Thursday, July 31, 2008

सूरदास का भ्रमरगीत

रजनी मेहता
सूरदास ने किया कृष्ण के बाल्य रूप का वर्णन,
भ्रमरगीत में किया उन्होनें निर्गुण ब्रह्रम का खण्ड़न!

कृष्ण चले गये मथुरा गोपियों को छोड़,
और अपनी यादों में किया गोपियों को भाव-विभोर!

उद्धव को था अपने ज्ञान पर अभिमान,
पर वे थे अभी प्रेम की शक्ति से अन्जान!

कृष्ण ने उन्हे भेजा गोपियों के पास,
करवाने इस बात का एहसास,
कभी मत करो अभिमान,
यही देना चाहते थे कृष्ण उद्धव को ज्ञान!

उद्धव पर गोपियों ने किये वचनों के तीखे प्रहार,
कृष्ण भी गोपियों के विरह में तड़पते नजर आते हैं कई बार!

उद्धव हुए गोपियों के सामने पराजित,
नहीं निकाल पाए क्रष्ण को जो गोपियों के हृदय में थे विराजित!?

नहीं दिला पाए गोपियों को निर्गुण ब्रह्रम का ज्ञान,
उद्धव को अन्त में करना पड़ा प्रेम का सम्मान!

जब उद्धव चले ब्रज से मथुरा की और,
उनके जीवन व विचारों में आ गया था परिवर्तन का दौर!

कहलाते हैं सूर जन्म से जन्मांध,
पर भ्रमरगीत ने ड़ाल दी हिन्दी साहित्य में नई जान!

Wednesday, July 30, 2008

रहोगी तुम वही

० सुधा अरोड़ा
एक
क्या यह जरुरी है कि तीन बार घण्टी बजने से पहले दरवाजा खोला ही न जाये ? ऐसा भी कौन-सा पहाड़ काट रही होती हो। आदमी थका-मांदा ऑफिस से आये और पांच मिनट दरवाजे पर ही खड़ा रहे.........
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इसे घर कहते हैं ? यहां कपड़ों का ढेर , वहां खिलौनों का ढेर। इस घर में कोई चीज सलीके से रखी नहीं जा सकती ?
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उफ्‌ ! इस बिस्तर पर तो बैठना मुश्किल है, चादर से पेशाब की गन्ध आ रही है । यहां-वहां पोतड़े सुखाती रहोगी तो गन्ध तो आएगी ही... कभी गद्दे को धूप ही लगवा लिया करो , पर तुम्हारा तो बारह महीने नाक ही बन्द रहता है, तुम्हे कोई गन्ध-दुर्गन्ध नहीं आती ।
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अच्छा, तुम सारा दिन यही करती रहती हो क्या ? जब देखो तो लिथड़ी बैठी हो बच्चों में। मेरी मां ने सात-सात बच्चे पाले थे, फिर भी घर साफ-सुथरा रहता था । तुमने तो दो बच्चों में ही घर की वह दुर्दशा कर रखी है, जैसे घर में क्रिकेट की पूरी टीम पल रही है ।
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फिर बही शर्बत ! तुम्हें अच्छी तरह मालूम है - मेरा गला खराब है। पकड़ा दिया हाथ ठण्डा शर्बत। कभी तो अक्ल का काम किया करो। जाओ, चाय लेकर आओ..... और सुनो, आगे से आते ही ठण्डा शर्बत मत ले आया करो। सामने........बीमार पड़ना अफोर्ड नहीं कर सकता मैं। ऑंफिस में दम लेने की फुर्सत नहीं रहती मुझे....... पर तुम्हें कुछ समझ में नहीं आएगा.....तुम्हें तो अपनी तरह सारी दुनिया स्लो मोशन में चलती दिखाई देती है.......
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सारा दिन घर-घुसरी बनी क्यों बैठी रहती हो, खुली हवा में थोड़ा बाहर निकला करो। ढंग के कपड़े पहनो। बाल संवारने का भी वक्त नहीं मिलता तुम्हें, तो बाल छोटे करवा लो, सूरत भी कुछ सुधर जाएगी। पास-पड़ोस की अच्छी समझदार औरतों में उठा-बैठा करो।
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बाऊजी को खाना दिया ? कितनी बार कहा है, उन्हें देर से खाना हजम नहीं होता, उन्हें वक्त पर खाना दे दिया करो.... दे दिया है ? तो मुहं से बोलो तो सही.....। जब तक बोलोगी नहीं, मुझे कैसे समझ में आएगा ?
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अच्छा सुनो , वह किताब कहां रखी है तुमने? टेबल के ऊपर-नीचे सारा ढूंढ लिया, शेल्फ भी छान मारा। तुमसे कोई चीज ठिकाने पर रखी नहीं जाती? गलती की जो तुमसे पढ़ने को कह दिया। अब वह किताब इस जिन्दगी में तो मिलने से रही।.... तुम औरतों के साथ यही तो दिक्कत है - शादी हुई नहीं, बाल-बच्चे हुए नहीं कि किताबों की दुनिया को अलविदा कह दिया और लग गये नून-तेल-लकड़ी के खटराग में, पढ़ना-लिखना गया भाड़ में.........
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यह कोई खाना है! रोज वही दाल-रोटी-बैंगन-भिण्डी और आ....लू। आलू के बिना भी कोई सब्जी होती है इस हिन्दुस्तान में या नहीं? मटर में आलू, गोभी मे आलू, मेथी में आलू, हर चीज में आ....लू। तुमसे ढंग का खाना भी नहीं बनाया जाता। अब और कुछ नहीं करती हो तो कम-से-कम खाना तो सलीके से बनाया करो।.......जाओ, एक महीना अपनी मां के पास लगा जाओ, उनसे कुछ रेसिपीज नोट करके ले आना.....अम्मा तो तुम्हारी इतना बढ़िया खाना बनाती है, तुम्हे कुछ नहीं सिखाया ? कभी चायनीज बनाओ, कॉण्टीनेण्टल बनाओ...खाने में वेरायटी तो हो.....
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वह किताब जरुर ढूंढ़कर रखना, मुझे वापस देनी है। यह मत कहना -भूल गयी..... तुम्हें आजकल कुछ याद नहीं रहता......
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अब तो दोनों सो गये है, अब तो यहां आ जाओ। बस, मेरे ही लिए तुम्हारे पास वक्त नहीं है। और सुनो...बाऊजी को दवाई देते हुए आना , नहीं तो अभी टेर लगाएंगे........
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आओ, बैठो मेरे पास ! अच्छा, यह बताओ , मैंने इतने ढेर सारे प्रपोजल में से तुम्हें ही शादी के लिए क्यों चुना ? इसलिए कि तुम पढ़ी-लिखी थीं , संगीत - विशरद थीं, गजलों में तुम्हारी दिलचस्पी थी, इतने खूबसूरत लैण्डस्केप तुम्हारे घर की दीवारों पर लगे थे।..... तुमने तुमने आपना यह हाल कैसे बना लिया ? चार किताबें लाकर दीं तुम्हें, एक भी तुमने खोलकर नहीं देखी।.... ऐसी ही बीवियों का शौहर फिर दूसरी खुले दिमागवाली औरतों के चक्कर में पड़ जाते हैं, और तुम्हारे जैसी बीवियां घर में बैठकर टसुए बहाती हैं ?....पर अपने को सुधारने की कोशिश बिल्कुल नहीं करेंगी।
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तुम्हारे तो कपड़ों में से भी बेबी-फूड और तेल-मसालों की गन्ध आ रही है.....सोने से पहले एक बार नहा लिया करो, तुम्हें भी साफ-सुथरा लगे और.......।
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यह लो , मैं बोल रहा हूं और तुम सो भी गयीं। अभी तो साढ़े दस ही बजे हैं, यह कोई सोने का वक्त है ? सिर्फ घर के काम-काज में ही इतना थक जाती हो कि किसी और काम के लायक ही नहीं रहतीं........
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दो

तुम्हारी आदतें कभी सुधरेंगी नहीं। पन्द्रह साल हो गये हमारी शादी को, पर तुमने एक छोटी-सी बात नहीं सीखी कि आदमी थका-मांदा ऑफिस से आये तो एक बार की घण्टी में दरवाजा खोल दिया जाये। तुम उस कोनेवाले कमरे में बैठी ही क्यों रहती हो कि यहां तक आने में इतना वक्त लगे ? मेरे ऑफिस से लौटने के वक्त तुम यहां....इस सोफे पर क्यों नहीं बैठतीं ?
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अब यह घर है ? न मेज पर ऐषट्रे, न बाथरुम में तौलिया...... बस, जहां देखो, किताबें, किताबें, किताबें........मेज पर, द्योल्फ पर, बिस्तर पर, कार्पेट पर, रसोई में, बाथरुम में ..... अब किताबें ही ओढ़ें-बिछायें, किताबें ही पहनें, किताबें ही खायें ?......
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यह कोई वक्त है चाय पीने का ? खाना लगाओ। गर्मी से वैसे ही बेहाल हैं, आते ही चाय थमा दी। कभी ठण्डा नींबू पानी ही ले आया करो।
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अच्छा, इतने अखबार क्यों दिखाई देते हैं यहां ? शहर में जितने अखबार निकलते हैं, सब तुम्हें ही पढ़ने होते हैं ? खबरें तो एक ही होती हैं सबमें, पढ़ने का भूत सवार हो गया है तुम्हें। कुछ होश ही नहीं कि घर कहां जा रहा है, बच्चे कहां जा रहे हैं......
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यह क्या खाना है ? बोर हो गये हैं रोज-रोज सूप पी-पीकर और यह फलाना-ढिमकाना बेक्ड और बॉयल्ड वेजीटेबल खा-खाकर। घर में रोज होटलों जैसा खाना नहीं खाया जाता। इतना न्यूट्रीशन कॉन्शस होने की जरुरत नहीं है। कभी सीधी-सादी दाल-रोटी भी बना दिया करो, लगे तो कि घर में खाना खा रहे हैं। आजकल की औरतें विदेषी नकल में हिन्दुस्तानी मसालों का इस्तेमाल भी भूलती जा रही हैं।
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यह क्या है, मेरे जूते रिपेयर नहीं करवाये तुमने ? और बिजली का बिल भी नहीं भरा ? तुमसे घर में टिककर बैठा जाए, तब न ! स्कूल में पढ़ाती हो, वह क्या काफी नहीं ? ऊपर से यह समाज सेवा का रोग भी पाल लिया अपने सिर पर ! क्यों जाती हो उस फटीचर समाज-सेवा के दफ्तर में? सब हिपोक्रेट औरतें हैं वहां। मिलता क्या है तुम्हें ? न पैसा, न धेला, उल्टा अपनी जेब से आने-जाने का भाड़ा भी फूंकती हो।
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यह है तुम्हारे लाड़ले का रिपोर्ट कार्ड! फेल नहीं होंगे तो और क्या! मां को तो फुर्सत ही नहीं हैं बेटे के लिए। अब मुझसे उम्मीद मत करो कि मैं थका-मांदा लौटकर दोनों को गणित पढ़ाने बैठूंगा। एम. ए. की गोल्ड मेडलिस्ट हा, तुमसे अपने ही बच्चों को पढ़ाया नहीं जाता? तुम्हें नया गणित नहीं आता तो एक टूटर रख लो। अब तो तुम भी कमाती हो, अपना पैसा समाज-सेवा में उड़ाने से तो बेहतर ही है कि बच्चों को किसी लायक बनाओ। सारा दिन एम. टी. वी. देखते रहते हैं।
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यह तुमने बाल इतने छोटे क्यों करवा लिये हैं ? मुझसे पूछा तक नहीं। तुम्हें क्या लगता है, छोटे बालों में बहुत खूबसूरत लगती हो ? यू लुक हॉरिबल ! तुम्हारी उम्र में ज्यादा नहीं तो दस साल और जुड़ जाते हैं। चेहरे पर सूट करें या न करें, फैशन जरुर करो।
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सोना नहीं है क्या ? बारह बज रहे हैं। बहुत पढ़ाकू बन रही हो आजकल। तुम्हे नहीं सोना है तो दूसरे कमरे में जाकर पढ़ो। मेहरबानी करके इस कमरे की बत्ती बुझा दो और मुझे सोने दो।
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अब हाथ से किताब छोड़ो तो सही ! सच कह रहा हूं , मुझे गुस्सा आ गया तो इस कमरे की एक-एक किताब इस खिड़की से नीचे फेंक दूंगा। फिर देखता हूं कैसे.........
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अरे, कमाल है, मैं बोले जा रहा हूं, तुम सुन ही नहीं रही हो। ऐसा भी क्या पढ़ रही हो जिसे पढ़े बिना तुम्हारा जन्म अधूरा रह जाएगा। कितनी भी किताबें पढ़ लो, तुम्हारी बुध्दि में कोई बढ़ोतरी होनेवाली नहीं है। रहोगी तो तुम वही........

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१७०२ , सॉलिटेअर , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई - ४०० ०७६ फोन - ९८२१८ ८३९८० .
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Tuesday, July 29, 2008

गोस्वामी तुलसीदास और उनकी साहित्य साधना

डॉ० शुभिका सिंह
गोस्वामी तुलसीदास की लेखनी पावन गंगाजल के समान मोक्ष प्रदान करने वाली है। जिन्होने वैदिक व आध्यत्मिक धर्म दर्शन के गूढ विषय को ऐसे सहज लोकग्राह्य रूप मे प्रस्तुत किया कि आज सारा हिन्दू समाज उनके द्वारा स्थापित रामदर्शन को अपनी पहचान व आस्था का प्रतीक मानने लगा है।

‘सियाराम मय सब जग जानी' की अनुभूति करने वाले तुलसीदास ने जीवन और जगत की उपेक्षा न करके ‘भनिति' को ‘सुरसरि सम सब कर हित' करने वाला माना। भारतीय जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले महाकवि तुलसी का आविर्भाव ऐसे विषम वातावरण में हुआ जब सारा समाज विच्छिन्न, विश्रृंखल, लक्ष्यहीन व आदर्श हीन हो रहा था। लोकदर्शी तुलसी ने तत्कालीन समाज की पीड़ा, प्रतारणा से तादात्म्य स्थापित कर उसका सच्चा प्रतिबिम्ब अपनी रचनाओं में उपस्थित किया। साधनहीन, अभावग्रस्त, दीन-हीन जाति का उद्धार असुर संहारक धर्मधुरिन कलि कलुष विभंजन राम का मर्यादित दिव्य लोकानुप्रेरक चरित्र ही कर सकता था इसीलिए उन्होंने तंद्राग्रस्त समाज के उद्बोधन के लिए लोकग्राह्य पद्धति को आधार बनाकर मर्यादा पुरूषोत्तम राम के लोकोपकारी व कल्याणकारी चरित्र का आदर्श प्रस्तुत कर अयात्म और धर्म को जीवन में उतारने का वन्दनीय कार्य किया। करूणायत, सुखमंदिर, गुणधाम श्री राम के ‘मंगलभवन अमंगलहारी ' रूप के सान्निध्य में सृष्टि के प्राणी मात्र, जड़ प्रकृति तथा अमगंलजनक असत्‌ प्रवृत्तियाँ सात्विक व मंगलमयी बन जाती है। ऐसे ‘लोकमंगल के विधान श्री राम से जुड़कर सभी तत्व स्वतः ही मंगलमयी हो जाते है। अतः उनका स्मरण सर्वत्र ही शुभता की सृष्टि करने वाला है और उनकी लोक मंगल विधायिनी कथा भारतीय राष्ट्रीय परम्परा की परम भव्य और मंगलमय गाथा है।

युगदृष्टा कवि तुलसी ने बड़ी निर्भीकता से तत्कालीन शासकों की दुर्नीति, स्वेच्छाचारी प्रवृत्ति, निरंकुश शासन एवं तज्जनित जनता की संत्रस्त दशा तथा आ आर्थिकहीनता का वर्णन कर आर्थिक वैषम्य की आड़ में पनप रहे सामाजिक विद्रोह की ओर संकेत कियाः-
‘ऊँचे नीचे करम धरम अधरम करि,
पेट ही को पचत बेचत बेटा बेटकी
तुलसी बुझाइ एक राम घनष्याम ही ते,
आगि बड़वागि ते बड़ी है आग पेट की॥'

तुलसी की उपरोक्त पंक्ति उस कटु सामाजिक सत्य को उद्घाटित करती है जिसकी भीषणता में आज सारा विष्व भुन रहा है। उनकी मंगलमयी दृष्टि का मूल था- भेदभाव से शून्य साम्यवादी समाज की स्थापना। भीषणता और सरसता, कोमलता और कठोरता, कटुता और मधुरता, प्रचण्डता और मृदुता का सामजस्य ही लोकधर्म का सौन्दर्य है। सौन्दर्य का यह उद्घाटन असौन्दर्य का आवरण हटाकर होता है।

तुलसी ने अपनी इसी लोकमांगलिक दृष्टि द्वारा जनमानस की नैसर्गिक जीवन की अभिव्यक्ति को लोक कल्याणार्थ सहज व आदर्श रूप में प्रस्तुत किया। जनता के गिरते नैतिक स्तर को उठाने के लिए उन्होनें श्री राम के दिव्य चरित्र व शील स्थापना के प्रति अपनी प्रतिबद्धता ज्ञापित की। समाज की आवश्य कतानुसार लोकाराधन के व्रती उपास्य के उपासक तुलसी ने ऐसी संतुलित लोकदृष्टि अपनायी, जिसने समाज में व्याप्त बुध और अबुध दोनों का सामीप्य प्राप्त कर लोकाराधन रूप की प्रतिष्ठा की। सत्य, धर्म, न्याय, मर्यादा, सुनीति, विवेक और आचरण जैसे मूल्यों की प्रतिस्थापना के प्रति तुलसी सदैव सचेत रहे। अपनी विषाल समन्वयकारी बुद्धि का सदुपयोग कर लोकदर्शी तुलसी ने मानस में समन्वय का जो आदर्श प्रस्तुत किया, वह अविस्मरणीय है। सगुण साकार राम में गुण और रूप का, शक्ति, शील और सौन्दर्य का अनुपम समन्वय उनकी लोक कल्याणकारी भावना का ही प्रमाण है। मध्यम मार्ग को अपनाते हुए तुलसी ने वर्णाश्रम धर्म की प्रतिष्ठा को आवश्यक मान ‘केवट प्रसंग' द्वारा भक्ति के क्षेत्र में ब्राह्यण और शूद्र को समान स्थान दिया। भक्ति की रक्षा हेतु उन्होने ‘सरजू नाम सुमंगल मूला, लोकवेद मत मंजुल कूला' वाली सरिता द्वारा आत्मपक्ष और लोकपक्ष में एकात्मकता स्थापित कर समाज के उन्नयन का प्रयास किया। सगुण-निर्गुण, विद्या-अविद्या, माया-प्रकृति, शैव-वैष्णव, प्रवृति-निवृति, भोग और त्याग का समन्वित रूप राम के चरित्र में दिखाकर धर्म के अति सहज मार्ग की नींव रखी।

प्रतिभा शाली कवि तुलसी ने भारतीय संस्कृति एवं युग जीवन का विशद् प्रतिबिम्ब और सर्वोदय रामराज्य की स्थापना का महान संदेश अवधपति राम के माध्यम से प्रस्तुत किया। ‘नहि दरिद्र कोउ दुःखी न दीना' के माध्यम से तुलसी ने रामराज्य का लोक कल्याणकारी रूप वर्णित करके उसे युग-युग के लिए एक प्रेरणास्पद आदर्श बना दिया। ‘जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी, ते नर अवसि नरक अधिकारी' के प्रति वह सदैव सचेत रहे। इस प्रकार सरल स्वभाव वाले सात्विक गुणों के पूंजीभूत रूप श्री राम सृष्टि रूप में शुभ का प्रतीक बन गए।
‘जे चेतन कर जड़ करे, जड़हि करै चैतन्य।'

कृपालु श्री हरि विष्णु के रामावतार के पीछे उनका एकमात्र उद्देश्य जनमानस में भव्य भावों और विचारों की प्रतिष्ठा द्वारा आदर्श समाज की स्थापना था। ब्रह्नानन्द सहोदय श्री राम के प्रत्येक कार्य लोकमंगल की भावना से अनुप्राणित हैं। वह उदात्त ज्ञानात्मक मूल्यों और आचरणगत व्यवहारिक क्रियाकलापों का मणिकांचन योग है। ‘जगमंगल गुनग्राम राम के' कहकर तुलसी ने सम्पूर्ण प्राणी मात्र चर, अचर, सज्जन, दुर्जन के कल्याण की कामना की है।

‘मुखिया मुख सो चाहिए, खान पान कहुँ एक' कहकर उन्होने राजा के आदर्श तथा प्रजातन्त्रीय व्यवस्था के मूल तत्व को प्रस्तुत किया। लोकरंजन और लोकमंगल के सिद्धान्त पर आधारित उनके रामराज्य में दण्डनीति और भेदनीति का पूर्णतः अभाव था। उनका रामराज्य, सामुदायिक कल्याण का आदर्श रूप है। मन, वचन, कर्म से पवित्र भारतीय संस्कृति के साक्षात्‌ स्वरूप श्रीराम ने समस्त भारतवर्ष को इस प्रकार सुश्रृखंलित कर दिया कि आज तक उनके आदर्श रामराज्य की गाथा गायी जाती है। जीवन रूपी संग्राम में सत्‌वृतियों के प्रतीक तुलसी के आराध्य जिस धर्म रथ पर आसीन है उसकी विजय निश्चित है-
‘सौरज धीरज तेहि रथ यात्रा, सत्य शील दृढ़ध्वजा पताका'।

तुलसी साहित्य में शिष्ट संस्कृति व लोक संस्कृति दोनों का श्रेष्ठ सम्मिलन है, जहाँ एक ओर उन्होने शिष्ट संस्कृति द्वारा आदर्श जीवन मूल्यों की स्थापना की, वही लोक संस्कृति द्वारा जीवन को गहराई से समझने का आधार दिया। विराट् भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हुए तुलसी ने मानवीय एकता, समता, विश्व-बन्धुत्व, आपसी भाईचारे की स्थापना कर अभिजात्य पात्रों को प्रकृत रूप में प्रस्तुत किया। मानव जीवन की गहन आस्थाओं व अनुभूतियों के प्रतीक रीतिरिवाजों व पावन संस्कारों के अतिरिक्त तुलसी साहित्य में समाविष्ट विविध देवी-देवताओं की मंगल पूजा, व्रत, उपासना, ज्ञान, कर्म, भाग्य, ज्योतिष आदि विषयों की गूढ चर्चा हमें अपनी भारतीय संस्कृति का बोध कराकर स्थिति शील व विकासशील बनाती है। ‘घाट मनोहर चारि' के माध्यम से उन्होने श्रेष्ठ संवाद रूपी चार घाटों का निर्माण करके राजाराम की अलौकिक कथा को अनुपम कलेवर में बाँधकर पावन गंगा के समान पूज्यनीय बना दिया। उन्होनें सारी समस्याओं का निदान भक्ति में माना है, जिसके सान्निध्य में सब कुछ सत्य शिव और सुन्दर हो जाता है।

नारी की शुचिता व पवित्रता की रक्षा करना उनकी मर्यादावाद का एक अभिन्न अंग है। सम्पूर्ण तुलसी साहित्य में प्रेम भाव के वर्णन में चाहे कितनी रसमयता, गहनता व श्रृंगारिकता क्यों न हो, नारी की गरिमा व रिश्तों की मर्यादा के प्रति पूर्ण सचेतता बरती गयी है।
तुलसी ने दरिद्रता, दुःख, पीड़ा, कष्ट से टूटते समाज की मंगलाशा व भक्ति को आधार बनाकर जीने का शुभ संकल्प दिया। तेजी से बदलते कालचक्र के परिणामस्वरूप अतिआधुनिकता के कारण जहां आज मानव का अस्तित्व ही संकट में पड़ गया है वही ऐसी स्थिति में तुलसी साहित्य जीवन रक्षक संजीवनी के समान निर्जीव प्राणियों में चेतना का संचार कर रहा है। उनके साहित्य में काव्य कौशल और लोकमंगल की चरम परिणति है जो मुक्तामणि के समान सुन्दर और मूल्यवान है। गोस्वामी जी के ईष्वरावतार राम हमारे बीच ईष्वरता दिखाने नही आए थे, मनुष्यता दिखाने आए थे, वह मनुष्यता जिसकी हमारे समाज को आवश्कता थी, है और हमेशा रहेगी।
निष्कर्षतः तुलसी ने लोक में व्याप्त अन्याय, अत्याचार, अनाचार, पाखण्ड की धज्जियाँ उड़ाकर जिस सियाराम के लोकपावन अमृतमयी यश का गान किया, वह मार्तण्ड के समान भटके हुए राहगीरों को राह दिखाने वाला है। भारतीय संस्कृति के संरक्षण तथा सामाजिक मर्यादा का आदर्श स्थापित करने में तुलसीदास का योगदान अप्रतिम है। राम काव्य के एक छत्र सम्राट गोस्वामी जी के काव्य में जो मार्मिकता, भाव प्रवणता, विशदता व्यवस्थापकता, गुरूत्व- गाम्भीर्यता व उदारता है वह अन्यत्र दुर्लभ है।
वाक्य-ज्ञान अत्यन्त निपुन भव पार न पावै कोई।
निसि गृह मध्य दीप की बातन तम निवृत्त नहिं होई॥

Monday, July 28, 2008

'एक ख़ास तबक़ा डरता है...ये सोच आगे न जाए...' नासिरा



नासिरा शर्मा से अचला शर्मा की बातचीत


(हिंदी की जानी-मानी लेखिका नासिरा शर्मा के उपन्यास 'कुइयाँजान' को लंदन में इंदु शर्मा कथा सम्मान से नवाज़ा गया है.)
नासिरा जी सबसे पहले आपको इस सम्मान के लिए बहुत-बहुत बधाई. मैं आपसे बरसों से मिलना चाहती थी जबसे आपका पहला उपन्यास 'सात नदियाँ एक समंदर' पढ़ा था. बताइए कितने साल हो गए हैं इसे?
24 साल तो हो गए हैं.
चौबीस साल की मेरी हसरत आज पूरी हो रही है, 2008 में. मुझे जहाँ तक याद पड़ता है 'सात नदियाँ एक समंदर' ईरानी क्रांति की पृष्ठभूमि में सात लड़कियों के संघर्ष की कहानी थी. तब से लेकर 'कुइयाँजान' तक आपने कई पुस्तकें लिखी हैं लेकिन मेरा पहला प्रश्न सात नदियाँ के विषय में है. आप इलाहाबाद की रहने वाली हैं दिल्ली में आपने काम किया है. अपने उपन्यास के लिए जो पात्र, जो पृष्ठभूमि आपने चुनी उसके लिए क्या आपको ख़ास मेहनत, रिसर्च करनी पड़ी?
मैंने फ़ारसी में एमए किया जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से. पृष्ठभूमि तो थी ही लेकिन 1976 में जब ईरान गई तो वहाँ अनजाने में कुछ इंक़लाबी लोगों से दोस्ती हो गई. वहाँ लोगों ने भी हमारी काफ़ी मदद की ये सोचकर कि हमारे यहाँ प्रेस आज़ाद है और उनकी चीज़ें यहाँ छपेंगी. जब मैं दोबारा 1978 में गई और 1979 में लौटी तो शाह के ख़िलाफ़, व्यक्ति के ख़िलाफ़ नहीं, व्यवस्था के खिलाफ़, काफ़ी कुछ लिखा क्योंकि वहाँ सारा मूवमेंट जो था वह ज़बान की, क़लम की आज़ादी के लिए था. वहाँ पर पूरी क्रांति में औरतों का बड़ा रोल मैंने देखा. तो कहा जा सकता है कि जो कुछ मैंने देखा वही उपन्यासों में उतर कर आया.
और अब कुइयाँजान के लिए आपको इंदु शर्मा कथा सम्मान मिला है. इस बीच आपने इतनी पुस्तकें लिखी हैं. आप अपनी इस साहित्य यात्रा में और कौन सी अपनी पुस्तकें महत्वपूर्ण मानती हैं?
लेखक जब भी कुछ लिखता है तो उसे लगता है कि वह बड़ी ईमानदारी से काम कर रहा है. 'शालमली' बहुत चर्चित हुई, और उसे भी पुरस्कार मिला. इसी तरह 'संगसार' थी उसे भी पुरस्कार मिला. और भी कई क़िताबें हैं जिनके लिए मुझे सम्मान मिले लेकिन हाँ, 'कुइयाँजान' के लिए मुझे बड़ी हैरत हुई. 2005 में ये उपन्यास आया था. सबसे पहले मैंने सम्मान देने वालों से पूछा कि 'जजेज़' कौन थे? तो उन्होंने कहा कि हम ये ज़ाहिर नहीं करते. इस बात की मुझे खुशी है कि पानी जैसी अंतरराष्ट्रीय समस्या पर यह उपन्यास है. सबसे पहले 'बीबीसी हिंदी डॉट कॉम' ने ही अपनी पत्रिका में इसका अंश छापा था. मुझे बड़ी ख़ुशी हो रही है कि आज हम इसी उपन्यास पर फिर बात कर रहे हैं.
आप 'कुइयाँजान' के बारे में थोड़ा सा और बताएँगी....पानी की समस्या को आपने किस तरह से, किन पात्रों के माध्यम से, किस पृष्ठभूमि के ज़रिए उठाया है?
यह एक लंबा 'ऑबज़र्वेशन' है. मैं ये बात देख रही थी कि जब नल में पानी नहीं है तो घर में रिश्ते गड़बड़ा जाते हैं. सड़क पर मारपीट हो जाती है. फिर यह देखती रही मैं कि धीरे-धीरे रिश्ते शुष्क होते जा रहे हैं, संवेदनाएँ शुष्क होती जा रही हैं. इस उपन्यास में दोनों तरह की प्यास है. एक तो साफ़-सुथरे पीने के पानी की और दूसरी रिश्तों की. इसमें सारे मौसमों का मैंने ज़िक्र किया है और उसमें पानी की समस्या को लिया है.
और सबसे बड़ी बात यह कि मैं जब बीकानेर गई थी और मुझे पता चला कि गंदा पानी पीने से एक ख़ास क़िस्म के केंचुए जैसे कीड़े लोगों के पैरों से निकलते हैं तो मैं कांप गई. इस बात से भी मैं परेशान रहती थी कि नदियाँ कैसे जोड़ी जाएँगी. नदियों को जोड़ने का एक अनुभव हो चुका था. लखनऊ के एक नवाब ने यह किया था. गोमती और गंगा नदी को जोड़ने की कोशिश की गई थी जो नाकाम रही थी. इस सब को लेकर मेरी परेशानियाँ थी कि मैं ऐसी चीज़ लिखूँ जो लोगों को अंदर तक झिंझोड़ दे. शायद इसी वजह से इसे काफ़ी पसंद किया गया.
आप नहीं सोचतीं कि इतनी बड़ी अंतरराष्ट्रीय समस्या पर है यह उपन्यास है इसे अंग्रेज़ी में भी होना चाहिए?

जिस वक्त यह सम्मान मुझे मिला था तो लोगों ने मुझसे कहा कि इसका अनुवाद हो जाएगा. लेकिन मैंने कहा कि इसका कोई ताल्लुक़ अनुवाद से तो है नहीं. अब ये है कि कोई उठाए इस चीज़ को तो अलग बात है. लेखक इसमें क्या करेगा? क्योंकि कई ऐसे हिंदी के लेखक हैं जिनके उपन्यासों का अनुवाद हुआ लेकिन उन पर कोई 'फ़ोकस' नहीं हुआ. क्योंकि या तो प्रकाशक उन्हें उस तरह से 'लॉंच' करे जैसे बाहर की दुनिया में होता है और बहुत बड़ी रक़म लेखकों को दी जाती है.
जब तक वह सारा प्रोग्राम नहीं होगा तब तक हम ऐसे धीरे-धीरे चलते रहेंगे. क्योंकि हमारे यहाँ प्रकाशक ऐसा नहीं करते हैं. लेखक के भरोसे ही, उसके नाम के भरोसे, उसकी क़लम के भरोसे किताब बेचते हैं. और एक दूसरी तहज़ीब भी देखने में आ रही है कि नए लेखक, या वह लेखक जो जल्दबाज़ी में हैं, वे अपना पैसा लगा कर किताब छपवाते हैं, बड़ी-बड़ी गोष्ठियाँ करवाते हैं. इसकी भी एक टकराहट हिंदोस्तान में देखने को मिल रही है.
मूल समस्या आप क्या समझती हैं - पैसे की, या फिर यह कि प्रकाशक और ज़्यादा ज़िम्मेदारी ले और किताब को ढंग से 'प्रमोट' करे?
असल में हालत ये हो रही है कि जिस तरह से कोई भी पेशा आपको रोज़ी-रोटी देता है उसी तरह किताब लिखना भी एक पेशा मान लिया गया है. जैसा पहले था कि एक अच्छे लेखक, उसकी सच्ची निष्ठा को, एक अच्छी क़लम को, एक अच्छी सोच को आगे ले जाना है, वो अब नहीं रहा. आज समाज कुछ ऐसा हो गया है - एक ख़ास तबक़े को ऐसा डर लगता है कि यह सोच आगे तक ना जाए.

मतलब चर्चा नहीं होती...
चर्चा भी होती है लेकिन जिस तरह से क़िताबों को लोगों तक पहुँचाया जाना चाहिए वो नहीं किया जाता. लेखक तो लोगों तक अपनी क़िताब पहुँचाएगा नहीं. उसने तो अपना काम कर दिया.
तो एक लेखक के तौर पर जब आप उपन्यास लिखती हैं तो वह क्या मूड होता है, क्या मनःस्थिति होती है, क्या उसकी प्रक्रिया होती है, यानी कि रचना प्रक्रिया
देखो, कहानी लिखते वक़्त तो तुम्हें ख़ुद अंदाज़ा होगा, तुम ख़ुद इतनी प्यारी कहानियाँ लिखती हो...आप तो जानती हैं कि आदमी एक उबाल, एक बुख़ार, एक कैफ़ियत से गुज़रता है और बहुत जल्द ही चंद पन्ने रंग डालता है. लेकिन उपन्यास एक आपकी ही बसाई दुनिया होती है जिसमें आपको ख़ुद जीना पड़ता है. इतने ढेर सारे किरदार... मैंने एक लेख लिखा है कि मैंने कितने घर बनाए. ऐसा आर्किटेक्ट बनना पड़ता है. जब हम नॉवेल लिखते हैं तो घर भी चुनते हैं, मुहल्ला भी चुनते हैं, उसमें किरदार रखते हैं, उसकी सजावट भी देखते हैं.
जब मेरा अपना घर बन रहा था तो उसे देखकर मुझे ख़याल आया कि मकान बनाते वक्त दीवारें नीचे से ऊपर की तरफ़ बढ़ती हैं. लेकिन हम जब लिखते हैं तो लेखक से नीचे आते हैं. उपन्यास लिखना दरअसल अपने को चारों तरफ़ से काटना और ऐसी जगह बैठकर लिखना है जहाँ आपके चारों तरफ़ क़ाग़ज़ बिख़रे हुए हों, जिन्हें आपको रोज़ाना समेट कर न रखना हो. बहुत सारे ड्राफ़्ट बनाने पड़ते हैं. सामान्य नहीं रहता आदमी. वैसे भी हम लोग आसामान्य ही हैं.
उस दौरान जो आपका बाक़ी जीवन है, उससे क्या टकराहट होती है. खाना बनाना, बच्चों को संभालना?
बिल्कुल टकराहट होती है. इसलिए उपन्यास कोई जल्दी नहीं लिखता. उसके लिए परिवेश चाहिए, सुक़ून चाहिए. और अगर वह नहीं मिलता तो या तो आदमी कविताएँ लिखता है या कहानियाँ लिखता है. आपको एक किरदार को अंत तक ले जाना होता है. एक पूरी आबादी आपके साथ चल रही होती है. बच्चे हैं, सड़क है, जानवर हैं...सड़क है.
अनुशासन हैं आपमें?
लेखन को लेकर बिल्कुल अनुशासित हूँ मैं.
अब तक कितने उपन्यास हो गए हैं?

शालमली, ठीकरे की मंगनी, एक बँटवारे पर है- ज़िंदा मुहावरे. उसके बाद मैंने 12 साल तक नहीं लिखा. क्योंकि वह सुक़ून सा नहीं था. यह दौर वह था जब जेएनयू का स्टडीरूम मुझे छोड़ना पडा था. उससे हम उखड़े लेकिन लेखन तो नहीं छूटा पर उपन्यास नहीं आया. तो बारह साल बाद मेरा 'अक्षयवट' आया, इसके बाद एक और उपन्यास आया और अब 'कुइयाँजान'.
आपने देखा कि मैं आपसे वे सवाल बाद में कर रही हूँ जो बहुत से लोग शायद पहले करते हैं. अब यह बताइए कि आपने लिखना कब शुरू किया और क्यों शुरू किया?
हमारे घर का वातावरण ऐसा था कि सब लिखते-पढ़ते रहते थे. बच्चे नकल करते ही हैं. मैं भी लिखने लगी. स्कूल में लिखने पर एक-आध ईनाम भी मिल गए. लेकिन संजीदगी से अपने अंदर के उबाल को सहज बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई शादी के बाद.
आप मेरे सवाल ख़ुद मुझे सौंप रहीं हैं. तो शादी की बात करें. आप इलाहाबाद में एक मुस्लिम परिवार में पली-बढ़ीं. शादी आपने की जेएनयू के डॉक्टर शर्मा से. कुछ उस बारे में बताएँ?
डॉक्टर शर्मा हमारे भूगोल के प्रोफ़ेसर थे. और हम लोगों ने तय किया कि शादी करनी है. बाद में उनको स्कॉलरशिप मिल गई 'ब्रिटिश काउंसिल' से. थार पर 'पीएचडी' जमा करने के लिए ये एडिनबरा आ गए. 'स्कॉलरशिप' में परिवार के लिए भी भत्ता शामिल था. बस कोर्टशिप हुई. 1967 में हमारी शादी हुई. तीन साल हम एडिनबरा में ही रहे. वहीं दो बच्चे भी हुए.
जितनी सहजता से आपने इस यात्रा के बारे में बताया है, क्या आपकी ये यात्रा उतनी ही आसान रही?

मुझे उस तरह की कोई तकलीफ़ नहीं हुई. आपस में भी कोई उलझन नहीं रही क्योंकि हम दोनों ही मज़हबी नहीं थे. मुहब्बत करना तो सब जानते हैं लेकिन मुहब्बत के साथ एक-दूसरे का आदर करना बहुत कम लोग जानते हैं. मुहब्बत जब होती है तो एक खुलापन आ जाता है, आप दानी हो जाते हैं. और मेरी ज़िंदगी ने भी बहुत कुछ दिया. उस दौर में एडिनबरा जैसी ख़ूबसूरत जगह पर रहना और एक उम्दा ज़िंदगी जीना. उसके बाद जेएनयू में ज़िंदगी शुरू हुई, जो कि क्रीम कही जाती थी और वहाँ का माहौल, लगातार विदेश यात्राएँ. इन सबने हमारे व्यक्तित्व को बढ़ने में बहुत मदद की. और शायद पहले से जो ख़ूबियाँ थीं, वे उभरीं और जो बुराइयाँ थीं वे दबीं.
और घर-बाहर, समाज, रिश्तेदार-उन सबके लिए भी सहज था यह?
आज मैं कह सकती हूँ कि मेरी ज़िंदगी को देखकर बहुत से लोगों ने इस तरह से शादियाँ कीं. मेरा मानना है कि आप अपने को उतना नहीं जानते जितना लोग आपको ऑबज़र्व करते हैं.
अब आख़िरी सवाल की तरफ़ आती हूँ. कुईयाँजान लिखा गया, पुरस्कार भी मिल गया. अब आगला प्रोजेक्ट क्या है. प्रोजेक्ट शब्द का इस्तेमाल मैं इसलिए कर रही हूँ क्योंकि आपके उपन्यासों में, सिर्फ़ एक घर नहीं होता, जैसा आपने कहा, बल्कि एक पूरा मुल्क, समाज, उसके पीछे की राजनीति दिखाई देती है. ज़ाहिर है ऐसा उपन्यास लिखने से पहले बहुत काम करना पड़ता है.
मेरा जो तीसरा उपन्यास 'ज़ीरो रोड' है, वह ज्ञानपीठ से आ रहा है. इलाहाबाद की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है ये उपन्यास. कुछ इसके बारे में भी कहना चाहूँगी. जब मैं दुबई गई, दुबई परियों जैसा मुल्क है. लेकिन जिस चीज़ ने मुझे झिंझोड़ा, वह यह थी कि वहाँ 65 प्रतिशत लोग हिंदुस्तानी थे. और साहब, अरब भी उनसे हिंदुस्तानी में बात कर रहा है और वे भी. मुझे लगा ये क्या हो रहा है. धीरे-धीरे यह बात मेरे अंदर जमने लगी और एक उपन्यास आ गया- ज़ीरो रोड. जो इलाहाबाद के ज़ीरो रोड से शुरू होता है और दुबई जाता है और दुबई से इलाहाबाद के ज़ीरो रोड वापस आता है.
लेकिन इस बीच मैंने अफ़ग़ानिस्तान और ईरान के इनक़लाब देखे. ज़िंदगी देखी, बहुतों के तलाक़ देखे, और बहुत सारों की उम्मीदों को बिखरते देखा, सियासत को देखा, दुनिया की राजनीति को देखा, वो जा कहाँ रही है. बम की संस्कृति जन्म ले रही है. हम जा कहाँ रहे हैं. एक तरफ़ हम लोगों को बुरी से-बुरी बीमारी से निजात दिला कर आरामदेह ज़िंदगी दे रहे हैं और दूसरी तरफ़ मिनटों में उसे तबाह कर दे रहे हैं. इसी के मद्देनज़र 'ज़ीरो रोड' वजूद में आया.
वैसे मैं एक नए उपन्यास पर भी काम कर रही हूँ. उसमें मैंने 'हुसैनी ब्राह्मण' के किरदार को लिया है. बहुत कम लोगों को पता होगा कि करबला की लड़ाई में दत्त लोगों ने बड़े ज़ोर-शोर से हिस्सा लिया था जो अब तक हुसैनी ब्राह्मण कहलाते हैं. इस उपन्यास की पृष्ठभूमि लखनऊ की है. इस उपन्यास में मैंने 'मुता' का ज़िक्र भी किया है. जैसे गंधर्व विवाह होते हैं, वैसे ही शिया मुसलमानों में 'मुता' होता है.
जिस ज़माने में बड़ी जंगें हुआ करती थीं, उस समय जो विधवाएँ थीं और जो सिपाही थे, उनके ख़याल से यह चलन शुरू हुआ. 'मुता' उन विधवा स्त्रियों से, जो खुद भी शादी की ख्वाहिश रखती हों, उनसे एक 'कॉन्ट्रेक्ट मैरिज' की तरह है. निकाह का 'कॉन्ट्रेक्ट' ख़त्म होने पर तलाक़ ले लिया, महर दे दिया, बच्चा होने पर नाम-नुफ़का दे दिया. लेकिन कई बार ये शादी पूरी ज़िंदगी चल जाती थी. कुछ लोग हालांकि इसके ख़िलाफ़ हैं. लेकिन अगर मैं उसके लिए आज का शब्द 'स्त्री विमर्श' इस्तेमाल करूँ तो ये एक बहुत बड़ा इंकलाबी क़दम था.
कब तक ख़त्म होगा ये उपन्यास ?
करबला की ज़्यादा जानकारी न हो पाने की वजह से मैं अटक गई हूँ.
नासिरा जी इस बातचीत के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद.

साभारः बीबीसी हिंदी सेवा प्रमुख

Sunday, July 27, 2008

तारीख़ी सनद

नासिरा शर्मा
उस दिन मैदाने ज़ाले ने ख़ून के छीटों से समय की सबसे सुंदर अल्पना अपने सीने पर सजाई थी. पौ फटते ही तारीख़ जैसे अपना कलम लेकर समय की सबसे लोमहर्षक कथा लिखने को बैठ गई थी और मैं अपने हाथ में पकड़ी मशीनगन से हमवतनों का सीना छलनी करने के लिए आमादा सिर्फ़ हुक्म का मुंतज़िर था.
सरकार के साथ गद्दारी और बगावत करने की एक सज़ा थी, वह थी...मौत. नन्हे से शब्द ‘फायर’ की गूँज के साथ मशीनगनों के दहाने आग का दरिया उगलने लगे थे और तब काली चादरों में लिपटे औरतों के बदन से टपकते ख़ून से धरती पर उभरते बेल-बूटे, बच्चों की चीखों से ख़ून के आंसू रोता आस्माँ, मर्दों की आह व बुका से फ़रियाद करती चहार सू...
हमने तुम्हें फूल दिए थे सिपाही तुमने हमें गोली के शूल दिए सिपाही.
इनसानी आवाज़ें मशीनगन की आवाज़ों में डूबकर लाशों के अंबार में ढल गई थीं. चिनार के पेड़ों की शाखों ने अपनी गरदनें झुका ली थीं और उन पर बैठी चिड़ियां अपना घोंसला छोड़कर चीख़ती जाने किस वीराने की ओर उड़ गई थीं.
ज़मीन पर पड़ी लाशों के ढेर में ‘महवश’ भी थी, जिसकी जवानी गुंचों की तरह उसके सीने फूटी थी मगर अब शकायक के सुर्ख फूलों में ढल चुकी थी.
लाशों के इसी मलवे में ‘हसन’ भी था जिसकी तुलना जबान से ‘मल्ग बल चाह’ (मर्ग बर शाह) की मीठी धुन उभरती थी. उसकी ज़िंदगी का साज़ खामोश...अब हमेशा के लिए खामोश टूटा पड़ा था.
जिस्मों से दबी एकदम नीचे ‘जैनब’ की लाश थी. जैनब जिसने टूटकर ज़िंदगी को चाहा था. ज़िंदगी में विभिन्न रंग के रंगीन ताश के पत्ते फेंटे थे. इस जुए में वह हारी भी थी और जीती थी, मगर आज की जीत का नूर ही निराला था...शफक की तरह ताज़ादम और आग की तरह सुर्ख़ और गरम.
ये एक ही खानदान के तीन लोग थे जिन्हें मैं जानता था...बहुत करीब से जानता था, जिन्होंने मैदाने ज़ाले की सुंदरता में एक फूल दो पत्तियों का इज़ाफा किया था.
उस दिन सुबह मुँह अंधेरे ही लोग घर से निकलकर ‘मैदान ज़ाले’ की ओर चल पड़े थे मगर उन्हें क्या पता था कि उनके इस गमन से फ़ायदा उठाकर भोर का तारा ख़ून के फव्वारों में बदल जाएगा. ‘मार्शल ला’ का ऐलान कब हुआ, उन्हें पता न लग सका. रेडियो खोलने की किसे सुध थी, फिर कौन सा ख़बर आने का समय था? घरों से आ-आकर लोग रस्सियों की नाजुक आड़ के पीछे सड़क और फुटपाथों पर बैठ गए थे. वे अपना मूक आक्रोश व्यक्त करने आए थे, मगर अचानक गोलियों के अंगारों ने दस मिनट के अंदर पंक्तिबद्ध बैठे निहत्थे लोगों को क्रोध से भून डाला था और देखते-ही-देखते तड़पते बदन सड़क पर लौटते, दर्द से ऐंठते, दम तोड़ते-सिमटते हुए तले-ऊपर हो गए थे वैसे अढ़हती की कोठरी में ज़मीन से लेकर छत तक चावल की बोरियाँ एक-दूसरे पर चुन दी गई हो.
वह सारा दृश्य ऊँचाई से देखने पर वास्तव में हृदय-विदारक था, मगर मेरी आँखें सब कुछ देखकर भी हाथ का साथ नहीं दे पा रही थीं, न हाथ मेरे दिल व दिमाग बल्कि ज़िंदगी भर की सधी उंगलियाँ मशीनगन पर अपना दबाव कायम रखे थीं.
माँ, मैं ठीक कर रहा हूँ. आज़ादी नजदीक है, वह देखो! अब तो आज़ादी की हवा भी चलने लगी है, सूंघो! कैसी प्यारी मदमाती सुगंध भरी है इस शरद ऋतु की हवा में. आज़ादी की भीनी-भीनी महक या ख़ुदा. कल जब यह सुगंध खुलकर फैलेगी तो कैसा अनुभव होगा

लाशों के सामने कुछ दूर पर पुराने जूते, सैंडिलें, पर्स, कपड़े पोटलियाँ जिनमें खाने का सामान था, फटे अख़बार और कागज़ों के ढेर पड़े थे. अधिकतर लोग पुराने तेहरान के निचले इलाके से थे. गरीब, फकीर जिनकी उम्मीदें कल से अधिक अपने द्वारा लगाए जाने वाले इंकलाब पर थीं.
गोलियों से खाली मशीनगन को हाथ में पकड़े मैं बेहिस खड़ा था. मेरी आँखें जख्मियों का पीछा कर रही थीं जिन्हें लाशों के बीच से निकालकर, वैन में डालकर उपचार के लिए अस्पताल ले जाया जा रहा था. मुरदों के ढेर पर गड़ी मेरी आँखें उस इंकलाबी शायर को ढूंढ़ रही थीं जो इंकलाबी शेर कहता था, सारे दिन अपने घर के आंगन में टहलता रहता था और हर पांच मिनट बाद घर के कामों में व्यस्त अपनी माँ को संबोधित करना हुआ बच्चों की-सी व्याकुलता से कहता था,‘‘...माँ, मैं ठीक कर रहा हूँ. आज़ादी नजदीक है, वह देखो! अब तो आज़ादी की हवा भी चलने लगी है, सूंघो! कैसी प्यारी मदमाती सुगंध भरी है इस शरद ऋतु की हवा में. आज़ादी की भीनी-भीनी महक या ख़ुदा. कल जब यह सुगंध खुलकर फैलेगी तो कैसा अनुभव होगा.’’
वह सिरफ़िरा शायर बड़ी हिकारत भरी मुसकराहट और कटाक्ष भरी आँखों से उसे घूरता था जब वह ड्यूटी के लिए घर से अपनी वरदी पहनकर निकलता था और शाम को ड्यूटी से लौटता था. मगर अफसोस. वह लाशों के ढेर में न था, न उसका इंकलाबी तराना फ़िजां में तैर रहा था. वह तो इस वक़्त रेडियो को कान से लगाए. आंगन में किसी बिफरे शेर की तरह अपने कछार में दहाड़ता टहल रहा होगा ‘बी शरफहा’. पैर पटकता हुआ पेंच,-ताव खाता हुआ, दांतों को पीसता, ख़ून के आँसू रोता हुआ.
इस मूर्दा गोश्त के अंबार में वह भारी मूंछों और भरे गालोंवाला कहानीकार भी न था जो परदा-दर-परदा दिमागी कलाबाजियाँ शब्दों के द्वारा देता हुआ सरकार पर चोटें करता था जिसकी कलम तिरयाक का असर रखती थी. वह केवल कागज़ पर छपता था. न किसी पत्रिका में, न किसी समाचार-पत्र में उसका नाम नज़र आता था, न उसका कोई संकलन था, न संग्रह, बस दो कागज़ों की सीमा पर उड़ेला वह ज़हर को मारने वाला विषहर जिसे पढ़ने वाला बड़े आराम से तह करके कोट की जेब में रख सकता था. वह भी न मुरदों में था न जख्मियों में.
बदनों के इस साकित दरिया में वह जवान लड़की भी न थी जो सबसे आगे सीने को ढाल बना, नारे लगाती हुई गुज़रती थी.
जब वह सावधान की मुद्रा में रायफल लिए टैंक पर खड़ा होता था तब वह लड़की बिना झिझके बास्केट में पड़े फूलों में से एक लाल शगुफ़्ता फूल उठाकर उसे भेंट करती हुई वह रोज़ का नारा दोहराती थी...
‘‘सिपाही. हम तुम्हें फूल देते हैंकल, हमें गोली का उपहार मत देना.’’
उसका सारा वजूद उस मासूम अनुरोध भरी आवाज़ से पिघलने लगता था, मगर फिर सिमटकर जमे मोम की तरह ठोस होकर और ड्यूटी पर इन अहसासों से स्वतंत्र हो बड़ी शान से फूल लेता और बड़े घमंड से बंदूक की नाल में खोंस देता था. इसके बाद नई नस्ल के सांचे में ढले नौजवान नारे लगाते, खिलखिलाते, कभी कोई शरीर लड़का उनमें से उसे आँख मारता गुजर जाता था.
सरबाज़ जो सर की बाज़ी लगा देने वाला सिपाही था, उसकी मौत के समाचार में न बहादुरी का ख़िताब था, न शहीद का नाम; बल्कि एक गुमनाम खुदकुशी का मुख्तसर बयान था. मगर कौन जानता है कि छह महीने में उसने पूरे ‘फायर’ हवाई किए थे और तिल-तिलकर वह एक विचित्र ग्लानी से तपता-पिघलता समाप्त हो रहा था

यहाँ तक कि इस भीड़ में आज आग़ा भी न था जो शाम के घिरते ही हुक्का लेकर अपने घर की चौखट पर बैठकर लंबे-लंबे कश भरता हुआ शहर में हुई हिंसात्मक घटनाओं की चर्चा करता था. गर्ज कि जिन लोगों को उसकी उम्मीद भरी बेचैन आँखें तालाश करती थीं उनमें से वहाँ कोई भी ज़िंदा या मुर्दा मौजूद न था. वहाँ तो केवल फटे-पुराने कपड़ों में लिपटे बेहिस जिस्म थे जिन्हें वह नहीं पहचानता था...केवल महवश, हसन और जैनब को छोड़कर.
वह भी कितना नादान है, वह सब यहाँ कहाँ होंगे? वह शायर, वह कहानीकार, वह लड़की, वे लड़के, उनके मक़तलगाह तो ओविन और हेसार जेल की चहारदीवारियाँ है जहाँ तंग अंधेरी कोठरियों में, बिजली के तार की मार, बिजली की कुरसी और जाने क्या-क्या...
लाशों के उठते ही भीड़ अस्पताल व सर्दखाने की तरफ छँट गई. इधर-उधर रूके लोग, जिनका इस घटना से कोई संबंध न था, अपने घरों के रास्ते पर भयभीत अपनी मुर्दा काया को घसीटते बढ़ने लगे. चौराहे पर आमद व रफ्त आरंभ हो गई और कुछ देर बाद सब कुछ शांत...केवल ख़ून के धब्बों पर हवा एक सख़्त पपड़ी की रचना कर रही थी.
शाम होते-होते ज़िंदगी दोबारा टूटकर जुड़ चुकी थी. चहल-पहल, शोर-शराबा, नारे, जुलूस, फ़िल्म, होटल; मगर वह पूरी तरह से खो चुका था. कहाँ जाए? उसने मशीनगन की सारी गोलियाँ खाली कर दी थीं और अब घर आकर बिलख-बिलखर किसलिए रो रहा था?
कुछ वर्ष पहले ज़ैनब इसी घर में ब्याहकर आई थी. क्योंकि वह उसकी पत्नी थी. महवश उसके इर्द-गिर्द घूमती थी क्योंकि वह उसकी बेटी थी. हसन उसके सीने पर सिर रखकर सोता था. क्योंकि वह उसका बेटा था. ये सारे प्यार के बंधन मोहब्बत के रिश्ते सियासी मतभेद से खिंचते, कमज़ोर पड़ते आख़िरी चंद महीने पहले टूट गए थे. ईरान वीरान हुआ था या नहीं, मगर उसका घर ज़रूर उजड़ गया था. उसका सारा वजूद वीरानी में ढल गया था.
ज़ैनब की इच्छा से ही उसने दो वर्ष पहले शाही फ़ौज में अपना नाम दिया था. सब कुछ अच्छा चल रहा था. मगर एकाएक जैनब के विचारों में बदलाव आया और वह उससे नाराज़ होकर अपना घर छोड़कर भाई के घर चली गई. वह उसे शाह का खरीदा गुलाम कहती थी. वह सारे कटाक्ष सहन कर सकता था मगर उसका कर्तव्य, उसकी ट्रेनिंग, उसकी शपथ क्या पल भर में उससे नाता तोड़ लेते? कल तक जो लोग उसके मजाक का केंद्र थे देखते-देखते शहादत का जाम पी गए. चार हज़ार लोग! एक सुबह को! आखिर क्यों? क्या सच है, क्या झूठ है? वह बेचैन रहा!
उसे उस पल क्या हुआ था जब शकायक के फूल पहाड़ी चट्टानों के बीच तेज हवा के वेग से टूट-टूटकर बिखर रहे थे तब उसे होश आया था और एकाएक रोशनी की तेज सुरंग ने उसकी बंदूक की नाल को नाक की सीध में न करके ऊपर आसमान की तरफ कर दिया था. तो क्या...वह घोखेबाज़ और गद्दार निकला? उसने नमकहरामी की थी? फौजी ट्रेनिंग को मिट्टी में मिला दिया था? एकाएक उसका मन इतना चंचल और मस्तिष्क इतना अनमना क्यों हो गया था? असमान की ओर छूटती उसकी बंदूक की सारी गोलियाँ इस तन्हा घर में उसके विचारों पर हथौड़े मार-मारकर उसे बेदम कर रही थी.
चंद दिन बाद समाचार-पत्र में एक सुर्खी थी ‘सरबाज़ की मौत’, उसके नीचे लिखा था, ‘‘कल एक सरबाज़ की लाश मिली जिसके सिर पर गोली लगी है, लाश खराब हो चुकी है इसलिए शक्ल पहचानना कठिन है.’’
अफ़सोस! सरबाज़ जो सर की बाज़ी लगा देने वाला सिपाही था, उसकी मौत के समाचार में न बहादुरी का ख़िताब था, न शहीद का नाम; बल्कि एक गुमनाम खुदकुशी का मुख्तसर बयान था. मगर कौन जानता है कि छह महीने में उसने पूरे ‘फायर’ हवाई किए थे और तिल-तिलकर वह एक विचित्र ग्लानी से तपता-पिघलता समाप्त हो रहा था. बंदूक की गोली तो सिर्फ़ एक बहाना था कहानी को शीघ्र दफ़न करने का. मगर तारीख़ को इतनी फुरसत कहाँ कि वह हक़ीकतों को बारीकी से कलमबंद करे कि मरने वालों में एक सिपाही भी था जो अपने अंदाज़ से लहू बहाकर शहीदों में शरीक हुआ था.
साभार बी.बी.सी हिन्दी

Saturday, July 26, 2008

पदचाप

एम. हनीफ मदार
हाथ मुंह धोकर लाखन चाचा, छप्पर के ऊपर से फिसलकर आंगन में फैली थके सूरज की अंतिम किरणों में ठंड से सिंकने के खयाल से आ बैठे .. और बैठे क्या लगभग पसर गए। थकान के बाद वैसे भी आदमी बैठ कहां पाता है। लाखन चाचा तब इतने नहीं थकते थे। अब लाखन चाचा दोनों बच्चों के छमाही इम्तिहान भी तो नहीं छुडाना चाहते जो आज से ही शुरू हुए हैं मगर आलू की बुवाई भी पिछाई न रह जाए इसी चिंता में आज अकेले ही लगे रहे।
गांव में लाखन चाचा को बुवाई के लिए टै्रक्टर भी कहां मिल पाता है, ट्रैक्टरों वाले बडे किसान अच्छी तरह जानते हैं कि लाखन चाचा पर ट्रैक्टर का भाडा भी फसल तक उधार करना पडेगा। आलू खुदाई के बाद भी लाखन चाचा जैसे छोटे किसान आलू को कोल्डस्टोर में रखकर अच्छी कीमत का इंतजार करें .. या उसे बेचकर खाद, बीज और पानी का पैसा चुकाएं ..? ट्रैक्टर का किराया चुकाने का लाखन चाचा पर इस समय पैसा आयेगा कहां से ..?
बीडी को अंगुलियों तक राख बना कर झाड देने के बाद लाखन चाचा ने वहीं लेटे-लेटे बडे लडके धीरज को आवाज दी। धीरज पुरानी पैन्ट कमीज पहने बाहर आया। लाखन चाचा ने धीरज के लिए ये कपडे सर्दी शुरू होते ही पैंठ से पुराने कपडों के ढेर से खरीदे थे। इन्हीं को पहनकर वह स्कूल भी चला जाता है। स्कूल में और बच्चे तो पूरी बांह की ऊनी जरसी पहन कर भी ठंड से सिरसिराते हैं लेकिन लाखन चाचा या उनके बच्चों की हड्डियां तो जैसे पत्थर की बनी हैं। लाखन चाचा भी तो खालिस अद्धी बांधे ऊपर से पुराना कुर्ता ही पहने जमीन पर टाट बिछा कर लेटे हैं।
लाखन चाचा के पांच में से बुढापे की संतान के रूप में सबसे पीछे के दो बच्चे ही बचे हैं। तीन बचे नहीं या कहें लाखन चाचा बचा नहीं पाए। उन्होंने तीनों को बीमारी से बचाने की कोशिश की तो खूब की मगर हर बार धनाभाव में बेबस हो गये। और तीनों बच्चे एक-एक कर चलते बने, अब बडा धीरज और छोटा दीपक ही बचा है। धीरज लाखन चाचा के पास आ बैठा, का ऐ चाचा? लाखन चाचा ने एक और बीडी जला ली जैसे उनकी बूढी हड्डियों को बीडी के धुएं से शाम की सर्दी में कुछ राहत मिल रही थी। तुम्हारे इंतियान कब खतम हुंगे?
अबई तौ आठ दिन लगिंगे चाचा। धीरज लाखन चाचा के शरीर से चिपककर गर्माहट महसूस करने लगा।
लाला तीन-चार दिना कौ काम रह गयौ ऐ, खेत में.. सब डौर बन जाते तौ पहलौ पानी लगि जातौ। चाचा ने कश खींच कर नाक से धुआं बाहर उडेला।
चाचा तुम ऊं टै्रक्टर ते चौं नांय करवाय लेत, सब ट्रैक्टर ते करवाय रऐं।
बेटा हम छोटे किसानन कूं ट्रैक्टर बारे कहां मिल्त ऐं! चाचा भूदेव शास्त्री पै तौ हमतेऊ कम खेत ऐ फिर उनै तौ ट्रैक्टर मिल गयौ। धीरज के उत्सुकता भरे मासूम सवाल से लाखन चाचा तनिक भी विचलित नहीं हुए। फीकी हंसी हंसते हुए लाखन चाचा ने धीरज के छोटे दिमाग को तो परेशान होने से रोक लिया। किंतु खुद खेत में डौर बनाने के काम को तीन-चार दिन में ही पूरा करने की जुगत लडाते हुए सूरज के छिपते ही छप्पर के पीछे बने कमरे में आ गए। बाहर आंगन में रात उतर आई।
दिन के ग्यारह बजे तक लाखन चाचा तीन-चार डौर ही बना पाए थे कि धीरज की अम्मा बदहवास सी दौडती खेत पर आई। वह अपनी सांसों पर काबू पाते हुए अटकती सी बोलीं घर पै दौ पुलिस बारे आए ऐं, और तुमें बुलाय रऐं। पुलिस का नाम सुनते ही लाखन चाचा को धूप में भी कंपकंपी आ गयी। वे फावडा वहीं छोड शंका-आशंकाओं से घिरे घबराते से घर पहुंचे। आंगन में बिछी चारपाई पर दो खाकी वर्दीधारी भूखे भेडिये की तरह लाखन चाचा को ही ताक रहे थे। लाखन चाचा लगभग हाथ जोडे सामने जा खडे हुए। एक सिपाही गरजा, तेरा ही नाम है लाखन?
हां साब। शब्द ही मुश्किल से फूट पाया लाखन चाचा के हलक से
बाबूजी का बात है?
अभी पता लग जाएगा। दूसरे सिपाही ने एक डायरी में लाखन चाचा का नाम लिखते हुए कहा। दूसरे सिपाही के शांत होते ही पहला सिपाही बोल पडा तू खेत में बच्चों से काम करवाता है, तुझे पता नहीं सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में भी बाल श्रम पर प्रतिबंध लगा दिया है।
वे इस पचडे से बचने के लिए हकलाते से बोले नांय साब मैं तो अकेलौई काम करूं, बालक तौ पढवै जामें।
दूसरा सिपाही सुनते ही भडका, झूठ बोलता है! और उसने एक अखबार का पेज फैला दिया, देख ये तेरा और तेरे बच्चों का ही फोटो है न जो खेत में काम कर रहे हैं, चल अब ज्यादा होशियारी मत दिखा, जल्दी से बच्चों के नाम बता। लाखन चाचा को अखबार का पेज देखते ही याद आ गया। ये तो वही फोटो है जिसे तीन-चार दिन पहले मोटर साइकिल पर आए दो आदमी खेत पर से ही खींच कर ले गए थे। वे खुद को पत्रकार बता रहे थे। लाखन चाचा के भीतर की उथल-पुथल में वे सब बातें उभर कर ऊपर आ गई जो उन पत्रकारों से हुई थीं। उनका दिमाग भी तेज दौडने लगा।- बालक तब काम कां कर रऐ। वु तो मेरी रोटी लै कें खेत में गए और बैठे। उन आदमीन नेई बच्चनकूं काम में लगाया के फोटू खैंचौओ और जि कई के जातें तुमारो फायदा होगो। मैंनेऊ जेई सोची के चलौ सरकार ते कछू बीज-फीजुई मिल जाइगौ। बस यही सोचकर लाखन चाचा उनको वे सब बातें बताते रहे थे, फसल के बखत पै हम इनकौ स्कूल छुडवाय कें खेत में लगाय लैमे। एकाध महीना में काम खतम है जाय तौ फिर स्कूल भेजवे लगें। इन बालकन के स्कूल के मास्साबऊ तौ अपने खेत के काम कूं पंद्रह-पंद्रह दिन की छुट्टी कर लेत ऐ। किंतु अब लाखन चाचा को अपने इस लालच पर बहुत गुस्सा आने लगा वे सिपाहियों के सामने गिडगिडाने लगे साब ऐसी भूल नांय होगी, अबके माफ कर देउ।
-अब कुछ नहीं होगा जुर्माना तो भरना पडेगा।
-पांच सौ रुपये। एक सिपाही ने फैसला सुना दिया। पांच सौ रुपये का नाम सुनकर लाखन चाचा के चेहरे पर सर्दी में भी पसीना चमकने लगा। पांचसौ रुपया कांते लांगौ साब?
चल तेरे लिए सौ कम करे देते हैं। पहले सिपाही ने हमदर्दी दिखाई, मगर आगे से ध्यान रहे ऐसी भूल ना हो। इससे लाखन चाचा की गिडगिडहाट कम नहीं हुई, बाबूजी मौपै तौ चारसौऊ नांय!
- तो जेल जाने को तैयार होगा। दूसरे सिपाही ने कडककर कहा। धीरज की अम्मा ने उन्हें इशारे से अंदर बुलाना चाहा जो छप्पर में घूंघट किए खडी थी। मगर लाखन चाचा को तो जैसे कुछ दिख ही नहीं रहा था। वे पूरे शरीर का साहस बटोरकर बोले, साब एकाध दिन में दे दूं तौ? पहला सिपाही उठ खडा हुआ, एकाध नहीं, हम कल आऐंगे, मगर कल या तो चार सौ ..नहीं तो जेल, समझे।
लाखन चाचा को काटो तो खून नहीं, उनका माथा यह सोच-सोच फटने लगा कि सबेरे तक चार सौ आंगे कांते..? नांय तो अब जा उमर में जेल जानौ पडेगौ, लोग न जाने कहां-कहां बातें करिंगे के लाखन ने न जाने का जुरम करौ ऐ। ऐसी बातें उन्हें भीतर तक परेशान तो करने ही लगीं मगर इससे भी ज्यादा वे इस बात से बेचैन होने लगे कि सरकार कहती है कि बच्चों से काम मत करवाओ उन्हें पढाओ, मगर गांव के शास्त्री जी कहते हैं, लाखन इन्हें क्यूं पढा रहा है, नौकरी तौ कहीं है नहीं, इससे तो इन्हें मजदूरी करना सिखा.. आखिर हमारे खेतों में काम कौन करेगा..? पढ-लिखकर इनकी कमर नहीं लचेगी। लाखन चाचा को तो समझ में ही नहीं आ रहा कि आखिर वे किसकी मानें। उन्होंने अपने दिमाग पर फिर से जोर डाला, अगर शास्त्री जी की नांय मानी तौ बीज बुआई कूं पैसा नांय मिलनौ.. और अगर सरकार की नांय मानी तौ जुरमानौ भुगतनौ पडैगौ। दोनों ही तरफ से जान आफत में है। वे लगातार बीडी पर बीडी फूंकने लगे जैसे इसी से कोई समाधान निकलेगा।
सिपाही तो कब के चले गए मगर लाखन चाचा अपनी धुनामुनी में वहीं बैठे रह गए।
- अब मई बैठे रहोगे या जा लंगकूं आओगे? लाखन की पत्नी ने आवाज दी जो पुलिस के जाते ही छप्पर में चूल्हे पर रोटियां पकाने में लगी थी।
चौं तोय मां को खाए जाय रौऐ? लाखन चाचा ने वहीं बैठे-बैठे सारा गुस्सा पत्नी पर उडेल दिया।
-ठीक है मई गढे रहौ। पत्नी भी खीझ पडी।
अचानक लाखन चाचा उठे और सीधे शास्त्री जी के घर जा पहुंचे। शास्त्री जी भकाभक धोती-कुर्ता पहने हाथ में छडी लिए कहीं जाने को निकल ही रहे थे कि, शास्त्री जी राधे-राधे। सामने लाखन चाचा को देखकर एकदम ठिठक गये। उनकी दोनों भौंहे सिकुडकर आपस में जुड गयीं। अगले ही पल लाखन चाचा ने हिम्मत जुटाकर अपनी समस्या सुनाने को मुंह खोल ही दिया शास्त्री जी के सामने।
शास्त्री जी ने लाखन चाचा की परेशानी पूरे ध्यान से सुनी और गंभीर हो कुर्सी पर बैठ गए हो तो सब जाएगा लाखन, तेरे घर पुलिस आऐगी भी नहीं.. मगर तू हमारी माने तब ना। उन्होंने लाखन चाचा को गौर से देखा और घूरते हुए बोले, तुझसे कितनी बार कहा कि इस जमीन को हमें बेच दे और बच्चों को स्कूल भेजने के बजाय मजदूरी में डाल। शास्त्री जी शांत हो गये फिर अपनी बडी और गोल-गोल अठन्नी सी आंखें फैलाकर बोले मैं तो कह रहा हूं खेत बेचकर भी तीनों बाप-बेटे उसी में काम करते रहो अपना समझकर और मजदूरी भी मिलती रहेगी।
लाखन चाचा फिर चकरा गये। - शास्त्री जी पुलिस बारे तौ कै रऐं कै बच्चन ते काम करायौ तौ जेल जाऔगे, और जुरमानौ अलग ते। उन्होंने हैरत से कहा-वो सब तू हम पर छोड दे और हमारी बात मान ले। शास्त्री जी लाखन की पीठ थपथपाते हुए बाहर ले आए तू सोच ले और शाम को बता देना, मैं लौटते में तुझसे पूछता आऊंगा।
लाखन चाचा छप्पर में पत्नी के पास सिर पकड कर जा बैठे। दोनों बच्चे आंगन के टाट पर बैठकर किताब पढने में मस्त थे।
कां चले गये? पत्नी के सवाल ने जैसे उन्हें नींद से जगा दिया हो।
शास्त्री के जौरे गयौओ।
का कई उन्नै?
वोई जो हमेशा कैत रऐं। लाखन चाचा के शब्द निराशा में डूबे थे।
तुमने का सोची ऐ?
मैरो तौ दिमाकुई काम नांय कर रौ। लाखन चाचा हथियार डालने की मुद्रा में आ गए।
तूई बता का करैं?
पत्नी जो तब से लगातार सोच रही थी अब उसे कहने का मौका मिला था-मैं तो जे कहूं कै कल जब पुलिस बारे आमें तो उन्ते जि पूछौ कै चौं साब हम किसानन कूं सरकारी नौकरी या काऊ कंपिनी बारेन की तरै बुढापे में कोई पैन्सिल (पैन्शन) या हारी-बीमारी कूं सरकार ते पइसा टका की कोई मदद तौ मिलै नांय। हमारौ सहारौ तौ जि बालकई ऐं, अब खेत में काम जे नांय करिंगे तौ कौ करैगौ। अब वु अपने खेत में काम कर रऐं तौ जुरमानौ कायेकौ?
बा.. री.. बा, मैं उन्ते जबान और चलाऊं सो वे मोय पीटैं। लाखन चाचा ने खीझकर खींसे निंपोरी।
चौं पीटिंगे, का अपनी बात कैबोऊ कोई जुरमें..? पत्नी तिलमिला उठी हमारी बात तौ उन्नै सुन्नी ई पडैगी।
तू जादा वकील भई ऐ, तौ तूई करि लियो बात।
हां-हां मैं करि लूंगी, तुम चूडी पैरि कैं भीतर बैठ जाऔ।
लाखन की पत्नी लाखन चाचा के भीतर कुछ जगाना चाह रही थी, शाम भी हो चली थी, सूरज लाखन की पत्नी के चेहरे की तरह तमतमा कर लाल हो गया था फिर धीरे से सरककर गांव के उस पार कहीं छिप गया।
लाखन..! आंगन में खडे शास्त्री ने आवाज लगाई। लाखन चाचा हडबडा गये। वे अब शास्त्री से क्या कहें। उनकी जुबान तो जैसे तालू में ही चिपक गई। पत्नी लाखन चाचा की स्थिति को भांप गई और घूंघट निकाले छप्पर से बाहर निकली, सिर झुकाए बोली, शास्त्री काका, हम अपनौं खेत नांय बेच रऐ.. और बालकऊ पढिंगें.. जितनैऊ पढि जांय, कम ते कम अपनी बात कैवो तौ सीखिई जांगे। इतना कहकर लाखन की पत्नी ने शास्त्री के सामने हाथ जोड दिये। लाखन चाचा को लगा शास्त्री भडक जाऐंगे मगर शास्त्री जी तो भौंचक थे।
ठीक है भाई। जाते हुए बस इतना ही कह पाए वे। आंगन में दोनों बच्चे कूदने लगे। लाखन चाचा रात भर अपनी निरीह कायरता पर खीझते रहे। सुबह पुलिस वालों के सामने लाखन चाचा झुककर हाथ जोडे नहीं, हाथ में फावडा लिए तन कर खडे थे।

Friday, July 25, 2008

गज़ल

देवमणि पांडेय
नही और कोई कमी ज़िन्दगी में
चलो मिल के ढ़ूंढ़ें ख़ुशी ज़िन्दगी में

हज़ारों नहीं एक ख़्वाहिश है दिल में
मिले काश कोई कभी ज़िन्दगी में

अगर दिल किसी को बहुत चाहता है
उसे कर लो शामिल अभी ज़िन्दगी में

मोहब्बत की शाख़ों पे गुल तो खिलेंगे
अगर होगी थोड़ी नमी ज़िन्दगी में

निगाहों में ख़ुशबू क़दम बहके बहके
ये दिन भी हैं आते सभी ज़िन्दगी में

मिलेंगे बहुत चाहने वाले तुमको
मिलेगा न हमसा कभी ज़िन्दगी में

बिछड़कर किसी से न मर जाए कोई
वो मौसम न आए किसी ज़िन्दगी में

Thursday, July 24, 2008

गज़ल

देवमणि पांडेय
दिल ने चाहा बहुत पर मिला कुछ नहीं
ज़िन्दगी हसरतों के सिवा कुछ नहीं

उसने रुसवा सरेआम मुझको किया
उसके बारे में मैंने कहा कुछ नहीं

इश्क़ ने हमको सौग़ात में क्या दिया
ज़ख़्म ऐसे कि जिनकी दवा कुछ नहीं

पढ़के देखीं किताबें मोहब्बत की सब
आँसुओं के अलावा लिखा कुछ नहीं

हर ख़ुशी मिल भी जाए तो क्या फ़ायदा
ग़म अगर न मिले तो मज़ा कुछ नहीं

ज़िन्दगी ये बता तुझसे कैसे मिलें
जीने वालों को तेरा पता कुछ नहीं

Wednesday, July 23, 2008

एक थी आरूषि

रजनी

मॉं-बाबुल के प्यार में पली एक नन्ही सी कली,
पर बड़ी होने से पहले गयी कुचली!

माता-पिता की रंजिश बेटी से निकाली,
खेलने की उम्र में उसकी हत्या कर ड़ाली!

फिर लगाया बेटी के कत्ल का इल्जाम पिता पर,
क्या गुजरी होगी जिसने खुद लिटाया बेटी को चिता की सेज पर!

आंसुओं की धारा बह निकली आंखों से मगर,
पर बेटी को न बचा पाने का अफसोस रहेगा जिन्दगी भर!

Tuesday, July 22, 2008

गांधी जी के तीन बन्दर

रजनी

अभी तक हमने केवल गांधी जी के तीन बन्दरों के बारे में सुना था जो दर्शाते थे बुरा मत कहो,बुरा मत सुनो,बुरा मत बोलो! परन्तु गांधी जी के तीन बन्दरों से अब काम नहीं चलेगा,आज के वर्तमान युग को गांधी जी के चौथे बन्दर की भी आवश्यकता है क्योंकि जब तक इन्सान बुरा सोचना नहीं छोड़ेगा तब तक इन्सान बुरा कहना,बुरा सुनना और बुरा बोलना नहीं छोड़ेगा! इन्सान की सोच पर ही उसका बोलना,कहना और सुनना निर्भर करता है!

Sunday, July 20, 2008

कॉंलेज - मस्ती की पाठशाला

रजनी मैहता

कॉंलेज के बीते दिनों की याद आती है,
कैसे शाम दोस्तों के साथ घूमने में बीत जाती थी!

फोन पर देर रात तक लम्बी बात होती थी,
जीवन में खुशी की बरसात होती थी!

एस.एम.एस फ्रैन्ड़स को भेजते रहते थे,
अपनी हर बात अपने दोस्तों से कहते थे!

वैलेंटाईन ड़े पर कॉंलेज में होता बहुत हंगामा था,
लाल गुलाब कॉंलेज की हर लड़की के हाथ में नजर आना था!

जीवन को खुशियों से भरने का अच्छा बहाना था
जिसने बाद में हर किसी को रूलाना था!

फ्राइड़े को फिल्म देखने का बनता प्रोग्राम था
फैशन भी कॉंलेज में बदल जाता हर शाम था!

कॉंलेज मस्ती की पाठशाला है कहलाता,
जीवन का हर रंग कॉंलेज में देखने को मिल जाता!

पढ़ाई कम और मस्ती होती कॉंलेज में ज्यादा है,
मोबाईल का भी कॉंलेज में होने का एक फायदा है!

कॉंलेज में जाने का अपना ही मजा है,
अगर मस्ती के साथ पढ़ाई न हो तो जीवन बन जाता एक सजा है!

पढ़ाई के साथ-साथ पूरा लो कॉंलेज लाइफ का आनन्द,
जीवन में कभी न बनाओ बुरे दोस्तों का संग!

Saturday, July 5, 2008

हमारे समय में ‘नचिकेता का साहस'

दिनेश श्रीनेत
साहित्य में साक्षात्कार की परंपरा को अगर हम तलाशना शुरू करें तो इसका आरंभ प्राचीनकाल से ही दिखाई देने लगता है। साक्षात्कार अपने प्राचीनतम रूप में दो लोगों के बीच संवाद के रूप में देखा जा सकता है। आमतौर पर इस संवाद का इस्तेमाल ज्ञान मीमांसा के लिए होता था। प्राचीन ग्रीक दर्शन से लेकर भारतीय पौराणिक साहित्य तक में इसे देखा जा सकता है। प्राचीनकाल में इस तरह के संवाद के कई रूप आज भी मौजूद हैं। प्लेटो की एक पूरी किताब ही सुकरात से किए गए सवालों पर आधारित है। इसी तरह से ‘कठोपनिषद्' में यम-नचिकेता के संवाद में जीवन-मृत्यु से संबंधित कई प्रश्नों को टटोला गया है, जहां नचिकेता पूछता है, ‘हे यमराज! एक सीमा दो, एक नियम दो - इस अराजक अंधकार को। अवसर दो कि पूछ सकूं साक्षातकाल से, क्या है जीवन? क्या है मृत्यु? क्या है अमरत्व?' भारत में पंचतंत्र भी प्रश्नोत्तर शैली का इस्तेमाल करते हुए कथा को आगे बढ़ाता है। यहां हर कहानी एक प्रश्न को जन्म देती है और हर प्रश्न के जवाब में ही एक दूसरी कहानी की शुरुआत होती है। यहां तक कि बाद की ‘बेताल पच्चीसी', ‘सिंहासन बत्तीसी' और ‘कथा सरित्सागर' में भी संवाद अहम्‌ है और कथा उसके माध्यम से आगे बढ़ती है। आधुनिक दार्शनिकों ने भी साक्षात्कार की विधा को एक ठोस आयाम दिया है। बर्कले जैसे दार्शनिकों की भी पूरी एक किताब साक्षात्कार शैली में है। इतिहासकार अर्नाल्ड टायनबी तथा दार्शनिक ज्यां पॉल सात्रके साक्षात्कार भी काफी लोकप्रिय रहे हैं। इन सबके अलावा भारतीय दर्शन की सबसे लोकप्रिय किताब ‘गीता' से बेहतर उदाहरण क्या हो सकता है, जहां पूरी ‘गीता' कुछ और नहीं सिर्फ कृष्ण और अर्जुन के बीच संवाद है।
प्रिंट मीडिया के विकास ने इसे एक दूसरा आयाम दिया। इसने साक्षात्कार को दुनिया की चर्चित हस्तियों को जानने-समझने, उनकी जवाबदेही तय करने और कई बार उन्हें कटघरे में खड़ा करने वाली विधा में बदल दिया। पश्चिमी देशों की कुछ पत्रिकाएं सिर्फ अपने साक्षात्कारों की बदौलत ही लोकप्रिय हैं। इसके विपरीत पश्चिम के मुकाबले भारत में अभी भी इंटरव्यू के मामले में प्रिंट मीडिया काफी पीछे दिखाई देता है। यहां प्रिंट मीडिया का शुरुआती विकास वैचारिक तथा अवधारणात्मक किस्म के आलेखों से हुआ। इसमें इंटरव्यू जैसे ‘लाइव' माध्यम की ज्यादा गुंजाइश नहीं थी। ‘दिनमान' और ‘धर्मयुग' तक में अधिक जोर वैचारिक तथा विश्लेषणात्मक लेखों का था। शायद यही वजह रही है कि साहित्यिक विधा के रूप में भी इसे अधिक गंभीरता से नहीं लिया गया और आज भी हमें जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद, निराला या महादेवी के बहुत अच्छे इंटरव्यू नहीं मिलते। यदि कभी ऐसे साक्षात्कार लिए भी गए हों तो कम से कम वे आज शोधार्थियों के लिए सुलभ नहीं हैं। संभवतः ‘रविवार' ने जब घटनाओं की सीधे रिपोर्टिंग करके पत्रकारिता के एक नए तेवर से हिन्दी के पाठकों को अवगत कराया तो साक्षात्कार की अहमियत खुद-ब-खुद सामने आ गई। इंटरव्यू ने पत्रकारिता को तेवर देने के साथ-साथ यथातथ्यता और प्रामाणिकता को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
हिंदी में साक्षात्कार की विधा का सही विकास इसके बाद से ही देखने को मिलता है। साक्षात्कार को एक सुंदर और साहित्यिक रूप पद्मा सचदेव ने दिया और व्यवस्थित तरीके से प्रस्तुत किया अशोक वाजपेई ने। पद्मा सचदेव ने अपने नितांत आत्मीय स्वर में की गई बातचीत से लोगों की चिरपरिचित शख्सियत को ही एक नए रूप में सामने रखा। डोगरी में कविताएं लिखने वाली पद्मा को हिंदी में बड़ी पहचान उनके इन साक्षात्कारों की वजह से ही मिली। कृष्णा सोबती ने भी ‘हम हशमत' में कई दिलचस्प साक्षात्कार लिए - इस पुस्तक में उनके साक्षात्कार आमतौर से सिर्फ बातचीत न बनकर लेखिका की सामने वाले से उसके पूरे वातावरण के बीच एक ‘मुठभेड़' बनता था। अपने शुरुआती दौर में ‘पूर्वग्रह' ने भी साक्षात्कार विधा को काफी संजीदगी से लिया। अशोक वाजपेई ने उसमें कई महत्त्वपूर्ण साक्षात्कार प्रकाशित किए। इस साक्षात्कारों का आयोजन भी आमतौर पर ‘पूर्वग्रह' ही करता था। उन्होंने हिंदी में साक्षात्कार विधा को जकड़बंदी से निकालकर उसे साहित्यकारों के अलावा चित्रकारों, संगीतकारों तथा फिल्मकारों पर भी एकाग्र किया। उन्होंने अपने संपादन में ‘पूर्वग्रह' के साक्षात्कार की दो किताबें भी निकालीं - ‘साहित्य विनोद' और ‘कला विनोद'। यह पूर्वग्रह की शैली थी कि किसी एक रचनाकार या कलाकार का दो या तीन लोग मिलकर इंटरव्यू करते थे। बाद के दौर में ‘बहुवचन' और ‘समास' जैसी पत्रिकाओं ने भी कई महत्त्वपूर्ण इंटरव्यू प्रकाशित किए, जिनमें आशीष नंदी जैसे समाजशास्त्री, कृष्ण कुमार जैसे शिक्षाशास्त्री, ज्ञानेंद्र पांडेय जैसे इतिहासकार और मणि कौल जैसे फिल्म निर्देशक भी शामिल थे। इन दिनों साक्षात्कार को एक गंभीर रचनात्मक आयोजन में बदलने वाली एक और अहम्‌ पत्रिका ‘पहल' है। ‘उद्भावना' पत्रिका ने तो सिनेमा पर गंभीर विमर्श को भी साक्षात्कार शैली में प्रस्तुत कर दिया।
हिंदी पत्रकारिता ने साक्षात्कार की विधा को देर से पहचाना और बाद में उसमें तेजी से परिवर्तन भी कर डाले। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के असर से प्रिंट मीडिया में भी इंटरव्यू का ताप और तेवर तय हुआ। लंबे साक्षात्कारों और सोच-विचारकर किए गए सवालों की जगह छोटे इंटरव्यू और पहले से तय प्रश्न दिखने लगे। फिल्मी हस्तियों, मॉडल, खिलाड़ी तथा अन्य ग्लैमर वर्ल्ड की हस्तियों के छोटे साक्षात्कार प्रकाशित होने लगे। इनके सवाल बहुत छोटे और तात्कालिक होते हैं। यह भी दरअसल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की चलते-फिरते इंटरव्यू करने की शैली का ही एक रूप है। जहां बहुत गंभीर या ठहर कर सोचने-विचारने वाले सवालों की गुंजाइश नहीं रहती। ऐसी स्थिति में ‘आपकी फेवरेट डिश' या फिर ‘लाइफ में सबसे इंपार्टेंट' जैसे सवाल ही रह जाते हैं। यानी सवाल ऐसे हों कि सिर्फ एक लाइन में जवाब दिया जा सके। यह शैली बाद के दौर में हिंदी वालों ने खूब और बिना सोचे-समझे इस्तेमाल की और अचरज की बात नहीं कि जावेद अख्तर, गुलजार और एम.एफ. हुसैन से भी इस तरह के इंटरव्यू मिल जाएं। अधकचरे किस्म के क्षेत्रीय पत्रकारों ने कामकाज संभालने वाले डी.एम. और ‘मिस शाहजहांपुर' से भी ऐसे सवाल पूछने शुरू कर दिए। कुल मिलाकर संवाद से विमर्श को खत्म कर दिया गया।
इससे उलट इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने ‘संवाद' के साथ दिलचस्प प्रयोग किए। प्रीतीश नंदी, सिमी ग्रेवाल, प्रभु चावला, विनोद दुआ और पूजा बेदी ने इंटरव्यू की शैली को ज्यादा आक्रामक बनाया। सामने वाले को निरुत्तर कर देने की हद तक चुभते सवाल पूछे और टेलीविजन पर लाखों दर्शकों ने जानी-मानी हस्तियों को इन्हीं सवालों के सामने भावुक होते और आंसू पोंछते भी देखा। इसी दौर के कुछ बेहतरीन कार्यक्रमों में साक्षात्कार को ज्यादा से ज्यादा अनौपचारिक बनाया गया और राजनीतिक या ग्लैमर वर्ल्ड की हस्तियों को उनके अपने माहौल के बीच रिकॉर्ड किया गया। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इस विधा के साथ ज्यादा ‘तोड़फोड़' की। विधा में की गई इस तोड़फोड़ के नतीजे कभी बहुत अच्छे होकर सामने आए तो कभी उबाऊ और कभी एकदम अर्थहीन, लेकिन कुल मिलाकर प्रिंट मीडिया के मुकाबले इसने सृजनात्मकता और उसके तेवर को कायम रखा।
दिलचस्प बात यह है कि दुनिया के स्तर पर प्रिंट मीडिया ने अपनी गंभीरता बरकरार रखी। ‘टाइम' और ‘द इकोनामिस्ट' जैसी पत्रिकाओं ने अपना कलेवर या शैली इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से आक्रांत होकर नहीं बदली। नोम चोमस्की, हैरॉल्ड पिंटर, उम्बर्तो इको और गैब्रिएल गार्सिया मारक्वेज जैसे विद्वानों तथा रचनाकारों के पास अभी भी अपनी बात रखने के लिए साक्षात्कार एक बेहतर विकल्प था। यही वजह है कि इनके बहुत अच्छे साक्षात्कार उपलब्ध हैं, जिनमें अपने वक्त की घटनाओं पर उनकी सटीक टिप्पणी तथा विश्लेषणात्मक रुख देखने को मिलता है। इसके विपरीत हम हिंदी तो दूर अपनी भारतीय भाषाओं तक में महाश्वेता देवी, अरुंधति राय, अमिताव घोष या नामवर सिंह के लंबे और गंभीर इंटरव्यू नहीं पाते। लिखे हुए शब्दों का विचार से यह ‘पलायन' अपने-आप में किसी समाजशास्त्रीय विमर्श का दिलचस्प विषय है।
हमेशा से माध्यमों में आए बदलावों से विधागत परिवर्तन हुए हैं और कई बार ‘विधाओं' ने अपनी मौलिकता को बरकरार रखते हुए माध्यमों का आंतरिक ताना-बाना बदला है। इस लिहाज से इंटरनेट की साक्षात्कार विधा में एक अलग भूमिका उभरकर सामने आ रही है। इंटरनेट इस दौर में तेजी से विचारों के ‘दस्तावेजीकरण' तथा उनकी ‘उपलब्धता' सुनिश्चित करने का माध्यम बना है, बेवसाइटों को खंगालें तो लगभग सभी अहम्‌ विचारकों के साक्षात्कार मिल जायेंगे। यहां आमतौर पर बड़े और लंबे इंटरव्यू ही उपलब्ध हैं। इतना ही नहीं इनमें से बहुत से साक्षात्कारों के वीडियो तथा ऑडियो फारमेट भी उपलब्ध हैं, जिन्हें उसी रूप में देखा या सुना जा सकता है। एडवर्ड सईद, नोम चोमस्की तथा ऐजाज अहमद जैसे विद्वानों के कई महत्त्वपूर्ण इंटरव्यू तथा पूरी-पूरी किताबें इंटरनेट की साइटों पर मौजूद हैं। यह उदाहरण हमें यह भी बताता है कि ‘विचार' किस तरह से माध्यमों में अपना दखल बनाते हैं। समय बदला है मगर अपने ‘समय से संवाद' लगातार जारी है। ‘कठोपनिषद्' में नचिकेता के सवालों के जवाब में यमराज कहते हैं, ‘हे नचिकेता, तूने साहस किया है! बहुत बड़ा साहस! तूने साक्षात्‌ मृत्यु से प्रश्न किया है और वह भी उसी के साम्राज्य में प्रवेश करके। स्वागत है तुम्हारे इस साहस का!' साक्षात्कार अपने सर्वाधिक सार्थक रूप में इसी ‘साहस' से जन्म लेता है। नचिकेता की प्रश्नाकुलता अब ‘साइबर स्पेस' में तैर रही है।

Tuesday, July 1, 2008

विजय लक्ष्मी से एम. हनीफ मदार की बातचीत

विजय लक्ष्मी से एम. हनीफ मदार की बातचीत

पिछले एक दशक में आमतौर पर महिलाओं की स्थिति और खासतौर पर आदिवासी, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों की महिलाओं की स्थिति में तेजी से गिरावट आई है। क्या कारण मानती हैं आप?
मैं समझती हूँ कि जो जातिवादी संगठन बन रहे हैं और जातिवादी राजनीति बड़ी तेजी से उभरी है इसका बहुत बड़ा प्रभाव इन महिलाओं की स्थिति में पड़ा है। इसकी वजह है कि यदि एक समुदाय अपनी जाति विशेष को लेकर चलता है तो दूसरे समुदाय में खुद ही उसके प्रति एक प्रतिस्पर्धा-सी होनी शुरू हो जाती है। जबकि जैसा हम लोग चाहते हैं कि आमतौर पर राजनीति में या अन्य क्षेत्रों में महिलाऐं पूरे सामाजिक और खुद के विकास के लिए बिना किसी जातिवाद के काम करें मगर उसको ये जातीय राजनीति खत्म कर देती है और इधर महिलाओं का जो आन्दोलन उनकी प्रगति के लिए बढ़ा है उस पर भी इसका विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। इसलिए महिलाओं की स्थिति ज्यादा बेहतर नहीं हो पा रही है।
वैश्वीकरण व नव उदारवादी नीतियों के बाद महिला कामगारों के लिए रोजगार की क्या संभावनाऐं दिखती हैं?
हाँ, महिला कामगारों के लिए प्रत्यक्ष रूप से रोजगार की संभावनाऐं बढ़ी हैं। जैसे मीडिया में बहुत स्कोप हुआ है एवं अनेक उद्योग धंधे भी इस तरह के शुरू हुए हैं जिसमें महिलाएं घर से बाहर निकलकर काम कर रही हैं परन्तु यदि हम इसको गहराई से देखें तो वह अपने स्तर पर व अपने बलबूते पर वह काम खुद नहीं कर पा रही हैं। जैसे पहले उद्योग धंधे थे वह सूत या कपास काटती थी या ज्यादा मेहनत और योग्यता के साथ वह ज्यादा कमा लेती थी जैसे वह कढ़ाई या बुनाई कर रही है। इसमें उसका खुद का प्रतिनिधित्व था जो उसे आत्मनिर्भरता के साथ ही निजत्वता का भान भी कराता था। वहीं आज जो काम है वह हवा में है और उसका मुख्यतः जो फायदा मिल रहा है वह उन्हीं लोगों को जो धनाढ्य हैं वैश्विक हैं व्यवसायी हैं उन्हीं को मिल पा रहा है परन्तु महिलाओं का तो वहाँ भी शोषण हो रहा है जैसे उन्हें कार बेचनी है या सिगरेट बेचनी है वहाँ भी बिना कपड़ों में एक महिला ही खड़ी है।
इसमें आप किसे दोषी मानती हैं, बाजार को या महिला मानसिकता को।
बाजार को मानते हैं क्योंकि महिला, वह तो भूखी मर जाएगी अगर काम नहीं करेगी तो। उसे तो कहीं न कहीं काम तो करना ही है बल्कि वह समझौता कर रही है। यह एक किस्म से वैश्यावृत्ति का ही दूसरा रूप दिखता है जहाँ उसे बाजारू मानसिकता के साथ धकेला जा रहा है समाज में परोसा जा रहा है समाज की मानसिकता को बिगाड़ने के लिए तो मैं उनके लिए आज कोई ठोस काम नहीं देखती। परिवर्तन के लिए लगातार उन्हें संघर्ष में तो रहना चाहिए।
महिलाओं पर बढ़ते यौन हमलों, बाल यौन उत्पीड़न, यौन ब्लैक मैलिंग के बढ़ते मामलों में भूमण्डलीकरण द्वारा परोसी जा रही संस्कृतियों को आप कितना जिम्मेदार मानती हैं?
हाँ, मैं समझती हूँ भूमण्डलीकरण में व्यावसायिक प्रचार-प्रसार का सबसे बड़ा माध्यम टी.वी. है और टी.आर.पी. बढ़ाने के लिए उस पर दिखाए जाने वाले अनेक इस प्रकार के प्रोग्राम भी शामिल रहते हैं जिनसे एक जो नवधनाढ्य वर्ग है उसमें एक भोगवादी मानसिकता पनपने लगी है और उसी के चलते जहाँ भी मौका मिलता है स्त्रियों पर बच्चियों के साथ वे इस तरह का जघन्य अपराध करने से नहीं चूकते।
शिक्षा क्षेत्र में मुस्लिम महिलाओं की स्थिति क्या है?
शिक्षा क्षेत्र में मुस्लिम महिलाओं की स्थिति बहुत खराब है। हमने सर्वे किया था उसमें अन्य समुदायों की अपेक्षा मुस्लिम महिलाओं का प्रतिशत बहुत कम है।
इस कम प्रतिशत के क्या कारण मानती हैं आप?
सबसे पहला कारण तो उनकी गरीबी है, और दूसरे उनके बीच धर्म गुरुओं मसलन मुल्ला-मौलवियों द्वारा यह प्रचारित किया जाता रहता है कि आपको दीन की तालीम के अलावा दूसरी भाषा या चीजें नहीं पढ़नी हैं। इससे मुस्लिम महिलाओं का रुझान भी शिक्षा की तरफ कम रह जाता है। क्योंकि मैंने कई जगह देखा है कि उनके पास अवसर भी हैं। परन्तु उनके ऊपर हिदायतों का इतना असर रहता है कि अन्य सामाजिक शिक्षा के प्रति उनका रुझान नहीं बढ़ पाता।
मुस्लिम महिलाओं को अपने संवैधानिक अधिकार पाने के लिए किस दिशा में बढ़ना चाहिए?
उनके लिए असल में बहुत काम की आवश्यकता है जो शिक्षित महिलाएं हैं वे उनके बीच जाकर उनमें सबसे पहले शिक्षा के प्रति चेतना जागृत करें। क्योंकि आमतौर पर तो वे ये मानने को तैयार नहीं हैं कि उनका शोषण हो रहा है या कोई नुकसान है और इसीलिए उन्हें यह जानकारी भी नहीं है कि उनके विकास के कहीं आगे रास्ते भी हैं। जबकि वे भी वह सारे अधिकार व हक प्राप्त कर सकती हैं जो अन्य समुदाय की महिलाओं व समाज को प्राप्त हैं।
मुस्लिम समुदाय की तत्त्ववादी शक्तियों के प्रतिगामी फतवों का मुस्लिम महिलाओं पर क्या प्रभाव दिखता है?
असल में ये जितने भी फतवे जारी होते हैं वे अधिकतर मुस्लिम महिलाओं के विकास को ही बाधित करते हैं। उनकी आजादी एवं मौलिकता छीनते हैं। जबकि ऐसे कानून या फतवे होने चाहिए जो महिलाओं को प्रगति का रास्ता दिखा सकें। लेकिन विडम्बना यह है कि जब कोई कानून बनता है जो मुस्लिम महिलाओं के अधिकार या महिलाओं को प्रगतिशीलता की ओर ले जाने में मदद करने की बात करता है तब उनके ही नेता कहना चाहिए स्वयंभू नेता सबसे पहले उस कानून को धर्म विरोधी बताकर विरोध कर देते हैं और उसके खिलाफ विकास को ही रोक देते हैं।
क्या उन फतवों का मुस्लिम महिलाओं को विरोध करना चाहिए?
बिल्कुल जो फतवे महिला विरोधी हों, खराब हों उनका विरोध करना ही चाहिए। मसलन अभी जो तलाक पर फतवा आया है वह खराब था साथ ही चुनाव लड़ने पर मुस्लिम महिलाओं के लिए फतवा जारी हुआ कि उन्हें चुनाव नहीं लड़ना चाहिए यह भी खराब फतवा था। अभी महिला इमाम बनने पर मुस्लिम महिलाओं पर पाबंदी लगा रखी है। जबकि अन्य देशों में महिला इमाम होने पर कोई रोक नहीं है। हालांकि इस फतवे के खिलाफ महिलाएं लगातार संघर्ष कर रहीं, भोपाल, इलाहाबाद, लखनऊ, दिल्ली आदि राज्यों में महिलाओं ने अपना महिला मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी गठित किया है। हाँलाकि उसका भी विरोध हुआ मगर वे निरन्तर संघर्ष कर रही हैं इसी तरह तमाम मुस्लिम महिलाओं को ऐसे फतवों का विरोध करना ही चाहिए।
एक स्त्री जब अपने स्वाभिमान के लिए या आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के लिए घर से बाहर निकलती है तो वह पुरुषों की अपेक्षा कितने स्तरों पर संघर्ष करती है?
एक स्त्री जब पुरुष के मुकाबले आत्मनिर्भर होने के लिए बाहर निकलती है तो देखिए जहाँ पुरुष को बहुत आसानी से सहमति मिल जाती है वहीं जब एक लड़की उसी की उम्र की उसी के बराबर पढ़ी-लिखी घर से बाहर निकलकर कुछ करना चाहती है तो उससे कहा जाता है कि तेरी शादी होकर दूसरे घर जाना है। तुझे घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए। अगर वह उस सीमा को लांघकर बाहर निकलती भी है तो जहाँ वह काम के लिए जाती है वहाँ उनके अधिकारी या सहकर्मी पुरुष और ज्यादातर पुरुष ही होते हैं वे भी उसको हेय दृष्टि से देखते हैं। एक बेचारगी का चोगा उसे ओढ़ा दिया जाता है वहाँ भी वह उस बेचारगी के भाव को तोड़ने के लिए लड़की है जबकि वह अपनी क्षमताओं के साथ उन क्षमताओं के बल पर समाज में कुछ कर पाने के लिए बाहर निकल रही है। लेकिन समाज अभी तक यह मानने को तैयार नहीं है कि यह उसका अधिकार है और वह भी पुरुषों की तरह समान रूप से आत्मनिर्भर और स्वतंत्र होकर जी सकती है। सच बात यह भी है कि वे चाहते भी नहीं कि महिला खुद अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। हालांकि हम कह सकते हैं कि हमारा समाज बहुत आगे निकल गया है और बहुत सारी लड़कियाँ अब घर से बाहर भी निकल रही हैं परन्तु समाज, परिवार इससे भी डरता है कि आत्मनिर्भर होकर वह खुद अपने फैसले करने लगेगी और फिर हमारी बात तो मानेगी नहीं जहां मरजी हो जैसे हो चली जाएगी। इसलिए अगर कुछ करेगी नहीं तो खाएगी क्या और जब भूखी रहेगी तब हमारे पैरों पर ही आकर गिरेगी इस तरह की अनेक दिक्कतों का सामना उसे आज भी करना पड़ता है।
आधुनिक समाज में पढ़ी-लिखी महिलाओं के शोषण का क्या कारण मानती हैं आप?
वही है सबसे अहम्‌ उसका आत्मनिर्भर न होना। क्योंकि पढ़-लिखकर भी वह दूसरों पर निर्भर रहती है तो आधी गुलामी तो उसकी वहीं से शुरू हो जाती है। दूसरे केवल अक्षर ज्ञान या डिग्री ले लेने से उसकी चेतना का विकास नहीं होता क्योंकि समाज या परिवार उसे सिर्फ इसलिए पढ़ाता है कि वह अपने भाइयों या शादी के बाद पति की एक अच्छी असिसटैण्ट बनकर कार्य करे अगर वह उनके कहे अनुसार सहयोग नहीं करती तो उसे बुरा समझा जाता है उसे पढ़ाई के दौरान या कभी भी यह आभास नहीं कराया जाता कि पढ़-लिख कर तुम स्वतंत्र बन सकती हो और खुद फैसले लेकर तुम अपना जीवन अपने तरीके से जी सकती हो। उसकी पढ़ाई या उसकी डिग्री सिर्फ उसके दहेज के रूप में मान ली जाती है कि शादी में पाँच लाख लगाऐंगे ऊपर से हमारी लड़की पढ़ी-लिखी है और शादी के बाद उसका पति भी उसे स्वतंत्र फैसले लेने का अधिकार नहीं देता वह भी उसे सिर्फ घर में सजाकर रखना चाहता है यह कहने को कि उसकी बीबी एम.ए., बी.एड. है और वह चार दीवारी में कैद होकर सब तरफ से उत्पीड़ित होती रहती है और तब अगर वह चाहती भी है खुद के लिए कुछ करना तो समाज और सबसे ऊपर उसका पति उसे यह इजाजत नहीं देता और वह रास्ता नहीं खोज पाती।
स्त्री के विवाह को क्या आप बंधन समझती हैं?
नहीं भी समझू अगर समाज जिस तरह लड़के लिए सोचता है कि पहले वह अपने पैरों पर खड़ा हो तब शादी की जाए अगर इसी तरह लड़की के लिए भी सोचा जाए तो। जबकि ऐसा नहीं होता और उसे बोझ की तरह पहले ही हटाने की कोशिश की जाती है दूसरे यह कि शादी को बंधन तब भी नहीं कहा जाए कि अगर शादी के समय जिस तरह दो बिजनेस मैन पार्टनरशिप करते हैं और अगर उनमें आपसी तालमेल ठीक नहीं बैठ पा रहा है तो वे आसानी से अलग भी हो जाते हैं। अगर विवाह को भी इसी तरह मानसिक रूप से तैयार होकर किया जाए कि अगर दोनों में से एक कोई धोखा दे रहा है, परेशान कर रहा है तब दूसरे पार्टनर को उसके जीवन से अलग होने का स्वतंत्र अधिकार हो, यदि पुरुष स्त्री को धोखा देता है या मर जाता है या कहीं चला जाता है तब उस स्त्री को दूसरा जीवन साथी चुनने की स्वतंत्रता हो तब शादी बंधन नहीं लगेगी। और वह अपने पति की अच्छी सहयोगी भी रहेगी परन्तु अमूमन होता यह कि पुरुष चाहता है कि वह वही करेगी जो वह चाहता है।