Sunday, May 10, 2009

वैषम्य

महेंद्र भटनागर

हर व्यक्ति का जीवन
नहीं है राजपथ —
उपवन सजा
वृक्षों लदा
विस्तृत
अबाधित
स्वच्छ
समतल
स्निग्ध !
.
सम्भव नहीं
हर व्यक्ति को
उपलब्ध हो
ऐसी सुगमता,
इतनी सुकरता।
सम दिशा
सम भूमि पर
आवास सबके हैं नहीं प्रस्थित,
एक ही गन्तव्य
सबका है नहीं
जब अभिलषित।
.
कुछ को
पार करनी ही पड़ेंगी
तंग-सँकरी
कण्ट-कँकरीली
घुमावोंदार
ऊँची और नीची
जन-बहुल
अंधारमय
पगडण्डियाँ — गलियाँ
पसीने-धूल से अभिषिक्त,
प्रति पग पंक से लथपथ।
.
नहीं,
हर व्यक्ति का जीवन
सकल सुविधा सहित
आलोक जगमग
राजपथ !
.
जब भूमि बदलेगी,
मार्ग बदलेगा !
.
 

Saturday, May 9, 2009

जीवन-संदर्भ

महेंद्र भटनागर

आओ
जीवन की गीता को
अभिनव संदर्भ प्रदान करें !
बदला
जब परिवेश मनुज का
आओ
नयी ऋचाओं का निर्माण करें !
.
नव मूल्यों को स्थापित कर
जीवन-धर्मी कविता के
अन्तर-बाह्य स्वरूपों को
अभिनव रचना दे !
जीवन्त नये आदर्शों की आभा दें !
जगमग स्वर्णिम गहने पहना दें !
.
जीवन की प्रतिमा को
नयी गठन
नव भाव-भंगिमा से सज्जित कर;
मानव को
चिर-इच्छित
संबंधों की गरिमा से
सम्पूरित कर
युग को महिमावान करें !
आओ
नव राहों के अन्वेषी बन
नूतन क्षितिजों की ओर
प्रवह प्रयाण करें !
.

Friday, May 8, 2009

ऊहापोह

महेंद्र भटनागर

प्रश्न —
अविकल स्थिर
अपनी जगह पर।
पंगु
सारी तर्कना,
विखण्डित
कल्पना !
अनिश्चित की शिलाओं तले
रोपित प्रश्न !
.
सूत्राभाव
पूर्व...उत्तर...सर्वत्र
ठहराव !
.
यह कश-म-कश
और कब तक ?
विवश मनःस्थिति
और कब तक ?
और कब तक
ओढ़े रहोगे प्रश्न ?
उलझी ऊबट सतह पर।
.
सब पूर्ववत्
अपनी जगह पर।

Thursday, May 7, 2009

वात्याचक्र

महेंद्र भटनागर

अंधड़
आ रहा सम्मुख
उमड़ता
सनसनाता
वेगवाही
धूलि-धूसर !
.
कुछ क्षणों में
घेर लेगा बढ़
तुम्हारा भी गगन !
जागो उठो
दृढ़ साहसिक मन
हो सचेत-सतर्क !
थपेड़े झेलने का प्रण
अभी
तत्काल
निश्चय आत्मगत कर।
.
अंधड़ों की शक्ति
तुमको तौलनी है,
संकटों पर
आत्मबल सन्नद्ध हो
जय बोलनी है,
प्राण की सोयी हुई
अज्ञात-मेधा को सचेतन कर !
.
हिमालय-सम
सुदृढ़ व्यक्तित्व के सम्मुख
गरजता क्रूर अंधड़
राह बदलेगा !
मरण का तीव्र धावन
तिमिर अंधड़
राह बदलेगा !

Wednesday, May 6, 2009

परिवेश के प्रति

महेंद्र भटनागर

कितनी तीखी ऊमस से
परिपूर्ण गगन,
लहराती अग्नि-शिखाओं से
कितना परितप्त भुवन !
कितना क्षोभ-युक्त
भाराक्रांत
दमित
मानव-मन !
जीवन का
वातावरण समस्त
थका-हारा,
काराबद्ध !
.
आओ
इसको बदलें,
गतिमान करें,
मल्लार-राग से भर दें
जलवाह !
पवन-संघातों से
निःशेष करें
दिग्दाह !

Tuesday, May 5, 2009

नियति

महेंद्र भटनागर


संदेहों का धूम भरा
साँसें
कैसे ली जायँ !
.
अधरों में
विष तीव्र घुला
मधुरस
कैसे पीया जाय !
.
पछतावे का ज्वार उठा
जब उर में
कोमल शय्या पर
कैसे सोया जाय !
.
बंजर धरती की
कँकरीली मिट्टी पर
नूतन जीवन
कैसे बोया जाय !
.
 

Sunday, May 3, 2009

हिन्दी इन्टरव्यू : उद्भव और विकास


पुस्तक उपलब्ध

मूल्य 200(25प्रतिशत छूट के साथ)

आलेख
डॉ० मेराज अहमद- साक्षात्कार की भूमिका
प्रो० रमेश जैन- साक्षात्कार
डॉ० विष्णु पंकज- हिन्दी इन्टरव्यू : उद्भव और विकास
डॉ० हरेराम पाठक- हिन्दी साक्षात्कार विधा : स्वरूप एवं सम्भावनाएं
अशफ़ाक़ कादरी- साहित्य एवं मीडिया में साक्षात्कार - एक दृष्टि
विज्ञान भूषण- प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से संबंधित साक्षात्कार की सैद्धान्तिकी में अन्तर
दिनेश श्रीनेत- हमारे समय में नचिकेता का साहस
साक्षात्कार
डॉ० शिवकुमार- मिश्र डॉ० सूर्यदीन यादव
प्रो० मैनेजर पाण्डेय -देवेन्द्र चौबे, अभिषेक रोशन, रेखा पाण्डेय एवं उदय कुमार
जाबिर हुसैन- रामधारी सिंह दिवाकर
नासिरा शर्मा- डॉ० फीरोज अहमद
काशीनाथ सिंह- रामकली सराफ
मधुरेश- साधना अग्रवाल
ओमप्रकाश वाल्मीकि- डॉ० शगुफ्ता नियाज
कंवल भारती- अंशुमाली रस्तोगी
डॉ० अर्जुनदास केसरी- डॉ० हरेराम पाठक
चित्रा मुद्गल- श्याम सुशील
मलखान सिंह सिसौदिया -डॉ० राजेश कुमार
शहरयार- डॉ० जुल्फिकार
प्रो० जमाल सिद्दीकी- डॉ० मेराज अहमद एवं डॉ० फीरोज अहमद
एक साधारण होटल वाला- डॉ० मेराज अहमद

मुस्लिम कथाकार और उनकी हिन्दी कहानियाँ


पुस्तक उपलब्ध

मूल्य 200(25प्रतिशत छूट के साथ)
भूमिका
डॉ० मेराज अहमद:सम्पूर्ण समाज की अभिव्यक्ति मुस्लिम कथाकार और उनकी हिन्दी कहानियाँ कहानियाँ
हसन जमाल : चलते हैं तो कोर्ट चलिए
मुशर्रफ आलम जौक़ी : सब साजिन्देएखलाक
अहमद जई : इब्लीस की प्रार्थना सभा
हबीब कैफी : खाये-पीये लोग
तारिक असलम तस्नीम : बूढ़ा बरगद
अब्दुल बिस्मिल्लाह : जीना तो पड़ेगा
असगर वजाहत : सारी तालीमात
मेहरून्निसा परवेज : पासंग
नासिरा शर्मा : कुंइयांजान
मेराज अहमद : वाजिद साँई
अनवर सुहैल : दहशतगर्द
आशिक बालौत : मौत-दर-मौत
शकील : सुकून
मौ० आरिफ : एक दोयम दर्जे का पत्र
एम.हनीफ मदार : बंद कमरे की रोशनी

अनुदर्शन

महेंद्रभटनागर

उड़ गये
ज़िन्दगी के बरस
रे कई,
राग सूनी
अभावों भरी
ज़िन्दगी के बरस
हाँ,
कई उड़ गये !
.
लौट कर
आयगा अब नहीं
वक़्‍त
जो — धूल में, धूप में
खो गया,
स्याह में
सो गया !
.
शोर में
चीखती ही रही ज़िन्दगी,
हर क़दम पर विवश,
कोशिशों में अधिक विवश !
.
गा न पाया कभी
एक भी गीत मैं हर्ष का,
एक भी गीत मैं दर्द का !
.
गूँजता रव रहा
मात्र :
संघर्ष....संघर्ष... संघर्ष !
विश्रान्ति के
पथ सभी
मुड़ गये !
ज़िन्दगी के बरस,
रे कई
देखते...देखते
उड़ गये !

Saturday, May 2, 2009

दिनान्त

. महेंद्रभटनागर
आज का भी दिन
हमेशा की तरह
चुपचाप
बीत गया !
.
अनिच्छित
असह
ब्राह्ममुहूर्त का कर्कश
अलार्म बजा,
दिनागम की खुशी में
एक पक्षी भी न चहका,
भोर
घर-घर बाँट आयी स्वर्ण,
मेरे बन्द द्वारों पर
किसी ने भी
न दस्तक दी
न धीरे से किसी ने भी
पुकारा नाम !
.
प्रौढ़ा दोपहर
प्रत्येक की दैनन्दिनी में
लिख गयी
विश्रान्ति के क्षण ;
मात्र मुझको
ऊब
केवल ऊब !
.
अलसाया शिथिल
अब देखता हूँ
आ रही सन्ध्या
अरुणिमा,
तुम भला क्या दे सकोगी ?
मौन उत्तर था —
‘अँधेरा....
घन अँधेरा !’
.

Friday, May 1, 2009

सुकर : दुष्कर

महेंद्रभटनागर

महज़
दिन बिताना सरल है,
जीना कठिन !
.
ज़िन्दगी को काटना
कितना सहज है,
खण्डित व्यक्तित्व के
धागों
रेशों को
सहेजना
सँवारना
सीना कठिन !
.
केवल
समय-असमय
उगलने को गरल है
पीना कठिन !
महज़
दिन बिताना सरल है
जीना कठिन !