन्यास कुइयाँजान नासिरा शर्मा की सपनीली या डरावनी कोरी परिकल्पना नहीं है और न ही स्वांत सुखाय के लिए किया गया सृजन ही है। भले ही सृजन के समय किसी भी साहित्यकार की कलम स्वांत सुखाय ही चलती हो किन्तु उसकी सार्थकता सकारात्मक मानवीय उद्देश्य एवं सामाजिक संदर्भों में ही अन्तर्निहित होती है। सामाजिक संदर्भों में कुइयाँजान का वैचारिक फलक दुनिया को खुद में समा लेने की क्षमता रखता है। उसकी चिन्ताओं में समूचे विश्व का मानव जीवन ही नहीं बल्कि धरती सम्पूर्ण जीवन की चिन्ताएं हैं - ‘‘आज विश्व में आँकड़ों द्वारा ज्ञात होता है कि लगभग एक अरब से ज़्यादा लोगों को साफ पानी पीने के लिए उपलब्ध नहीं है। दो अरब लोगों को नहाने धोने के लिए पानी नहीं मिल पाता, जिससे लोग अनेक तरह के रोगों का शिकार हो रहे हैं। मृत्यु-दर दिन-प्रतिदिन बढ़ती चली जा रही है। भारत में गाँव, कस्बों, शहरों में लोग कुँआ, तालाबों और नदियों से पानी लेते हैं जो अधिकतर गंदा और कीटाणुयुक्त होता है। उसमें प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले संखिया की मिलावट होती है। सारे विश्व में 261 प्रमुख नदियाँ एक से अधिक देशों से होकर गुज़रती हैं। दुनिया के कुल नदी प्रवाह का 80 प्रतिशत इन्हीं में है और जिन देशों से होकर यह गुज़रती हैं उनमें संसार की 40 प्रतिशत जनसंख्या रहती है। पानी के कारण सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तनाव पनपते हैं - जैसे - भारत और पाकिस्तान, भारत और बंगला देश, भारत और नेपाल, सीरिया और तुर्की के बीच स्वयं भारत में कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी को लेकर तनाव की स्थिति पनप चुकी है।’’1 उपन्यास में प्रस्तुत ऐसे आंकड़ों से गुज़रते हुए जल समस्या की वैश्विक विकरालता से साक्षात्कार होता है। तब नासिरा शर्मा का यह महत्त्वपूर्ण सृजन जल समस्या पर लिखा गया - .............................................शेष भाग पढ़ने के लिए पत्रिका देखिए