Tuesday, February 21, 2017

ग्रामीण मुस्लिम समाज की कहानियाँ -----अनवर सुहैल

आम  नागरिकों के  मन  में भारतीय मुस्लिम समाज के बारे में कई अजीबोगरीब धारणाएं और भ्रांतियां व्याप्त  हैं.
प्रेमचंद की कहानी 'ईदगाह' के दादी और  हामिद हों या  'पञ्च-परमेश्वर' के अलगू चौधरी और जुम्मन शेख, ऐसे कितने कम मुस्लिम पात्र हैं जिनसे बहुसंख्यक  समाज के छात्र या बच्चे  रूबरू हो  पाते  हैं. इतना कम जानते हैं लोग मुसलमानों के बारे में कि अंजाने में सौजन्यतावश ईद-बकरीद की तरह मुहर्रम की भी मुबारकबाद दे डालते हैं. स्कूली-कक्षाओं  में भी इन  मुस्लिम छात्रों का  कितना कम प्रतिशत होता है. जैसे-जैसे कक्षा बढती है मुस्लिम छात्रों  की  संख्या  घटती  जाती  है. उच्च शिक्षा  में तो  उँगलियों में गिने जा सकते  हैं  मुस्लिम छात्र. हाँ, समाज  में कसाई, दरजी, टायर पंक्चर वाले, ऑटो मेकेनिक, नाई जैसे कामों को करने  वाले  मुस्लिम  पात्रों  से बहुसंख्यक  समाज  मिलता-जुलता है. या फिर जरायम-पेशा कामों  में  लिप्त  होने  के कारण  पुलिस  रिकार्ड  में ये  मुस्लिम  पात्र  मिलते  हैं. इधर विगत कई सालों  से  आतंकवादी या दहशतगर्द  के रूप में भी  मुस्लिम लोग  चर्चा  में  आते  हैं. वर्ना  इनके बारे में  कोई  बात  भी  नहीं  करता.
एक  धारणा  ये  भी  बहुसंख्यकों  के मन  में पुख्ता  है कि  ये  तमाम  मुस्लिम  एक  हैं  और  कांग्रेस के वोट  बैंक  हैं. इस  वोट  बैंक में डाका  डाला  लालू  ने, मुलायम  ने और  बहनजी  ने. ये भी  एक गलत  धारणा  है  कि  जामा मस्जिद के शाही  इमाम को अब  भी अपना धरम-गुरु मानते हैं और हर चुनाव  से पूर्व  शाही इमाम  एक  फतवा ज़ारी  करते हैं जिसे  सारे मुसलमान मानते  हैं.
मीडिया, साहित्य, सिनेमा जैसे जनसुलभ-लोकप्रिय  माध्यम के रहते हुए भी मुसलमान समाज एक एलियन के रूप में ही लोगों के मन-मस्तिष्क में स्थापित है. देश की अधिकांश जनता अपने सम्पूर्ण जीवनकाल में भी इन मुसलमान नागरिकों से परिचित हो नहीं पाती है. इसके बरअक्स ये  भी कहा जा सकता  है कि भारतीय मुस्लिम समाज  खुद को कुछ  इस  तरह एक ऐसे  खोल  में  ढंके  हुए है कि इस  खोल  से  वो  बाहर निकलता नहीं और किसी  दूजे  को  इस  खोल में  प्रवेश की  गरज  नहीं . बेशक  ये  गरज की ही बात  है. किसी  को गरज  नहीं  कि  इस  बंद  से समाज  के  बारे  में  जाने. वैसे  भी  बहुसंख्यक  समाज स्वयंमेव  इतने खांचे  में  विभाजित  है  कि उसकी  जातियां-उपजातियां एक-दूजे  को  ताउम्र  नहीं  जान  पाती हैं तो फिर  मुस्लिम समाज के  बारे  में  तरह-तरह  की  भ्रांतियां  फैलना  लाजिम  है. ये मुसलमानन  बेशक आतंकवादी या देशद्रोही नहीं हैं जो कि देश के गाँव-खेड़े में जीविकोपार्जन करते हैं और दो-जून की किचकिच के बाद फुर्सत के क्षणों में अपने ईष्ट की अराधना करते हैं. इनमें अरब के मुसलमानों की तरह की कट्टर एकेश्वरवादी सोच या दुर्राग्रह  का नितांत अभाव दीखता है. ये नमाज़ और पूजा में सिर्फ पद्धति का भेद जानते हैं. अपने बुजुर्गों, संतों, पीरों-औलियाओं की मजारों पर जाकर ऐसी हाजिरी देते हैं जैसे कि कोई गैर-मुस्लिम हों...जबकि कट्टर सोच के मुसलमान इस तरह कब्र की पूजा या अराधना को हराम कहते हैं. इनमें शिया भी हैं. सुन्नी मुसलमान भी यदि दाढ़ी-टोपी की कवायद करें तो इनमें और अन्य शहरियों में भेद मुश्किल है. बोलचाल, रहन-सहन भी एक जैसा है. गाँव का किसान किसी भी जात या धर्म का हो एक सा दिखलाई देता है. एक सी मुसीबतों का सामना करने को अभिशप्त होता है. लेकिन संख्या के इस खेल में कई ताकतें इन्हें अलगियाने के लिए कृत-संकल्पित रहती हैं और भेद-भाव के नित नए औजारों से सामाजिक एकरसता को छिन्न-भिन्न करती रहती हैं.
फिर भी देश में  बहुत से ऐसे लोग हैं जिनके जीवनकाल में शायद ही कोई मुसलमान व्यक्ति उनके साथ लम्बे समय तक गुजर-बसर किया हो. इतिहास, धर्म और राजनीती के घालमेल में बहुसंख्यकों और मुस्लिमों के बीच खाई बढती जा रही है.
कोई युवक यदि दाढ़ी रखना चाह रहा हो तो उसके दोस्त झट से उसे मियाँ या तालिबानी या आतंकवादी कहने लगते हैं. दाढ़ी, टोपी और ढीला उठंगा पैजामा-कुरता एक ऐसी पोषक का पर्याय है.
 उनकी दृष्टि और सोच में ये जो देश के मुसलमान नागरिक हैं जो किसी बर्बर सभ्यता के पोषक होते हैं और जो किसी भी तरह से अन्य लोगों के बीच  हिलमिल नहीं सकते.
अलीगढ विश्विद्यालय के प्रोफ़ेसर मेराज अहमद के दो  कथा संग्रह 'दावत' और ' घर के घाट के'  मेरे समक्ष है और ये तमाम कहानियाँ मुझसे संवाद कर रही हैं. सभी कहानियों का केंद्र-बिंदु है ये है कि प्रगति और विकास के तमाम दावों के बावजूद मुस्लिम समाज की हैसियत कम से कमतर होती जा रही  है. एक जगह हाशिया होती है लेकिन उसके भी बाहर धकेल दी जा रही है इस  समाज की अस्मिता. मेराज अहमद बड़ी बारीकी से कहानी के परिवेश, पात्र और परिस्थितियों के ज़रिये इन सवालों को उठाते हैं. वे सवाल जिनके लिए बेशक स्वयं मुस्लिम समाज भी ज़िम्मेदार हैं और मुख्यधारा से खुद को काटे रखते हैं.
मेराज अहमद की अधिकाँश कहानियों के विषय इन्ही मुस्लिम पात्रों  के इर्द-गिर्द बिखरे  हुए हैं, जिन्हें वृहत्तर समाज एक समक्ष कथाकार ने लाने का सद्प्रयास किया है. कथा की ये वही धरती है जहां राही मासूम रज़ा आधा-गाँव झलकता है और कहीं अब्दुल बिस्मिल्लाह की झीनी झीनी बीनी चदरिया के आस्थावान बुनकरों की आहें-कराहें और गीत-गुनगुनाहटें सुनाई देती हैं. मेराज अहमद के कथापात्र बेशक अजनबी नहीं हैं लेकिन उनका परिवेश और देश-काल-वातावरण इस तरह  से हिंदी कहानी में एक साथ नहीं दिखलाई देता है. इन कहानियों को किसी प्लाट के रूप में गढा गया नहीं लगता है कोई फार्मूला के तहत  ये कहानियां लिखी गई हैं. ये कहानियां जब हम पढ़ते हैं तो लगता है कि कितना कम हम जानते हैं अपने ही बीच के इन नागरिकों के बारे में...जिनके बारे में बिना किसी उलझन के हम अनायास ही कह देते हैं  कि 'अरे ये तो पाकिस्तानी हैं' या 'बिदेस से धन आता है तभी तो बिना नौकरी-चाकरी के मुर्ग-मुसल्लम उड़ाते हैं मिंयाँ!'
'देशद्रोही' आतंकवादी या फिर म्लेच्छ जैसे तमगे तो जैसे अधिकाँश मुसलमानों को यूँ ही मिल जाते हैं.
मुझे लगता है कि चूँकि मुस्लिमों ने खुद को किसी अदृश्य परदे से अल्गियाये रखा है तो उसका खामियाजा उन्हें ही भुगतना होगा. इस मुस्लिम आबादी में  अधिकाँश उर्दू लिपि लिखना जानते नहीं, अरबी सिर्फ कुरआन को बिना समझे पढने के लिए सीखी है  और हिंदी इतनी कम जानते हैं कि गुज़ारा हो. ऐसे में इनके बीच अलग-अलग मदरसों से तालीम-याफ्ता हाफ़िज़, मौलाना आकर मज़हब की व्याख्या अपने सुख-सुविधा के अनुसार कर देते हैं. देवबंद स्कूल के मौलाना अपने हिसाब से धर्म की व्याख्या करते हैं, बरेली स्कूल के मौलाना अपने तरीके से. इन मौलानाओं की व्याख्याओं के बीच आम मुसलमान कन्फुज़ियाया सा दीखता है. एक कहता है कब्र पर चादर चढ़ाना हराम है जबकि दूसरा तबका कहता है कब्र में मौजूद संत जीवित हैं और उन्हें नई चादर चाहिए ही चाहिए...
एक समय ऐसा आता है कि इन मुसलमानों में आस्था-विश्वास की जंग होने लगती है. ये एक शीत-युद्ध जैसी स्थिति होती है. परिणामतः कस्बों में कई मस्जिदें बन जाती हैं. हर मस्जिद में जुमा की नमाज़  में शौकिया नमाजियों की खासी भीड़ नज़र आती है और सप्ताह के अन्य दिन किसी भी नमाज़ में चार-छः से ज्यादा नमाज़ी नहीं जुटते. हर मस्जिद के इमाम मुसलमानों से अल्लाह की राह में ज्यादा से ज्यादा दान की अपील करते हैं. इन्हीं दान के पैसों से मस्जिद के मीनारों की ऊंचाई बढती है और नमाजियों की संख्या में कमी आती जाती है. इस्लामी जीवन पद्धति को कड़ाई से पालन करना आम इंसान के बस की बात नहीं है. जितना इबादत की जाये वो कम होती है. एक मुसलमान सारी ज़िन्दगी इसी जद्दोजेहद में डूबा रहता है कि अल्लाह के हुक्म की नाफ़रमानी की है और जीते जी जो हो लेकिन मौत के बाद बेशक जहन्नुम की आग में जलना ही होगा. दुनिया की रंगीनी और रोज़मर्रा की उलझनें उसे नमाज़ पढने से रोकती हैं. वो एक पक्का नमाज़ी भले बन पाए लेकिन सच्चा इंसान बनने का प्रयास अवश्य करता है.
जुमा की सामूहिक नमाज़ में जब मौलाना ऐसे मुसलमानों को अपने सामने पंक्तिबद्ध बैठा पाते हैं तो उन्हें जमकर लानत भेजते हैं और ये भी बताते जाते हैं कि दुनिया में  मुसलमानों की ज़िल्लत भरी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा कारण है नमाज़ से दूरी. बावजूद इसके जुमा की नमाज़ पढ़कर सरपट भागे मुसलमान अगले जुमा को ही मस्जिद में पुनः लानत-मलामत सुनने इकट्ठा होते हैं. जुमा के अलावा अन्य दिनों में नमाजियों की संख्या बेहद कम होती है. इन मुसलमानों के बच्चे स्कूल जाने से पहले अरबी की तालीम मस्जिद या मदरसों में पाते हैं और स्कूल जाने लगते हैं तो मदरसे छूट जाते हैं. इन मदरसों के मौलाना बहुत कम पगार में दीन-इस्लाम की शिक्षा देते हैं और अमूमन झाड-फूंक, दुवा-तावीज़ जैसे अमल करके आजीविका चलाते हैं. ऐसे इलाके जहां मुस्लिमों की घनी आबादी हो वहां के लोग जातीय और धार्मिक पहचान को बरकरार रखते हैं और तीज-त्योहारों में इसीलिए इन इलाकों को 'मिनी पाकिस्तान' के नाम से बहुसंख्यक पुकारा करते हैं. लेकिन जहाँ मुस्लिम गिने-चुने होते हैं वहां वे बहुसख्यकों की वेशभूषा, लबो-लहजा धारण कर लेते हैं. मुस्लिम और गैर-मुस्लिम के बीच कोई बाहरी भेद या भिन्नता आसानी से पकड़ में नहीं आती. हिन्दू-मुस्लमान वैसे तो एक-दूजे के पूरक हैं लेकिन फासीवाद जब बढ़ता है तब आतंकवाद भी खूब पनपता है. अब ये बहस का मुद्दा हो सकता है कि फासीवाद पहले या आतंकवाद पहले. ये दोनों सिफत मिलकर इंसानियत और अमन का गला घोंटती रहती हैं.
मेराज अहमद के दोनों कथा-संग्रह की कहानियाँ पढने के बाद यही महसूस होता है कि ये कहानियां इसलिए ज़रूरी हैं कि इनमें बीस प्रतिशत की आबादी वाले मुस्लिम समाज की मनोदशा और परिस्थितियों की ज़बरदस्त पड़ताल है. कथाकार की चिंता में भारत की साझा संस्कृति के झिलमिलाते इतिहास को अक्षुण बनाये रखने चाहत है.  विभिन्नता में एकता का जो सूत्र भारत की पहचान है उसे बचाए रखने के लिए कथाकार परेशान दीखता है.
'पहचान' कहानी के आज़ाद-ख़याल, बिंदास अख्तर साहब की मानसिक संरचना को उकेरा गया है. अख्तर साहब दीनदार मुस्लमान के साथ भारतीयता की मिश्रित सभ्यता की मिसाल थे. उनकी पत्नी भी बुर्कानशीं होकर साडी जैसे कपड़े पसंद करती थीं. सिविल सर्विस से रिटायर होकर शानदार जीवन गुज़ार रहे थे. अल काएदा, लादेन, आईसिस, मंडल-कमंडल जैसे देशी-विदेशी मसलों की जुगाली मीडिया और समाज में देख-सुनकर अख्तर साहब इस कद्र भयभीत या यूँ कहें कि पज़ल्ड हो जाते हैं कि रिटायर्मेंट के बाद चेहरे पर उगाई दाढ़ी को कुतर डालते हैं.  अपनी जातीय या मजहबी पहचान से इंसान को मुहब्बत होती है और उम्र के अंतिम पडाव में अख्तर साहब को किन दुश्चिंताओं ने घेरा कि उन्हें ये निर्णय लेना पड़ा होगा. बहुसंख्यक समाज को कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई दाढ़ी क्यों नहीं रख रहा और क्यों हटा  दे रहा है. लेकिन कथाकार को तो सोचना पड़ता है कि लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष देश में ऐसी भयावह  स्थितियां क्योंकर निर्मित हो रही हैं. ऐसे कौन से कारक तत्व हैं जो नागरिकों को संविधान प्रदत्त सुविधाओं से वन्चित करने पर बाध्य करते हैं.
ऐसा नहीं है  या  ऐसे अन्य  मुद्दे  हैं  जिनसे  सिर्फ मुस्लिम समाज  ही  जूझ रहा है, बल्कि ऐसे ही मिलते-जुलते मुद्दों से देश का दलित समुदाय, स्त्रियाँ और अन्य जातीय अल्पसंख्यक जूझ रहे हैं.
सिविल सर्विस में कई तरह की जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए अख्तर साहब कभी कट्टर मुसलमान नहीं थे. वे तो नमाज़ी ही बन पाए थे और पाक-परहेजगार मुसलमान. नौकरी की मसरूफियात ने उन्हें और उनके परिवार को कभी सोचने समझने का अवसर ही दिया कि वे इस्लामी रीति-रिवाजों और धार्मिक पहचान की चीजों का पालन करें. वैसे भी दुनिया के तमाम  मुसलमानों के रहन-सहन को देखें तो ये ज़रूरी नहीं लगता कि एक ख़ास किस्म की वेशभूषा और चेहरा-मोहरा धारण करने से ही मुसलमान बने रहने का तमगा मिलेगा. दुनिया में अपनी ज़रूरतों के मुताबिक इन्सान वेशभूषा और अन्य चीजों को धारण करता है तभी तो इस्लाम एक युनिवर्सल मजहब बने रह सकता है. यदि अरबियन वेशभूषा ही अनिवार्य कर दी जाए तो कितना कठिन होगा रोज़मर्रा के काम करना. हुनरमंद इंसान काम के हिसाब से अपनी वेशभूषा तय करता है कि मजहब या जात के अनुसार!
रिटायर्मेंट के बाद जब कार्यालयीन काम से छुट्टी मिली तो अख्तर साहब कुरता-पजामा टोपी पहनने लगे, नमाज़ पढने लगे और दाढ़ी भी रख ली.  इस दाढ़ी ने अख्तर साहब के स्वतंत्रचेता मित्रों की कलई खोल दी.
अख्तर साहब के दोस्त नित्यानंद जी ने जब ये कहा---'भाई अख्तर साहिब, मुझे तो हर दाढ़ी वाला तालिबानी लगता है.' 
अख्तर साहब उस दिन घर लौटे तो आईने में देर तक खुद को निहारते रहे. ---'उनका आईने वाला चेहरा अलग अलग शक्लों में तब्दील हो रहा है. आईने में कभी ओसामा बिन लादेन, कभी अल-जवाहिरी, कभी मौलाना अज़हर की शक्लें उभरने लगीं.'
ये डर है जो कथा को एक नई ऊंचाई देता है और देश के नीति-नियंताओं के समक्ष प्रश्न खड़े करता है. ये डर दुनिया के तमाम मुल्कों में बसे से  प्रत्येक मुसलमान के मन के स्थाई रूप  से घर बना  चुका है.
दो कथा संग्रह और कुल तेईस कहानियां. मेराज अहमद की कहानियों में ऐसा नहीं कि सिर्फ भारतीय मुस्लिम समाज की विसंगतियों को विषय बनाया  गया  है. मेराज अहमद की  कहानियों  में मुस्लिम  का समाज का दर्द तो है ही साथ ही भारतीय ग्रामीण कृषक समाज की व्यथा को भी स्वर देने का विनम्र प्रयास  है. अब हो सकता है कि कृषक या ग्रामीण सुखदेव हो या सुलेमान. मेराज अहमद की कहानियों में उत्तरप्रदेश के ग्रामीण समाज की सरल  बुनावट और जातीयता की जटिल पेचिदिगियाँ आसानी से उद्घाटित होती हैं. जाने क्यों इन कहानियों की चर्चा नहीं हुई. प्रतीक्षा, सुरसत्ती, मेरा घर कहाँ है, सम्बन्ध, कम्मो, मर्जाद, अपना परिवार, चौराहे का आदमी ऐसी कहानियां हैं जिनमे उत्तरप्रदेश के जनपदीय जीवन का खाका उपस्थित है. इन कहानियों के पात्र और परिवेश गैर-मुस्लिम समाज से हैं और मेराज अहमद इन कहानियों के कारण सिर्फ अल्पसंख्यक या मुस्लिम परिवेश के कथाकार होने से बचाने के लिए काफी हैं. मेराज अहमद की जनपदीय और ग्रामीण जनजीवन, उनके रस्मो-रिवाज़, रहन-सहन, सामाजिक विसंगतियां और मानसिक सोचो-फ़िक्र को रेणु की भाषा और शैली में प्रस्तुत करते हैं. अवधी भावभूमि की अपनी रंगत है और अपना अलग टेक्सचर है. मुहावरेदार भाषा-शैली, छोटे-छोटे वाक्य और निरन्तर कथा-प्रवाह से सजी इन कहानियों का अलग टेस्ट है और बेशक हिंदी कथा साहित्य में इन कहानियों की भी चर्चा होनी चाहिए. इन कहानियों के पात्र हमारे बहुसंख्यक समाज के वे पात्र हैं जो दैनिक जीवन की उलझनों से हताश तो होते हैं लेकिन जिनकी जीवट इच्छा-शक्ति उन्हें उत्सवों से भी जोड़े रखती है. परम्परा का निर्वाह करने में ये पात्र तनिक भी नहीं चूकते और शहरी सामाजिक क्रूरता और असहिष्णुता से खुद को बचाए रखने के लिए कृत-संकल्पित रहते हैं. इन कहानियों की भी चर्चा करता लेकिन मेरा उद्देश्य मेराज अहमद की वे कहानियां हैं जिनमें भारतीय मुस्लिम समाज के द्वन्द को लेखक ने उभारा है.
कथा 'दावत' उन आदतन ज़रायम पेशा मुस्लिमों की दास्तान है जो परिस्थितिवश अपराध करते हैं और फिर उस अपराध के दंड से बचने के नूतन प्रयत्न करते हैं. स्थानीय नेता वो चाहे जिस जात के हों इन आदतन अपराधियों को प्रश्रय देते हैं. तभी तो छोटे खां कहते हैं कि--'यक़ीनन मामले को सुलटाकर निहोर भाई ने भैया के अहसान का हक अदा कर दिया.'
उत्तर-प्रदेश की विकट जातीय संरचना में मौजूद ये ग्रामीण मुस्लिम अपराधी पात्र कितने खुदगर्ज हैं इसे इस संवाद से समझा जा सकता है--'चाहे रईस नेता हो, चाहे निहोर चमार. सबका मकसद एक! माल उडाओ और मौज मनाओ!'
असंवेदनशील सामाजिक मनोदशा के लिए ज़िम्मेदार घटक कौन हो सकते हैं? बेशक, स्वयं इंसान और उनके बीच दलाल किस्म के नेता. इन सबके ताल-मेल से उपजती है कहानी 'दावत'.
' घर के घाट के' का असद ग्रामीण संस्कारों से कटकर जिस तरहइ  शहरी जीवन की नकली चमक-दमक का शिकार होता है कि उसके अन्दर की मासूमियत और दोस्ती के बीज अंकुरित होने से पहले मर जाते हैं.
स्त्रियों के प्रति हमारा परिवेश कितना क्रूर है और उनकी उपस्थिति को अपमानित करने का मौका चूकना नहीं चाहता है. 'चिड़िया फुर्र' कहानी ये सिद्ध करती है कि धर्म कोई हो, जाति कोई हो स्त्रियाँ अपमानित होती रहती हैं और उन्हें एक सीमित खांचे में बांधे रखने की साजिशें समानांतर चलती रहती हैं. मर्द जब हार मानता है तब स्त्री पर चारित्रिक हमला जैसे किसी परमाणु बम के विस्फोट की तरह होता है---
'सीधे कहो तुम्हारे गाँव की सभी औरतें आवारा हैं.'
'तुम ये भी कहोगे कि मैं भी वैसी हूँ.'
'चुप हो जा इसी में तेरी भलाई है.'
'नहीं तो क्या कर लोगे?'
'देखोगी?'
'दिखाओ.'
मुन्ताज ने उसके बाल पकड़ कर चट चट दो चांटे जड़ दिए.
ये है मेराज अहमद का कथा-प्रवाह और संतुलित संवाद. ऐसे ट्रीटमेंट लगभग सभी कहानियों की विशेषता हैं.
मुस्लिम समाज में स्त्रियों की अशिक्षा, रूढ़िवादिता, आर्थिक विपन्नता से उत्पन्न कदम कदम पर अपमान, यातना और सजाएं मेराज अहमद की कहानियों का मूल स्वर है. मेराज अहमद अपनी कहानियों में उन कारणों को खोजते हैं जिनकी वजह से समाज में स्त्रियों की ये दशा है. मुल्ला-मौलवियों और तांत्रिकों की मौजूदगी में इस समाज की औरतें नित प्रताड़ित होती हैं और जीते जी जहन्नम के अज़ाब झेलती हैं.
अंततोगत्वा मेराज अहमद के दोनों कथा संग्रह हिंदी कथा-साहित्य को समृद्ध करने में सहायक सिद्ध होंगे.

समीक्ष्य संग्रह :     1- दावत  (पृष्ठ :132)   मूल्य : 140/-
                                 2- घर के घाट के (पृष्ठ : 120) मूल्य : 140/-
प्रकाशक  : वांग्मय बुक्स
                   205-ओहद रेजिडेंसी, मिल्लत कालोनी, दोदपुर रोड, अलीगढ़ 202002
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