Monday, September 28, 2009

नयी सदी की पहचान श्रेष्ठ महिला कथाकार


ममता कालिया
समकालीन रचना जगत में अपने मौलिक और प्रखर लेखन से हिन्दी साहित्य की शीर्ष पंक्ति में अपनी जगह बनाती स्थापित और सम्भावनाशील महिला-कहानीकारों की रचनाओं का यह संकलन आपके हाथों में सौंपते, मुझे प्रसन्नता और संतोष की अनुभूति हो रही है। आधुनिक कहानी अपने सौ साल के सफ़र में जहाँ तक पहुँची है, उसमें महिला लेखन का सार्थक योगदान रहा है।







हिन्दी कहानी का आविर्भाव सन् 1900 से 1907 के बीच समझा जाता है। किशोरीलाल गोस्वामी की कहानी ‘इंदुमती’ 1900 में सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित हुई। यह हिन्दी की पहली कहानी मानी गई। 1901 में माधवराव सप्रे की ‘एक टोकरी भर मिट्टी’; 1902 भगवानदास की ‘प्लेग की चुड़ैल’ 1903 में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की ‘ग्यारह वर्ष का समय’ और 1907 में बंग महिला उर्फ राजेन्द्र बाला घोष की ‘दुलाईवाली’ बीसवीं शताब्दी की आरंभिक महत्वपूर्ण कहानियाँ थीं। मीरजापुर निवासी राजेन्द्रबाला घोष ‘बंग महिला’ के नाम से लगातार लेखन करती रहीं। उनकी कहानी ‘दुलाईवाली’ में यथार्थचित्रण व्यंग्य विनोद, पात्र के अनुरूप भाषा शैली और स्थानीय रंग का इतना जीवन्त तालमेल था कि यह कहानी उस समय की ज़रूरी कृति बन गई। इस काल खण्ड की अन्य उल्लेखनीय लेखिकायें थीं- जानकी देवी, ठकुरानी शिवमोहिनी, गौरादेवी, सुशीला देवी और धनवती देवी।






यह राजनीतिक उथल-पुथल और जन-जागरण का भी समय था। अतः इनके बाद की महिला कहानीकारों में हमें राष्ट्रीय-चेतना के दर्शन हुए। वनलता देवी, सरस्वती देवी, हेमन्तकुमारी और प्रियम्वदा देवी ने अपनी कहानियों में राजनीतिक सरोकारों का परिचय दिया। समाज में फैली कुरीतियों यथा बाल-विवाह, पर्दा प्रथा और अशिक्षा को विषय-वस्तु बना कर मुन्नी देवी भार्गव, शिवरानी देवी (प्रेमचन्द की पत्नी) चन्द्र प्रभादेवी मेहरोत्रा। विमला देवी चौधरानी आदि ने कहानियाँ लिखीं। इन रचनाकारों ने अपने तरीके से यथार्थपरक, समाजोन्मुखी लेखन की नींव रखी।






सन् 1916 से 1935 तक का समय प्रेमचन्द्र के प्रभाव का समय था। उनकी कहानियों में मौजूद आदर्शोनमुखी यथार्थवाद, परवर्ती लेखकों में फार्मूला की हद तक अपनाया गया। लेकिन यहीं से परिवर्तन की इच्छा ने जन्म लिया। हिन्दी कहानी पर इस कालखंड में गाँधीवाद, मार्क्सवाद और फ्रॉयडवाद का भी प्रभाव देखा गया। उषा देवी मित्रा, कमला चौधरी और सत्यवती मलिक ने कहानी के विकास को इस दौर में सार्थक योगदान किया। उनकी रचनाओं में सामाजिक समस्याओं के साथ मनोवैज्ञानिक पक्ष भी व्यक्त हुआ। स्वाधीनता की आकांक्षा सुभद्रा कुमारी चौहान की कविताओं और कहानियों में दिखाई दी। इस दौर में हिन्दी कहानी में समाज सुधार की चिन्ता सर्वोपरि थी। होमवती देवी, महादेवी वर्मा, चन्द्रकिरण सोनरिक्सा आदि ने अपनी कहानियों में समाज के समस्याग्रस्त हिस्सों को उजागर किया।






स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् देश के दो टुकड़े हो गये। समाज ने विभाजन की विभीषिका देखी और झेली। इस प्रक्रिया में सबसे ज्यादा अवमूल्यन मानवीय विश्वास और विवेक का हुआ। कथा-साहित्य के लिए यह समय संक्रांति-काल था। कृष्ण सोबती की कहानी ‘सिक्का बदल गया’ इसी संकट का मार्मिक दस्तावेज़ है। कहानी की नायिका ‘शाहनी’ उस यातना को प्रत्यक्ष देख सकती है जहाँ वह अपने ही घर में अब सुरक्षित नहीं है। सद्भावना की जगह सन्देह ने ले ली है। पर शाहनी अपने व्यक्तित्व का वैभव कम नहीं होने देती। पराजय के क्षण में भी वह साम्राज्ञी की तरह घर से बाहर आती है। इस कहानी पर आलोचक मधुरेश का कहना है कि मानवीय सद्भाव के क्षरण वाले उस भयावह दौर में भी, भावुक हुए बिना, कृष्णा सोबती उस मानवीय तत्व को रेखांकित करती हैं जो मनुष्य में बचे हुए विश्वास को जिंदा रखे हुए था। कृष्णा सोबती के पात्र बेहद सजीव और यथार्थ लगते हैं।






जीवन के प्रति गहरी आस्था और अनुराग चित्रित करती उनकी अन्य प्रसिद्ध कहानियाँ हैं-‘ए लड़की’, ‘मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘नाम पट्टिका’ और ‘तिन पहाड़’। उनके लेखन में पंजाब क्षेत्र की महक उनकी भाषा शब्द-चयन और वाक्य संरचना में भरपूर महसूस की जा सकती है। कृष्णा जी अपने वृहद् उपन्यास ‘ज़िन्दगीनामा’ के लिए भी जानी जाती हैं। समकालीन साथी कलाकारों पर उनके संस्मरण ‘हम हशमत’ नामक संग्रह में प्रकाशित हैं। उनकी रचनाओं में तल्खी की अपेक्षा खुलापन और तेवर की अपेक्षा संवेदनशीलता नज़र आती है। उनका नवीनतम उपन्यास ‘समय सरगम’ है। वे आजकल एक अन्य उपन्यास पर कार्य कर रही हैं।


हिन्दी कहानी के विकास में कहानी-आंदोलनों की भी अहम भूमिका रही है। इनमें प्रमुख ये रहे हैं-






(1) नयी कहानी


(2) साठात्तरी कहानी


(3) सचेतन कहानी


(4) समांतर कहानी


इन पर कुछ विस्तार से चर्चा करना प्रासंगिक होगा।






(1) नयी कहानी-सन् 1955 से सन् 1963 तक के काल-खण्ड में हमें नयी कहानी का प्रारंभ और उन्मेष दिखाई देता है। ‘नयी कहानी’ शब्द की स्थापना के विषय में दो मत हैं। कथाकार कमलेश्वर का कथन है कि कवि दुष्यंतकुमार ने सबसे पहली बार इस दौर की कहानी को ‘नयी कहानी’ शब्द से पहचान दी। राजेन्द्र यादव मानते हैं कि डॉ. नामवर सिंह और दुष्यंतकुमार दोनों को उसका श्रेय मिलना चाहिए। नामवर जी की आलोचना पुस्तक ‘कहानी : नयी कहानी’ इतनी प्रामाणिक और पठनीय रही कि पाठकों के दिमाग़ में यह नामवर जी के साथ सम्बद्ध हो गया। स्वयं नामवरजी का कहना है कि ‘कहानी की चर्चा में अनायास ही ‘नई कहानी’ शब्द चल पड़ा है और सुविधानुसार इसका प्रयोग कहानीकारों ने भी किया है और आलोचकों ने भी।’ (कहानी : नयी कहानी पृष्ठ 53) प्रख्यात लेखक वह ‘हंस’ पत्रिका के सम्पादक राजेन्द्र यादव ने अपनी पुस्तक ‘एक दुनिया समानांतर’ की भूमिका में नयी कहानी पर विमर्श करते हुए लिखा है, ‘वस्तुतः आज (नयी) कहानी युग के सन्दर्भों दबावों से प्राप्त अपने अनुभवों’ को आत्मसात् करके उन्हें पात्रों, स्थितियों में फैलाकर तटस्थ भाव से देखने-समझने और पाठक तक पहुँचाने का प्रयास है।’’






1947 में आज़ादी मिलने के बाद भी हमें वह समाज नहीं मिला जिसका सपना गाँधी, नेहरू के साथ-साथ हम सबने देखा था। ऐसी स्थिति में वर्जनाओं, प्रतिबंधों और विसंगतियों से जूझते जन–साधारण की भावनाओं परिस्थितियों और परेशानियों को नयी कहानी ने अपनी विषय वस्तु बनाया। नयी कहानी जीवन से जुड़कर समाज की पहचान है। समाज में फैली अस्थिरता अनिश्चतता और अराजकता को अपनी-अपनी तरह से मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेन्द्र प्रसाद, मन्नू भंडारी, अमरकान्त, उषा प्रियम्बदा, कृष्णा सोबती, मार्कंण्डेय, भीष्म साहनी और निर्मल वर्मा ने व्यक्त करने का प्रयास किया। नयी कहानी की विशेषता प्रतीकात्मकता और सांकेतिकता रही। मोहन राकेश की ‘ग्लासटैंक’, राजेन्द्र यादव की छोटे-छोटे ताजमहल, कमलेश्वर की ‘राजा निरबंसिया’, मन्नू भंडारी की ‘यही सच है’, निर्मल वर्मा की ‘परिन्दे’ और उषा प्रियंवदा की ‘वापसी’ में ये विशेषतायें देखी जा सकती हैं।






नई कहानी हिन्दी कथा साहित्य के विकास में एक महत्वपूर्ण चरण रही है।


(2) सन् 1960 के बाद की कहानियों में नयी कहानी की अपेक्षा ज्यादा प्रामाणिक यथार्थ और वर्तमान स्थितियों का विश्लेषण पाया गया। इसी प्रवृत्ति की कहानी को साठोत्तरी कहानी की संज्ञा दी गई। इसी बीच एक अल्पजीवी दौर अकहानी का भी रहा जिसने नयी कहानी के खिलाफ़ मोर्चा खोला। इसका मूल स्वर अस्वीकार और निषेध का रहा। राजकमल चौधरी के असामयिक निधन ने इस पक्षधरता भी समाप्त हो गई तथा इससे जुड़े रचनाकार साठोत्तरी कहानी के प्रयोग में सक्रिय हो गये। दूधनाथ सिंह, ज्ञानरंजन, रवीन्द्र कालिया, ममता कालिया, चित्रा मुद्गल, सुधा अरोड़ा, और नमिता सिंह आदि साठोत्तरी रचनाकार माने जाते हैं। आलोचक मधुरेश के अनुसार ये युवा लेखक किसी परंपरागत नैतिकता या सामाजिक प्रतिबद्धता के कायल नहीं, वे सत्य को अपनी आँखों से देखने पर अधिक विश्वास करते हैं, अतः सातवें दशक की इस कहानी के अंदर हर लेखक अपने ढंग से जूझता या संघर्ष करता दिखाई देता है।’ साठोत्तरी कहानी की भाषा और शैली अधिकस्पष्ट सघन और तार्किक है।






(3) सचेतन कहानी का नारा मुख्यतः महीप सिंह ने उछाला पर इसकी सक्रियता का काल संक्षिप्त रहा। इस आंदोलन से जगदीश चतुर्वेदी, राजीव सक्सेना, योगेश गुप्त, मनहर चौहान आदि जुड़े रहे। इस आंदोलन पर यूरोप के अस्तित्ववाद का प्रत्यक्ष प्रभाव रहा।






(4) सन् 1972 में ‘सारिका’ के संपादक व लेखक कमलेश्वर ने समांतर कहानी की स्थापना की। उनका कहना था कि समांतर कहानी, साहित्य की तरफ से, साथ देने का औपचारिक प्रस्ताव नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर चल रही, यथार्थ की लड़ाई में शामिल कहानी है।’ कमलेश्वर ने ‘सारिका’ के कई विशेषांक इसी सिद्धांत के प्रतिपादन में निकाले, किन्तु आम पाठक को इसका कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिल सका कि यह कहानी किन अर्थों में भिन्न है। से.रा. यात्री, जितेन्द्र भाटिया, मधुकर सिंह, इब्राहिम शरीफ़, सूर्यबाला और अनीता औलक इस आंदोलन के दौरान चर्चा में आईं।






यह सुखद है कि रचनाकार की रचनाशीलता और लेखन-अवधि आंदोलनों की अपेक्षा ज्यादा सुदृढ़ और लम्बी होती है। कहानी के क्षेत्र में आज भले ही कोई सक्रिय आंदोलन न हो, समकालीन लेखन में कहानी अपने समय और समाज को व्यक्त करने में जी जान से जुटी है। आज का यथार्थ भी ज्यादा जटिल कुटिल और बहुकोणीय है समकालीन रचनाकार नये प्रयोगों द्वारा वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक संरचना ‘संवाद’ के जरिये साकार करता है। समकालीन लेखन में कहानी की कमान महिलाओं ने बिल्कुल इस तरह संभाली जिस तरह वे अन्य गतिविधियों में मोर्चा सँभालती हैं। लेकिन व्यापक स्वीकृति पाने के लिये उन्हें लम्बा संघर्ष करना पड़ा महिला लेखन को प्रायः हाशिये का लेखन माना गया; कोष्ठक में बन्द एक पूरक कर्म। हाशिये और कोष्ठक से निकाल कर इसे केन्द्र में लाने के लिए पिछली पीढ़ी की लेखिकाओं ने अथक परिश्रम किया। आज महिला-लेखन विश्वविद्यालय का एक महत्त्वपूर्ण विषय है।






भारी संख्या में विद्यार्थी, महिला रचनाकारों के कृतित्व पर शोध-कार्य कर रहे हैं। महिला-विमर्श पर अलग से गोष्ठियाँ और सेमिनार होते हैं। पत्र-पत्रिकाओं को महिला लेखन विशेषांक निकाल कर नया जीवनदान मिलता है, उनकी प्रसार संख्या बढ़ जाती है। जाहिर है महिला लेखन में विलक्षण पठनीयता, विश्वसनीयता, जिजीविषा और मार्मिकता के कारण ही इसे इतना विशाल पाठक वर्ग मिला है। आत्माभिव्यक्ति की आकांक्षा के साथ-साथ आत्मसजगता और परिवेश-चेतना महिला कहानीकार के रचनात्मक सरोकार का केन्द्रीय बिन्दु रहा है।






विषयगत नवीनता, दृष्टिकोण का साहस और विसंगतियों की पड़ताल कृष्णासोबती के साथ-साथ हमें मन्नू भण्डारी उषा प्रियम्वदा, ममता कालिया, चित्रा मुद्गल और नमिता सिंह में भरपूर मिलती है। कुछ अन्य महिला रचनाकार जिन्होंने हिन्दी कहानी को समृद्ध किया है इस प्रकार हैं-मृणाल पाण्डे, मैत्रेयी पुष्पा, राजी सेठ, चन्द्रकांता, प्रभाखेतान, कमल कुमार, सुषम बेदी, लवलीन, गीतांजलिश्री, मधु कांकरिया आदि। सभी महिला-रचनाकारों ने स्त्री-पुरुष सम्बन्धों का गहन और सूक्ष्म विश्लेषण किया है। कामकाजी स्त्री का जगत घर-परिवार के अतिरिक्त व्यापक हो जाता है। अतः महिला कहानीकार की कलम कामकाजी महिलाओं की ज़िन्दगी पर भी फोकस हुई है।






कथा-सृजन के क्षेत्र में प्रतिभा का विलक्षण विस्फोट महिला-लेखन की प्रमाणिक पहचान के लिए पर्याप्त प्रमाण होता यदि आलोचना के स्तर पर इसकी सम्यक् समीक्षा की जाती। महिला-रचनाकार की कृतियाँ अपनी संवेदनशीलता, तार्किकता और तेवर में बेहद पठनीय होते हुए भी आलोचना के ठंडेपन की शिकार हैं। डॉ. निर्मला जैन ने मूल्यांकन की दिशा में कुछ महत्वपूर्ण कार्य किया है पर उतना अपर्याप्त है। मूल्यांकन का मसला, आरक्षण के मसले की तरह ही पुरुषवादी परहेज़ का शिकार है।


कुछ वर्ष पहले तक महिला लेखन पर आरोप लगाया जाता था कि यह सीमित दृष्टि का साहित्य है; कि यह परिवार के दायरे के बाहर नहीं निकलता; कि यह समय-समाज के उन पेचीदा आयामों को नहीं उठाता जो समकालीन जीवन को परिभाषित करें।






इन आरोपों के अनौचित्य पर कुछ देर बाद विचार करते हैं। पहले हमें यह देखना है कि भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति कैसी है। कहना होगा कि इसका उत्तर संतोषजनक नहीं है। महिलाओं को दोयम दर्जे का नागरिक, कार्यकर्ता और संचालक माना जाता है। परिवार से जुड़ी हर जिम्मेदारी उनके मत्थे मढ़ कर पुरुष अपनी प्रतिभा का बेहतर उपयोग करने के लिये स्वतंत्र है। स्त्री के सन्दर्भ में अवसर की कमी को प्रतिभा की कमी समझने की घूर्तता बरती गई है। कुल मिलाकर भारतीय समाज में एक ऐसी आचार-संहिता का पालन होता है जिसमें स्त्री-पुरुष का रिश्ता सेवक-स्वामी के असमान सम्बन्ध के रूप में पनपता है। यह अपने आप में एक नये तरीके की वर्ग विषमता है जिस पर हैव और हैव-नॉट का सिद्धान्त बख़ूबी लागू होता है। कोई ताज्जुब नहीं कि जब-जब स्त्री-विमर्श पर गोष्ठियाँ आयोजित की जाती हैं, स्त्री के साथ दलित प्रश्न भी चर्चा का केन्द्रीय विषय बनकर उभरता है।






आत्माभिव्यक्ति की आकांक्षा के साथ-साथ आत्मसजगता का रेखांकन पिछले पचास वर्षों में महिला लेखन का केन्द्र-बिन्दु रहा है। कहानी के समानांतर उपन्यास के सृजन में भी आज लेखिकाओं ने कमान सँभाल रखी है। पिछले कुछ वर्षों के महत्वपूर्ण उपन्यास महिलाओं द्वारा ही रचे गये हैं। कृष्णा सोबती का ‘ज़िन्दगीनामा’ और ‘समय सरगम’, मन्नू भंडारी का ‘महाभोज’, मृणाल पाण्डे का ‘पटरंगपुर पुराण’, मृदुला गर्ग का ‘अनित्य’, चित्रा मुद्गल का ‘आंवा’, ममता कालिया का ‘बेघर’ और ‘नरक दर नरक’ मैत्रेयी पुष्पा का ‘चाक’ और अलका सरावगी का ‘कलिकथा वाया बाइपास’ कालजयी उपन्यास हैं। नितांत नयी युवा पीढ़ी में भी लेखिकाओं का योगदान विस्मयकारी है। दीपक शर्मा, गीतांजलि श्री, जया जादवानी, मधु कांकरिया, नासिरा शर्मा आदि की रचनायें अपने आधुनिक विन्यास और विषय वस्तु से हमें चौंकाती हैं और उम्मीद बंधाती हैं कि उनकी पैनी नज़र समय समीक्षा करती रहेगी।


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Sunday, September 27, 2009

नारी विमर्शः दशा और दिशा

पुस्तक प्रकाशित






नारी विमर्शः दशा और दिशा

स. फीरोज/शगुफ्ता





अनुक्रम

दो शब्द

मधुरेश : नारीवादी की विचार-भूमि ०९

सुरेश पण्डित : बाजार में मुक्ति तलाशती औरतें २६

शिव कुमार मिश्र : स्त्री-विमर्श में मीरा ३२

कमल किशोर श्रमि:स्त्री मुक्ति का प्रश्न ४०

मूलचन्द सोनकर : स्त्री-विमर्श के दर्पण में स्त्री का चेहरा ४५

शशि प्रभा पाण्डेय : नारीवादी लेखन : दशा और दिशा ७२

हरेराम पाठक : स्त्रीवादी लेखन : स्वरूप और सम्भावनाएँ ७९

जय प्रकाश यादव : आधुनिक समाज में नारी-मुक्ति का प्रश्न ८६

वी.के. अब्दुल जलील: स्त्री-विमर्श समकालीन हिन्दी कथा साहित्य के

संदर्भ में' ९२

जगत सिंह बिष्ट : स्त्री-विमर्श और मृणाल पाण्डे का कथा साहित्य ९६

शोभारानी श्रीवास्तव : महादेवी वर्मा का नारी विषयक दृष्टिकोण १०८

रामकली सराफ : स्त्री जीवन का यथार्थ और अन्तर्विरोध ११३

ललित शुक्ल : संवेदना और पीड़ा की चित्राकार मुक्तिकामी

रचनाकार : नासिरा शर्मा ११८

आदित्य प्रचण्डिया : हिन्दी कहानी में नारी १२५

शगुफ्ता नियाज : राजनीतिक पार्श्वभूमि और महिला उपन्यासकार १३२

उमा भट्ट : सुभद्रा कुमारी चौहान की कहानियों में स्त्री १४०

रमेश शर्मा : मध्यकालीन हिन्दी भक्तिकाव्य और नारी-विमर्श

के आयाम १४८

तारिक असलम : मुस्लिम स्त्रियाँ : स्वप्न और संघर्ष १५७

फ़ीरोज खान : दुर्दशा से लड़ती मुस्लिम औरतें १६२

बजरंग बिहारी तिवारी: दलित नारीवाद की अवधारणा १६६

साक्षात्कार

नासिरा शर्मा से शीबा फहमी एवं मेराज अहमद की बातचीत १७०

मैत्रेयी पुष्पा से उजैर खाँ की बातचीत १८३

विजय लक्ष्मी से हनीफ़ मदार की बातचीत १९३

दलित विमर्श और हम

पुस्तक प्रकाशित






दलित विमर्श और हम
स. फीरोज/शगुफ्ता



अनुक्रम


दो शब्द


शिव कुमार मिश्र - दलित साहित्यःअंतर्विरोध के बीच और उनके बावजूद ०९


माता प्रसाद - दलित साहित्य, सामाजिक समता का साहित्य है १८


शुकदेव सिंह - दलित-विमर्श, दलित-उत्कर्ष और दलित-संघर्ष २१


धर्मवीर - डॉ० शुकदेव सिंह : पालकी कहारों ने लूटी २९


रामदेव शुक्ल - कौन है दलितों का सगा? ३६


मूलचन्द सोनकर - रंगभूमि के आईने में सूरदास के नायकत्व की पड़ताल ४४


सुरेश पंडित - दलित साहित्य : सीमाएं और सम्भावनाएँ ६१


रामकली सराफ - दलित विमर्श से जुड़े कुछ मुद्दे ६७


कमल किशोर श्रमिक - अम्बेडकर की दलित चेतना एवं मार्क्स ७५


ईश कुमार गंगानिया- दलित आईने में मीडिया ८०


सूरजपाल चौहान - दलित साहित्य का महत्त्व एवं उसकी उपयोगिता ८७


अनिता भारती - दलिताएँ खुद लिखेंगी अपना इतिहास ९०


हरेराम पाठक - दलित लेखन : साहित्य में जातीय सम्प्रदायवाद का संक्रमण ९८


तारा परमार - दलित महिलाएं एवं उनका सशक्तिकरण १०४


तारिक असलम - दलित मुसलमानों की सामाजिक त्रासदी ११०


मानवेन्द्र पाठक - साठोत्तरी हिन्दी कविता में दलित-चेतना ११९


जगत सिंह बिष्ट - शैलेश मटियानी के कहानी साहित्य में दलित संदर्भ १२४


जसराम हरनोटिया-निजीकरण और दलित १३४


आदित्य प्रचण्डिया-दलित साहित्य-चिन्तन के दस्तावेज १४०


फीरोज खान - दलित साहित्य की अवधारणा एवं दलित साहित्यः एक विमर्श १४४


इकरार अहमद - दलित विरोध का यथार्थ १४९


साक्षात्कार


- डॉ० जय प्रकाश कर्दम से डॉ० पूरन सिंह की अन्तरंग बातचीत १५६


- तीन आम दलित व्यक्तियों से डॉ० मेराज अहमद की बातचीत १६१


- रमणिका गुप्ता से डॉ० शगुफ्ता नियाज की अन्तरंग बातचीत १७२


- डॉ० श्योराज सिंह बेचैन से मिर्जा गौहर हयात की बातचीत १८०


Wednesday, September 23, 2009

फेयरवेल


प्रताप दीक्षित






अंततः रामसेवक अर्थात्‌ आर.एस. वर्मा, सहायक सुपरवाइजर की पोस्टिंग मुख्यालय में ही हो गई। ग्रामीण इलाकों से लेकर कस्बों और अनेक नगरों में फैली शाखाओं वाले इस अर्द्धसरकारी जनसेवी संस्था का मुख्यालय प्रदेश की राजधानी में स्थित था। नियुक्ति के पश्चात्‌ लगभग पन्द्रह-सोलह वर्षों के दौरान वह सदा ग्रामीण अथवा कस्बाई इलाकों में ही रहा था। नीति के अनुसार प्रत्येक तीन वर्ष बाद उसका स्थानान्तरण हो जाता। यद्यपि इसके कारण अभी तक उसे कुछ विशेष असुविधा तो नहीं हुई क्योंकि जिस छोटे-से नगर की गंदी-सी बस्ती में उसका बचपन बीता था, उसकी तुलना में इन जगहों में उसके रहन-सहन का स्तर पर्याप्त से अधिक ही था। परन्तु बढ़ती सुविधाएँ, जिनका वह आदी होता गया था, शीघ्र ही अपनी अर्थवत्ता खोने लगीं। मसलन रंगीन टी.वी. और फ्रिज खरीदा, तो बिजली न आती। पत्नी के लिए ब्यूटी सैलून न होता। कहीं-कहीं तो उसके नए विशाल सोफे और बोन-चाइना की क्रॉकरी के लिए उपयुक्त मेहमान तक उपलब्ध न होते। अतः क्षेत्राीय प्रबंधक से लेकर यूनियन के महासचिव तक दौड़ने और काफी जद्दोजहद के बाद उसके स्थानान्तरण के लिए आदेश हेड ऑफिस हेतु हो गए। इस महानगर में आने के थोड़े ही दिनों बाद उसे लगने लगा कि उसके अंदर की गौरैय्या एक डैने पसारे विशाल पक्षी में परिवर्तित हो रही है।

नई जगह, आवास से कार्यालय दूर था। बच्चों के स्कूल भी पास नहीं। खर्च बढ़ने ही थे। पिता को भेजे जाने वाले मनीऑडरों में अंतराल आने लगा। दफ्तर के बाद अथवा छुट्टियों में बाहर निकलना मुश्किल होता। पिछली जगहों में, यहाँ की तरह नफासत पसंद सहयोगी भले ही न रहे हों, पर अवकाश के दिन और शामें मोहन लाल, श्रीवास्तव, रफीक अथवा पांडेय के यहाँ कट ही जाती थी। यहाँ इस प्रकार का पारस्परिक व्यवहार संभव न हो पाता। एक तो चलन नहीं दूसरे सभी दूर-दूर रहते थे। उसने प्रारम्भ में कोशिश की परन्तु थोड़ी ही देर बाद, जिसके घर वह गया होता, उसके आने का कारण पूछ बैठता। अतः वह भी चुप हो बैठ गया। इस नगर में दूर-पास के संबंधी भी शायद ढूँढने पर ही मिलते। यहाँ सुविधाएँ जरूर अधिक थीं-बिजली की आपूर्ति लगभग चौबीस घंटे, दूरदर्शन के अनेक चैनल, मनोरंजन के साधन, चिकित्सा सुविधा, नए-नए विज्ञापनों वाली उपभोक्ता वस्तुओं से भरे हुए बाजार। परन्तु समय कृपणता बरतता। पहली जगहों में जहाँ दुकानदार अनुनय के साथ किफायती दरों में सामान घर पहुँचा देते, यहाँ प्रॉविजन स्टोरों में प्रतीत होता कि उस पर लगातार एहसान किया जा रहा है या अति विनम्रता का प्रदर्शन कि बिना खरीददारी के वापस आने की हिम्मत न पड़ती, रेट चाहे जितने अधिक लगते रहे हों। यदि कभी बिजली न आ रही हो तो बंद कमरों से निकल चौथी मंजिल की खुली छत पर जाने का साहस न होता। शायद सुविधा भी नहीं थी। मकान मालिक की इतनी सदाशयता ही बहुत थी वह नजरें मिलने पर जरा-सा सिर हिलाकर नमस्कार-सा कर लेता।

मुख्यालय के जिस उपविभाग में सहायक-पर्यवेक्षक के पद पर उसकी नियुक्ति थी, वहाँ का मुख्य कार्य, विभिन्न शाखाओं से आए स्टेटमेंट का विश्लेषण और वर्गीकरण कर, अंतिम आंकड़े तैयार करना था। दफ्तर में काम तो कम था परन्तु फैलाव अधिक। एक का काम दूसरे से जुड़ा, एक हद तक दूसरे पर निर्भर था। अक्सर शाखाओं अथवा दूसरे विभागों से साप्ताहिक और मासिक रिपोर्ट समय पर न आती, जिससे कम्प्यूटर पर फीगर न पहुँच पाती। जिम्मेदार उसे ठहराया जाता। कार्यालय में लगता सभी जल्दी में हैं। लंच के बाद बाबू लोग तो चले ही जाते,

अधिकारी भी इधर-उधर देख सिमट लेते। उसके विभाग को ऊपर के लोग अनाथालय और अधीनस्थ कर्मी ÷क्लब' कहते। निश्चित बंटा काम भी समय पर पूरा न हो पाता। कारण अनेक थे। स्टेशनरी की कमी जो अक्सर हो जाती, चपरासी या वाटर-ब्वाय का गायब हो जाना, आदि-आदि। इसके बाद लोगों के अपने काम भी तो थे। बिल अथवा शेयर फार्म जमा करना, बच्चों को स्कूल से लाना। मेहरोत्राा की बीबी स्कूल में पढ़ाती थी, वह उसे छोड़कर आता। फिर लेने भी तो जाना पड़ता था। विभाग में उसके अतिरिक्त एक अन्य अधिकारी जे.पी. श्रीवास्तव था। उसे लोग सनकी या ऐसा ही कुछ मानते। नियम-कानून का पक्का। खुद समय से आता, जमकर काम करता और सबसे यही उम्मीद करता। वह अक्सर हाजिरी रजिस्टर में क्रॉस लगा देता। लोग उससे चिढ़ते। खुद पिले रहो, पर यह क्या सबको घड़ी देखकर हांकोगे। उससे श्रीवास्तव की पट गई।

एक दिन उसकी सीट पर ऑडिट सेक्शन का कुंदन आया, ÷÷बॉस! जरा दो सौ रुपये बढ़ाना।'' उसके हाथ में एक लिस्ट थी। उसने फाइलों के बीच से सिर उठाकर प्रश्नवाचक दृष्टि से उसकी ओर देखा।

÷÷अरे! क्या जनार्दन जी का सरकुलर नहीं मिला। अपने निदेशक महोदय, शाह साहब का, स्थानान्तरण केन्द्रीय कार्यालय हुआ है। उनकी विदाई पार्टी है।''

÷÷परन्तु क्या यह राशि ज्यादा नहीं है?'' उसने झिझकते हुए कहा, लेकिन जनार्दन के नाम से उसने रुपये बढ़ा दिए थे।

÷÷आप अभी नए आए लगते हैं। मजे करोगे यार!'' कुंदन ने बेतकल्लुफी से कहा था।

दो दिन बार विदाई पार्टी का आयोजन संस्थान के अतिथिगृह में किया गया था। विशाल लॉन में कुर्सियाँ और बीच में लाल कालीन। लोग धीरे-धीरे आ रहे थे। उसने हाथ जोड़ नमस्ते किया। अधिकारी संघ के सचिव जनार्दन जी लोगों से घिरे हुए थे। व्यस्तता के बाद भी उन्होंने आगे बढ़कर उससे हाथ मिलाया। वह कृतज्ञ हो आया।

पण्डित जनार्दन, अधिकारी संघ के सचिव, टाई-सूट में रहते। गौर वर्ण, माथे पर लाल चंदन, सिर पर गांठ लगी चोटी। गरिमामय ढंग से निरन्तर अंग्रेजी बोलते।

धीमे-धीमे बोलते अचानक उनका स्वर तेज हो जाता। यह इस बात का सूचक था कि फैसला हो गया, अब बात खत्म। उन्होंने कई लोगों को कुछ काम बताते हुए, आदेश जैसे स्वर में, प्रार्थना की। पास खड़ा जगदीश, कुछ नहीं तो, पास पड़ी बेतरतीब कुर्सियों को ही व्यवस्थित करने लगा। वह निरुद्देश्य इधर-उधर देखता रहा। तभी जनार्दन जी उसके पास आकर बोले, ÷÷आपसे तो मुलाकात ही नहीं होती बहुत व्यस्त रहते हैं।''

उसने कुछ कहना चाहा तभी निदेशक महोदय की कार अंदर आती दिखाई दी। लोग सावधान हो उठे। जनार्दन उससे ÷एंज्वाय', ÷एंज्वाय' करते उधर बढ़ गए। लोगों ने उन्हें मार्ग दिया। उन्होंने कार का दरवाजा खोलते हुए, ÷वेलकम सर' कहकर हाथ मिलाया।

काले सूट में मुस्कराते निदेशक महोदय, लोगो के साथ, सोफों की ओर बढ़े। सभी लोगों के साथ वह पीछे पड़ी एक कुर्सी पर बैठ गया था। वह स्पष्ट नहीं सुन पा रहा था। माल्यार्पण का कार्यक्रम आरम्भ हो चुका था। सचिव महोदय आवाज देते और लोग, महत्त्वपूर्ण लोग, निदेशक महोदय को माला पहनाकर वापस आ जाते। जर्नादन जी ने आवाज दी थी, ÷श्री जगदीश चन्द्र, स्टेटमेंट अनुभाग' जगदीश शायद लघुशंका हेतु चला गया था। पंडित जी ने कुछ रुककर कहा, ÷श्री राम सेवक जी।'

वह चौंका फिर सचिव महोदय को अपनी ओर देखते पाकर आगे बढ़ा और उनके हाथ से माला ले, निदेशक महोदय के गले में डाल, फिर वापस अपने स्थान पर आ बैठा। अभी भी कई मालाएँ बची हुई थीं। वह अपने को महत्त्वपूर्ण मान रहा था। उसका संकोच कुछ हद तक मिट गया था। इसके बाद अगला कार्यक्रम था। जर्नादन जी ने निदेशक महोदय का गिलास भरने के बाद अपना गिलास भरा था। इसके बाद अन्य लोगों ने। ÷चियर्स' के साथ हलचल बढ़ गई थी।

÷आओ यार।' कहीं से जगदीश ने आकर उसे खींचा था।

÷÷परन्तु, मैं तो लेता नहीं।'' उसने कहा।

÷÷अरे सूफीपन छोड़ो। दो सौ वसूलने हैं या नहीं?'' उसने दुबारा जोर दिया।

निदेशक महोदय, उपनिदेशक के साथ किसी गम्भीर मंत्राणा में व्यस्त हो गए थे। जनार्दन जी आते दिखे। वह उसके सामने आ गए थे। वह खड़ा हो गया। उससे मुखातिब होते हुए उन्होंने कहा, ÷यार रामसेवक तुम आगे क्या लिखते हो?'

वह संकुचित हो उठा। उसे याद आया, वर्षों पहले कॉलेज में एक प्रोफेसर के द्वारा इसी प्रश्न के उत्तर में उसने उन्हें वह लेक्चर पिलाया था कि वह माफी-सी माँगने लगे थे। पर इस समय उसने झिझकते हुए उत्तर दिया, ÷जी! वर्मा, रामसेवक वर्मा।'

÷वही तो,' वह हाथ में गिलास लिए हो-हो हँसते हुए थूक उड़ाते बोले, ÷÷वही तो। मैं तो कुछ और समय रहा था।''

वह कुछ कहना चाहता था, परन्तु माहौल देखकर चुप रह गया। जनार्दन जी फिर डायरेक्टर साहब के पास सिमट गए थे। वह चिन्तित से बोले-÷सर, आपके जाने के बाद इस मुख्यालय का क्या होगा? ईश्वर जाने इस संस्था का क्या भविष्य है?'

शायद भोजन कुछ कम पड़ गया था। लोग आशंकित हो हाथ में प्लेटें लिए टूट पड़ रहे थे। निदेशक महोदय को काफी बड़ा गिफ्ट पैकेट विदाई में दिया गया था। देर रात लौटते हुए उसने अपनी पूर्व विदाई पार्टियाँ याद आई। पाँच-पाँच रुपये एकत्रिात कर, चाय-समोसे, गुलाब जामुन और उपहार में एक पेनसेट। उसे संतोष हुआ चलो यहाँ से चलते समय विदाई पार्टी तो ढंग से होगी। घर में पत्नी और बच्चे पार्टी की भव्यता सुनकर उत्साहित थे।

अगले माह उसके प्रभाग में कार्यरत जगदीश के तबादले के आर्डर आ गए। उसके इस स्टेशन पर पाँच वर्ष पूर्ण हो चुके थे। आना था ही। उसने कुंदन, सचिव का सहयोगी, से जगदीश की पार्टी के लिए बात की। ÷क्या?' उसने आश्चर्य से उसकी ओर देखते हुए कहा, ÷इस संबंध में तुम सचिव से ही सीधे बात कर लो।'

उसने सचिव को ढूँढा। वह डायरेक्टर के कमरे में था। वह बाहर ही प्रतीक्षा करने लगा। तभी द्वार खुला। स्प्रिंग वाला दरवाजा खोल, जनार्दन बाहर निकला। पीछे डायरेक्टर साहब। वह दरवाजा बंद होने से रोकने के लिए पकड़े रहा था। उसने सुना, ÷÷पहले की बातें तो जाने दीजिए। मैं जाने वाले की बुराई नहीं करता परन्तु यहाँ के प्रबन्ध, लोगों की कार्यक्षमता में जो सुधार आपके ज्वाइन करने के बाद हुआ, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।''

जनार्दन कह रहा था।

मुदित डायरेक्टर साहब कार में बैठ गए थे। उसने जनार्दन से अपनी बात जोर देकर कही। जनार्दन गंभीर हो गया, ÷÷इस बार तो संभव नहीं है। लोग अभी दो-दो सौ झेल ही चुके हैं। फिर इसे जनरल बॉडी में पास भी तो कराना पड़ेगा।''

तभी वहाँ कुंदन और तीन-चार अन्य साथी भी आ गए थे। वह निराश होकर आगे बढ़ गया था। पीछे से उसके कानों में कई आवाजें पड़ी थीं-÷पार्टी चाहिए! साला डायरेक्टर से अपनी बराबरी करता है।'

दो-ढाई महीने बीत गए। उसने इस बीच और कई साथियों से बात की थी। उसे आश्चर्य था कि सबके हित और समानता की बात होने पर भी कोई भी उससे सहमत क्यों नहीं था। एक शाम उसे कार्मिक विभाग में बुलाया गया। पता चला कि उसका ट्रांसफर एक दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रा में हो गया था। उसे रोष के साथ अचरज भी हुआ-उसे आए तो मुश्किल से एक वर्ष भी नहीं हुआ होगा। इतनी जल्दी

÷÷आप चाहें तो निदेशक महोदय से मिल लें।'' कार्मिक अधिकारी ने ठंडे स्वर में अपनी विवशता बताई।

परन्तु कुछ न हो सका। वह जनार्दन से किंचित आवेश में मिला।

÷÷यह तो प्रशासनिक आधार पर हुआ है। इसमें कुछ नहीं हो सकता।'' जनार्दन ने मजबूरी जाहिर की।

उसके दोबारा कहने पर कहा, ÷अच्छा तो आप अवकाश ले लें। देखूंगा, क्या-कुछ किया जा सकता है?'

एक दिन उसके सुनने में आया कि कुंदन ने जनार्दन से कहा था, ÷÷यह तो बना हुआ वर्मा है।''

जनार्दन ने कहा था, ÷÷मुझे पहले से ही मालूम था।''

वह दो माह तक बीमारी के आधार पर छुट्टी लिए रहा। रोज जनार्दन के कार्यालय में जाकर बैठ जाता। आखिरकार परिणाम आया। दूरस्थ शाखा से आदेश परिवर्तित होकर एक अन्य, अपेक्षाकृत निकट की ग्रामीण शाखा के लिए हो गया, उसे अवमुक्त कर दिया गया था। उसके अधीनस्थ भी प्रसन्न थे। तिवारी कह रहा था, ÷÷बड़े कानूनदां और तुर्रमखाँ बनते थे। लद गए न।''

वह रिलीविंग पत्रा लेकर लौट रहा था। उसको मालूम था कि उसकी फेयरवेल न होनी थी न होगी। उसके मन में आ रहा था-छोटू को गुलाब की माला और बेटी को गिफ्ट पैकेट की प्रतीक्षा होगी। पत्नी तो, पार्टी में खाने को क्या था-यही सुनकर तृप्त हो जाएगी।

वह निरन्तर सोचता रहा। लौटते हुए बाजार में घड़ी की एक दुकान पर रुका। एक अलार्म घड़ी खरीदकर पैक करवाने के बाद, लाल कागज में गिफ्ट-पैकेट बनवा लिया। पास में स्थित एक मंदिर के बाहर बैठे माली से एक गुलाब का हार लिया। माली ने उसे पत्ते में लपेटना चाहा, पर उसने उसे ऐसे ही ले लिया। माला लिए हुए वह पार्क के कोने में गया। इधर-उधर देख, उसने माला पहन लिया। वह पार्क के बाहर आया। एक रिक्शेवाले को रोका। वह चौकन्ना-सा रिक्शे पर बैठ गया। रिक्शा उसके घर की ओर चल पड़ा।


Monday, September 21, 2009

ईद मुबारक हो

ईद मुबारक हो

Sunday, September 20, 2009

उपनिवेश में स्त्री


प्रभा खेतान

नव-उपनिवेश के बाद



यह किताब जीवन के दो पक्षों के बारे में है। एक स्त्री का और दूसरा उपनिवेश का। न इस उपनिवेश को समझना आसान है और न स्त्री को। अगर यह उपनिवेश वही होता जिससे बीसवीं सदी के मध्य में कई देशों और सभ्यताओं ने मुक्ति पायी थी तो शायद हम इसे राजनीतिक और आर्थिक परतंत्रता की संरचना करार दे सकते थे। अगर यह उपनिवेश वही होता जिससे लड़ने के लिए राष्ट्रवादी क्रांतियाँ की गई थीं और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की अवधारणा पेश की गई थी तो शायद हम इसके खिलाफ उपनिवेशवाद के नाम से परिभाषित हो चुकी अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूँजी, पितृसत्ता इतरलिंगी यौन चुनाव और पुरुष-वर्चस्व की ज्ञानमीमांस का उपनिवेश है जिसकी सीमाएँ मनोजगत से व्यवहार-जगत तक और राजसत्ता से परिवार तक फैली हुई हैं।






दूसरे पक्ष में होते हुए भी यह अनिवार्य नहीं है कि स्त्री इस उपनिवेश के खिलाफ ही खड़ी हो। वह लाजिमी तौर पर वहाँ नहीं है जहाँ उसे होना चाहिए था यानी वह पाले से दूसरी तरफ नहीं है। इस उपनिवेश की विरोधी शक्ति होते हुए भी वह इसके बीच में खड़ी है। उपनिवेश के खिलाफ संघर्ष उसका आत्म-संघर्ष भी है और यही स्थिति स्त्री को समझने की मुश्किलों का कारण बनी हुई है। स्त्री मुक्ति-कामना से छटपटा रही है, उसका प्रयास भी यही है लेकिन उपनिवेश के वर्चस्व से उसका मनोजगत आज भी आक्रांत है।






गुजरे जमानों के उपनिवेशवाद विरोधी संघर्षों की तरह औरत की दुनिया के सिपहसालार उपनिवेश के साथ हाथ-भर का वह अंतराल स्थापित नहीं कर पाये हैं जो इस लड़ाई में कामयाबी की पहली शर्त है। ‘उपनिवेश में स्त्री/मुक्ति-कामना की दस वार्ताएँ’ इसी अंतराल की स्थापना की दिशा में किया गया प्रयास है। ये वार्ताएँ कारखाने और दफ्तर में काम करती हुई स्त्री, लिखती हुई स्त्री, रचती हुई स्त्री, पुरुष से प्रेम के द्वंद्व में उलझी हुई स्त्री, मानवीय गरिमा की खोज में जुटी हुई स्त्री, बौद्धिक बनती हुई स्त्री, नारी-ज्ञानमीमांसा की नियति खड़ी करती हुई स्त्री, क्रांति के दर्शन से दो-चार होती हुई स्त्री और भाषा व विमर्श के संजाल में फँसी हुई स्त्री से संबंधित हैं।






आजकल सारी दुनिया में ‘नारीवाद’ शब्द लोगों को चौंका रहा है। औसत की आजादी के आंदोलन को नाना प्रकार की प्रतिक्रियाओं का सामने करना पड़ रहा है। चिली, नामीबिया, पेरू, बांग्लादेश, केन्या, रूस, पूर्वी यूरोप के देशों, कैथोलिक चर्च और हिंदू परंपरावादियों की नजर में नारीवाद अनैतिक आचरण का पर्याय है। जमीन से जुड़े आंदोलनकर्ताओं के अनुसार, विशेषकर पूर्वी यूरोप के वामपंथियों के अनुसार नारीवाद मात्र एक बुर्जुआ विचार है। हालत यह है कि स्त्री अधिकारों की प्रबलतम समर्थकों के एक हिस्से ने भी नारीवाद को खारिज कर दिया है। मगर ऐसा क्यों हो रहा है ? इस सवाल पर अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण से विचार करते हुए उसे विभिन्न विचारधाराओं और राष्ट्रीय आंदोलनों की रोशनी में रखकर देखना होगा।






कई स्त्रियों के अनुसार नारीवादी विचारधारा का स्रोत्र पश्चिम रहा है। अर्थात भारतीय संदर्भ में यह एक आयातित विचारधारा है और इस विचारधारा की पैरोकार श्वेत पश्चिमी मध्यवर्गीय स्त्रियाँ हैं। समझा जाता है कि इन श्वेतांग स्त्रियों की जीवन-शैली, परंपरा एवं मूल्यबोध से तीसरी दुनिया की औरतों को क्या लेना-देना ! इस दुनिया के तो पुरुष ही स्वतंत्र नहीं हैं, तब भला औरत क्या मुक्त होगी ? समस्या यह है कि एक तरफ तो नारीवाद अपने पश्चिमी मूल के कारण विवादग्रस्त हुआ है और दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्वतंत्रता और पहचान की उसकी विचारधारा, रणनीति और परियोजना विशिष्ट किस्म की है। इस विशिष्टता के कारण भ्रम यह होता है कि मुक्तिकामी मानवाधिकार के लिए किए जानेवाले अन्य आंदोलनों से नारियाँ नहीं जुड़ पायी हैं। इसी सिलसिले में यह भी मान लिया जाता है कि नारीवाद अराजक मानसिकता का प्रतिनिधित्व करता है, सामाजिक व्यवस्था की चूलें हिलाकर रख देना चाहता है और इस विचारधारा से प्रभावित स्त्रियाँ पुरुषों से नफरत करने लगती हैं। दरअसल ये सभी धारणाएँ भ्रामक हैं। नारीवाद एक विचारधारा और जीवन-शैली है। चूँकि स्त्री भी सोचना-समझना जानती है इसलिए मानवाधिकार की विचारधारा और उससे प्रभावित आंदोलन स्त्री-जीवन के लिए परिवर्तनकामी है। नारीवाद पर पड़े प्रभावों का विश्लेषण करने से पता चलता है कि युग धर्म के अनुसार प्रचलित विचारों से स्त्री विचारक भी प्रभावित होती हैं। वे उन विचारधाराओं का विश्लेषण करके उन्हें अपने पक्ष में मोड़ना चाहती हैं।






महान चिंतकों के विचारों को स्त्री जब कार्यरूप में परिणत करना चाहती है तो उस दौरान उसे अपने जीवन के प्रसंग में इन विचारों की सीमा, उनकी अंतर्निहित पुरुष-केन्द्रीयता और स्त्री-द्वेष भी समझ में आता है। पुरुष-जीवन निजी और सार्वजिक दायरों में स्पष्ट रूप से बँटा हुआ है। सामाजिक मंचों पर नारी स्वतंत्रता की वकालत करनेवाला पुरुष जब घर में अपनी पत्नी को प्रताड़ित करता है तो उसे ऐसा करने की सुविधा इसी बँटवारे के कारण मिल पाती है। जाहिर है कि जब स्त्री व्यक्तिगत जीवन की समस्याओं को, सार्वजनिक जीवन को उधेड़ना शुरू करेगी तो पुरुष-समाज को लगेगा कि निजी और सार्वजनिक दायरों में अंतर्विरोधी आचरण की सुविधा से वंचित हुआ जा रहा है। इस तरह नारीवाद निजी और सार्वजनिक से स्थापित विभाजन को बदलने की कोशिश करके पुरुष विरोधी होने के आरोप को नियंत्रित करता है। कहा जाता है कि नारीवाद पारिवारिक मूल्यहीनता को प्रश्रय देता है। या फिर वह पारिवारिक संरचनाओं को तोड़ देना चाहता है। वास्तविकता कुछ और है। अगर पारिवारिक संरचनाएँ मानवीय हैं तो अपनी वैचारिक संभावनाओं सहित नारीवाद परिवार और समाज के मानवीय मूल्यों को नष्ट करने के बजाय बचाना चाहेगा। वह पारंपरिक समाज-व्यवस्था को परिवर्तित जरूर करना चाहता है और बदलाव को टूटना तो नहीं कहा जा सकता। परिवार स्त्री की सबसे पुख्ता जमीन है। यदि इस जमीन पर खड़े होकर वह यथास्थिति के परिवर्तन के पक्ष में है और अन्य व्यापक सामाजिक जिम्मेदारियों को स्वीकारना चाहती है, तो इसे गलत क्यों कहा जाना चाहिए ?






यह भी कहा जा रहा है कि बहनापे की अवधारणा बहुलतावादी दौर में पूरी तरह खटाई में पड़ चुकी है। वास्तविकता यह है कि इसी अवधारणा के चलते मार्गन जैसी चिंतक जमीन से जुड़े हुए स्त्री-आंदोलनों पर विमर्श पेश करने की कोशिश करती हैं। उनका तर्क है कि स्त्री एक वैश्विक राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरती जा रही है। मार्गन के अनुसार चूँकि पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना ने हर देश की जमीन घेरी है इसलिए राष्ट्रीय संरचना पर पितृसत्तात्मक मानसिकता हावी हो जाती है, इसलिए इसके विरोध को सार्वभौम घटना के रूप में लिया जाना चाहिए। मार्क्सवादी विचारधारा भी पितृसत्ता के इस वर्चस्व से अछूती नहीं है। मार्क्सवादी राज्य एक तरफ स्त्री-हितों और उसके मानवीय पक्ष की पूरी तरह वकालत करता है लेकिन स्त्री के संदर्भ में राजकीय हस्तक्षेप के बावजूद स्त्री-आंदोलन की अलग पहचान स्वीकारने में असमर्थ रहता है। आधी दुनिया होने के कारण स्त्री की मुक्ति बहुसंख्यक जनता की मुक्ति की पर्याय समझी जानी चाहिए। दमन और शोषण के खिलाफ लड़ी जानेवाली अलग-अलग लड़ाइयों में स्त्री भी शामिल है लेकिन स्त्री-शोषण की अलग से चर्चा अनिवार्य है। वरना होता यह है कि वैचारिक स्तर पर मानवमुक्ति की चर्चा में चिंतक, दार्शनिक, विचारक और सामाजिक शोधकर्ता मान लेते हैं कि सबकी मुक्ति में स्त्री की मुक्ति भी शामिल होगी इसलिए अलग से स्त्री-हित की चर्चा की कोई तुक नहीं है।






इस पुस्तक में मैंने दार्शनिक विचारधाराओं की चर्चा की है जिनका मुझ पर प्रभाव पड़ा। इन विचारधाराओं को पढ़ते हुए मुझे यही लगा कि पुरुष होने की प्रक्रिया और स्त्री होने की प्रक्रिया में मौलिक अंतर है। पुरुष को पूर्वानुमानित रूप से व्यक्ति मान लिया जाता है पर स्त्री को यह स्वीकृति नहीं मिलती। देकार्त ने जब ऐलान किया था कि मैं सोचता हूँ इसलिए मेरा अस्तित्व है तो देकार्त का ‘मैं’ पहले तो उनका ‘मैं’ रहा और फिर उसमें अन्य पुरुषों का ‘मैं’ समाता गया। देकार्त के चिंतनशील ‘मैं’ का दायरा फैलता चला गया। पर क्या देकार्त के इस बृहदाकार ‘मैं’ में स्त्री शामिल थी ? आखिर उसमें स्त्री क्यों नहीं शामिल होनी चाहिए थी ? आखिर आदमी/इंसान/व्यक्ति में स्त्री-पुरुष दोनों ही निहित हैं। अत: देकार्त के अनुसार स्त्री भी कह सकती है कि मैं सोचती हूँ इसलिए मैं हूँ, मेरा अस्तित्व है। चिंतन करना व्यक्ति के युक्तिपरक होने का सबूत है। अपनी इस सामर्थ्य के कारण तो व्यक्ति जानवर से भिन्न होता है। बुद्धि एक सार्वभौम गुण के रूप में उभरती है जिसके कारण जानवर और इंसान की भिन्नता कायम रहती है। लेकिन स्त्री ने जब इस गुण का इस्तेमाल करते हुए अपने आप से, अपने परिवेश से और पुरुष की सत्ता से पूछा कि ‘क्या मैं इंसान हूँ ?’ ‘क्या मेरी भी कोई मानवीय गरिमा है ?’ तो उसे जो जवाब मिला वह कुछ और था। उसकी समझ में आ गया कि इंसान की श्रेणी में तो पुरुष है, स्त्री तो एक संपूरक भर है।






बहरहाल, अपनी दावेदारियों के साथ जैसे ही स्त्री ने अपने सारगुण, स्त्रीत्व, पर ध्यान केन्द्रित किया, वैसे ही उसे दिखाई पड़ा कि इस सारगुण के बावजूद, स्त्री और स्त्री में वर्ग, वर्ण और जाति की विविधताएँ हैं, रंग-भेद है उसे एक-दूसरे से विलग करती हुई राष्ट्रीय सीमाएँ हैं। सवाल उठा कि जिस स्त्री की चर्चा की जा रही है वह कौन है ? किस जाति की और किस वर्ग की है ? इस विविधता के कारण स्त्री से कहा गया है कि अलगाववादी चिंतन का परिणाम अच्छा नहीं होता और पहचान की राजनीति हीनभावना से प्रेरित होती है। यह भी कहा गया है कि केंद्र में आने की, मुख्यधारा में शामिल करने की माँग एक बचकानी माँग है क्योंकि केंद्र हैं ही कहाँ ? केंद्र तो महज भाषा द्वारा निर्मित एक संकेतक-भर है। परिधि भी तो स्वयं में एक केंद्र है। स्त्री-पुरुष के बीच ऐसी कोई भी तो एक भेदक रेखा नहीं खींची जानी चाहिए। तर्क दिया गया है कि भेदक रेखा में जो स्पेस है वहाँ भी तो एक भेदक रेखा है। अत: ऐसी कोई भेदक रेखा होती नहीं।






भेदक रेखा तो बनती-मिटती रहती है, इसके लिए व्यर्थ परेशान होने की क्या जरूरत ! स्त्री ने जब इन तर्कों को कसौटी पर कसा तो पाया कि उसका शोषण और दमन काल्पनिक नहीं, यथार्थ है। जिस भेद-भाव का स्त्री को अनुभव होता है, वह केवल भाषागत संरचना नहीं है। स्त्री को उसकी अधीनस्थता को इस कदर आत्मसात करा दिया गया है कि सत्ता की दमन कारी गतिविधियों को वह स्वीकारने लगी है। परंपरा ने उसे स्वास्थ्य, शिक्षा, राजनीतिक स्वतंत्रता और राजनैतिक भागीदारी और यहाँ तक कि व्यक्तिबोध जैसे मूलाधिकारों से भी वंचित रखा है। सत्ता द्वारा नियोजित यह वंचना ही स्त्री को राष्ट्र के दायरे में अपनी पहचान सीमित करने के खिलाफ विद्रोह का आधार प्रदान करती है। ये तमाम तर्क अनुचित साबित होते हैं कि स्त्री-मुक्ति की माँग जैसी अलगाववादी घटना न तो कभी हिंदू अतीत में घटी है और न ही हिंदू परंपरा में स्त्री कभी इतनी गुलाम रही है। यही हिंदुत्ववादी तर्क आगे बढ़कर कहता है कि स्त्री तो महाशक्ति के प्रतीक के रूप में पूजित है। बिना शक्ति के शिव तो महज शव हैं।






अत: नारी-मुक्ति की इन चर्चाओं के मूल में पश्चिम की अपसंस्कृति है। नैतिक स्तर पर ये पश्चिमी स्त्रियाँ हमारे सांस्कृतिक मूल्यों से अनभिज्ञ हैं और नैतिक-अनैतिक में भेद करने में असमर्थ हैं। स्पष्ट है कि स्त्री के संदर्भ में हिंदुत्व के ये सभी तर्क उसकी पहचान को राष्ट्र में सीमित करने के उपक्रम मात्र हैं। एक बार फिर स्त्री को राष्ट्रीयता बनाम साम्राज्यवाद के द्वित्व में से किसी एक को मानने के लिए मजबूर किया जा रहा है। जैसे ही वह राष्ट्रीय सीमाओं को लाँघने का प्रयास करती है, उस पर पश्चिमीकरण का आरोप जड़ दिया जाता है। नारी-मुक्ति की विचारधारा इस तरह के आरोपों की हमेशा से शिकार रही है। दरअसल, चाहे प्राचीन हो या अर्वाचीन, प्राच्य हो या पश्चिम, राष्ट्र हो या जातीयता, एक की कीमत पर दूसरे को जायज ठहराना या फिर तुलनात्मक रवैया अपनाना सत्तात्मक दृष्टिकोण का परिचायक है। द्वंद्वात्मकता अनिवार्यत: एकत्वीकरण के सारे प्रयासों को बहुलता की स्वीकृति में परिणत कर देती है।






इसी मोड़ पर मुझे दांते द्वारा नरक के वर्णन का एक अंश याद आता है। नरक के दरवाजे पर पापात्माओं की भीड़ लगी थी और वे अपने-अपने झुंड़ों को कभी दायें तो कभी बायें हिला रहे थे। लेकिन वे साथ बैठकर किसी भी नैतिक या राजनीतिक मुद्दे पर बातचीत करने में असमर्थ थे। दांते का कहना है कि अपनी राय देने में कुछ कहने में असमर्थ लोग तो इतने जघन्य हैं कि नरक में भी प्रवेश के अधिकारी नहीं हैं। वे अपने कहे की जिम्मेदारी भी नहीं लेना चाहते। ऐसे लोग अपने किसी विचार पर टिकते भी नहीं। स्त्री की समस्याओं के संदर्भ में यह मनोवृत्ति और भी स्पष्ट होकर उभरती है। क्योंकि स्त्री समस्या स्पष्ट पक्षधरता की माँग करती है। राष्ट्र की सीमाएँ इसमें आड़े नहीं आनी चाहिए।






स्त्री का सवाल और राष्ट्रीय एकता का सवाल एक दूसरे के खिलाफ रखकर नहीं देखा जाना चाहिए। लेकिन ध्यान रहे कि स्त्री हो या पुरुष, पक्षधरता के कारण यथास्थिति से मिलने वाली सुविधाओं को छोड़ना पड़ता है, कीमत देनी पड़ती है जिसके लिए कोई तैयार नहीं है। स्त्री के हक सर्वसम्मति से नहीं दिये जा सकते। समकालीन जगत में स्त्री का प्रसंग एक नैतिक जिम्मेदारी की माँग करता है। आँकड़े उठाकर देख लीजिए: शिक्षा, स्वास्थ्य, राजनीति, रोजगार और व्यापार-जगत, हर जगह स्त्री-श्रम की कीमत पुरुष-श्रम से कम है। क्या इस आधार पर जनतांत्रिक मूल्यों का विकास संभव है ? कार्य-जगत में यौन भेद-भाव और यौन-हिंसा भी कम नहीं है। स्त्री को पुरुष की तरह वोट का अधिकार है। पर स्त्रियों का प्रतिनिधित्व पुरुष वर्ग ही करना चाहता है। राजनीतिक जीवन में स्त्री की सक्रिय भागीदारी नहीं है। दुनिया के सारे सांसदों का दस प्रतिशत हिस्सा ही स्त्रियाँ हैं और केवल चार प्रतिशत स्त्रियाँ मंत्रालयों में हैं। केवल गरीबी ही स्त्री के लिए बाधक नहीं है। गरीब तो पुरुष भी है, अर्थाभाव तो वह भी झेलता है, जातिवाद का शिकार भी वह है। मगर पितृसत्तात्मक समाज की स्त्री-विरोधी परंपराओं का आयाम पूरी तरह विशिष्ट है। ये परंपराएँ स्त्री को घर सौंपती हैं, बच्चों का भरण-पोषण सौंपती हैं। मानवता के नाम पर वृद्ध और बीमारों के लिए उससे नि:शुल्क सेवा लेती हैं और बदले में उसके द्वारा की गई सेवाओं का महिमा-मंडन कर अपने कर्तव्यों को इतिश्री कर लेती हैं। स्त्री भूखी है या मर रही है, इसकी चिंता किसी को नहीं होती।






पितृसत्तात्मक परंपरा ने निश्चित कर रखा है कि अधिक से अधिक शिक्षा पुरुष को मिलनी चाहिए, क्यों कि उसे कमाना है। उसे पौष्टिक भोजन मिलना चाहिए क्योंकि उसके श्रम की कीमत है। पुरुष को इसलिए राजनीतिक चुनाव का अधिकार दिया गया है क्योंकि भेद-भाव करने और दूसरों का शोषण करने के मामले में वह ज्यादा ताकतवर साबित होता है। साथ ही वह अपने से भिन्न को नियंत्रित करने की क्षमता भी रखता है। यहाँ तक कि विरोध और विद्रोह की अपेक्षा भी पुरुष से अधिक की जाती है। स्त्री के विरोध से सत्ता चौंकती है। गुजरात के दंगों में जब स्त्रियों ने लूटपाट मचाई, तो अधिकतर पुरुषों की नजर में यह चौंकानेवाली घटना थी कि ऐसा जघन्य काम पढ़ी-लिखी स्त्रियों ने कैसे किया ! टिप्पणी की गई कि देखिए हमारी स्त्रियाँ कितनी नीचे जा रही हैं ! क्या होगा हमारे धर्म का ? कौन रक्षा करेगा हमारी जातीय अस्मिता की ? आखिर स्त्री माँ है, संतति के भरण-पोषण की पूरी जिम्मेदारी उसी की है। विडंबना यह है कि स्त्री से नैतिक जिम्मेदारी की माँग करनेवाला समाज उसे आर्थिक, राजनीतिक एवं सामाजिक मुद्दों पर निर्णय के अधिकार से वंचित रखना चाहता है। जिसे अधिकार ही नहीं मिला उससे जिम्मेदारी की माँग क्यों की जा रही है ? जो खुद गौण, दोयम और अधीनस्थ है, वह कैसे दूसरों के प्रति अपनी जिममेदारी निभायेगा ?






दूसरे, संस्कृति के संदर्भ में सार्विकता एवं बहुलता की अवधारणा का स्पष्टीकरण जरूरी है। बहुसंस्कृतिवाद का अपना जोखिम है जिससे फिलहाल बचा नहीं जा सकता। फासीवादी संस्कृति के मूल्य स्त्री द्वारा स्वीकारे नहीं जाने चाहिए। गुजरात की हिंदू स्त्रियों ने मुसलमान स्त्री के साथ जो किया वह फासीवादी सांस्कृतिक मूल्यों का स्त्री-वर्ग द्वारा किया गया वरण है। क्या स्त्री के लिए कोई निरपेक्ष सार्विक प्रतिमान हासिल नहीं किया जा सकता ? आलोचनात्मक सार्विकता के आधार पर प्रत्येक स्त्री-पुरुष के जीवन की गुणवत्ता को मापना संभव है। लेकिन आलोचनात्मक सार्विकवाद हमें परंपरा के इतिहास के प्रति संवेदनशील जरूर बना सकता है, मगर उसी हद तक जहाँ तक वह परंपरा स्त्री के विकास में सहायक हो, ताकि जीवन की गुणवत्ता और परंपरा के संबंध का आकलन करना संभव हो सके।






आलोचनात्मक सार्विकता स्थापित भूगोल की सीमा स्वीकारने के लिए कभी तैयार नहीं होगी। राष्ट्रवाद की अपनी सीमा है। राष्ट्रवाद चाहे फासीवाद द्वारा प्रचारित किया जा रहा हो या फिर चाहे वह कोई दमनकारी राष्ट्रवाद हो या किसी वर्ग विशेष का राष्ट्रवाद हो, वह अंतत: पहचान का दर्शन है। परिधि से उबरने की कोशिश में लगी हुई स्त्री को राष्ट्रवाद की जरूरत कुछ समय के लिए पड़ सकती है। राष्ट्रवाद के जरिए स्त्री को अन्य संस्थापितों के बीच पहचान मिलती है। पर यह तो पहला कदम ही हो सकता है। इसे आखिरी मंजिल तो नहीं कहा जा सकता। राष्ट्रवाद स्त्री को मजबूर करेगा कि वह केवल अपनी सांप्रदायिक, जातीय और वर्गीय पहचान और संसकृति को पुख्ता करे। इस प्रक्रिया में कई समस्याएँ हैं। 11 वीं शताब्दी का उपनिवेशवाद प्राचीन ब्रह्मणवाद की भौंडी नकल रहा है।






उसने निचली जातियों को हीन बताकर मानव-संस्कृति की भव्यता और औदार्य से उन्हें वंचित रखनेवाली समाज-व्यवस्था को बदलने की चेष्टा नहीं की। हिंदू जब यह कहता है कि उसे पहले हिंदुत्व की रक्षा करनी है या केवल अपना जातीय साहित्य पढ़ना है, तो राष्ट्रवाद के नाम पर पहचान की राजनीति उभरती है। पहचान की राजनीति का एक दूसरा पहलू भी है। यह राजनीति स्त्री-मुक्ति आंदोलन को आत्मग्रस्त करेगी, सीमित करेगी। वह स्त्री खोयेगी ज्यादा, पायेगी कम। घेटो चाहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हो या मदरसे का, जीवन के वैविध्य की ओर उनका ध्यान नहीं जा पायेगा। यदि भिन्नताएँ आपस में टकराती हैं, तो इन भिन्नताओं के साथ चलना सीखना होगा। उनका आपसी संवाद निरंतर होना ही चाहिए। स्त्री या दलित अपनी मूक खामोशी में भी बहुत कुछ बोलते हैं। सत्ता अपनी ऊँचाई से ऐसे खोखले नारे लगाती है, जो हमारी समझ से बाहर होते हैं। स्त्री सत्ता का विरोध करती है मगर विरोध के पीछे वह सत्ता की आकांक्षा नहीं रखती। उसे तो सत्ता से अलग हटकर और एक बेहतर दुनिया की खोज करनी है। महज आत्मश्लाघा और मुग्ध आत्मरति से कुछ नहीं मिलनेवाला। बल्कि स्वतंत्रता और मानवीयता की खोज अंतहीन होनी चाहिए, आकाश की अनंतता की तरह।






मान्यता है कि इंसान होने की पहली पहचान है किसी राज्य का नागरिक होना। तब क्या मानवाधिकार का सबसे सुरक्षित गढ़ राष्ट्रवाद है ? क्या राष्ट्र की आलोचना करनेवाला देशभक्त नहीं हो सकता ? स्त्री के अधिकारों की चर्चा करने पर पूछा जाता है कि वह किस राष्ट्र की नागरिक है ? उसका धर्म, उसकी जाति, उसका संप्रदाय क्या है ? इन सवालों का जवाब यह है कि नारीवाद को राष्ट्रीय सीमा में बंद नहीं किया जा सकता। सिद्धांत और विमर्श को इतिहास और व्यवहार से अलग करना होगा। राष्ट्रवाद से इतर यह कोई अकेली चीख नहीं होगी। बल्कि इसमें वैयक्तिकता की सामूहिक अवधारणा पर ध्यान दिया जाएगा। उन संबंधों से जुड़ने की प्रक्रिया से पहचान निर्मित होती है जिनके मूल में स्त्री का निजी और विशिष्ट इतिहास रहता है। साथ ही जुड़ी होती है स्त्री आंदोलन की सामूहिक राजनीति। स्त्री की पहचान बिखरी हुई भी हो सकती है, संबंधवाचक एवं सामूहिक भी। लेकिन स्त्री को पुरुष द्वारा अभिव्यक्त सांस्कृतिक आदर्शों की आलोचना करनी सीखनी होगी। स्थापित प्रतिमाओं के पीछे छिपी हुई सत्ता की नीयत को पहचानना होगा। स्त्री को अपने से भिन्न अन्य वर्ग, जाति और राष्ट्र की स्त्री-पुरुषों के संबंधवाचक संपर्क बनाने होंगे। चाहे वामपंथ हो या दक्षिणपंथ, भूमंडलीय स्तर पर अब तक की राजनीतिक प्रक्रियाओं में स्त्री-प्रसंग में हमेशा विरोधाभासी विपर्यात्मक एवं विशिष्ट अर्थमयता ही प्रचलित रही है। जैसा कि मैंने ऊपर कहा है कि एक-दूसरे के बरखिलाफ जोड़ियों में सोचना ही चिंतन का तरीका रहा है। किंतु अब हमें यह या वह स्त्री या पुरुष, सक्रिय या निष्क्रिय, युक्तिसंगत या भावनात्मक आदि द्वित्वों का अतिक्रमण करते हुए किसी एकल व्यवस्था की ओर कदम बढ़ाने के बजाय स्त्री-पुरुष को साथ-साथ रखते हुए दोनों की अपनी-अपनी पहचान के साथ जीना सीखना होगा।






एक समूचेपन की व्यवस्था करनी होगी। जो है, उसमें थोड़ा और जुड़ेगा। स्त्री को वैज्ञानिक आलोचना की पद्धति सीखनी होगी, ताकि अन्य आंदोलनों की सक्रियता में वह जाने-अनजाने स्त्री-मुक्ति के लक्ष्यों की अपेक्षा न कर बैठे। स्त्री कहीं अपने वर्गीय हितों को अपने राजनीतिक स्वार्थों के तहत गौण न बना दे। स्त्री स्थानीय संघर्ष कर रही है भूमंडलीय स्तर पर भी वह संघर्षरत होगी, एक समग्र दृष्टिकोण अपनायेगी। एक ओर यदि स्थानीय परंपरा, सापेक्षिक नैतिक मूल्यों एवं सांस्कृतिक विरासत की समस्या है तो दूसरी ओर स्त्री को संस्कृतियों की सीमाओं के पार छानबीन और अन्वेषण करना होगा ताकि उसके आलोचनात्मक रुख से एक ऐसा वैश्विक दृष्टिकोण विकसित हो सके जिसके जरिए अपनी छद्म चेतना को बदलने में वह सक्षम हो सके। इस तरीके से न स्थानीय मुद्दों की उपेक्षा होगी और न ही स्थानीय सीमाओं में कैद होकर रह जाना होगा।






बहुलता की माँग की वजह से स्त्री-जीवन भिन्न-भिन्न आवाजों से निर्देशित होता रहा है। पर बहुलता का अर्थ अलग-अलग खाँचों में बंद सांस्कृतिक मूल्यबोध नहीं है। संस्कृति के ऊपर है मनुष्यता, जो स्त्री को अब तक उपलब्ध नहीं हो सकी है। यदि होती तो दुनिया में इतना आतंक नहीं फैलता। स्त्री तो मनुष्य बनने की प्रक्रिया में है, उस ओर अग्रसर है। प्रत्येक स्त्री की अपनी-अपनी क्षमता है, सांस्कृतिक सामर्थ्य है। बहुलता की अवधारणा का समर्थन हमें एक कारगर संवाद की तरफ ले जाता है। यदि स्त्री-हितों की चर्चा की जी रही है तो प्रत्येक मानव स्त्री की बात हमें करनी होगी। स्त्रियों में जितनी भी बहुलताएँ हैं, उन्हें खुद को एक-दूसरे के समकक्ष समझना होगा और यदि हममें से अन्य कोई भी स्त्री शोषित होती है, हिंसा का शिकार होती है तो मानवीय मूल्यों का तकाजा है कि उस पर ध्यान दिया जाए ताकि इस मानव (और स्त्री) के प्रति नया दृष्टिकोण विकसित हो सके। स्त्री के प्रति अब तक मानवीय दृष्टिकोण निर्मित नहीं हो सका है। इन मुद्दों पर केवल पुरुष ही गौर करते रहे।






स्त्री यदि एक बार अपनी समस्याओं के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण निर्मित कर पाती तो पितृसत्तात्मक धार्मिक एवं सांस्कृतिक योजनाएँ स्वत: खारिज हो जातीं। दलित एवं शोषित अपने बारे में सही निर्णय लेने में समर्थ नहीं हैं क्योंकि लंबे समय तक अधीनस्थ रहने की वजह से उन्होंने सत्ता के मूल्यों को इतना आत्मसात कर लिया है कि उनकी आलोचनात्मक क्षमता कुंद हो गयी है। इसीलिए आत्माभिव्यक्ति को और तराशने की जरूरत है। स्त्री अपनी पक्षधरता अवश्य विकसित करे और बोले, मगर उसका वक्तव्य आत्मरति से ग्रस्त न हो। यही कारण है कि स्त्री को आज मानव-मूल्यों पर आधारित शिक्षा की वकालत करनी है ताकि चिंतन का स्तर और विकसित हो, व्यक्ति की सोच स्थानीय सीमाओं से बाहर निकले, वह धार्मिक मतान्धता की शिकार न हो। हाँ, उस प्रक्रिया में वैकल्पिक जीवन-मूल्यों का संकेत जरूर मिले ताकि बिना किसी दबाव और भय के वह शिवम् की अवधारणा विकसित कर सके।






इस पुस्तक में विभिन्न विचारों के विश्लेषण से मैंने साफ करने की चेष्टा की है कि स्त्री की अस्मिता-यात्रा को राष्ट्र के दायरे में कुछ कदम और चलना पड़ेगा लेकिन उसकी यह यात्रा निकासी के दरवाजे की तरफ होगी। स्थानीय के माध्यम से वह सार्वभौम की ओर जाएगी और सार्वभौम के जरिये स्थानीय को स्पर्श देगी। वह पुरुष-समाज को पक्षधरता के लिए मजबूर करेगी पर अलगाववादी चिंतन और अपने घेटोकरण से बचते हुए विभिन्नता और बहुलता का झंड़ा बुलंद करती रहेगी। हिंदुत्व के राजनीतिक आक्रमण का प्रतिरोध करते हुए धर्मनिरपेक्षतावादियों के उकसावे में नहीं आएगी वरना उसे एक बार फिर सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता के घिसे-पिटे द्वित्व में फँस जाना होगा। अपनी पहचान के सवाल पर उसे अपना वक्तव्य अलग से जारी करना होगा। नारीवाद बौद्धिकता के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि नारीवाद लेखन और चर्चा में जातिवाद, वर्ग आधारित सोच, सांप्रदायिकता, साम्राज्यवादी विचारधारा, पुरुषकेंद्रित जीवन-दर्शन और मूल्यों का प्रभाव खोज निकालना है। ये वही मूल्य और विचारधाराएँ हैं जो न केवल स्त्री को पुरुष के अधीनस्थ रखते हैं बल्कि स्त्री-स्त्री में भी भेद की खाई को भी चौड़ा कर देते हैं।

Saturday, September 19, 2009

बृहस्पतिवार का व्रत

अमृता प्रीतम
आज बृहस्पतिवार था, इसलिए पूजा को आज काम पर नहीं जाना था...बच्चे के जागने की आवाज़ से पूजा जल्दी से चारपाई से उठी और उसने बच्चे को पालने में से उठाकर अपनी अलसाई-सी छाती से लगा लिया, ‘‘मन्नू देवता ! आज रोना नहीं, आज हम दोनों सारा दिन बहुत-सी बातें करेंगे...सारा दिन....’’यह सारा दिन पूजा को हफ्ते में एक बार नसीब होता था। इस दिन वह मन्नू को अपने हाथों से नहलाती थी, सजाती थी, खिलाती थी और उसे कन्धे पर बिठाकर आसपास के बगीचे में ले जाती थी।
यह दिन आया का नहीं, माँ का दिन होता था...आज भी पूजा ने बच्चे को नहला-धुलाकर और दूध पिलाकर जब चाबी वाले खिलौने उसके सामने रख दिए, तो बच्चे की किलकारियों से उसका रोम-रोम पुलकित हो गया.....चैत्र मास के प्रारम्भिक दिन थे। हवा में एक स्वाभाविक खुशबू थी, और आज पूजा की आत्मा में भी एक स्वाभाविक ममता छलक रही थी। बच्चा खेलते-खेलते थककर उसकी टाँगों पर सिर रखकर ऊँघने लगा, तो उसे उठाकर गोदी में डालते हुए वह लोरियों जैसी बातें करने लगी—‘मेरे मन्नू देवता को फिर नींद आ गई...मेरा नन्हा-सा देवता...बस थोड़ा-सा भोग लगाया, और फिर सो गया...’’पूजा ने ममता से विभोर होकर मन्नू का सिर भी चूम लिया, आँखें भी, गाल भी, गरदन भी—और जब उसे उठाकर चारपाई पर सुलाने लगी तो मन्नू कच्ची नींद के कारण रोने लगा।
पूजा ने उसे उठाकर फिर कन्धे से लगा लिया और दुलारने लगी, ‘‘मैं कहीं नहीं जा रही, मन्नू ! आज मैं कहीं नहीं जाऊँगी...।’’लगभग डेढ़ वर्ष के मन्नू को शायद आज भी यह अहसास हुआ था कि माँ जब बहुत बार उसके सिर व माथे को चूमती है, तो उसके बाद उसे छोड़कर चली जाती है।और कन्धे से कसकर चिपटे हुए मन्नू को वह हाथ से दुलारती हुए कहने लगी, ‘‘हर रोज तुम्हें छोड़कर चली जाती हूँ न...जानते हो कहाँ जाती हूँ ? मैं जंगल में से फूल तोड़ने नहीं जाऊँगी, तो अपने देवता की पूजा कैसे करूँगी ?’’और पूजा के मस्तिष्क में बिजली के समान वह दिन कौंध गया, जब एक ‘गेस्ट हाउस’ की मालकिन मैडम डी. ने उसे कहा था—‘‘मिसिज़ नाथ ! यहाँ किसी लड़की का असली नाम किसी को नहीं बताया जाता। इसलिए तुम्हें जो भी नाम पसन्द हो रख लो।’’
और उस दिन उसके मुँह से निकला था—‘‘मेरा नाम पूजा होगा।’’गेस्ट हाउस वाली मैडम डी. हँस पड़ी थी—‘‘हाँ, पूजा ठीक है, पर किस मन्दिर की पूजा ?’’और उसने कहा था—‘‘पेट के मन्दिर की।’’माँ के गले से लगी बाँहों ने जब बच्चे को आँखों में इत्मीनान से नींद भर दी, तो पूजा ने उसे चारपाई पर लिटाते हुए, पैरों के बल चारपाई के पास बैठकर अपना सिर उसकी छाती के निकट, चारपाई की पाटी पर रख दिया और कहने लगी—‘‘क्या तुम जानते हो, मैंने अपने पेट को उस दिन मन्दिर क्यों कहा था ? जिस मिट्टी में से किसी देवता की मूर्ति मिल जाए,
वहाँ मन्दिर बन जाता है—तू मन्नू देवता मिल गया तो मेरा पेट मन्दिर बन गया....’’और मूर्ति को अर्ध्य देने वाले जल के समान पूजा की आँखों में पानी भर आया, ‘‘मन्नू, मैं तुम्हारे लिए फूल चुनने जंगल में जाती हूँ। बहुत बड़ा जंगल है, बहुत भयानक, चीतों से भरा हुआ, भेड़ियों से भरा हुआ, साँपों से भरा हुआ...’’और पूजा के शरीर का कंपन, उसकी उस हथेली में आ गया, जो मन्नू की पीठ पर पड़ी थी...और अब वह कंपन शायद हथेली में से मन्नू की पीठ में भी उतर रहा था।उसने सोचा—मन्नू जब खड़ा हो जाएगा, जंगल का अर्थ जान लेगा, तो माँ से बहुत नफरत करेगा—तब शायद उसके अवचेतन मन में से आज का दिन भी जागेगा, और उसे बताएगा कि उसकी माँ किस तरह उसे जंगल की कहानी सुनाती थी—जंगल की चीतों की, जंगल के भेड़ियों की और जंगल के साँपों की—तब शायद....उसे अपनी माँ की कुछ पहचान होगी। पूजा ने राहत और बेचैनी का मिला-जुला साँस लिया। उसे अनुभव हुआ जैसे उसने अपने पुत्र के अवचेतन मन में दर्द के एक कण को अमानत की तरह रख दिया हो....पूजा ने उठकर अपने लिए चाय का एक गिलास बनाया और कमरे में लौटते हुए कमरे की दीवारों को ऐसे देखने लगी जैसे वह उसके व उसके बेटे के चारों ओर बनी हुई किसी की बहुत प्यारी बाँहें हों...उसे उसके वर्तमान से भी छिपाकर बैठी हुई....पूजा ने एक नज़र कमरे के उस दरवाजे की तरफ देखा—जिसके बाहर उसका वर्तमान बड़ी दूर तक फैला हुआ था....शहर के कितने ही गेस्ट हाउस, एक्सपोर्ट के कितने ही कारखाने, एअर लाइन्स के कितने ही दफ्तर और साधारण कितने ही कमरे थे, जिनमें उसके वर्तमान का एक-एक टुकड़ा पड़ा हुआ था....परन्तु आज बृहस्पतिवार था—जिसने उसके व उसके वर्तमान के बीच में एक दरवाज़ा बन्द कर दिया था।बन्द दरवाज़े की हिफाजत में खड़ी पूजा को पहली बार यह खयाल आया कि उसके धन्धे में बृहस्पतिवार को छुट्टी का दिन क्यों माना गया है ?
इस बृहस्पतिवार की गहराई में अवश्य कोई राज़ होगा—वह नहीं जानती थी, अतः खाली-खाली निगाहों से कमरे की दीवारों को देखने लगी...इन दीवारों के उस पार उसने जब भी देखा था—उसे कहीं अपना भविष्य दिखाई नहीं दिया था, केवल यह वर्तमान था...जो रेगिस्तान की तरह शहर की बहुत-सी इमारतों में फैल रहा था....और पूजा यह सोचकर काँप उठी कि यही रेगिस्तान उसके दिनों से महीनों में फैलता हुआ—एक दिन महीनों से भी आगे उसके बरसों में फैल जाएगा।और पूजा ने बन्द दरवाज़े का सहारा लेकर अपने वर्तमान से आँखें फेर लीं।उसकी नज़रें पैरों के नीचे फर्श पर पड़ीं, तो बीते हुए दिनों के तहखाने में उतर गईं।तहखाने में बहुत अँधेरा था....बीती हुई ज़िन्दगी का पता नहीं क्या-क्या, कहाँ-कहाँ पड़ा हुआ था, पूजा को कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था।परन्तु आँखें जब अँधेरे में देखने की अभ्यस्त हुईं तो देखा—तहखाने के बाईं तरफ, दिल की ओर, एक कण-सा चमक रहा था।पूजा ने घुटनों के बल बैठकर उसे हाथ से छुआ।उसके सारे बदन में एक गरम-सी लकीर दौड़ गई और उसने पहचान लिया—यह उसके इश्क का ज़र्रा था, जिसमें कोई आग आज भी सलामत थी।और इसी रोशनी में नरेन्द का नाम चमका—नरेन्द्रनाथ चौधरी का जिससे उसने बेपनाह मुहब्बत की थी।और साथ ही उसका अपना नाम भी चमका—गीता, गीता श्रीवास्तव।वह दोनों अपनी-अपनी जवानी की पहली सीढ़ी चढ़े थे—जब एक-दूसरे पर मोहित हो गए थे।परन्तु चौधरी और श्रीवास्तव दो शब्द थे-जो एक-दूसरे के वजूद से टकरा गए थे उस समय नरेन्द्र ने अपने नाम से चौधरी व गीता ने अपने नाम से श्रीवास्तव शब्द झाड़ दिया था।
और वह दोनों टूटे हुए पंखों वाले पक्षियों की तरह हो गए थे।चौधरी श्रीवास्तव दोनों शब्दों की एक मजबूरी थी—चाहे-अलग-अलग तरह की थी। चौधरी शब्द के पास अमीरी का गुरूर था। इसलिए उसकी मजबूरी उसका यह भयानक गुस्सा था, जो नरेन्द्र पर बरस पड़ा था। और श्रीवास्तव के पास बीमारी और गरीबी की निराशा थी—जिसकी मजबूरी गीता पर बरस पड़ी थी, और पैसे के कारण दोनों को कॉलेज की पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी। और जब एक मन्दिर में जाकर दोनों ने विवाह किया था, तब चौधरी और श्रीवास्तव दोनों शब्द उनके साथ मन्दिर में नहीं गए थे। और मन्दिर से वापस लौटते कदमों के लिए चौधरी-घर का अमीर दरवाज़ा गुस्से के कारण बन्द हो गया था और श्रीवास्तव-घर का गरीबी की मजबूरी के कारण।फिर किसी रोज़गार का कोई भी दरवाज़ा ऐसा नहीं था, जो उन दोनों ने खटखटाकर न देखा हो। सिर्फ देखा था कि हर दरवाज़े से मस्तक पटक-पटककर उन दोनों मस्तकों पर सख्त उदासी के नील पड़ गए थे।रातों को वह बीते हुए दिनों वाले होस्टलों में जाकर, किसी अपने जानने वाले के कमरे में पनाह माँग लेते थे और दिन में उनके पैरों के लिए सड़कें खुल जाती थीं।वही दिन थे—जब गीता को बच्चे की उम्मीद हो आई थी।गीता की कॉलेज की सहेलियों ने और नरेन्द्र के कॉलेज के दोस्तों ने उन दिनों में कुछ पैसे इकट्ठे किए थे, और दोनों ने जमुना पार की एक नीची बस्ती में सरकण्डों की एक झुग्गी बना ली थी—जिसके बाहर चारपाई बिछाकर गीता आलू, गोभी और टमाटर बेचने लगी थी, और नरेन्द्र नंगे पाँव सड़कों पर घूमता हुआ काम ढूँढ़ने लगा था।खैरायती हस्पताल के दिन और भी कठिन थे—और जब गीता अपने सात दिन के मन्नू को गोद में लेकर, सरकण्डों की झुग्गी में वापस आई थी—तो बच्चे के लिए दूध का सवाल भी झुग्गी में आकर बैठ गया था।और कमेटी के नलके से पानी भरकर लाने वाला समय।पूजा के पैरों में दर्द की एक लहर उठकर आज भी, उसके पैरों को सुन्न करती हुई, ऊपर की रीढ़ की हड्डी में फैल गई, जैसे उस समय फैलती थी, जब वह गीता थी, और उसके हाथ में पकड़ी हुई पानी की बाल्टी का बोझ, पीठ में भी दर्द पैदा करता था, और गर्भ वाले पेट में भी।पूजा ने तहखाने में पड़े हुए दिनों को वहीं हाथ से झटककर अँधेरे में फेंक दिया और उस सुलगते हुए कण की ओर देखने लगी, जो आज भी उसके मन के अँधेरे में चमक रहा था। जब वह घबराकर नरेन्द्र की छाती से कसकर लिपट जाती थी—तो उसकी अपनी छाती में से सुख पिघलकर उसकी रगों में दौड़ने लगता था।पूजा के पैरों से फिर एक कंपन उसके माथे तक गया—जब तहखाने में पड़े हुए दिनों में से—अचानक एक दिन उठकर काँटे की तरह उसके पैरों में चुभ गया—जब नरेन्द्र को हर रोज़ हल्का-हल्का बुखार चढ़ने लगा था, और वह मन्नू को नरेन्द्र की चारपाई के पास डालकर नौकरी की तलाश करने चली गई थी।उसे यह विचार आया कि वह इस देश में जन्मी-पली नहीं थी, बाप की तरफ से वह श्रीवास्तव कहलाती थी, परन्तु वह नेपाल की लड़की थी, माँ की तरफ से नेपाली, इस कारण उसे शायद अपने या किसी और देश के दूतावास में ज़रूर कोई नौकरी मिल जाएगी—और इसी सिलसिले में वह सब्जी बेचने का काम नरेन्द्र को सौंपकर हर रोज़ नौकरी की तलाश में जाने लगी थी।
‘मिस्टर एच’—पूजा को यह नाम अचानक इस तरह याद आया जैसे वह जीवन के जलकर राख हुए कुछ दिनों को कुरेद रही हो, और अचानक उसका हाथ उस राख में किसी गर्म अंगारे को छू गया हो।वह उसे एक दूतावास के ‘रिसेप्शन रूम’ में मिला था। एक दिन कहने लगा, ‘‘गीता देवी ! मैं तुम्हें हर रोज़ यहाँ चक्कर लगाते देखता हूँ।
तुम्हें नौकरी चाहिए ? मैं तुम्हें नौकरी दिलवा देता हूँ। यह लो, तुम्हें पता लिख देता हूँ, अभी चली जाओ। आज ही नौकरी का प्रबन्ध हो जाएगा...’’ और पूजा, जब गीता होती थी, कागज़ का वह टुकड़ा पकड़कर, अचानक मेहरबान हुई किस्मत पर हैरान खड़ी रह गई थी।वह पता एक गेस्ट हाउस की मालकिन—‘मैडम डी.’ का था, जहाँ पहुँचकर वह और भी हैरान रह गई थी, क्योंकी नौकरी देने वाली मैडम डी. उसे ऐसे तपाक से मिली जैसे पुराने दिनों की कोई सहेली मिली हो। गीता को एक ठण्डे कमरे में बिठाकर उसने गर्म चाय और भुने हुए कबाब खिलाए थे।नौकरी किस-किस काम की होगी, कितने घंटे वह कितने तनख्वाह—जैसे सवाल उसकी होंठों पर जितनी बार आते रहे, मैडम डी. उतनी बार मुस्करा देती थी। कितनी देर के बाद उसने केवल यह कहा था—‘‘क्या नाम बताया था ?
मिसिज़ गीता नाथ ? परन्तु इसमें कोई आपत्ति तो नहीं अगर मैं मिसिज़ नाथ की अपेक्षा तुम्हें मिस नाथ कहा करूँ ?’’गीता हैरान हुई, पर हँस पड़ी—‘‘मेरे पति का नाम नरेन्द्र नाथ है। इसी कारण अपने आपको मिसिज़ नाथ कहती हूँ। आप लोग मुझे मिस नाथ कहेंगे तो आज जाकर उन्हें बताऊँगी कि अब मैं उनकी पत्नी के साथ-साथ उनकी बेटी हो गई हूँ।’’मैडम डी. कुछ देर तक उसके मुँह की तरफ देखती रही, कुछ बोली नहीं, और जब गीता ने पूछा, ‘‘तनख्वाह कितनी होगी ?’’
तो उसने जवाब दिया था—‘‘पचास रुपए रोज़।’’‘‘सच ?’’ कमरे के सोफे पर बैठी गीता—जैसे खुशी से दोहरी होकर मैडम डी. के पास घुटनों के बल बैठ गई थी।‘‘देखो ! आज तुमने कोई अच्छे कपड़े नहीं पहने हैं ! मैं तुम्हें अपनी एक साड़ी उधार देती हूँ, तुम साथ वाले बाथरूम में हाथ धोकर वह साड़ी पहन लो।’’ मैडम डी. ने कहा, और गीता मन्त्रमुग्ध-सी उसके कहने पर जब कपड़े बदलकर आई तो मैडम डी. ने पचास रुपए उसके सामने रख दिए, ‘‘आज की तनख्वाह।’’
इस परी-कहानी जैसी नौकरी के जादू के प्रभाव से अभी गीता की आँखें मुँदी जैसी थीं कि मैडम डी. उसका हाथ पकड़कर उसे ऊपर की छत के उस कमरे में छोड़ आई, जहाँ परी-कहानी का एक राक्षस उसकी प्रतीक्षा कर रहा था।कमरे के दरवाज़े पर बार-बार दस्तक सुनी, तो पूजा ने इस तरह हाँफते हुए दरवाज़ा खोला जैसे वह तहखाने में से बहुत-सी सीढ़ियाँ चढ़कर बाहर आई हो।‘‘रात की रानी—दिन में सो रही थी ?’’
दरवाज़े से अन्दर आते हुए शबनम ने हँसते-हँसते कहा, और पूजा के बिखरे हुए बालों की तरफ देखते हुए कहने लगी, ‘‘तेरी आँखों में तो अभी भी नींद भरी हुई है, राम के खसम ने क्या सारी रात जगाए रखा था ?’’शबनम को बैठने के लिए कहते हुए पूजा ने ठण्डी साँस ली, ‘‘कभी-कभी जब रात का खसम नहीं मिलता, तो अपना दिल ही अपना खसम बन जाता है, वह कम्बख्त रात को जगाए रखता है...।’’
शबनम हँस पड़ी, और दीवान पर बैठते हुए कहने लगी, ‘‘पूजा दीदी ! दिल तो जाने कम्बख्त होता है या नहीं, आज का दिन ही ऐसा होता है, जो दिल को भी कम्बख्त बना देता है। देख, मैंने भी तो आज पीले कपड़े पहने हुए हैं और मन्दिर में आज पीले फूलों का प्रसाद चढ़ाकर आई हूँ...।’’‘‘आज का दिन ? क्या मतलब ?’’ पूजा ने शबनम के पास दीवान पर बैठते हुए पूछा।‘‘आज का दिन, बृहस्पतिवार का। तुझे पता नहीं ?’’‘‘सिर्फ इतना पता है कि आज के दिन छुट्टी होती है’’—पूजा ने कहा। तो शबनम हँसने लगी—‘‘देख ले। हमारे सरकारी दफ्तर में भी छुट्टी होती है....।’’‘‘मैं सोच रही थी कि हमारे धन्धे में इस बृहस्पतिवार को छुट्टी का दिन क्यों माना गया है...’’
‘‘हमारे संस्कार’’ शबनम के होंठ पर एक बल खाकर हँसने जैसे हो गए। वह कहने लगी—‘‘औरत चाहे वेश्या भी बन जाए परन्तु उसके संस्कार नहीं मरते। यह दिन औरत के लिए पति का दिन होता है। पति व पुत्र के नाम पर वह व्रत भी रखती है, पूजा भी करती है—‘‘छः दिन धन्धा करके भी वह पति और पुत्र के लिए दुआ माँगती है...’’पूजा की आँखों में पानी-सा भर आया—‘‘सच।’’ और वह धीरे से शबनम को कहने लगी—‘‘मैंने तो पति भी देखा है, पुत्र भी। तुमने तो कुछ भी नहीं देखा...’’‘‘जब कुछ न देखा हो, तभी तो सपना देखने की जरूरत पड़ती है...’’ शबनम ने एक गहरी साँस ली, ‘‘इस धन्धे में आकर किसने पति देखा है...?’’
और कहने लगी—‘‘जिसे कभी मिल भी जाता है, वह भी चार दिन के बाद पति नहीं रहता, दलाल बन जाता है...तुझे याद नहीं, एक शैला होती थी...’’‘‘शैला ?’’ पूजा को वह साँवली और बाँकी-सी लड़की याद हो आई, जो एक दिन अचानक हाथ में हाथी-दाँत का चूड़ा पहनकर और माँग में सिन्दूर भरकर, मैडम को अपनी शादी का तोहफा देने आई थी, और गेस्ट हाउस में लड्डू बाँट गई थी। उस दिन उसने बताया था कि उसका असली नाम कान्ता है।शबनम कहने लगी—‘‘वही शैला, जिसका नाम कान्ता था। तुझे पता है उसका क्या हुआ ?’’‘‘कोई उसका ग्राहक था, जिसने उसके साथ विवाह कर लिया था...’’‘‘ऐसे पति विवाह के मन्त्रों को भी धोखा दे देते हैं। उससे शादी करके उसे बम्बई ले गया था, यहाँ दिल्ली में उसे बहुत-से लोग जानते होंगे, बम्बई में कोई नहीं जानता, इसलिए वहाँ वे नेक ज़िन्दगी शुरू करेंगे...’’‘‘फिर ?’’ पूजा की साँस जैसे रुक-सी गई।‘‘अब सुना है कि वहाँ बम्बई में वह आदमी उस ‘नेक ज़िन्दगी’ से बहुत पैसे कमाता है’’...पूजा के माथे पर त्योरियाँ पड़ गईं, वह कहने लगी, ‘‘फिर तू मन्दिर में उस तरह का पति क्यों माँगने गई थी ?’’शबनम चुप-सी हो गई, फिर कहने लगी, ‘‘नाम बदलने से कुछ नहीं होता। मैंने नाम तो शबनम रख लिया है, परन्तु अन्दर से वही शकुन्तला हूँ—जो बचपन में किसी दुष्यन्त का सपना देखती थी...अब ये समझ लिया है कि जैसे शकुन्तला की ज़िन्दगी में वह भी दिन आया था, जब दुष्यन्त उसे भूल गया था...मेरा यह जन्म उसी दिन जैसा है।’’पूजा का हाथ अनायास ही शबनम के कन्धे पर चला गया और शबनम ने आँखें नीची कर लीं। कहने लगी—‘‘मैं जानती हूँ...इस जन्म में मेरा यह शाप उतर जाएगा।’’पूजा का निचला होंठ जैसे दाँतो तले आकर कट गया। कहने लगी—‘‘तू हमेशा यह बृहस्पतिवार का वृत रखती है ?’’‘‘हमेशा...आज के दिन नमक नहीं खाती, मन्दिर में गुण और चने का प्रसाद चढ़ाकर केवल वही खाती हूँ...बृहस्पति की कथा भी सुनती हूँ, जप का मन्त्र भी लिया हुआ है....और भी जो विधियाँ हैं...’’शबनम कह रही थी, जब पूजा ने प्यार से उसे अपनी बाँहों में ले लिया और पूछने लगी—‘‘और कौन-सी विधियाँ ?’’शबनम हँस पड़ी, ‘‘यही कि आज के दिन कपड़े भी पीले ही रंग के होते हैं, उसी का दान देना और वही खाने....मन्त्र की माला जपने और वह भी सम में....इस माला के मोती दस, बारह या बीस की गिनती में होते हैं। ग्यारह, तेरह या इक्कीस की गिनती में नहीं—यानी जो गिनती—जोड़ी-जोड़ी से पूरी आए, उसका कोई मनका अकेला न रह जाए...’’शबनम की आँखों में आँसू आने को थे कि वह ज़ोर से हँस पड़ी। कहने लगी, ‘‘इस जन्म में तो यह ज़िन्दगी का मनका अकेला रह गया है, पर शायद अगले जन्म में इसकी जोड़ी का मनका इसे मिल जाए...’’ और पूजा की ओर देखते हुए कहने लगी, ‘‘जिस तरह दुष्यन्त की अँगूठी दिखाकर शकुन्तला ने उसे याद कराया था—उसी तरह शायद अगले जन्म में मैं इस व्रत-नियम की अँगूठी दिखाकर उसे याद करा दूँगी कि मैं शकुन्तला हूँ...’’

Sunday, September 13, 2009

याद तो फिर भी आओगे

SEEMA GUPTA

ह्दय के जल थल पर अंकित
बस चित्र धूमिल कर जाओगे
याद तो फिर भी आओगे

हंसना रोना कोई गीत पुराना
सुर सरगम का साज बजाना
शब्द ताल ले जाओगे
याद तो फिर भी आओगे
सुनी राहे, दिल थाम के चलना
साथ बिताये पलो का छलना
सब खाली कर जाओगे
याद तो फिर भी आओगे
कांधे पर सर और स्पर्श का घेरा

रात के मुख पर चाँद का सेहरा
तुम विराना कर जाओगे
याद तो फिर भी आओगे