Sunday, August 23, 2009

निर्वासित

प्रताप दीक्षित

वह पान की दुकान से सिगरेट लेते हुए या मेरे घर के सामने की गली में आते जाते अक्सर दिखाई दे जाते। मोहल्ले के पढ़े लिखे बेकार लड़के उनके आगे पीछे रहते। जिन्हें वह नौकरी के संबंध में सलाह देते। किसी से उसके इण्टरव्यू के संबंध में बात करते हुए, किसी को किसी कार्यालय में लीव-वेकैंसी के लिए प्रार्थना पत्रा देने को कहते। उनके बगल से निकलते हुए, जब कब, उनकी बातचीत के टुकड़े मेरे कानों में पड़ते। उनके आसपास युवाओं की अनुशासन बद्धता, शिष्टता और आज्ञाकारिता देखकर आश्चर्य होता। मेरे जैसे बेरोजगार युवक को स्वर्ग के देवदूत से कम नहीं प्रतीत होते। उनकी बातें गीता के वाक्य। परन्तु मैं अपने भीरू और दब्बू स्वभाव के कारण उनसे परिचय करने का साहस नहीं जुटा पाता। उनसे अपरिचित रह कर भी मैं उनके संबंध में बहुत कुछ सुन और जान चुका था, कि वे किसी बड़े कार्यालय में डायरेक्टर के स्टेनो हैं। बड़े-बड़े अधिकारियों से उनका परिचय है। किसी की नौकरी लगवाना, साक्षात्कार में सिफारिश करवाना उनके लिए बहुत सरल है। जाने कितने लोग उनकी सिफारिश से नौकरी पाकर मौज कर रहे हैं। इस पर भी वे बड़े ही सरल हृदय, दयालु और परोपकारी व्यक्ति हैं।
यह सब सुनकर मेरे मन में लालच पैदा होता है और मैं सोचता कि कैसा दुर्भाग्यशाली हूँ मैं, जो ऐसे व्यक्ति के होते हुए भी बी.ए. पास दो वर्षों से बेकार बैठा हूँ। मैं व्यग्र भाव से किसी भी प्रकार उनसे परिचय करने और बातचीत का अवसर ढूँढा करता। वे प्रतिदिन मेरे घर के सामने से गुजरते। दुबला-पतला लम्बा शरीर। सांवला-दो तीन दिन की दाढ़ी बढ़ा चेहरा। पैण्ट, कमीज व हवाई चप्पलों में दिखाई देते। अक्सर उनकी कमीज में बटनों के स्थान पर आलपिनें लगी दिखाई देतीं। पर यह सब कुछ, उनकी वेशभूषा, मुझ पर पड़े उनके प्रभाव को कम न करता बल्कि कुछ बढ़ा ही देता। एक दिन मुझे उनसे मुलाकात का अवसर मिल ही गया। अपने नगर के एक संस्थान के कार्यालय से मुझे साक्षात्कार हेतु बुलाया गया था। मैं घर के बाहर खड़ा एक मित्रा के साथ इस संबंध में बात कर रहा था। तभी भाई साहब आते दिखाई दिए। मेरा मित्रा उनसे पहले से परिचित था। उसने उन्हें नमस्ते किया। मैं भी सकुचते हुए नमस्ते करता हूँ। वे सिर जरा-सा हिलाते हैं। बृजेश ने उनसे मेरा परिचय कराया और वे मेरा इण्टरव्यू लेटर देखने लगे। मैं उत्सुकता से उनकी ओर निहारता हूँ।
÷÷ओह....यह तो जिला सहकारी समिति में है। कब इण्टरव्यू है तुम्हारा?'' फिर खुद ही पत्रा में साक्षात्कार की तिथि ढूँढते हैं। मेरी ओर देखकर, ÷÷क्या कुछ टाइप-वाइप का टेस्ट भी होगा?''
÷÷जी....शायद हो!'' मुझे अपने अज्ञान पर मन ही मन गुस्सा आता है।
पर वे ध्यान नहीं देते। वे टाइप सीखने के फायदों को बताने लगे।
मैंने दबे स्वरों में प्रार्थना की कि इस कार्यालय में एक व्यक्ति के अवकाश में जाने के कारण दो माह के लिए स्थान रिक्त है। यदि मेरा कार्य करा दें तो उनकी मेरे ऊपर बड़ी कृपा होगी। मुझे फिर अपने पर गुस्सा आता है कि मुझे ठीक से प्रार्थना करना भी नहीं आता।
÷÷बिल्कुल-बिल्कुल' मोहल्ले के लड़कों का भला नहीं होगा तो किसका होगा!'' वे मेरा नाम पूछते हैं। मेरे बताने पर, ÷÷तुम तो किशन लाल जी के लड़के हो ना?'' मैं सिर हिलाता हूँ।
हो-हो कर हंसते हुए वह बड़े ही विश्वास से मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहते हैं, ÷÷तुम तो अपनी ही बिरादरी के हो भाई। तुम्हारा तो काम टाप प्रायर्टी पर। यहाँ का क्षेत्राीय प्रशासक तो अपना यार लगा है। मैं तो बिना गाली के साले से बात ही नहीं करता। कई बार खाने पर बुला चुका है।''
मित्रा उन्हें नमस्ते कर चला जाता है वे मुझे साथ लेकर सड़क तक चले आए हैं। अचानक वे मुझसे खुले हुए ५० पैसे सिगरेट लेने के लिए माँगते हैं। मैं उन्हें पैसे देकर स्वयं को उपकृत अनुभव करता हूँ। मैं उनसे दबे स्वर में पुनः प्रार्थना करता हूँ। वे मुझसे दो-तीन दिन बाद मिलने को कहते हैं।
दूसरे दिन उनको देखते ही मैं नमस्ते करता हूँ। साथ आने का इशारा करके वे चलने लगते हैं। अपने मित्रा के संबंध में बता रहे हैं कि वे दोनों साथ पढ़े हुए हैं। उनका कहा कभी टालता नहीं। सड़क पर आकर हम सीधे चलते रहते हैं। सामने शर्मा रेस्टोरेण्ट है। उन्हें अन्दर जाते देख मैं झिझकता हूँ परन्तु वह आग्रह करके मुझे अन्दर ले जाते हैं।
बैरा उनका आर्डर पाकर चाय, समोसे व गुलाबजामुन रख जाता है। चाय-नास्ते के बीच वह बताते रहते हैं, उन लड़कों के विषय में जिनको उन्होंने नौकरी पर लगवा दिया, पर वे लोग कुछ दिन बाद छोड़ गए।
÷÷भाई। खर्च भर का तो इस मँहगाई के समय मिल ही रहा था कपड़ा बाजार में। पर वे तो शुरू से ही फन्ने खाँ नौकरी चाहते हैं।'' मैं उनकी बात पर सहमति प्रकट करता हूँ। नाश्ते के बाद हम काउण्टर पर आते हैं। ÷छै पचास' बैरा चिल्लाता है। मैं उनकी ओर देखता हूँ। वे दूसरी ओर देखकर सिगरेट सुलगा रहे हैं। कुछ क्षण रुककर मैं जेब से दस रुपए का मुड़ा-तुड़ा नोट निकालकर काउण्टर पर रख देता हूँ। बचे हुए पैसे लेकर उसके पीछे आता हूँ। वे दरवाजे पर आ चुके हैं।
÷÷अच्छा मैं चल रहा हूँ। आज तुम्हारा काम भी करवाना है। तुम ऐसा करो कि अपना नाम पता लिखकर दे दो मुझे।''
फिर स्वयं जेब से सिगरेट का खाली पैकेट निकालकर उस पर मेरा नाम पूछकर लिख लेते हैं।
दूसरे दिन सुबह जल्दी बुलाते हैं। ÷÷हाँ, घर पर ही आ जाना।'' कहकर चले जाते हैं।
उस दिन व्यस्त रहा। शाम देर से आया। घर पर मालूम हुआ कि भाई साहब कुछ देर पूर्व तक प्रतीक्षा करते रहे थे। मुझे ग्लानि होती है। इतना बड़ा आदमी मेरे मामले में इतनी रुचि दिखा रहा है और मैं बेपरवाह घूम रहा हूँ। उनके प्रति श्रद्धा से भर जाता हूँ।
अगली सुबह मैं तैयार होकर उनके घर चल देता हूँ। मेरे घर से कुछ ही दूर पर उनका घर है। मैं उनके घर पहली बार आया हूँ। घर के बाहर दो तीन बार आवाज देने पर वे बाहर आते हैं, ÷÷आओ भाई तुमसे क्या पर्दा है।''
मैं अन्दर जाता हूँ।
कमरे में मुझे एक कुर्सी पर बैठाकर बीच के पर्दे के पास जाकर चाय बनाने लिए कहते हैं। अन्दर से कुछ भुनभुनाहट की आवाज आती है। पर वे ध्यान न देकर मुझसे बातें किए जा रहे हैं, राजनीति, बेकारी, खेल, आज का मौसम आदि-आदि पर।
मैं चुपचाप ÷हूँ-हाँ' किए जा रहा हूँ। थोड़ी देर बाद वे पर्दें के दूसरी ओर जाते हैं। लौटकर उनके हाथ में एक चाय का प्याला है। वे मुझसे चाय के लिए पूछते हैं। मैं औपचारिकता वश मना कर देता हूँ। वे दुबारा नहीं कहते। चाय पीकर मेरे साथ चलने को तैयार होते हैं। पर्दें के पीछे से फिर कुछ भुनभुनाहट होती है, वे अन्दर जाते हैं। मैं भी खड़ा हो गया हूँ।
वह बाहर आते हैं, ÷÷सुनो जरा बीस रुपए देना यार.....वो कुछ।''
मेरे चेहरे पर निरीहता का भाव आ जाता है। जेब से, छोटी बहन से माँग कर लाए दस-दस के तीन नोटों में दो उन्हें देता हूँ। वह उन्हें लेकर अन्दर दे देते हैं।
मैं उनके साथ बाहर आता हूँ। वे बडे+ उत्साह से मुझसे बातें कर रहे हैं। सड़क पर आकर वे रेस्तराँ के आगे रुकते हैं।
÷÷भाई कुछ ले लिया जाए। न जाने कितनी देर लगे'' कहते हुए वह अन्दर घुसते हैं। मैं चुपचाप बैठ जाता हूँ। मैं इशारे से उन्हें बताना चाहता हूँ कि मेरे पास अन्तिम दस का नोट बचा है।
वे सिर हिलाते हुए हंसते हैं, ÷÷अरे भाई अब तो हजार-बारह सौ के आदमी बनने जा रहे हो नोटों से जेबें भरी रहेंगी'' फिर वे मेरी ओर झुककर धीमी रहस्यमय आवाज में कहते हैं, ÷÷इस नौकरी में ऊपरी आमदनी भी काफी है।''
मैं कल्पना में अपनी जेबों को नोटों से भरा देखता हूँ। वे बैरा को आर्डर दे रहे हैं। मैं दस्त आने का बहाना करके कुछ भी खाने से मना कर देता हूँ।
÷÷अरे भई, जवानी में ये हाल....।''
बैरा सामान ले आता है। मैं उन्हें खाता देखता रहता हूँ। उनके खाने के बाद हम दोनों काउण्टर तक आते हैं। मुझे मालूम है कि पेमेन्ट मुझे ही करना है। मैं पेमेन्ट करता हूँ। काउण्टर मैन दो रुपया पचास पैसे मुझे वापस कर देता है।
बाहर आकर वे रिक्शा बुलाते हैं। दूधवाला-बंगला चलने के लिए वे रिक्शे वाले से पैसे पूछते हैं।
÷÷पाँच रुपये, साब।''
मैं झुंझला पड़ता हूँ, ÷÷वहाँ के दो रुपये पड़ते हैं। हमें नहीं जाना।''
वह हंसते हैं और रिक्शे में बैठ जाते हैं न चाहते हुए भी मुझे भी उनकी बगल में बैठना पड़ता है।
वे मेरी खीज व विवशता को कम करने का प्रयास करते हैं, ÷÷पैसे की परवाह न करो, वहाँ जाना जरूरी है।''
रिक्शा रोकते हैं, वहाँ हम दोनों उतर पड़ते हैं। सामने बंगला खड़ा है। वे ठिठके-से उधर जाते हैं। इधर-उधर अपरिचित से देखते हैं। मैं ठीक उनके पीछे आ जाता हूँ। बरामदे में साहब से मिलने के लिए कुछेक लोग बैठे हैं। कमरे के दरवाजे पर पर्दा पड़ा है। कुछ दूर पर एक चपरासी-सा व्यक्ति स्टूल पर ऊँघ रहा है। भाई साहब दरवाजे के पास जाते हैं और जरा-सा पर्दा हटाकर कुछ अन्दर झाँकने का प्रयास करते हैं।
तभी चपरासी सावधान की मुद्रा में खड़ा हो जाता है, ÷÷ऐ! कहाँ? इधर चलो, उधर!''
मुझे चपरासी की हेकड़ी पर गुस्सा आ जाता है, ÷÷जरा तमीज से, समझे! अभी तुम्हें मालूम हो जाएगा कि तुम्हारे साहब इनके क्या हैं! तब तुम्हें....!''
लेकिन भाई साहब रुके नहीं। भीगे मूस की तरह कांप गए और फिर चपरासी से प्रार्थना की, ÷÷भाई, जरा साहब से मिलना है।''
चपरासी शिष्ट हो आया, ÷÷बेंच पे बैठो। अपने नम्बर से जाना।''
भाई साहब बेंच के पास आकर खड़े हो जाते हैं, एक हाथ को दूसरे हाथ से मलते हुए। कुछ देर यूं ही खड़े होने के बाद मुझसे कहते हैं, ÷÷सुनो, इनसे बाद में आकर मिल लेंगे, ये भी फुर्सत में होंगे। तब तक चीफ एकाउन्टेंट के पास हो आया जाये। यहीं पास में रहते हैं।
मैं चुपचाप उनके पीछे चल देता हूँ। एक कच्ची गली में रुककर ठीक सामने वाले क्वार्टर के आगे आवाज देते हैं।
एक तहमद पहने व्यक्ति जिसके अभावग्रस्त चेहरे से लगता है कि वह मात्रा क्लर्क ही हो सकता है-फट्ट से दरवाजा खोलता है। भाई साहब मुस्कराने की कोशिश करते हैं, ÷÷बहुत दिनों बाद मिले, भाई।''
कुछ देर की औपचारिक बातचीत के बाद भाई साहब ऐसा प्रश्न पूछते हैं जिसका उत्तर वह वर्षों से जानते होंगे, ÷÷अब तो सुपरिन्टेंडेंट होंगे या यू.डी.सी.?''
÷÷ससुर कहाँ अपने भाग्य। अपने तो एल.डी.सी. पैदा हुए हैं और एल.डी.सी. ही मरेंगे।''
÷÷खैर, मेरे लिए तो तुम एकाउन्टेंट ही हो।'' हाँ, फिर वह मेरी ओर संकेत करते हैं, ÷÷इनका एक काम है।''
मैं याचना की मुद्रा में हाथ जोड़ देता हूँ।
÷÷आजकल बड़ी मारा-मारी है। सर्विस के लिए तो अब ऊँची पहुँच चाहिए।''
मैं निराश-हताश हो जाता हूँ।
भाई साहब मेरी ओर देखते हैं, ÷÷भई, डोंट वरी कोई बात नहीं। कुछ न कुछ जरूर हो जाएगा।''
हम उन एकाउन्टेंट साहब से विदा लेकर बाहर आते हैं।
गली से बाहर निकलकर एक निस्संग स्वर उभारते हैं, ÷÷तुम्हारे पास दो-तीन रुपये होंगे न? दो मुझे दे दो। तुम बस से चले जाना।''
मैं उनकी ओर देखकर जेब से दो रुपये उन्हें दे देता हूँ। जेब में हाथ डालकर एक के सिक्के को कसकर पकड़ लेता हूँ। कहीं भाई साहब ये सिक्का भी न माँग लें।
थोड़ी दूर तक मेरे साथ चलते हैं, ÷÷अभी जरा देर में बस मिल जाएगी। मुझे एक काम से जाना है।''
वह तेजी से एक ओर बढ़ जाते हैं। मैं कुछ देर तक यथास्थिति खड़ा रहा। सोचता रहा, न जाने क्या-क्या? फिर अनजाने ही धीरे-धीरे चलता हुआ मैं बड़े साहब के बंगले के गेट के आगे से निकलता हूँ।
गेट के सामने खड़ी कार में शायद बड़े साहब बैठने जा रहे हैं।
तभी कहीं से भाई साहब जल्दी से आते हैं। वे मुझे नहीं देख पाए। वे बड़े साहब के पैर छूने का उपक्रम कर रहे हैं। मुझे अस्पष्ट सुनाई देता है। वे कह रहे हैं - ÷÷सर मैं दो साल से बेकार हूँ। बड़ी दया होगी। मैंने लीव वैकेंसी के लिए एप्लाई किया है। मेरा इस पद के लिए अनुभव भी है। मैं स्टेनों भी हूँ...।''
बड़े साहब का उत्तर मैं नहीं सुन पाता। परन्तु वे कार में बैठ जाते हैं। कार धूल उड़ाती हुई चली जाती है।
धूल के गुबार में भाई साहब का चेहरा छिप-सा गया है।

Thursday, August 20, 2009

वाड्मय पत्रिका का लोकार्पण नासिरा शर्मा अंक


नासिरा शर्मा विशेषांक उपलब्ध मूल्य 100/ (डाक खचॅ अलग) पृष्ट 344
अनुक्रम

सम्पादकीय
नासिरा शर्मा : मेरे जीवन पर किसी का हस्ताक्षर नहीं
डॉ. सुदेश बत्रा : नासिरा शर्मा - जितना मैंने जाना
ललित मंडोरा अद्भुत जीवट की महिला नासिरा शर्मा
अशोक तिवारी : तनी हुई मुट्ठी में बेहतर दुनिया के सपने
शीबा असलम फहमी : नासिरा शर्मा के बहान
अर्चना बंसल : अतीत और भविष्य का दस्तावेज : कुइयाँजान
फजल इमाम : जीरो रोड में दुनिया की छवियां
अमरीक सिंह दीप : ईरान की खूनी क्रान्ति से सबक़
सुरेश पंडित : रास्ता इधर से भी जाता है
वेद प्रकाश : स्त्री-मुक्ति का समावेशी रूप
डॉ. नगमा जावेद : जिन्दा, जीते-जागते दर्द का एक दरिया हैः जिन्दा मुहावरे
डॉ. आदित्य : भारतीय संस्कृति का कथानक जीवंत अभिलेखः अक्षयवट
एम. हनीफ़ मदार : जल की व्यथा-कथा कुइयांजान के सन्दर्भ में
बन्धु कुशावर्ती : जीरो रोड का सिद्धार्थ
प्रो. अली अहमद फातमी - एक नई कर्बला
सगीर अशरफ : नासिरा शर्मा का कहानी संसार - एक दृष्टिकोण
प्रत्यक्षा सिंहा : संवेदनायें मील का पत्थर हैं
डॉ. ज्योति सिंह : इब्ने मरियम : इंसानी मोहब्बत का पैग़ाम देती कहानियाँ
डॉ. अवध बिहारी : इंसानियत के पक्ष में खड़ी इबारत - शामी काग़ज
डॉ. संजय श्रीवास्तव : मुल्क़ की असली तस्वीर यहाँ है
हसन जमाल : खुदा की वापसी : मुस्लिम-क़िरदारों की वापसी
प्रताप दीक्षित : बुतखाना : नासिरा शर्मा की पच्चीस वर्षों की कथायात्रा का पहला पड़ाव
प्रो. वीरेन्द्र मोहन : मानवीय संवेदना और साझा संस्कृति की दुनियाः इंसानी नस्ल
प्रो. रोहिताश्व : रोमांटिक अवसाद और शिल्प की जटिलता
मूलचंद सोकर : बुजकशी का मैदान- एक महान देश की अभिशप्त गाथा
प्रो. रामकली सराफ : स्त्रीवादी नकार के पीछे इंसानी स्वरः औरत के लिए औरत
इकरार अहमद : राष्ट्रीय एकता का यथार्थ : राष्ट्र और मुसलमान
सिद्धेश्वर सिंह : इस दुनिया के मकतलगाह में फूलों की बात
आलोक सिंह : नासिरा शर्मा का आलोचनात्मक प्रज्ञा-पराक्रम
डॉ. मेराज अहमद : नासिरा शर्मा का बाल साहित्य : परिचयात्मक फलक
नासिरा शर्मा प्रेमकुमार की बातचीत
नासिरा शर्मा मेराज अहमद और फीरोज अहमद की बातचीत


सम्पादक: वाङ्मय (त्रैमासिक हिन्दी पत्रिका)

बी-4,लिबटी होम्स ,अलीगढ,

उत्तरप्रदेश(भारत),202002,

मोब: +91 941 227 7331

Saturday, August 8, 2009

तमाचा

प्रताप दीक्षित
शाम को दफ्तर से लौटने पर देखा तो घर में बिजली नहीं थी। अक्सर ऐसा होने लगा था। जैसे-जैसे मौसम के तेवर बदलते, बिजली की आँख-मिचौली बढ़ती जाती। बिजली विभाग का दफ्तर न हुआ देश की सरकार हो गई। वह पसीने में लथपथ प्रतीक्षा करने लगा। और कोई चारा भी तो नहीं था। जब शहर का यह हाल है तो गाँवों में क्या होगा। इन कष्ट के क्षणों में भी उसे देश-समाज की चिन्ता थी। उसे अपने आप पर गर्व हुआ। कुछ देर बाद अंधेरा घिर आया।
आ गई। अचानक एक उल्लास मिश्रित शोर उभरा। लाइट आ गई थी, जैसा कि अन्य घरों से आते प्रकाश से लग रहा था। सिवाय उसके यहाँ। अब उसे चिन्ता हुई। सामूहिक रूप से तो किसी कष्ट को भोगा जा सकता है। एक दूसरे के प्रति एक अव्यक्त सहानुभूति की धारा सबको एक सूत्रा में बाँधे रहती है। परन्तु ऐसी स्थिति में तो दूसरे से ईर्ष्या ही पैदा होती है। लगता है कि उसके यहाँ ही कुछ फॉल्ट है। शायद फ्यूज उड़ा हो। उसने फ्यूज देखा, वह सही था। उसने स्विच, बोर्ड हिलाए-डुलाए परन्तु परिणाम ज्यों का त्यों। वह थककर बैठ गया। पत्नी ने कहा कुछ करो न, हाथ पर हाथ रखकर बैठने से क्या होगा?
वह परेशान हो गया। ये छोटे-मोटे काम, जिन्हें अन्य लोग आसानी से निपटा लेते, उनसे न सम्हलते। इस तरह के कार्य उसे सदा दुःसाध्य लगते रहे थे। मजबूरी की बात तो अलग। वह अनमने ढंग से बिजली मिस्त्री की तलाश में निकला। इन बिजली वालों से भगवान बचाए। पहले तो वह इतने छोटे से कार्य के लिए तैयार नहीं होगा। आजकल पंखे-कूलर के काम में वैसे ही व्यस्तता है। गली-मोहल्ले के मुलाहिजे से हामी भी भर लें तो घण्टों क्या एक दो-दिन शक्ल नहीं दिखाते।
दोबारा जाने पर उत्तर मिलता है, आप चलें। बस अभी आ रहा हूँ। यदि बहुत फुसलाने से आ भी गए तो जरा से काम का, वह भी रिपेयरिंग के बाद, जो पारिश्रमिक बताते उससे तो लगता पहले की स्थिति में लौटना ज्यादा अच्छा होगा। परन्तु तब ऐसा होना सम्भव नहीं होता। खैर, बिजली वाले के पास जाना तो था ही। वह पास में ही स्थित बिजली वाले की दुकान पर गया। दुकान में मिस्त्री नहीं था। दुकान वाले ने बड़ी ही नम्रता से कहा।
आप चलें साहब! थोड़ी देर में मिस्त्री के आने पर उसे आपके यहाँ भेजता हूँ।
दुकानदार उसका घर जानता था, फिर भी उसने मकान नम्बर, नुक्कड़ पर मन्दिर की पहचान आदि भली भाँति समझा दी। वह लौट आया। उसे तो पहले से ही इसी जवाब की उम्मीद थी।
काफी देर हो गई। न किसी को आना था, न कोई आया। उसने सोचा-अब कल देखा जाएगा। परेशानियों के बाद वह परिस्थितियों से समझौता कर लेता। धीरे-धीरे उसकी अंधेरे से पहचान बनने लगी थी। परन्तु पत्नी और बच्चे चित्रहार न देख पाने के कारण बेचैन और झुँझलाए हुए थे। बिजली वाले के पास फिर जाना पड़ा। इस बार दुकान का मालिक दुकान बंद करने की तैयारी में लग रहा था।
उसने कहा, इस समय तो मिस्त्री लौटा नहीं। अगर सुबह भेज दे....।
अरे नहीं भई, कुछ करो। वह गिड़गिड़ाता हुआ-सा बोला। उसके चेहरे पर व्यग्रता और निरीहता दोनों उभर आये।
तभी दुकान में एक १६-१७ साल का छोकरा-सा दिखता लड़का आया।
१५ एम्पियर का एक प्लग टॉप, पाँच मीटर २ बाई ४ का पी.वी.सी. तार देना।
गोरे, बड़े बालों वाले जीन्स पहने छोकरे ने कहा। लड़का तेज दिख रहा था। उसके हाथ में एक प्लास था। यद्यपि लड़का देखने में बिजली मिस्त्री जैसा नहीं लग रहा था, परन्तु उसके हाथ में प्लास और क्रय किए जाने वाले सामान के
सम्बन्ध में उसके तकनीकी विवरण के कारण उसे लगा कि शायद उसका काम निकल सके।
उससे झिझकते हुए उसे संबोधित किया।
क्या... उसे असमंजस हुआ, लड़के को आप कह कर सम्बोधित करे या तुम'। आप लायक उसकी उम्र नहीं थी और तुम कहने में उसके साथ-सुथरे कपड़े और तेजी बाधक थी। उसने तुम-आप गोलमोल कर दिया।
जरा-सा काम था।
क्या काम है?'' छोकरे प्रत्युत्तर में पूछा।
यहीं पास में...।'' उसने पहले जगह बताते हुए बाद में काम बताया। कहीं दूर जाने की बात सुन वह मना न कर दे।
चलिए। वह तैयार हो गया।
उसने पारिश्रमिक पूछना चाहा। परन्तु हमेशा की तरह आशंका के कारण-कहीं अनजान समझ, पैसे ज्यादा बता दिए और बात न तय हो सकी, वह कतरा गया।
जब-तब ऐसा होता। रिक्शे पर बैठने से पहले पैसे तय करने में उसे डर लगता। मालूम नहीं क्या माँग बैठे। मोलभाव करने पर मना कर दे। मोलभाव उसे अपनी प्रतिष्ठा और गरिमा के प्रतिकूल भी लगता है। और जब बिना पूछे बैठ जाता तो पूरे रास्ते मन ही मन पछताता-तय कर लेना था, अब तो जो भी अनाप-शनाप माँगेगा देना पड़ेगा। वह हिसाब जोड़ता रहता। इतनी दूर का अधिकतम किराया क्या हो सकता है। उससे दो रुपये अधिक दे दे। पर नहीं यह तो मूर्खता होगी। एक रुपया ज्यादा दिया जा सकता है। वह रिक्शे वाले से संवाद आरम्भ कर देता।
कहाँ के रहने वाले हो?
कब से रिक्शा चला रहे हो?
आदि आदि।
उसे लगता, इस प्रकार निकटता होने से कम से कम वह ठगेगा तो नहीं। संयोग से यदि वह उसके गाँव-जवार या आसपास का निकल आता तो वह खिल उठता।
भाई, तुम तो अपनी ही तरफ के हो।
गन्तव्य पर पहुँच वह सोची हुई राशि उसे देता, यदि वह चुपचाप स्वीकार कर लेता तो उसे निराशा सी होती-उसने जल्दबाजी कर दी। यदि एक रुपया कम भी दिया जाता तो काम चल जाता।
हिसाब-किताब में वह सदा का पक्का रहा है। किसी रेस्टोरैंट में बैठकर खाते-पीते, वह सम्बन्धित बिल का हिसाब-किताब मन ही मन करता रहता। दोस्तों अथवा परिवार के साथ इसकी गति में तीव्रता आ जाती। खाई जाने वाली सामग्री के साथ ही बैरे को दी जाने वाली टिप की राशि वह प्रति व्यक्ति व्यय में जोड़ लेता।
उसने दुकानदार से पूछना चाहा, लड़के को क्या दे दें। लड़का वही खड़ा था। उसके सामने पूछने में संकोच हुआ। उसके आगे बढ़ जाने पर उसने पलटकर पूछ ही लिया।
साहब, समझकर दे दीजिएगा।'' दुकानदार ने कहा।
घर आकर लड़के ने मेन स्विच में टेस्टर से करेण्ट चेक किया। लाइन ठीक थी। मीटर में करेण्ट आ रहा था। उसने बोर्ड खोला। मेन लाइन से बोर्ड तक आए तारों में एक तार अलग था। उसने दोनों तार बाहर खींचे। तारों को छीलकर जोड़ने लगा।
वह टार्च दिखा रहा था। वह उससे लगातार बातें किये जा रहा था, ÷÷मेरे दफ्तर में तो बहुत काम निकलता है। कई मिस्त्री आगे-पीछे घूमते रहते हैं।''
फिर रुककर कहा, ÷÷यदि तुम्हें फुरसत है तो तुम्हारे लिए बात करूँ।'' लड़का अपने काम में मग्न था।
उसने मेन स्विच ऑन किया, बिजली नहीं आई। ऑफ और फिर ऑन करने पर लाइट एकबारगी चमककर चली गई। वह फिर से तार अलग करने लगा। उसकी बेचैनी बढ़ रही थी। जितनी देर होगी, उतने ही ज्यादा पैसे माँगेगा। जल्दी काम होने पर कम से कम यह कहने का मौका तो रहता ही है, ÷÷काम ही कितनी देर का था।''
उसने कहना चाहा इससे तो पहले ही ठीक था। अगर कहीं यह ठीक न कर सका तो दूसरा व्यक्ति और ज्यादा वसूलेगा। जैसे-जैसे देर हो रही थी उसकी झुँझलाहट बढ़ रही थी। उसने मन ही मन निश्चय किया-आज एक भी पैसा फालतू नहीं देना है। वह हमेशा की तरह बरगलाने या धौंस में नहीं आएगा। आखिर उसका भी तो अपना व्यक्तित्व है। सरकारी दफ्तर में बड़ा बाबू। तमाम अधीन लोगों को दबाव में रखता ही है-चाहे वे दैनिक वेतनभोगी ही क्यों न हो। क्या हुआ जो वह बड़े अधिकारियों के आगे, लोगों के कथनानुसार, ÷हें-हें' करता रहता है। वह तो सरकारी ड्यूटी का मामला है। अब इन रिक्शे वालों, बिजली वालों जैसे दो टके के लोगों के सामने दब गया तो रह गई मर्दानगी। अब लौ नसानी अब न नसैहों। उसने विचार किया-दस रुपए पर्र्याप्त होंगे। हैं तो कुछ ज्यादा। परन्तु इससे कम में होता क्या है।
उसे अपनी दरियादिली पर स्वयं गर्व हुआ। परन्तु यदि यह न माना! अगले ही क्षण उसके मन में आया-ठीक है दो रुपये और सही। उसने ऊपर की जेब में दस रुपए का नोट अलग रख लिया। ज्यादा पैसे देखकर ये लोग और मुँह फैलाते हैं। पहले दस, फिर न मानने पर दो और। इससे अधिक एक भी नहीं। कोई नया सामान तो लगाया/बदला नहीं है। आखिर काम ही कितना किया है। वह मन ही मन आश्वस्त हुआ।
लेकिन बड़े बालों वाला छोकरा लग तेज रहा है। पूरा गुण्डा नज+र आ रहा है। उसे लगा इसको नहीं बुलाना था। लगता है आज छुआ कर रहेगा। वह भी कैसी मूर्खता कर जाता है बाज वक्त। उसे परिवार वालों पर गुस्सा आने लगा। एक दिन भी बिना बिजली के नहीं रहा जा सकता था। खैर अब तो सर दे ही दिया है ओखली के बीच। जो होगा देखा जाएगा।
अब तो भुगतना ही है। देखो, कैसे चालाकी से देर किए जा रहा है। चलो दो और सही। उसने गहरी सांस ली। कुल हुए चौदह। पर कहीं २०, ३० या ५० जो, जी में आए न माँग ले? यदि झगड़ा किया, कुछ अभद्रता न कर बैठे। जो भी हो, परन्तु किसी भी सूरत में आज दबना नहीं है। जरा सी भी बदतमीजी की तो वह तमाचा मुँह पर मारेगा कि सारी हेकड़ी निकल जाएगी। दो हड्डी का तो दिख रहा है। आज वह दृढ़प्रतिज्ञ हो गया था। उसने कोशिश की लेकिन उसे याद नहीं आया कि उसने पिछली बार, कब और किसकी पिटाई की थी। परन्तु मारपीट से कहीं मामला बढ़ भी तो सकता था।
उसे अखबारों की कुछ घटनाएँ याद आईं, जरा सी बात पर चाकू या बम मार दिए गये थे। उसने उसे आजमाना चाहा। स्वर को रहस्यमय बनाते हुए, ÷÷गुड्डू को तो जानते ही होगे। अरे वह जिसने पिछली बार भरे बाजार में गोली चला दी थी। चाकू-वाकू तो मामूली सी बात है उसके लिए। मेरा भतीजा लगता है।''
तभी लाइट आ गई। अब जौहर का अवसर आ गया। उसने सोचा। उसके हाथ-पैर कांप रहे थे। लड़के के चेहरे पर धूर्तता-भरी मुस्कुराहट दिखाई पड़ी। दोनों एक दूसरे पर दाँव भाँज रहे थे। पहल कौन करता है?
लड़का हँसा।
वह हतप्रभ हुआ, यह तो नया पैंतरा है। इस पर तो उसने विचार ही नहीं किया था। वह इस दाँव की काट ढूंढता तब तक लड़का सीढ़ियों से उतर चुका था।
÷÷अरे रुको, पैसे तो लेते जाओ।'' उसने कहा। लड़का निचली सीढ़ी पर ठिठका, ÷÷साहब, देर ही कितनी लगी है। इतने से काम का क्या चार्ज? आप परेशान थे। काम हो गया।'' लड़का तेजी से निकल गया था।

Friday, August 7, 2009

अंतर्मन

SEEMA GUPTA

अंतर्मन की ,
विवश व्यथित वेदनाएं
धूमिल हुई तुम्हे
भुलाने की सब चेष्टाएँ,
मौन ने फिर खंगाला
बीते लम्हों के अवशेषों को
खोज लाया
कुछ छलावे शब्दों के,
अश्कों पे टिकी ख्वाबों की नींव,
कुंठित हुए वादों का द्वंद ,
सुधबुध खोई अनुभूतियाँ ,
भ्रम के द्वार पर
पहरा देती सिसकियाँ..
आश्वासन की छटपटाहट
"और"
सजा दिए मानसपट की सतह पर
फ़िर विवश व्यथित वेदनाएं
धूमिल हुई तुम्हे
भुलाने की सब चेष्टाएँ,

Thursday, August 6, 2009

गुमशुदा

प्रताप दीक्षित
रघुवीर शरण के लिए ये अवकाश के क्षण थे। निश्चिंतता के भी। ऐसी स्थितियाँ कम ही होतीं। अधिकाँशतः खाली समय में, जिसकी इफ़रात होती, उनके हाथों में कागज और पेन रहता। चारों ओर छोटी-छोटी पर्चियों का ढेर लग जाता। वे एकाग्र मन से जाने क्या जोड़ा-घटाया करते। वर्तमान से कटे, आने वाले पलों से बेपरवाह।
सामान्यतः बँधी-बँधायी आमदनी वालों का लेखा-जोखा मात्रा खर्चों की कतर-ब्योंत एक सीमित रहता है। उन्हें भी प्रतिमाह एक निर्धारित राशि प्राप्त होती। खर्र्चे भी लगभग निश्चित। परन्तु वे आय के हिसाब-किताब के अलावा, आकस्मिक स्रोतों से होनेवाली आमदनी की संभावना का ध्यान रखते।
उन्हें लगता, जिन्दगी का क्या भरोसा? उन्हें कुछ हो गया तो! पक्षपात या हृदय का दौरा तो आज आम हो गया है। इसके अतिरिक्त नौकरी से निलम्बन की आशंका, बेटी के संभावित विवाह, पुत्रा के लिए एक अद्द नौकरी या रोजगार का जुगाड़। अनेकों समस्याएँ थीं, जहाँ एकमुश्त रकम की जरूरत पड़ सकती थी। वे अक्सर हिसाब फैलाते-प्राविडेण्ट फण्ड से अग्रिम पच्चीस हजार, बैंक की फिक्स्ड डिपॉजिट दस हजार, शेयर्स के...बचत खाते में शेष तीन सौ-कुल जोड़...
जोड़ने के बाद आने वाले योग की राशि किसी भी एक मद के लिए पर्याप्त सिद्ध न होती। किसी समय एक मित्रा के कहने पर, उन्होंने एक कम्पनी के शेयर्स खरीद लिए थे। वे समाचार-पत्रा में नियमित रूप से आर्थिक पृष्ठ पर नजर रखते। भाव में मन्दी होने पर चिन्तित, इसके विपरीत मुदित। सुरक्षा का एहसास। जहाँ कही इस सम्बन्ध में चर्चा होती, वे सजग हो जाते। कभी-कभी बीच में टोककर अपनी आशंकाओं का निराकरण करने का प्रयास भी करते।
कुछ दिनों में वे यदा-कदा लॉटरी के एक-दो टिकट भी खरीदते, जिनमें पुरस्कार की राशि बड़ी और इनाम खुलने की तिथि काफी दिनों बाद की होती। कम से कम उस दिन तक आशान्वित तो रहा जा सके। ताड़ की भाँति बढ़ती बेटी, एम.ए. पास बेरोजगार पुत्रा, मकान में एक कमरा बनवाकर किराए पर उठाना अथवा गाँव में गिरवी पड़ी जमीन छुड़ाने के लिए पिता को रुपए भेजना...सुरसा की भाँति फैलती जरूरतें! प्राथमिकता तय न कर पाने के कारण, कल्पना में इन सबमें संगति बैठाने की कोशिश करते।
दफ्तर में सहयोगी महँगाई भत्ते, सी.सी.ए. अथवा वेतन-निर्धारण में होने वाली विसंगतियों के सम्बन्ध में उनकी राय लेते। इस बारे में उनकी कोई अनुभवगत पृष्ठभमि नहीं थी। विद्यार्थी तो वे दर्शन और साहित्य के रहे थे। कदाचित्‌ कभी कविताएँ भी लिखते थे। परन्तु सतत्‌ अभ्यास और लम्बे समय तक कर्मचारी संगठन में सक्रियता के चलते वह इन मामलों में पारंगत हो गए थे। इसका शुमार इस कदर उनकी आदतों में हो गया था कि विगत कुछ वर्षों से यूनियन में नए आए युवा पदाधिकारियों का वर्चस्व और संगठन से एक प्रकार से दरकिनार कर दिये जाने के बावजूद भी वे किसी को मना कर पाते।
दिनचर्या में सुबह का अखबार, मन्दिर जाना तथा शाम को टी.वी. देखना तो शामिल था ही, संस्कारों के कारण गीता पाठ भी।
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्‌य कर्मणः
कर्म किए बिना निस्तार भी तो नहीं था। ये यन्त्रावत्‌ एक ही मनःस्थिति में सभी कार्य निपटाते। जिस निस्संगता के साथ वे रात में पत्नी के साथ सोते, दिन में उसी निस्संगता के साथ अक्सर निर्णय लेते-बहुत हो चुका घर-परिवार...!
उस दिन में भी वे निश्ंिचत थे। शेयर बाजार उछाल पर था। खर्चों का मिलान अन्तिम पैसे तक मिल चुका था। घर में भी कुछ विपरीत घटित नहीं हुआ था। वे दूरदर्शन पर दिखाई जाने वाली फीचर-फिल्म देखने की तैयारी में थे। ठीक उसी प्रकार जैसे कोई पुजारी धूप-दीप-नैवेद्य के साथ पूजा-अर्चना की तैयारी करता है।
दूरदर्शन पर अभी गुमशुदा व्यक्तियों के सम्बन्ध में सूचित किया जा रहा था। यूँ उनका ध्यान इस ओर न भी जाता, परन्तु एक तो फुरसत और दूसरे पुरस्कार के उल्लेख ने उनका ध्यान आकृष्ट कर ही लिया।
...पुरुषोत्तम लाल, उम्र लगभग साठ वर्ष, औसत शरीर, सामान्य कद, गेहुंआ रंग, कोई निशान तथा पहचान का चिद्द उपलब्ध नहीं। अमुक तारीख से...'
सूचना देने के लिए टेलीफोन नम्बर, एक व्यापारिक संस्थान का पता तथा आकर्षक ईनाम देने की घोषणा भी की गई थी। पुरुषोत्तम लाल जी का चित्रा कुछ धुँधला-सा था। चित्रा से उनकी उम्र का सही पता नहीं चल रहा था। एक साधारण-सा बूढ़ा आदमी।
उन्होंने गौर से देखा। कहीं देखा-सा लगा उन्हें!
...अरे! यह विज्ञापन तो पिछले ही सप्ताह किसी अखबार में देखा है! उठावनी', रस्मपगड़ी', अंतिम अरदास' आदि की विज्ञप्तियों के बीच गुमशुदा का यह विज्ञापन भी दुबका हुआ था। वे सचेत हो उठे। पत्नी, पुत्रा, पुत्री सबको आवाज दे डाली। उन सबके कमरे में आने तक सूचना समाप्त हो गयी थी। उन्होंने पुराने अखबार माँगे। दुर्भाग्य कि सम्बन्धित अखबार न मिल सका।
इस घर में माँगने पर कुछ मिलता भी है? अभी पिछले सप्ताह की ही तो बात है!
कोई सुन रहा है मेरी बात?' इस बार भी उनकी आवाज में कडुवाहट थी।
सुन लिया है। आखिर उस मुए, पढ़े, बासी अखबार में क्या धरा है?'
तुम लोग नहीं समझोगे!'
उनका टी.वी. देखने का मजा किरकिरा हो गया। मन न लगा।
रघुवीर शरण ने बहुत प्रयास किए, पर अखबार न मिलना था, न ही मिला। उन्हें तो ठीक से अखबार का नाम और तारीख भी याद नहीं। पता नहीं घर, दफ्तर या किसी लायब्रेरी में...कहीं देखा तो जरूर था। अब याददाश्त भी तो इस उम्र में साथ नहीं देती। इश्तिहार की हल्की-सी झलक उनके जेहन में थी।
उन्होंने सोचा, प्रयास करने में हर्ज ही क्या है। पुरस्कार की राशि नहीं मिलेगी तो पास से क्या जाता है? उचित राशि दस हजार से कम तो भला क्या होगी! बड़े लोग हैं, अधिक भी हो सकती है। पर उन्हें शंका हुई, कई बड़े आदमी मक्खीचूस भी होते हैं। कहीं सूखा-सा धन्यवाद देकर, दो-चार सौ ही न पकड़ा दें।
रघुवीर शरण सोचने लगे...यदि पहले न भी रहा हो तो भी इस उम्र तक आदमी धार्मिक होना शुरू हो ही जाता है। बढ़ती आयु जंगल में हाँकेवालों की तरह दौड़ाती है। मन जंगली जानवर-सा भयाक्रांत मन्दिर, इस-उस आश्रम, गुरु तक, न जाने कहाँ-कहाँ दौड़ता फिरता है।
अवश्य किसी ऐसी ही जगह होंगे। पिछले दिनों नगर में एक प्रख्यात कथावाचक संत का आगमन हुआ था। उनके प्रवचन में हजारों की संख्या में लोग उपस्थित होते, दीक्षा लेते। किताबें, कैसेट, ताबीज, लॉकेट, खरीदते। बुढ़ऊ जरूर वहाँ होंगे।
रघुवीर शरण प्रतिदिन प्रवचन-स्थल पर पहुँच जाते। उनकी खोज आरम्भ हो जाती। प्रवचन चलता रहता।
वे मनोयोग के साथ चारों ओर चक्कर लगाते। किताबों, कैसेट के स्टॉल...यहाँ तक कि साथ के पार्क में भी नजर डाल आते। कार्यक्रम के बाद भारी भीड़ छूटती। वे चेहरों को निहारते। पहचानने की कोशिश जारी रखते। धक्के भी खाते। कई बार उन्हें लगा कि वांछित सफलता मिली, लेकिन यह उनका भ्रम मात्र होता।
इसी दौरान वे मन्दिरों, गंगा-घाटों, आश्रमों में भी चक्कर लगा आए, लेकिन निराशा ही हाथ लगी।
पहले उन्होंने नहीं सोचा था कि काम इतना मुश्किल होगा। वे सोचने लगे-पुरुषोत्तम लाल जाएँगे कहाँ? सम्पन्न परिवार, उम्र के हिसाब से परहेजी सही, भरपेट भोजन, करने को भरपूर आराम। क्या मन ऊब नहीं जाता होगा? अवश्य ही ऊब गया होगा! वे व्यस्त होते गये। सुबह से शाम, कभी रात तक भी बाजारों, पार्क, रेस्तराँ में घूमते रहते बूढ़े, बच्चे एक समान। जीभ पर नियंत्राण नहीं रह पाता। क्या पता किसी हलवाई, चाटवाले या रेस्तराँ में ही दिख जाएँ! उनका बजट गड़बड़ाने लगा। वे किसी भीड-भाड़वाले होटल, दुकान में ऐसी जगह बैठ जाते जहाँ वे दूर तक का नजारा ले सकें।
वेटर थोड़ी-थोड़ी देर में पूछ जाता, साहब कुछ और?
अन्त में वे उठ जाते।
एक दिन उनके मन में आया कि हो न हो, किसी अस्पताल में भी देख लिया जाए। उन्हें सुनी-सुनाई घटनाएँ याद आईं, जिसमें स्मृति का लोप हो जाता है। नगर में कई अस्पताल थे। अक्सर मरीज सोए हुए मिलते। उन्हें कठिनाई होती। वैसे भी लेटे हुए सभी एक जैसे लगते। कई दिनों तक जाना पड़ा, पर परिणाम कुछ न निकला।
उन्हें लगा कि क्यों न रेड-लाइट इलाके में भी एक चक्कर लगा आएँ? इस आयु में बुझते दीपक की लौ एकाएक तेज हो जाती है। शरीर तो साथ नहीं देता, पर मन तो लगता, कभी-कभी, आदमखोर बन जाता है। यद्यपि यह बदनाम इलाका पुलिस ने जाने कब खाली करा लिया था, बरसों से धन्धा बन्द सुना जाता था, फिर भी उनकी हिम्मत गली में जाने की न पड़ी।
अब तो उन पर धुन सवार हो गई थी। एक जुनून-सा। पुरस्कार का ख्याल तो जाने कब उनके मन से निकल गया था। वे सोचते रहते कि पुरुषोत्तम लाल किस हाल में होंगे? पास में पैसे बचे हैं या नहीं? पकी उम्र के रईस आदमी हैं, सम्भवतः माँग सकते नहीं किसी से।
कहीं भूखे-प्यासे न पड़े हों! घर क्यों छोड़ा? किसी पारिवारिक समस्या के कारण? वसीयत के लिए पुत्रों, परिवारवालों से कोई टकराव तो नहीं है? अब तो कपड़े भी चीकट हो गये होंगे। पत्नी है या नहीं? बच्चों को वास्तव में फिक्र है तो दुबारा विज्ञापन क्यों नहीं दिया?
वे खोए हुए रहते। उनके शौक टी.वी., पान सब छूट गए। गीता-पाठ में भी नागा हो जाता। उनका खाना, सोना सब अनियमित होता गया। कई-कई दिनों तक दाढ़ी न बनाते। बनाने की फुर्सत ही न मिलती। कपड़े न बदलते। घर में पत्नी, बेटे, बेटी सब परेशान रहते।
क्या हो गया है? पहले तो ऐसे न थे। दफ्तर से वापस थके-हारे आते। कुछ दिनों से तो जाने-आने का कोई समय ही नहीं रहा...।
एक दिन उनके सहकर्मी वर्मा जी ढूँढते हुए घर आए, तब परिवारवालों को पता चला, कई दिनों से ऑफिस गए ही नहीं थे। पूछने पर भड़क जाते, तुम्हें क्या? तुम सबके लिए पूरा जीवन लगा दिया। किसी को फिक्र है?
जाने क्या-क्या एक ही साँस में कह जाते! रात में नींद न आती। कभी कोई पुस्तक उठाते, पर मन न लगता। झुँझलाते। कभी सोने के पहले या सोती पत्नी को जगाकर अजीब-अजीब प्रश्न पूछते। कहते, आखिर इस आयु में लोग कहाँ गायब हो जाते हैं?....यदि मैं घर छोड़कर जाऊँ तो बता सकती हो, कहाँ जाऊँगा?
पत्नी नींद में जवाब देती, ÷क्या हो गया है तुम्हें! खुद तो नींद आती नहीं, पर मुझे तो सोने दो।'
रघुवीर शरण ने ऑफिस से एक सप्ताह की छुट्टी बढ़वा ली। उनसे एक चूक हो गयी थी। उन्हें रेलवे-स्टेशन, प्लेटफॉर्म पहले ही देख लेना चाहिए था। बिना ठिकाने का आदमी कहाँ रहेगा!
वे पुनः उत्साहित हो गए। प्लेटफॉर्म पर तो बरसों गुजारे जा सकते हैं। भीड़ में किसका ध्यान जाता है? वे प्लेटफॉर्म टिकट ले स्टेशन पर बने रहते। एक प्लेटफॉर्म से दूसरे पर। गाड़ियों का अन्तहीन सिलसिला। कोई न कोई टे्रन आती या छूटती रहती। वे कम्पार्टमेंट में झाँककर देखते। थक जाते तो किसी खाली बेंच पर सुस्ता लेते। एक दिन तो हद हो गई। उनके हाथ पर सिक्का रखकर, ÷बाबा, आगे बढ़ो!' कहता एक युवक जल्दी में चला गया था।
वे थके लौटे थे। घर में पत्नी, पुत्रा आदि सभी की मुद्राएँ सामान्य नहीं थीं। पत्नी अपनी बेटी से फुसफुसा रही थी, किसी ने जरूर कुछ करा दिया है। कोई जादू-टोना।
रात गहरा आई थी। वे चुपचाप अन्दर कमरे में जाकर बैठ गए। थकावट से चूर। जूते उतार पैरों को अपने हाथों से दबाते, निढ़ाल बिस्तर पर लुढ़क गए। शरीर से ज्यादा क्लांत मन, विचार-शून्य। धुँधली दृष्टि डे्रसिंग टेबिल के आईने पर पड़ी। सामने एक दाढ़ी बढ़ा, असमय वृद्ध, काला पड़ गया रंग! उन्हें कहीं देखा हुआ लगा। गौर से दुबारा देखा तो हतप्रभ रह गए।
पत्नी, पुत्र, पुत्री....आज सभी कारण जान लेने पर आमादा थे। पत्नी कमरे में आई। बाकी लोग दरवाजे पर ही ठिठके थे। वह अवाक्‌ रह गई। रघुवीर शरण फूट-फूटकर हिचकियाँ लेते हुए रो रहे थे।