Skip to main content

राही मासूम रजा और आधा गाँव

राही मासूम रजा और आधा गाँव


- प्रो० जोहरा अफ़जल


राही मासूम रजा एक ऐसे आधुनिक रचनाकार थे जिनकी रचनाओं का मुख्य विषय राजनीति है। चाहे वह उनका उपन्यास हो, कहानी हो, कविता हो अथवा निबन्ध। उनकी सभी रचनाओं में समय की अनुगूँज सुनाई देती है। राही के उपन्यासों में आधा गाँव टोपी शुक्ला, हिम्मत जौनपुरी, ओस की बूँद,सीन ७५, दिल एक सादा कागज,कटरा बी आरजू, असन्तोष के दिन और नीम का पेड़ में से सबसे
अधिक चर्चित उपन्यास आधा गाँव है। राही ने इस उपन्यास में गंगौली गाँव की वास्तविक कथा के माध्यम से १९३७ से १९५२ तक के समय के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक यथार्थ और उसकी परिवर्तनशील स्थितियों का वितान रचा है।
राही का यह उपन्यास हिन्दी के महत्त्वपूर्ण उपन्यासों में से एक है। आधा गाँव आधुनिक भारतीय समाज के विभिन्न विषयों को समेटे हुए है। लेखक ने उत्तर प्रदेश के एक गाँव गंगौली के आधे टुकड़े को ही अपना कथा क्षेत्र बनाया है, जिसका वह स्वयं भोगता एवं जानकार है। हिन्दी उपन्यास जगत्‌ में शायद पहली बार मुस्लिम जनजीवन का यथार्थ अपने विविध रंगों में उसकी अच्छी और बुरी परछाइयों को लेकर प्रस्तुत हुआ है, जिसने निश्चित रूप से भारतीय जीवन का एक और पहलू उजागर किया है।
राही अपने गाँव गंगौली से, वहाँ के लोगों से वहाँ के कण-कण से प्यार करते हैं। उपन्यास को पढ़ने पर पता चलता है कि राही गंगौली की मिट्टी की गन्ध में, कीचड़ और गोबर में, गाय और बैलों में, प्राकृतिक शोभा में उतने ही रमते हैं जितने गंगौली के लोगों में। राही भारत की परम्परागत साझा संस्कृति और विरासत के प्रबल समर्थक थे। वे धर्म की राजनीति करने वालों के सदैव विरोधी रहे। उन्होंने आधा गाँव में यह साफ़ कर दिया कि धर्म किसी राष्ट्र की स्थापना का आधार नहीं हो सकता। धर्म और राजनीति का रिश्ता तेल और पानी जैसा है। यदि भारत में
धर्म को राजनीति से जोड़कर सत्ता प्राप्त करने की चेष्टा की गई तो इसके भयानक परिणाम होंगे। राही ने धर्म और जाति की राजनीति करने वालों की कड़ी आलोचना की है। वह हर तरह की संकीर्णता और कट्टरता के सख्त विरोधी रहे, जीवन भर एक सही भारतीयता हिन्दुस्तानियत की खोज करते रहे।
आधा गाँव की कथा गंगौली गाँव के शिया मुसलमानों के परिवारों की है जहाँ अन्य जाति और धर्म के लोग भी रहते हैं। राही ने इसे आंधे गांव की कहानी कहा है पर यदि इसकी गहराई में जाकर देखें तो यह आधे की नहीं, सारे गांव की कहानी है बल्कि यदि पूरे भारत की कहानी कहा जाय तो अनुचित न होगा।
राही ने अपने लगभग सभी उपन्यासों में आने वाले नये समाज की प्रवृत्तियों को पहचाना और अपने लेखन का विषय बनाया तथा उन तमाम समस्याओं का भी चित्रण किया हैं। लेखक आधा गाँव में सपरिवार स्वयं मौजूद रहता है और कहानी का आरंभ भी उसने अपने बचपन से ही किया है। बाल्यावस्था में न समझ आने वाली बातें जिन्हें आज वह खूब समझाता है उनका चित्रण करने में उसे कोई संकोच नहीं होता। आधा गाँव में मध्यवर्गीय जीवन और उस समाज में व्याप्त अनेक विसंगतियों एवं समस्याओं को उकेरा गया है।
आधा गाँव एक आँचलिक उपन्यास है पर इसमें कोई एक कथा नहीं है। राही विभिन्न पात्रों के साथ उनकी अलग-अलग कथा लेकर चलते हैं किन्तु विभिन्न पात्रों तथा इन पात्रों की कहानियों में विभिन्नता होते हुए भी ये एक सुर में बँधे हुए हैं तथा कथानक में कहीं भी शिथिलता दिखाई नहीं देती। जिस समय में इस उपन्यास की रचना हुई और जिस समय की यह कथा है, उस समय शिक्षा की दृष्टि से देश पिछड़ा हुआ था। नवयुवकों को रोजी-रोटी की तलाश में अपना घर छोड़ना पड़ता था। राही ने आधा गाँव के माध्यम से अनेक प्रश्न पाठक के सम्मुख रखे हैं, ऐसा करने के लिए उन्होंने काल्पनिक पात्रों एवं कथाओं का आश्रय लिया है।
पाकिस्तान के निर्माण के प्रश्न को गंगौली गाँव के हर व्यक्ति की मानसिकता से जोड़ कर सोचने और उस पर विचार करने पर राही ने विवश किया है। गाँव में किसी को भी पाकिस्तान से सहानुभूति नहीं है। गंगौली के मुसलमानों के स्वतन्त्रता से पूर्व खुशहाल जीवन और स्वतन्त्रता के पश्चात्‌ की दयनीय स्थिति का बड़ा ही मार्मिक चित्रण किया है, राही ने। उन्होंने मुस्लिम लीग की राजनीति को नहीं स्वीकारा, भारत-पाक के सिद्धान्त को स्वीकार नहीं किया, पर इसका जो सामाजिक प्रभाव पड़ा उसका अत्यन्त सजीव चित्र प्रस्तुत किया। ÷मुस्लिम लीग' की राजनीति पर जितना सशक्त प्रहार राही ने किया उतना अन्य किसी लेखक की रचना में दिखाई नहीं देता।
भारत और पाकिस्तान का बटवारा राजनीतिक ही नहीं सामाजिक एवं सांस्कृतिक त्रासदी भी है। गंगौली जैसे गाँव के मुसलमान मुस्लिम लीग को वोट देने के बाद भी पाकिस्तान नहीं गये। मिगदाद तो पाकिस्तान जाने से साफ़ इन्कार कर देती है-हम ना जाए वाले हैं कहीं ! जायें ऊ लोग जिन्हें हल-बैल से शरम आती है। हम त किसान है, तन्नू भाई। जहाँ हमरा खेत, हमरी जमीन -वहाँ हम...... 1 तन्नू पाकिस्तान का विरोध करते हुए कहता है - नफ़रत और खैफ़ की बुनियाद पर बनने वाली कोई चीज+ मुबारक नहीं हो सकती ...२
आधा गाँव में समाज के दो रूपों के यथार्थ को राही ने बड़ी बेबाकी से दर्शाया है -एक भारत विभाजन से पूर्व का समाज और फ़िर विभाजन के बाद का। पाकिस्तान बनने की मांग से पूर्व गंगौली गाँव के हिन्दू तथा मुसलमान आपस में सौहार्द पूर्वक रहते थे, भले ही वे दूसरे के यहां खाने-पीने से परहेज करते थे पर मन में कोई नफ़रत या मन मुटाव न था। मुसलमान दशहरा के लिए चन्दा देने में पीछे न रहते। जहीर मियाँ ने मठ के बाबा को पाँच बीघे जमीन माफ़ कर दी, फुन्नन मियाँ ने भी मन्दिर बनवाने के लिए ज+मीन दी थी। ऐसे मुसलमान परेशान थे, सोचने में असमर्थ कि अचानक मुसलमानों के लिए अलग देश की आवश्यकता क्यों पड़ गई। उनके सम्मुख एक बहुत बड़ा प्रश्न देश के बटवारे को लेकर उठ खड़ा हुआ। राही धर्म के नाम पर देश को या देशवासियों को बांटने के पक्ष में नहीं थे। उन्हीं के शब्दों में मैंने दंगों पर रोना बन्द कर दिये है क्योंकि मुझे लाशों को धर्मों के आधार पर बाँटने की कला नहीं आती। मैं केवल यह देखता हूँ कि नागरिक मरा पड़ा है। एक बाप, एक भाई, एक पति, एक माँ, एक बहन, एक बेटी, एक परिवार भरा पड़ा है। घर, हिन्दू या मुसलमान या सिख, हरिजन, या ब्राह्मण नहीं होते। घर तो घर होते हैं।''३
उनकी यहीं भावना आधा गाँव में स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। राही साम्प्रदायिकता के विरु( एक आदर्शवादी उपन्यासकार की भाँति अपनी भूमिका निभाना नहीं भूले। उन्हें विश्वास है कि भारत में हिन्दूओं का राज हो जाने पर मुसलमानों पर कोई आपत्ति नहीं आयेगी। यही बात वह आधा गाँव' के पात्र फुन्नन मियाँ के मुख से कहलाते हैं- हां-हां, त हुए बा। तू त ऐसा हिन्दु कहि रहियों जैसे हिन्दु सब भुकाऊ है कि काटलीयन। अरे ठाकुर कुंवरपाल सिंह त हिन्दू रहे। झगुरियों हिन्दु है। ऐ भाई, ओ परसरमुवा हिन्दुए न है कि जब शहर में सुन्नी लोग हरमजदगी कीहन कि हम हजरत अली का ताबूत न उठे देंगे, काहे को कि ऊ शिया लोग और तबर्रा पढ़त हएं, त परसरमुवा ऊधम मचा दीहन कि ई ताबूत उट्ठी और ऊं ताबूत उट्ठा। तेरे जिन्ना साहब हमरो ताबूत उठाये न आये।'यह बात राही ने एक साधारण व्यक्ति के मुख से कहलाकर सिद्ध करने का प्रयास किया है कि साम्प्रदायिक दंगे-फ़साद तो पढ़े-लिखे, शिक्षित राजनेताओं का काम है साधारण जन को इसमें कोई रुचि नहीं।
जिस प्रकार मेरी गंज आंचल के उपेक्षित जीवन को उसकी समस्त कुरूपता को मानवीय स्तर पर फणीश्र्वरनाथ रेणु ने मैला आँचल में चित्रित किया है उसी प्रकार राही मासूम रजा ने पहली बार अपने ही गाँव गंगैली के शिया मुसलमानों की सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक समस्याओं का बड़ा ही मार्मिक चित्र आधा गाँव' में प्रस्तुत किया हैं जितना यथार्थ चित्र राही ने मुसलमानों का किया है उतना इससे पहले हिन्दी उपन्यासों में कहीं देखने को नहीं मिलता।
आधा गाँव में स्वतन्त्रता से पूर्व और बाद के गंगौली गाँव का चित्रण है जो उस समय का जीता जागता प्रमाण है - जहाँ स्वार्थी अैर पद्लोलुप नेताओं का अत्यन्त घिनौना रूप दिखाया गया है। उस समय सम्पूर्ण भारत ऐसी ही विसंगतियों का शिकार था। राही ने बड़ी ही संवेदनशीलता के साथ इस तथ्य को उजागर करने का प्रयास किया है। जातिवाद का आधार लेकर जो राजनीति की जाती है उससे समाज का हित कभी नहीं हो सकता। वह एक प्रगतिशील यथार्थवादी साहित्यकार थे, इसीलिए उनके उपन्यास आधा गाँव में सामाजिक यथार्थ का रंग चटख है।
आधा गाँव में जो कुछ भी घटित होता दिखाया गया है वे घटनाएं केवल गंगौली गाँव की नहीं थी बल्कि पूरे भारत में ऐसी ही स्थिति थी। राही का आधा गाँव उपन्यास बहु आयामी उपन्यास है। कोई भी विषय ऐसा नहीं जो इनकी दृष्टि से अछूता रह गया हो। पाकिस्तान का निर्माण देश का विभाजन इस उपन्यास की केन्द्रीय वस्तु नहीं है फिर भी वह केन्द्रीय वस्तु से इतनी जुड़ी हुई है कि उससे अलगाने में कठिनाई होती है। इस उपन्यास की केन्द्रीय वस्तु है समय की गति। समय ही आधा गाँव का नायक है। राही के अनुसार - यह कहानी न कुछ लोगों की है, न कुछ परिवारों की। यह उस गाँव की कहानी भी नहीं है जिसमें इस कहानी के भले बुरे पात्र अपने को पूर्ण बनाने का प्रयत्न कर रहे है। यह कहानी न धार्मिक है न राजनीतिक, क्योंकि समय न धार्मिक होता है न राजनीतिक और यह कहानी है समय की ही। यह गंगौली में गुजरने वाले समय की कहानी है। कई बूढ़े मर गये, कई जवान कई बच्चे जवान हो गये .... यह कहानी है उन खण्डहरों की जहाँ कभी मकान थे और यह कहानी उन मकानों की जो खण्डहरो पर बनाये गये हैं।४
यह उपन्यास जहाँ एक ओर अभिजात्य मुस्लिम समाज का चित्र प्रस्तुत करता है वहीं दूसरी ओर आजादी के बाद भारत में तेजी से होने वाले परिवर्तनों को भी रेखांकित करता है। राही मासूम रजा एक ऐसे कथाकार हैं जिन्होंने बड़ी निर्भीकता से राजनीति पर कड़ा प्रहार किया है। इन्होंने बिना किसी झिझक और भय के यथार्थ को अपने साहित्य में दर्शाया है। उनकी इसी निर्भीकता, निडरता और सच्चाई को देखकर धर्मवीर भारती यह कहने पर विवश हुए- अगर मैं ईश्वर पर विश्वास करता होता तो ऐसे क्षण में यही प्रार्थना करता कि प्रभु इस दुस्साहसी की सेवा करना। क्योंकि इसकी सच्ची आवाज में तुम ही बसते हो। मगर किससे प्रार्थना करूँ, अगर ईश्र्वर है तो ये समाज में व्याप्त मिथ्या के खतरनाक व्यूह भी तो उसी की वजह से होगें।५
राही ने अपने सभी उपन्यासों - आधा गाँव, टोपी शुक्ला', ओस की बूँद', हिम्मत जौनपुरी', असन्तोष के दिन, कटरा बी आरजू एवं दिल एक सादा कागज में समाज में व्याप्त समस्त जटिल समस्याओं का चित्रण किया है। जिनमें सबसे बड़ी समस्या है व्यक्ति और समाज की असमानता। वे मानते हैं कि सारी समस्याओं के पीछे व्यक्ति का अपना स्वार्थ होता है। उनके अनुसार जब तक मनुष्य के भीतर ये स्वार्थ रहेंगे तब तक इन समस्याओं से पीछा नहीं छूट सकता। ÷आधा गाँव' में व्यक्ति की इसी समस्या को बड़े सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया है राही ने।
हिन्दुओं की तरह मुसलमानों में भी कई प्रकार के सामाजिक भेद हैं। हड्डी की शुद्धता, रक्त की शुद्धता पर भी बहुत जोर दिया जाता है। आर्थिक रूप से चाहे व्यक्ति कितना भी सम्पन्न हो पर यदि उसकी हड्डी में दाग़ है तो उसे समाज में वह स्थान कभी नहीं मिल सकता जो शुद्ध हड्डी वाले निर्धन व्यक्ति को मिलता है। अशरफुल्ला खाँ को अपने पठान होने पर गर्व है -हम ठहरे पठान लोग। हमारे यहाँ तो दोस्ती और दुश्मनी के अलावा कोई और पैमाना ही नहीं होता। दोगली हरकतें करना शेखों और नीच जात वालों का काम है।''६ सैफुनिया से विवाह करने के पश्चात्‌ मिगदाद अपने पिता की खरी हड्डी का चैलेंज करते हुए कहता है बाकी हम्में त इहो मालूम है कि हमहूं सैय्यद ना है। बाकी जना रहा कि अब्बा ई बतिया बिल्कुल ही भूल गये हैं। ऊ त इकद्म्मे से सैय्यद हो गये हैं। और अब त जब से लड़के अब्बा की शेरवानी पा गये हैं तब से अउरो मारे इतराए लगे हैं।७ युवा पीढ़ी में अपने बड़ों के प्रति आदर की भावना कम होती दिखाई दे रही है। गंगौली गाँव में आये दिन पिता-पुत्र, सास-बहू के झगड़े होते रहते हैं। हर परिवार की यही कहानी है।
गंगौली में शिया मुसलमानों के अतिरिक्त राकी मुसलमानों और जुलाहों के घर भी हैं पर उनके साथ शिया लोगों का मेलजोल नहीं है। इस उपन्यास में ऐसे भी चित्र है जिनमें शिया पुरुष हिन्दुओं-भंगी या चमार जाति की स्थितियों से सम्बन्ध रखते है, परन्तु शुद्धता का ऐसा आड्म्बर है कि हिन्दू मरीज की नब्ज देखने के बाद हकीम साहब स्नान करते दिखते हैं। राही ने अपने आधा गाँव में सामाजिक जीवन के जिस पक्ष को अधिक उभारा है वह यही, पुरुषों का नीच जाति की स्थितियों के साथ अनैतिक यौन सम्बन्ध है। मोहर्रम के चाँद के दिखते ही शिया लोगों की शोक सभाएं शुरू हो जाती हैं। इसी प्रकार की एक सभा में सितारा और अब्बास एक दूसरे पर मोहित हो जाते हैं। अब्बास अलीगढ़ मुस्लिम विश्र्वविद्यालय का छात्र है अल्हड़ सितारा के साथ शारीरिक सम्बन्ध स्थापित कर उसे भूल जाता है। प्रेम का परिणाम केवल सितारा को ही भुगतना पड़ता है। नारी की स्थिति का अत्यंत सजीव चित्र राही ने इस उपन्यास में प्रस्तुत किया है। स्त्री-पुरुष के अनैतिक सम्बन्धों को भी आधा गाँव में खुलकर दिखाया गया है। सभी पात्र शरीर के भूखे हैं। उन्हें बस शरीर मिलना चाहिए चाहे वह शरीर रिश्ते की बहन का हो, नौकरानी का हो या फिर किसी भी नीच जात का। राही ने परिवारों की, समाज की इन्हीं छोटी-छोटी समस्याओं को एक बड़ी समस्या बनाकर प्रस्तुत किया है। इन्होंने साम्प्रदायिक विभीषिका का चित्रण जितने साहस पूर्ण ढंग से किया है, शायद ही कोई अन्य इतने साहस का प्रदर्शन कर सकें।
इसमें सन्देह नहीं कि साठोत्तरी उपन्यासकारों में राही एक निराला व्यक्तित्व रखते है, जिनमें विद्रोह कूट-कूट कर भरा है। उनके उपन्यासों में नए पुराने द्वन्द्व की नई भंगिमाएं दृष्टिगोचर होती है। आजादी के बाद एक नया नेतृत्व वर्ग विकसित हुआ। इस नये वर्ग के उदय के पीछे कोई परम्परा नहीं, शिक्षा नहीं, सम्पन्नता नहीं। यदि कुछ है तो वह है वोटों का जोड़-तोड़। वोटों का यह जोड़-तोड़ समाज के एक साधारण व्यक्ति को समाज का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सदस्य बना देता है। वह व्यक्ति खुद ही सरकार होता है और सरकार और जनता के बीच सेठ भी। आधा गाँव में एक स्वर जो लगातार सुनाई देता हैं, वह है मुसलमानों का देश प्रेम। वे भी इसी देश का, राष्ट्र का एक हिसा हैं। वे भी अपने घर, अपने गाँव और देश की मिट्टी से उतना ही प्रेम करते हैं जितना अन्य जाति के लोग या देशभक्त को हो सकता है। राही ने भारतीय मुसलमानों की व्यथा और कथा को बहुत ही प्रभावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया है।
राही मासूम रजा ने अपने उपन्यास आधा गाँव में व्यक्त समस्याओं का कोई समाधान प्रस्तुत नहीं किया है। वह चाहते थे कि पाठक स्वयं उचित और अनुचित का निर्णय करे। उन्होंने तो केवल अपने उपन्यास द्वारा मानव मन की कोमल एवं पवित्र भावनाओं को उजागर करके सत्य एवं सद्वृत्तियों को जाग्रत करने का प्रयास किया है। वे एक साहित्यकार थे जिन्होंने कथा साहित्य के क्षेत्र में एक नये क्षितिज की खोज की और हमें एक ऐसे संसार में परिचित कराया जिसे हम गहराई से नहीं जानते थे। उनके तेवरों को शब्दों में नहीं ढाला जा सकता।




सन्दर्भ-सूची


१. राही मासूम रजा, आधा गाँव, पृ० २२६
२. वही, पृ० २६३
३. राही मासूम रजा, लगता है बेकार गये हम, पृ० २२६
४. आधा गाँव, पृ० ११-१२
५. राही मासूम रजा, मैं एक फेरीवाला, भूमिका से, पृ० ९
६. आधा गांव, पृ० १०३
७. वही, पृ० २२६
यह आलेख राही मासूम रज़ा विशेषांक में भी पढ़ सकते है.

Comments

सुनीता said…
राही मासूम राजा....आधा गांव...कई सालो पहले पढ़ा था पर आज इसका ये सार पढ़कर पूरी कहानी सामने आगई और दिल फिर एक बार फुन्नन मियां को याद कर गया....आधा गांव को फिर पढ़ा जाए

Popular posts from this blog

साक्षात्कार

प्रो. रमेश जैन
साक्षात्कार जनसंचार का अनिवार्य अंग है। प्रत्येक जनसंचारकर्मी को समाचार से संबद्ध व्यक्तियों का साक्षात्कार लेना आना चाहिए, चाहे वह टेलीविजन-रेडियो का प्रतिनिधि हो, किसी पत्र-पत्रिका का संपादक, उपसंपादक, संवाददाता। साक्षात्कार लेना एक कला है। इस विधा को जनसंचारकर्मियों के अतिरिक्त साहित्यकारों ने भी अपनाया है। विश्व के प्रत्येक क्षेत्र में, हर भाषा में साक्षात्कार लिए जाते हैं। पत्र-पत्रिका, आकाशवाणी, दूरदर्शन, टेलीविजन के अन्य चैनलों में साक्षात्कार देखे जा सकते हैं। फोन, ई-मेल, इंटरनेट और फैक्स के माध्यम से विश्व के किसी भी स्थान से साक्षात्कार लिया जा सकता है। अंतरिक्ष में संपर्क स्थापित कर सकते हैं। पहली बार पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी ने अंतरिक्ष यात्री कैप्टन राकेश शर्मा से संवाद किया था, जिसे दूरदर्शन ने प्रसारित किया था। इस विधा का दिन पर दिन प्रचलन बढ़ता जा रहा है।
मनुष्य में दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ होती हैं। एक तो यह कि वह दूसरों के विषय में सब कुछ जान लेना चाहता है और दूसरी यह कि वह अपने विषय में या अपने विचार दूसरों को बता देना चाहता है। अपने अनुभ…

समकालीन साहित्य में स्त्री विमर्श

जया सिंह


औरतों की चुप्पी सदियों और युगों से चली आ रही है। इसलिए जब भी औरत बोलती है तो शास्त्र, अनुशासन व समाज उस पर आक्रमण करके उसे खामोश कर देते है। अगर हम स्त्री-पुरुष की तुलना करें तो बचपन से ही समाज में पुरुष का महत्त्व स्त्री से ज्यादा होता है। हमारा समाज स्त्री-पुरुष में भेद करता है।
स्त्री विमर्श जिसे आज देह विमर्श का पर्याय मान लिया गया है। ऐसा लगता है कि स्त्री की सामाजिक स्थिति के केन्द्र में उसकी दैहिक संरचना ही है। उसकी दैहिकता को शील, चरित्रा और नैतिकता के साथ जोड़ा गया किन्तु यह नैतिकता एक पक्षीय है। नैतिकता की यह परिभाषा स्त्रिायों के लिए है पुरुषों के लिए नहीं। एंगिल्स की पुस्तक ÷÷द ओरिजन ऑव फेमिली प्राइवेट प्रापर्टी' के अनुसार दृष्टि के प्रारम्भ से ही पुरुष सत्ता स्त्राी की चेतना और उसकी गति को बाधित करती रही है। दरअसल सारा विधान ही इसी से निमित्त बनाया गया है, इतिहास गवाह है सारे विश्व में पुरुषतंत्रा, स्त्राी अस्मिता और उसकी स्वायत्तता को नृशंसता पूर्वक कुचलता आया है। उसकी शारीरिक सबलता के साथ-साथ न्याय, धर्म, समाज जैसी संस्थायें पुरुष के निजी हितों की रक्षा करती …

स्त्री-विमर्श के दर्पण में स्त्री का चेहरा

- मूलचन्द सोनकर

4
अब हम इस बात की चर्चा करेंगे कि स्त्रियाँ अपनी इस निर्मित या आरोपित छवि के बारे में क्या राय रखती हैं। इसको जानने के लिए हम उन्हीं ग्रन्थों का परीक्षण करेंगे जिनकी चर्चा हम पीछे कर आये हैं। लेख के दूसरे भाग में वि.का. राजवाडे की पुस्तक ‘भारतीय विवाह संस्था का इतिहास' के पृष्ठ १२८ से उद्धृत वाक्य को आपने देखा। इसी वाक्य के तारतम्य में ही आगे लिखा है, ‘‘यह नाटक होने के बाद रानी कहती है - महिलाओं, मुझसे कोई भी संभोग नहीं करता। अतएव यह घोड़ा मेरे पास सोता है।....घोड़ा मुझसे संभोग करता है, इसका कारण इतना ही है अन्य कोई भी मुझसे संभोग नहीं करता।....मुझसे कोई पुरुष संभोग नहीं कर रहा है इसलिए मैं घोड़े के पास जाती हूँ।'' इस पर एक तीसरी कहती है - ‘‘तू यह अपना नसीब मान कि तुझे घोड़ा तो मिल गया। तेरी माँ को तो वह भी नहीं मिला।''
ऐसा है संभोग-इच्छा के संताप में जलती एक स्त्री का उद्गार, जिसे राज-पत्नी के मुँह से कहलवाया गया है। इसी पुस्तक के पृष्ठ १२६ पर अंकित यह वाक्य स्त्रियों की कामुक मनोदशा का कितना स्पष्ट विश्लेषण …