Monday, November 2, 2009

शऊर की दहलीज: दहलीज लाँघने की कोशिश

से. रा. यात्री


शऊर की दहलीज प्रेमकुमार द्वारा उर्दू के चर्चित एवं शीर्षस्थ रचनाकारों से समय-समय पर किए गए साक्षात्कार की प्रस्तुति है। जाहिर है कि ये सब अपने-अपने क्षेत्रा के विशेषज्ञ हैं। यह एक तरह का एक ऐसा पारम्परिक एवं अन्तरंग संवाद है जिसमें प्रश्नोत्तरी का पारम्परिक रूप सिरे से गायब है। साक्षात्कर्त्ता पाठक और रचनाकार के मध्य हल्के से सूक्ष्म संकेत छोड़कर अलग हट जाता है और दोनों की एक-दूसरे की मानसिकता में आवाजाही का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।

शऊर की दहलीज में कुल नौ साहित्यकारों का आत्मस्वरूप उभर कर आया है। इनमें विधागत वैविध्य का भी विस्तार दिखाई पड़ता है।

आले अहमद सुरूर उर्दू साहित्य के एक उम्रदराज रचनाकार हैं।

प्रेमकुमार ने दस बारह प्रश्नों में ही सुरूर साहब की सृजनशीलता के छह-सात दशकों का व्यक्तित्व और कृतित्व अपनी सम्पूर्णता में रेखांकित कर दिया है। इस साक्षात्कार अथवा संवाद की विशेषता यह भी है कि यह एक ऐसी विभूति से किया गया है जो अठ्ठासी वर्ष को पार किए बैठी है, वार्धक्य के अलावा वह पक्षाघात की व्याधि से भी पीड़ित है। यह सुरूर साहब की अनथक जुझारूपन की वृत्ति ही है कि वह पूरी तरह से, बाहरी दुनिया से जुड़े रहने वाली ऊर्जा से पूरम्पूर हैं।

यद्यपि जज्बी एक बड़े तरक्की पसंद शायरों की श्रेणी में आते हैं पर उनका अटल विश्वास है कि हम ऊपर से आने वाले को मजबूर और लाचार हैं।... कब शेर हो जाए पता नहीं।' उनकी मशहूर ग़ज+ल भी-÷मरने की दुआएँ क्यों माँगू - जीने की तमन्ना कौन करे ' इसी ऊपर से आने वाले ग़ैबी चमत्कार की उपज है। इसी सन्दर्भ में बात को आगे बढ़ाते हुए उनकी सोच है - आपने राइटर्स को देखा है? न डिग्री, न बी०ए०, एम०ए० पर सब पर छाए हैं,... ये वही लोग हैं जिनमें महसूस करने का जबरदस्त माद्दा है। ऐसे लोग जिनका असर अवाम क़बूल करे कम होते हैं। इस हिसाब से हम कितने घटिया आदमी हैं।' (पृष्ठ ३२)

कुर्रतुलऐन हैदर से साक्षात्कार कतई सम्भव न हुआ होता यदि लेखक ने अपने आगे खड़ी समस्त बाधाओं को ध्वस्त करने के लिए कमर न कस ली होती। यही क्यों उस स्थिति में तो वह पूरी तरह उखड़ ही सकता था जब साक्षात्कार के ऐन क्षणों में कुर्रतुल की बचपन की सहेली फातिमा हैदराबादी का अनपेक्षित प्रवेश होता है।

प्रेमकुमार ने समस्त विपरीत परिस्थितियों को अपने परपज की ओर मोड़कर साक्षात्कार से सम्बद्ध सारा कुछ सार्थक निकाल लिया। उसने बहुत देर तक कुर्रतुल से सीधा सवाल न करके लेखिका के रहन-सहन रख-रखाव और उसके जीवन से जुड़े अनेक प्रसंगों के साक्षी वहाँ मौजूद पात्रों के माध्यम से एक तस्वीर खड़ी कर ली।

यदि प्रेम कुमार उन पन्द्रह सवालों में से जो उसने कुर्रतुलऐन हैदर से किए- एक भी न करता तब भी उसने लेखिका की निजता और जीवन पर्यन्त फैले सोच तथा व्यवहार के माध्यम से पाठक के सामने एक समूची, परिपक्व विभूति का बहिर्स्तर और कद्दावर कद प्रस्तुत करने में रिकार्ड सफलता प्राप्त कर ली होती।

इन्तजार हुसैन उर्दू कथा साहित्य प्रकारान्तर से पूरे साहित्य जगत की एक बड़ी हस्ती ठहरती है। प्रेम कुमार ने उन्हें कितने ही कोणों से कुरेदा है - कौंचा है और उनके व्यक्तित्व की पारदर्शिता को पूर्णता के साथ रूपायित कर दिखाया है।

जिन्दगी में प्रेम की उत्कट चाहत रचनाकार के शून्य को भरती है और साधारण आदमी की अपेक्षा उसे एक अलग तरह का अस्तित्व और अनुभव देती है। इन्तजार हुसैन स्वयं को प्रेम की दुर्लभ-भावना से वंचित महसूस करते हुए कहते हैं: जज्बाती एतबार से जिन्दगी खाली हो ऐसा नहीं है पर जो इश्क मेरे तसव्वुर में है उस तजुर्बे से नहीं आया कोई। (पृष्ठ ७२)

इन्तजार हुसैन ने वे सारी महानताएँ एक सिरे से खारिज कर दी हैं जिन्हें प्रायः रचनाकार ओढ़े फिरते हैं। उनका यह आत्मस्वीकार ही उन्हें बड़े रचनाकारों की पंक्ति में पांक्तेय बनाकर खड़ा करने के लिए पर्याप्त हैः हाँ... जिंदगी में एक कमी यह भी है कि मैंने कोई बड़ा गुनाह नहीं किया। वो करना चाहिए। बहुत बड़े सबाब का काम भी नहीं किया। क्यों क्या... इसका मतलब यह है कि मेरे यहाँ एडवेंचरस स्प्रिट नहीं है। (पृष्ठ ७२)

स्वयं को कठघरे में खड़ा करके अपने को अलग से व्याख्यायित करना और किसी तरह की रियायत अथवा छूट न लेना एक दुर्लभ गुण है जो बहुत ही कम रचनाकारों में पाया जाता है।

इस साक्षात्कार संकलन में प्रेमकुमार ने काजी अब्दुलसत्तार के संवाद को औपन्यासिक विस्तार दिया है। वह चाहे तो काजी के जीवनवृत्त पर एक अत्यन्त रोचक जीवनी भी प्रस्तुत कर सकते हैं।

काजी से साक्षात्कार का निहितार्थ है कि आप अजूबों के अजायबघर में दाखिल हो गए हैं। कोई कोना ऐसा नहीं जहाँ हठात्‌ ध्यान खींचने वाला ऐसा कुछ न कुछ विचित्रा बिखरा पड़ा न मिल जाए जिससे चकित न होना पड़े। कल्पना का विराट संसार, इतिहास, संस्कृति, परम्परा की अनन्त अबूझ, दीप्त मणियाँ। क्या कुछ नहीं है वहाँ?

प्रेमकुमार ने जितने धैर्य और व्यापक सन्दर्भों में गहरे उतरकर यह साक्षात्कार किया है और उसे कथारस से किंचित भी विरत नहीं होने दिया यह तो विलक्षण है ही साथ ही यह भी कम चकित करने वाला तथ्य नहीं है कि शुरू हो जाने पर कहीं विराम की जरा भी परवाह न करने वाले काजी साहब से वह सब कुछ निकाल लिया है जो उर्दू लेखन का बड़ा हासिल तो है ही - काजी की चतुर चितेर क्रूर' की छवियों का भी दुर्लभ एलबम है।

जोगिन्दर पाल के नजरिए से वही रचनाशीलता रेखांकित होती है जो सन्दर्भ बदल जाने पर नए प्रसंगों में भी अर्थ नहीं खोती। बहुत शोर मचाने वाली की जगह शब्दों में मितव्ययी रचना सच्चे अर्थों में सार्थक होती है। खामोशी गहरी हो जाने से मौन की भाषा स्वयंमेव व्यक्त होने लगती हैः जब आप दुख के शिकार हों या गहरे सोचते हों तो शोर नहीं मचाते... चुप होते हैं...

जोगिन्दर पाल मानते हैं कि एक सच्चे लेखक का विस्तार एक सतह यानी अपने समय के धरातल पर भी होता है और वह दूसरे वक्तों के धरातल पर भी प्रासंगिक होने की स्थिति में रहता है। रचना का असली स्वरूप रचना के भीतर से पैदा होना चाहिए न कि सतही किस्म के भाष्यों से।

कला की समस्या वहाँ पैदा होती है जहाँ लयात्मकता खंडित होती है। जोगिन्दर पाल के यह शब्द उल्लेखनीय हैं: शिव ने गाया विष्णु ने सुना यानी शिव को सुनने के लिए विष्णु बनना पड़ता है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि लेखक के मर्म में स्वयं को आत्मलीन करने वाले पाठक को समीक्षक की सलाहियत की कोई दरकार नहीं है।

डॉ० गोपीचंद नारंग का साक्षात्कार एक सही ढंग से पढे- लिखे और विचारधारा के मामले में सुलझे हुए अदीब की बातचीत का विस्तार है।

गोपीचंद नारंग साहित्य की दुनिया में कई स्तरों पर एक विवादास्पद व्यक्तित्व हैं इसलिए हमें उनके गुण दोषों पर विचार करने के बजाय उनकी विचारधारा को जानने समझने का प्रयास करना चाहिए।

यह पूरा साक्षात्कार जानकारियों और साहित्य के वैश्विक सरोकारों को इतनी सहजता से सामने रख देता है कि पाठक उसके प्रवाह में अनायास बहता चला जाता है। एक बहुपठित सर्जक रचनाशीलता के कितने आयामों को एक साथ अन्वेषित करता है - इस साक्षात्कार में यह तथ्य पूरी तरह निरूपित हुआ है।

शहरयार से प्रेमकुमार का लम्बा वार्तालाप साहित्य तथा संस्कृति की अनेकमुखी धाराओं के सिकुड़ते चले जाने की चिन्ता व्यक्त करता है। उर्दू काव्य जगत में शहरयार का अपना एक महत्त्वपूर्ण और गरिमापूर्ण स्थान तो है ही - साथ ही वैचारिक स्तर पर भी वह एक सुलझे हुए विचारक के रूप में परिलक्षित होते हैं। बड़े-बड़े विचारक, समाजशास्त्री, संस्कृतिकर्मी और साहित्यकार वर्तमान के चर्तुमुखी हा्रस को जिस तीव्रता से अनुभव कर रहे हैं - वह सब शहरयार के काव्य में पूरी शिद्दत से अभिव्यक्त होता है।

शहरयार का पक्का विश्वास है कि एक स्वस्थ समाज की स्थापना, साहित्य, कला, संस्कृति में विकास तभी सम्भव है जब कोई एब्सोल्यूट वैल्यू हो। इस सन्दर्भ में उनका यह कथन एक बड़े बयान के रूप में रेखांकित होना चाहिएः बड़ी शायरी जिस जमाने में पैदा होती है उसमें कुछ वैल्यूज को सब मानते हैं...। बहुत से शायर मिलकर शायद एक परछाईं हों बड़ी शायरी की, ये जो जल्दी-जल्दी चेंज आ रहे हैं वे किसी वैल्यू पर नहीं रुकने देते सोसायटी को, अच्छा, बुरा, हसीन, बदसूरत अब एव्सोल्यूट फार्म में नहीं हैं। जब तक एव्सोल्यूट वैल्यू न हो बड़ा कहाँ?

शहरयार अपने समकालीनों की अपेक्षा एक बिलकुल अलग तरह के शायर हैं। उनके प्रतीक भी दूसरे से अलग हटकर हैं। उनकी शायरी में रात, एकांत, अंधेरा खूब घने होकर आते हैं: जिधर अंधेरा है, तंहाई है, उदासी है, सफर का हमने वो सिम्त क्यों मुक़र्रिर की है। वह जागती आँखों से स्वप्न देखने के विश्वासी है। उनके प्रतीकों का अर्थ हमेशा एक- सा नहीं होता। परिवेश के अनुसार बिम्बों के स्वरूप और अर्थ में भी परिवर्तन होता है।

अहमद फराज पाकिस्तान और हिन्दुस्तान में एक ऐसे मकबूल शायर हैं (थे) जिनसे प्रेमकुमार ने उनकी मृत्यु से पहले उनकी पचहत्तर वर्ष की आयु में यह साक्षात्कार किया था।

भारत की प्रजातंत्र प्रणाली की अहमद फराज ने प्रशंसा की है पर साथ ही यहां की अनियंत्रित होती जनसंख्या पर उन्होंने चिन्ता भी व्यक्त की है। पाकिस्तान की खुले शब्दों में आलोचना करने में उन्होंने कोई झिझक नहीं दिखाईः हमारे यहाँ तो पूरी सोसायटी करप्ट कर दी गई है। अदालत, जनरल पुलिस थाना, कचहरी अस्पताल।

काव्य में वस्तु और उसके स्वरूप की अदायगी पर अहमद फराज की दृष्टि स्पष्ट है। वह मानते हैं कि विचार अपना फार्म स्वयं खोज लेता है। थाट कण्टेन्ट फार्म से ज्यादा महत्त्व रखता है, इमोशन अपने लिए कंटेनर खुद ढूंढते हैं। इसीलिए मुख्तलिफ फार्मस्‌ में मुख्तलिफ जज्बात ढल सकते हैं।

भाषा और शब्दों के महत्व पर उनके विचार हैं -शायर को लफ्जों में इंतखाब में एहतियात की जरूरत होती है।

शऊर की दहलीज हाथ में लेने पर मेरे मन में जो पहला सवाल उठा था वह यह था कि मैं इसे क्यों पढूँ? मैंने उर्दू साहित्य का कभी विधिवत्‌ अध्ययन नहीं किया। लम्बे समय से उर्दू के कुछ बड़े नामों से सिर्फ इसलिए परिचित हूँ कि वह बार-बार सामने आते रहे हैं। आज तो उर्दू लिपि से वह भी अनभिज्ञ हो चुके हैं जिन्हें पारिवारिक विरासत के रूप में उर्दू और उर्दू अदब मिला था - फिर बाकी का तो कहना ही क्या? ऐसी अधूरी और अधकचरी समझ के चलते उर्दू अदब की शऊर की दहलीज में झाँकना अनाधिकार चेष्टा ही कही जाएगी।

पर चूँकि पुस्तक नागरी लिपि में है इसलिए पढ़ने की गुंजाइश तो बनती ही थी और मैंने गहरी दिलचस्पी महसूस करते हुए पूरे साक्षात्कार पढ़ डाले। मैंने इन साक्षात्कारों को पढ़ने के बाद अनुभव किया कि भले ही मैंने उर्दू के अदीबों का साहित्य नहीं पढ़ा पर उनके विराट स्वरूप से एक अंतरंग परिचय तो इन साक्षात्कारों के माध्यम से पा ही लिया।

प्रेमकुमार ने गहरी जानकारी और असीम धीरज के बुलबूते उर्दू के उन सभी श्रेष्ठ साहित्यकारों से सार्थक संवाद स्थापित किया है जो आज हिन्दी के असंख्य पाठकों के लिए अपरिचित नहीं रह गए हैं। संवाद शैली और सहज भाषा में प्रेमकुमार ने सभी नौ साहित्यकारों की सामर्थ्य और सीमाओं को रेखांकित किया है, रचनात्मकता और रचना प्रक्रिया के सूक्ष्मातिसूक्ष्म बिन्दुओं की तलाश की है और यह भी कि वह अपने समकालीनों के बारे में क्या राय रखते हैं।

कुल मिलाकर यह सभी साक्षात्कार हमारे समय के जीवन्त दस्तावेज हैं और अपनी आत्यन्तिकता में अनोखे हैं। इनका अन्दाज और तेवर इनकी एक अलग तरह की विशेषता को रेखांकित करते हैं।

समीक्षक- से. रा. यात्री

एफ/ई. ७ , नया कवि नगर, गाजियाबाद





1 comment:

Mansoor Ali said...

shukriya, is dahleez par chadhane ke liye, ye kitaab kahan par uplabdh hogi, pata zaroor deve.
m.hashmi