Sunday, November 22, 2009

राही मासूम रजा और आधा गाँव

राही मासूम रजा और आधा गाँव


- प्रो० जोहरा अफ़जल


राही मासूम रजा एक ऐसे आधुनिक रचनाकार थे जिनकी रचनाओं का मुख्य विषय राजनीति है। चाहे वह उनका उपन्यास हो, कहानी हो, कविता हो अथवा निबन्ध। उनकी सभी रचनाओं में समय की अनुगूँज सुनाई देती है। राही के उपन्यासों में आधा गाँव टोपी शुक्ला, हिम्मत जौनपुरी, ओस की बूँद,सीन ७५, दिल एक सादा कागज,कटरा बी आरजू, असन्तोष के दिन और नीम का पेड़ में से सबसे
अधिक चर्चित उपन्यास आधा गाँव है। राही ने इस उपन्यास में गंगौली गाँव की वास्तविक कथा के माध्यम से १९३७ से १९५२ तक के समय के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक यथार्थ और उसकी परिवर्तनशील स्थितियों का वितान रचा है।
राही का यह उपन्यास हिन्दी के महत्त्वपूर्ण उपन्यासों में से एक है। आधा गाँव आधुनिक भारतीय समाज के विभिन्न विषयों को समेटे हुए है। लेखक ने उत्तर प्रदेश के एक गाँव गंगौली के आधे टुकड़े को ही अपना कथा क्षेत्र बनाया है, जिसका वह स्वयं भोगता एवं जानकार है। हिन्दी उपन्यास जगत्‌ में शायद पहली बार मुस्लिम जनजीवन का यथार्थ अपने विविध रंगों में उसकी अच्छी और बुरी परछाइयों को लेकर प्रस्तुत हुआ है, जिसने निश्चित रूप से भारतीय जीवन का एक और पहलू उजागर किया है।
राही अपने गाँव गंगौली से, वहाँ के लोगों से वहाँ के कण-कण से प्यार करते हैं। उपन्यास को पढ़ने पर पता चलता है कि राही गंगौली की मिट्टी की गन्ध में, कीचड़ और गोबर में, गाय और बैलों में, प्राकृतिक शोभा में उतने ही रमते हैं जितने गंगौली के लोगों में। राही भारत की परम्परागत साझा संस्कृति और विरासत के प्रबल समर्थक थे। वे धर्म की राजनीति करने वालों के सदैव विरोधी रहे। उन्होंने आधा गाँव में यह साफ़ कर दिया कि धर्म किसी राष्ट्र की स्थापना का आधार नहीं हो सकता। धर्म और राजनीति का रिश्ता तेल और पानी जैसा है। यदि भारत में
धर्म को राजनीति से जोड़कर सत्ता प्राप्त करने की चेष्टा की गई तो इसके भयानक परिणाम होंगे। राही ने धर्म और जाति की राजनीति करने वालों की कड़ी आलोचना की है। वह हर तरह की संकीर्णता और कट्टरता के सख्त विरोधी रहे, जीवन भर एक सही भारतीयता हिन्दुस्तानियत की खोज करते रहे।
आधा गाँव की कथा गंगौली गाँव के शिया मुसलमानों के परिवारों की है जहाँ अन्य जाति और धर्म के लोग भी रहते हैं। राही ने इसे आंधे गांव की कहानी कहा है पर यदि इसकी गहराई में जाकर देखें तो यह आधे की नहीं, सारे गांव की कहानी है बल्कि यदि पूरे भारत की कहानी कहा जाय तो अनुचित न होगा।
राही ने अपने लगभग सभी उपन्यासों में आने वाले नये समाज की प्रवृत्तियों को पहचाना और अपने लेखन का विषय बनाया तथा उन तमाम समस्याओं का भी चित्रण किया हैं। लेखक आधा गाँव में सपरिवार स्वयं मौजूद रहता है और कहानी का आरंभ भी उसने अपने बचपन से ही किया है। बाल्यावस्था में न समझ आने वाली बातें जिन्हें आज वह खूब समझाता है उनका चित्रण करने में उसे कोई संकोच नहीं होता। आधा गाँव में मध्यवर्गीय जीवन और उस समाज में व्याप्त अनेक विसंगतियों एवं समस्याओं को उकेरा गया है।
आधा गाँव एक आँचलिक उपन्यास है पर इसमें कोई एक कथा नहीं है। राही विभिन्न पात्रों के साथ उनकी अलग-अलग कथा लेकर चलते हैं किन्तु विभिन्न पात्रों तथा इन पात्रों की कहानियों में विभिन्नता होते हुए भी ये एक सुर में बँधे हुए हैं तथा कथानक में कहीं भी शिथिलता दिखाई नहीं देती। जिस समय में इस उपन्यास की रचना हुई और जिस समय की यह कथा है, उस समय शिक्षा की दृष्टि से देश पिछड़ा हुआ था। नवयुवकों को रोजी-रोटी की तलाश में अपना घर छोड़ना पड़ता था। राही ने आधा गाँव के माध्यम से अनेक प्रश्न पाठक के सम्मुख रखे हैं, ऐसा करने के लिए उन्होंने काल्पनिक पात्रों एवं कथाओं का आश्रय लिया है।
पाकिस्तान के निर्माण के प्रश्न को गंगौली गाँव के हर व्यक्ति की मानसिकता से जोड़ कर सोचने और उस पर विचार करने पर राही ने विवश किया है। गाँव में किसी को भी पाकिस्तान से सहानुभूति नहीं है। गंगौली के मुसलमानों के स्वतन्त्रता से पूर्व खुशहाल जीवन और स्वतन्त्रता के पश्चात्‌ की दयनीय स्थिति का बड़ा ही मार्मिक चित्रण किया है, राही ने। उन्होंने मुस्लिम लीग की राजनीति को नहीं स्वीकारा, भारत-पाक के सिद्धान्त को स्वीकार नहीं किया, पर इसका जो सामाजिक प्रभाव पड़ा उसका अत्यन्त सजीव चित्र प्रस्तुत किया। ÷मुस्लिम लीग' की राजनीति पर जितना सशक्त प्रहार राही ने किया उतना अन्य किसी लेखक की रचना में दिखाई नहीं देता।
भारत और पाकिस्तान का बटवारा राजनीतिक ही नहीं सामाजिक एवं सांस्कृतिक त्रासदी भी है। गंगौली जैसे गाँव के मुसलमान मुस्लिम लीग को वोट देने के बाद भी पाकिस्तान नहीं गये। मिगदाद तो पाकिस्तान जाने से साफ़ इन्कार कर देती है-हम ना जाए वाले हैं कहीं ! जायें ऊ लोग जिन्हें हल-बैल से शरम आती है। हम त किसान है, तन्नू भाई। जहाँ हमरा खेत, हमरी जमीन -वहाँ हम...... 1 तन्नू पाकिस्तान का विरोध करते हुए कहता है - नफ़रत और खैफ़ की बुनियाद पर बनने वाली कोई चीज+ मुबारक नहीं हो सकती ...२
आधा गाँव में समाज के दो रूपों के यथार्थ को राही ने बड़ी बेबाकी से दर्शाया है -एक भारत विभाजन से पूर्व का समाज और फ़िर विभाजन के बाद का। पाकिस्तान बनने की मांग से पूर्व गंगौली गाँव के हिन्दू तथा मुसलमान आपस में सौहार्द पूर्वक रहते थे, भले ही वे दूसरे के यहां खाने-पीने से परहेज करते थे पर मन में कोई नफ़रत या मन मुटाव न था। मुसलमान दशहरा के लिए चन्दा देने में पीछे न रहते। जहीर मियाँ ने मठ के बाबा को पाँच बीघे जमीन माफ़ कर दी, फुन्नन मियाँ ने भी मन्दिर बनवाने के लिए ज+मीन दी थी। ऐसे मुसलमान परेशान थे, सोचने में असमर्थ कि अचानक मुसलमानों के लिए अलग देश की आवश्यकता क्यों पड़ गई। उनके सम्मुख एक बहुत बड़ा प्रश्न देश के बटवारे को लेकर उठ खड़ा हुआ। राही धर्म के नाम पर देश को या देशवासियों को बांटने के पक्ष में नहीं थे। उन्हीं के शब्दों में मैंने दंगों पर रोना बन्द कर दिये है क्योंकि मुझे लाशों को धर्मों के आधार पर बाँटने की कला नहीं आती। मैं केवल यह देखता हूँ कि नागरिक मरा पड़ा है। एक बाप, एक भाई, एक पति, एक माँ, एक बहन, एक बेटी, एक परिवार भरा पड़ा है। घर, हिन्दू या मुसलमान या सिख, हरिजन, या ब्राह्मण नहीं होते। घर तो घर होते हैं।''३
उनकी यहीं भावना आधा गाँव में स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। राही साम्प्रदायिकता के विरु( एक आदर्शवादी उपन्यासकार की भाँति अपनी भूमिका निभाना नहीं भूले। उन्हें विश्वास है कि भारत में हिन्दूओं का राज हो जाने पर मुसलमानों पर कोई आपत्ति नहीं आयेगी। यही बात वह आधा गाँव' के पात्र फुन्नन मियाँ के मुख से कहलाते हैं- हां-हां, त हुए बा। तू त ऐसा हिन्दु कहि रहियों जैसे हिन्दु सब भुकाऊ है कि काटलीयन। अरे ठाकुर कुंवरपाल सिंह त हिन्दू रहे। झगुरियों हिन्दु है। ऐ भाई, ओ परसरमुवा हिन्दुए न है कि जब शहर में सुन्नी लोग हरमजदगी कीहन कि हम हजरत अली का ताबूत न उठे देंगे, काहे को कि ऊ शिया लोग और तबर्रा पढ़त हएं, त परसरमुवा ऊधम मचा दीहन कि ई ताबूत उट्ठी और ऊं ताबूत उट्ठा। तेरे जिन्ना साहब हमरो ताबूत उठाये न आये।'यह बात राही ने एक साधारण व्यक्ति के मुख से कहलाकर सिद्ध करने का प्रयास किया है कि साम्प्रदायिक दंगे-फ़साद तो पढ़े-लिखे, शिक्षित राजनेताओं का काम है साधारण जन को इसमें कोई रुचि नहीं।
जिस प्रकार मेरी गंज आंचल के उपेक्षित जीवन को उसकी समस्त कुरूपता को मानवीय स्तर पर फणीश्र्वरनाथ रेणु ने मैला आँचल में चित्रित किया है उसी प्रकार राही मासूम रजा ने पहली बार अपने ही गाँव गंगैली के शिया मुसलमानों की सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक समस्याओं का बड़ा ही मार्मिक चित्र आधा गाँव' में प्रस्तुत किया हैं जितना यथार्थ चित्र राही ने मुसलमानों का किया है उतना इससे पहले हिन्दी उपन्यासों में कहीं देखने को नहीं मिलता।
आधा गाँव में स्वतन्त्रता से पूर्व और बाद के गंगौली गाँव का चित्रण है जो उस समय का जीता जागता प्रमाण है - जहाँ स्वार्थी अैर पद्लोलुप नेताओं का अत्यन्त घिनौना रूप दिखाया गया है। उस समय सम्पूर्ण भारत ऐसी ही विसंगतियों का शिकार था। राही ने बड़ी ही संवेदनशीलता के साथ इस तथ्य को उजागर करने का प्रयास किया है। जातिवाद का आधार लेकर जो राजनीति की जाती है उससे समाज का हित कभी नहीं हो सकता। वह एक प्रगतिशील यथार्थवादी साहित्यकार थे, इसीलिए उनके उपन्यास आधा गाँव में सामाजिक यथार्थ का रंग चटख है।
आधा गाँव में जो कुछ भी घटित होता दिखाया गया है वे घटनाएं केवल गंगौली गाँव की नहीं थी बल्कि पूरे भारत में ऐसी ही स्थिति थी। राही का आधा गाँव उपन्यास बहु आयामी उपन्यास है। कोई भी विषय ऐसा नहीं जो इनकी दृष्टि से अछूता रह गया हो। पाकिस्तान का निर्माण देश का विभाजन इस उपन्यास की केन्द्रीय वस्तु नहीं है फिर भी वह केन्द्रीय वस्तु से इतनी जुड़ी हुई है कि उससे अलगाने में कठिनाई होती है। इस उपन्यास की केन्द्रीय वस्तु है समय की गति। समय ही आधा गाँव का नायक है। राही के अनुसार - यह कहानी न कुछ लोगों की है, न कुछ परिवारों की। यह उस गाँव की कहानी भी नहीं है जिसमें इस कहानी के भले बुरे पात्र अपने को पूर्ण बनाने का प्रयत्न कर रहे है। यह कहानी न धार्मिक है न राजनीतिक, क्योंकि समय न धार्मिक होता है न राजनीतिक और यह कहानी है समय की ही। यह गंगौली में गुजरने वाले समय की कहानी है। कई बूढ़े मर गये, कई जवान कई बच्चे जवान हो गये .... यह कहानी है उन खण्डहरों की जहाँ कभी मकान थे और यह कहानी उन मकानों की जो खण्डहरो पर बनाये गये हैं।४
यह उपन्यास जहाँ एक ओर अभिजात्य मुस्लिम समाज का चित्र प्रस्तुत करता है वहीं दूसरी ओर आजादी के बाद भारत में तेजी से होने वाले परिवर्तनों को भी रेखांकित करता है। राही मासूम रजा एक ऐसे कथाकार हैं जिन्होंने बड़ी निर्भीकता से राजनीति पर कड़ा प्रहार किया है। इन्होंने बिना किसी झिझक और भय के यथार्थ को अपने साहित्य में दर्शाया है। उनकी इसी निर्भीकता, निडरता और सच्चाई को देखकर धर्मवीर भारती यह कहने पर विवश हुए- अगर मैं ईश्वर पर विश्वास करता होता तो ऐसे क्षण में यही प्रार्थना करता कि प्रभु इस दुस्साहसी की सेवा करना। क्योंकि इसकी सच्ची आवाज में तुम ही बसते हो। मगर किससे प्रार्थना करूँ, अगर ईश्र्वर है तो ये समाज में व्याप्त मिथ्या के खतरनाक व्यूह भी तो उसी की वजह से होगें।५
राही ने अपने सभी उपन्यासों - आधा गाँव, टोपी शुक्ला', ओस की बूँद', हिम्मत जौनपुरी', असन्तोष के दिन, कटरा बी आरजू एवं दिल एक सादा कागज में समाज में व्याप्त समस्त जटिल समस्याओं का चित्रण किया है। जिनमें सबसे बड़ी समस्या है व्यक्ति और समाज की असमानता। वे मानते हैं कि सारी समस्याओं के पीछे व्यक्ति का अपना स्वार्थ होता है। उनके अनुसार जब तक मनुष्य के भीतर ये स्वार्थ रहेंगे तब तक इन समस्याओं से पीछा नहीं छूट सकता। ÷आधा गाँव' में व्यक्ति की इसी समस्या को बड़े सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया है राही ने।
हिन्दुओं की तरह मुसलमानों में भी कई प्रकार के सामाजिक भेद हैं। हड्डी की शुद्धता, रक्त की शुद्धता पर भी बहुत जोर दिया जाता है। आर्थिक रूप से चाहे व्यक्ति कितना भी सम्पन्न हो पर यदि उसकी हड्डी में दाग़ है तो उसे समाज में वह स्थान कभी नहीं मिल सकता जो शुद्ध हड्डी वाले निर्धन व्यक्ति को मिलता है। अशरफुल्ला खाँ को अपने पठान होने पर गर्व है -हम ठहरे पठान लोग। हमारे यहाँ तो दोस्ती और दुश्मनी के अलावा कोई और पैमाना ही नहीं होता। दोगली हरकतें करना शेखों और नीच जात वालों का काम है।''६ सैफुनिया से विवाह करने के पश्चात्‌ मिगदाद अपने पिता की खरी हड्डी का चैलेंज करते हुए कहता है बाकी हम्में त इहो मालूम है कि हमहूं सैय्यद ना है। बाकी जना रहा कि अब्बा ई बतिया बिल्कुल ही भूल गये हैं। ऊ त इकद्म्मे से सैय्यद हो गये हैं। और अब त जब से लड़के अब्बा की शेरवानी पा गये हैं तब से अउरो मारे इतराए लगे हैं।७ युवा पीढ़ी में अपने बड़ों के प्रति आदर की भावना कम होती दिखाई दे रही है। गंगौली गाँव में आये दिन पिता-पुत्र, सास-बहू के झगड़े होते रहते हैं। हर परिवार की यही कहानी है।
गंगौली में शिया मुसलमानों के अतिरिक्त राकी मुसलमानों और जुलाहों के घर भी हैं पर उनके साथ शिया लोगों का मेलजोल नहीं है। इस उपन्यास में ऐसे भी चित्र है जिनमें शिया पुरुष हिन्दुओं-भंगी या चमार जाति की स्थितियों से सम्बन्ध रखते है, परन्तु शुद्धता का ऐसा आड्म्बर है कि हिन्दू मरीज की नब्ज देखने के बाद हकीम साहब स्नान करते दिखते हैं। राही ने अपने आधा गाँव में सामाजिक जीवन के जिस पक्ष को अधिक उभारा है वह यही, पुरुषों का नीच जाति की स्थितियों के साथ अनैतिक यौन सम्बन्ध है। मोहर्रम के चाँद के दिखते ही शिया लोगों की शोक सभाएं शुरू हो जाती हैं। इसी प्रकार की एक सभा में सितारा और अब्बास एक दूसरे पर मोहित हो जाते हैं। अब्बास अलीगढ़ मुस्लिम विश्र्वविद्यालय का छात्र है अल्हड़ सितारा के साथ शारीरिक सम्बन्ध स्थापित कर उसे भूल जाता है। प्रेम का परिणाम केवल सितारा को ही भुगतना पड़ता है। नारी की स्थिति का अत्यंत सजीव चित्र राही ने इस उपन्यास में प्रस्तुत किया है। स्त्री-पुरुष के अनैतिक सम्बन्धों को भी आधा गाँव में खुलकर दिखाया गया है। सभी पात्र शरीर के भूखे हैं। उन्हें बस शरीर मिलना चाहिए चाहे वह शरीर रिश्ते की बहन का हो, नौकरानी का हो या फिर किसी भी नीच जात का। राही ने परिवारों की, समाज की इन्हीं छोटी-छोटी समस्याओं को एक बड़ी समस्या बनाकर प्रस्तुत किया है। इन्होंने साम्प्रदायिक विभीषिका का चित्रण जितने साहस पूर्ण ढंग से किया है, शायद ही कोई अन्य इतने साहस का प्रदर्शन कर सकें।
इसमें सन्देह नहीं कि साठोत्तरी उपन्यासकारों में राही एक निराला व्यक्तित्व रखते है, जिनमें विद्रोह कूट-कूट कर भरा है। उनके उपन्यासों में नए पुराने द्वन्द्व की नई भंगिमाएं दृष्टिगोचर होती है। आजादी के बाद एक नया नेतृत्व वर्ग विकसित हुआ। इस नये वर्ग के उदय के पीछे कोई परम्परा नहीं, शिक्षा नहीं, सम्पन्नता नहीं। यदि कुछ है तो वह है वोटों का जोड़-तोड़। वोटों का यह जोड़-तोड़ समाज के एक साधारण व्यक्ति को समाज का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सदस्य बना देता है। वह व्यक्ति खुद ही सरकार होता है और सरकार और जनता के बीच सेठ भी। आधा गाँव में एक स्वर जो लगातार सुनाई देता हैं, वह है मुसलमानों का देश प्रेम। वे भी इसी देश का, राष्ट्र का एक हिसा हैं। वे भी अपने घर, अपने गाँव और देश की मिट्टी से उतना ही प्रेम करते हैं जितना अन्य जाति के लोग या देशभक्त को हो सकता है। राही ने भारतीय मुसलमानों की व्यथा और कथा को बहुत ही प्रभावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया है।
राही मासूम रजा ने अपने उपन्यास आधा गाँव में व्यक्त समस्याओं का कोई समाधान प्रस्तुत नहीं किया है। वह चाहते थे कि पाठक स्वयं उचित और अनुचित का निर्णय करे। उन्होंने तो केवल अपने उपन्यास द्वारा मानव मन की कोमल एवं पवित्र भावनाओं को उजागर करके सत्य एवं सद्वृत्तियों को जाग्रत करने का प्रयास किया है। वे एक साहित्यकार थे जिन्होंने कथा साहित्य के क्षेत्र में एक नये क्षितिज की खोज की और हमें एक ऐसे संसार में परिचित कराया जिसे हम गहराई से नहीं जानते थे। उनके तेवरों को शब्दों में नहीं ढाला जा सकता।




सन्दर्भ-सूची


१. राही मासूम रजा, आधा गाँव, पृ० २२६
२. वही, पृ० २६३
३. राही मासूम रजा, लगता है बेकार गये हम, पृ० २२६
४. आधा गाँव, पृ० ११-१२
५. राही मासूम रजा, मैं एक फेरीवाला, भूमिका से, पृ० ९
६. आधा गांव, पृ० १०३
७. वही, पृ० २२६
यह आलेख राही मासूम रज़ा विशेषांक में भी पढ़ सकते है.

Sunday, November 15, 2009

सिक्का बदल गया


कृष्णा सोबती







खद्दर की चादर ओढ़े, हाथ में माला लिये शाहनी जब दरिया के किनारे पहुँची तो पौ फट रही थी। असमान के परदे पर लालिमा फैलती जा रही थी। शाहनी ने कपड़े उतारकर एक ओर रखे और ‘श्री राम’ ‘श्री राम’ करती पानी में हो ली। अंजलि भरकर सूर्य देवता को नमस्कार किया, अपनी उनींदी आँखों पर छींटे दिये और पानी से लिपट गयी।


चनाब का पानी आज भी पहले-सा सर्द था, लहरें-लहरों को चूम रही थीं। सामने कश्मीर की पहाड़ियों से बर्फ पिघल रही थी। उछल-उछल आते पानी के भँवरों से टकराकर कगार गिर रहे थे लेकिन दूर दूर तक बिछी रेत आज न जाने क्यों खामोश लगती थी। शाहनी ने कपड़े पहने, इधर-उधर देखा, कहीं किसी की परछाईं तक न थी। पर नीचे रेत में अगणित पाँवों के निशान थे। वह कुछ सहम-सी उठी।


आज इस प्रभात की मीठी नीरवता में न जाने क्यों कुछ भयावना-सा लग रहा है। वह पिछले पचास वर्षों से यहाँ नहाती आ रही है। कितना लम्बा अरसा है ! शाहनी सोचती है, एक दिन इसी दरिया के किनारे वह दुल्हन बनकर उतरी थी और आज....


आज शाह जी नहीं, उसका वह पढ़ा-लिखा लड़का नहीं, आज वह अकेली है, शाहजी की लम्बी-चौड़ी हवेली में अकेली है। पर नहीं...यह क्या सोच रही है वह सबेरे-सबेरे। अब भी दुनियादारी से मन नहीं फिरा उसका। शाहनी ने लम्बी साँस ली और ‘श्रीराम, श्रीराम’ करती बाजरे के खेतों से होते घर की राह ली। कहीं-कहीं लिपे पुते आँगनों पर से धुआँ उठ रहा था। टन-टन बैलों की घंटियाँ बज उठती हैं। फिर भी...फिर भी कुछ-कुछ बँधा-बँधा-सा लग रहा है। शाहनी ने नजर उठायी। यह मीलों फैले खेत अपने ही हैं। भरी-भरायी नयी फसल को देखकर शाहनी किसी अचानक के मोह में भीग गयी। यब सब शाहनी की बरकतें हैं। दूर-दूर गाँवों तक फैली हुई ज़मीनें, ज़मीनों में कुएँ-सब अपने हैं। साल में तीन फसल, ज़मीन तो सोना उगलती है। शाहनी कुएँ की ओर बढ़ी, आवाज़ दी, ‘शेरे, शेरे, हसैना, हसैना...’’


शेरा शाहनी का स्वर पहचानता है। वह न पहचानेगा ! अपनी माँ जैना के मरने के बाद वह शाहनी के पास पलकर बड़ा हुआ। उसने पास पड़ा गँड़ासा ‘शटाले’ के ढेर के नीचे सरका दिया। हाथ में हुक्का पकड़कर बोला, ‘‘ऐ हसैना...सैना...शाहनी की आवाज़ उसे कैसे हिला गयी है। अभी तो वह सोच रहा था कि उस शाहनी को ऊँची हवेली की अँधेरी कोठरी में पड़ी सोने-चाँदी की संदूकचियाँ उठाकर...कि तभी ‘शेरे शेरे....’ शेरा गुस्से से भर गया। किस पर निकाले अपना क्रोध ? शाहनी पर चीखकर बोला, ‘‘ऐ मर गयीं एँ-रब्ब तैनू मौत दे...’’


हसैना आटे वाली कनाली एक ओर रख, जल्दी—जल्दी बाहर निकल आयी ‘‘ऐ आयी आँ...क्यों छाबेले (सुबह-सुबह) तड़पना एँ ?’’


अब तक शाहनी नज़दीक पहुँच चुकी थी। शेरे की तेज़ी सुन चुकी थी। प्यार से बोली, ‘‘हसैना, यह वक्त लड़ने का है ? वह पागल है तो तू ही जिगरा कर लिया कर।’’


‘‘जिगरा !’’ हसैना ने मान भरे स्वर में कहा, ‘‘शाहनी लड़का आखिर लड़का ही है। कभी शेरे से भी पूछा है कि मुँह-अँधेरे क्यों गालियाँ बरसायी हैं इसने ?’’ शाहनी ने लाड़ से हसैना की पीठ पर हाथ फैरा, हँसकर बोली, ‘‘पगली मुझे तो लड़के से बहू अधिक प्यारी है ! शेरे...’’


‘‘हाँ शाहनी !’’


‘‘मालूम होता है, रात को कुल्लूवात के लोग आये हैं यहाँ ?’’ शाहनी ने गंभीर स्वर में कहा।


शेरे ने जरा रुककर घबराकर कहा-‘‘नहीं...शाहनी !’’ शेरे के उत्तर को अनसुनी कर शाहनी जरा चिंतित स्वर से बोली, ‘‘जो कुछ भी हो रहा है, अच्छा नहीं। शेरे, आज शाह जी होते तो शायद कुछ बीच-बचाव करते। पर....’’ शाहनी कहते-कहते रुक गयी। आज क्या हो रहा है। शाहनी को लगा जैसे जी भरभर आ रहा है..शाह जी को बिछड़े कई साल बीत गये, पर...पर आज कुछ पिघल रहा है...शायद पिछली स्मृतियाँ आँसुओं को रोकने के प्रयत्न में उसने हसैना की ओर देखा और हल्के से हँस पड़ी। और सोच ही रहा है, ‘‘क्या कह रही है शाहनी आज ! आज शाहनी क्या कोई भी कुछ नहीं कर सकता। यह हो के रहेगा-क्यों न हो ? हमारे ही भाई-बंदों से सूद ले लेकर शाह जी सोने की बोरियाँ तोला करते थे। प्रतिहिंसा की आग शेरे की आँखों में उत्तर आयी। गँड़ासे की याद हो आयी। शाहनी की ओर देखा-नहीं-नहीं शेरा, इन पिछले दिनों में तीस-चालीस कत्ल कर चुका है पर..पर वह ऐसा नीच नहीं....सामने बैठी शाहनी नहीं, शाहनी के हाथ उसकी आँखों में तैर गये। वह सर्दियों की रातें-कभी-कभी शाह जी की डाँट खा के वह हवेली में पड़ा रहता था और फिर लालटेन की रोशनी में वह देखता है, शाह जी के ममता-भरे हाथ दूध का कटोरा थामे हुए, शेरे-शेरे उठ पी ले।’ शेरे ने शाहनी के झुर्रियाँ पड़े मुँह की ओर देखा तो शाहनी धीरे-धीरे से मुस्करा रही थी। शेरा विचलित हो गया। आखिर शाहनी ने क्या बिगाड़ा है हमारा ? शाह जी की बात शाह जी के साथ गयी, वह शाहनी को जरूर बचायेगा, लेकिन कल रात वाला मशविरा वह कैसे मान गया था। फिरोज की बात, ‘‘सब कुछ ठीक हो जायेगा...सामान बाँट लिया जायेगा।’’


शाहनी चलो तुम्हें घर तक छोड़ आऊँ।’’


शाहनी उठ खड़ी हुई। किसी गहरी सोच में चलती हुई शाहनी के पीछे-पीछे मजबूत कदम उठाता शेरा चल रहा है। शंकित-सा उधर-उधर देखता जा रहा है। अपने साथियों की बातें उसके कानों में गूँज रही हैं। पर क्या होगा शाहनी को मारकर ?


‘‘शाहनी !’’


‘‘हाँ शेरे ?’’


शेरा चाहता है कि सिर पर आने वाले खतरे की बात कुछ तो शाहनी को बता दे, मगर वह कैसे कहे ?


‘‘शाहनी...’’


शाहनी ने सिर ऊँचा किया। आसमान धुएँ से भर गया था। ‘‘शेरे...’’


शेरा जानता है यह आग है। जबलपुर में आज आग लगनी थी, लग गयी। शाहनी कुछ न कह सकी। उसके नाते-रिश्ते सब वही हैं।


हवेली आ गयी। शाहनी ने शून्य मन से ड्योढ़ी में कदम रखा। शेरा कब लौट गया उसे कुछ पता नहीं, दुर्बल-सी देह और अकेली, बिना किसी सहारे के न जाने कब तक वहीं पड़ी रही शाहनी। दुपहर आयी और चली गयी। हवेली खुली पड़ी है। आज शाहनी नहीं उठ पा रही है। जैसे उसका अधिकार आज स्वयं ही उससे छूट रहा है। शाह जी के घर की मालकिन...लेकिन नहीं, आज मोह नहीं हट रहा है मानो पत्थर हो गयी हो। पड़े-पड़े शाम हो गयी; पर उठने की बात फिर भी नहीं सोच पा रही। अचानक रसूली की आवाज सुनकर चौंक उठी।



Monday, November 2, 2009

शऊर की दहलीज: दहलीज लाँघने की कोशिश

से. रा. यात्री


शऊर की दहलीज प्रेमकुमार द्वारा उर्दू के चर्चित एवं शीर्षस्थ रचनाकारों से समय-समय पर किए गए साक्षात्कार की प्रस्तुति है। जाहिर है कि ये सब अपने-अपने क्षेत्रा के विशेषज्ञ हैं। यह एक तरह का एक ऐसा पारम्परिक एवं अन्तरंग संवाद है जिसमें प्रश्नोत्तरी का पारम्परिक रूप सिरे से गायब है। साक्षात्कर्त्ता पाठक और रचनाकार के मध्य हल्के से सूक्ष्म संकेत छोड़कर अलग हट जाता है और दोनों की एक-दूसरे की मानसिकता में आवाजाही का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।

शऊर की दहलीज में कुल नौ साहित्यकारों का आत्मस्वरूप उभर कर आया है। इनमें विधागत वैविध्य का भी विस्तार दिखाई पड़ता है।

आले अहमद सुरूर उर्दू साहित्य के एक उम्रदराज रचनाकार हैं।

प्रेमकुमार ने दस बारह प्रश्नों में ही सुरूर साहब की सृजनशीलता के छह-सात दशकों का व्यक्तित्व और कृतित्व अपनी सम्पूर्णता में रेखांकित कर दिया है। इस साक्षात्कार अथवा संवाद की विशेषता यह भी है कि यह एक ऐसी विभूति से किया गया है जो अठ्ठासी वर्ष को पार किए बैठी है, वार्धक्य के अलावा वह पक्षाघात की व्याधि से भी पीड़ित है। यह सुरूर साहब की अनथक जुझारूपन की वृत्ति ही है कि वह पूरी तरह से, बाहरी दुनिया से जुड़े रहने वाली ऊर्जा से पूरम्पूर हैं।

यद्यपि जज्बी एक बड़े तरक्की पसंद शायरों की श्रेणी में आते हैं पर उनका अटल विश्वास है कि हम ऊपर से आने वाले को मजबूर और लाचार हैं।... कब शेर हो जाए पता नहीं।' उनकी मशहूर ग़ज+ल भी-÷मरने की दुआएँ क्यों माँगू - जीने की तमन्ना कौन करे ' इसी ऊपर से आने वाले ग़ैबी चमत्कार की उपज है। इसी सन्दर्भ में बात को आगे बढ़ाते हुए उनकी सोच है - आपने राइटर्स को देखा है? न डिग्री, न बी०ए०, एम०ए० पर सब पर छाए हैं,... ये वही लोग हैं जिनमें महसूस करने का जबरदस्त माद्दा है। ऐसे लोग जिनका असर अवाम क़बूल करे कम होते हैं। इस हिसाब से हम कितने घटिया आदमी हैं।' (पृष्ठ ३२)

कुर्रतुलऐन हैदर से साक्षात्कार कतई सम्भव न हुआ होता यदि लेखक ने अपने आगे खड़ी समस्त बाधाओं को ध्वस्त करने के लिए कमर न कस ली होती। यही क्यों उस स्थिति में तो वह पूरी तरह उखड़ ही सकता था जब साक्षात्कार के ऐन क्षणों में कुर्रतुल की बचपन की सहेली फातिमा हैदराबादी का अनपेक्षित प्रवेश होता है।

प्रेमकुमार ने समस्त विपरीत परिस्थितियों को अपने परपज की ओर मोड़कर साक्षात्कार से सम्बद्ध सारा कुछ सार्थक निकाल लिया। उसने बहुत देर तक कुर्रतुल से सीधा सवाल न करके लेखिका के रहन-सहन रख-रखाव और उसके जीवन से जुड़े अनेक प्रसंगों के साक्षी वहाँ मौजूद पात्रों के माध्यम से एक तस्वीर खड़ी कर ली।

यदि प्रेम कुमार उन पन्द्रह सवालों में से जो उसने कुर्रतुलऐन हैदर से किए- एक भी न करता तब भी उसने लेखिका की निजता और जीवन पर्यन्त फैले सोच तथा व्यवहार के माध्यम से पाठक के सामने एक समूची, परिपक्व विभूति का बहिर्स्तर और कद्दावर कद प्रस्तुत करने में रिकार्ड सफलता प्राप्त कर ली होती।

इन्तजार हुसैन उर्दू कथा साहित्य प्रकारान्तर से पूरे साहित्य जगत की एक बड़ी हस्ती ठहरती है। प्रेम कुमार ने उन्हें कितने ही कोणों से कुरेदा है - कौंचा है और उनके व्यक्तित्व की पारदर्शिता को पूर्णता के साथ रूपायित कर दिखाया है।

जिन्दगी में प्रेम की उत्कट चाहत रचनाकार के शून्य को भरती है और साधारण आदमी की अपेक्षा उसे एक अलग तरह का अस्तित्व और अनुभव देती है। इन्तजार हुसैन स्वयं को प्रेम की दुर्लभ-भावना से वंचित महसूस करते हुए कहते हैं: जज्बाती एतबार से जिन्दगी खाली हो ऐसा नहीं है पर जो इश्क मेरे तसव्वुर में है उस तजुर्बे से नहीं आया कोई। (पृष्ठ ७२)

इन्तजार हुसैन ने वे सारी महानताएँ एक सिरे से खारिज कर दी हैं जिन्हें प्रायः रचनाकार ओढ़े फिरते हैं। उनका यह आत्मस्वीकार ही उन्हें बड़े रचनाकारों की पंक्ति में पांक्तेय बनाकर खड़ा करने के लिए पर्याप्त हैः हाँ... जिंदगी में एक कमी यह भी है कि मैंने कोई बड़ा गुनाह नहीं किया। वो करना चाहिए। बहुत बड़े सबाब का काम भी नहीं किया। क्यों क्या... इसका मतलब यह है कि मेरे यहाँ एडवेंचरस स्प्रिट नहीं है। (पृष्ठ ७२)

स्वयं को कठघरे में खड़ा करके अपने को अलग से व्याख्यायित करना और किसी तरह की रियायत अथवा छूट न लेना एक दुर्लभ गुण है जो बहुत ही कम रचनाकारों में पाया जाता है।

इस साक्षात्कार संकलन में प्रेमकुमार ने काजी अब्दुलसत्तार के संवाद को औपन्यासिक विस्तार दिया है। वह चाहे तो काजी के जीवनवृत्त पर एक अत्यन्त रोचक जीवनी भी प्रस्तुत कर सकते हैं।

काजी से साक्षात्कार का निहितार्थ है कि आप अजूबों के अजायबघर में दाखिल हो गए हैं। कोई कोना ऐसा नहीं जहाँ हठात्‌ ध्यान खींचने वाला ऐसा कुछ न कुछ विचित्रा बिखरा पड़ा न मिल जाए जिससे चकित न होना पड़े। कल्पना का विराट संसार, इतिहास, संस्कृति, परम्परा की अनन्त अबूझ, दीप्त मणियाँ। क्या कुछ नहीं है वहाँ?

प्रेमकुमार ने जितने धैर्य और व्यापक सन्दर्भों में गहरे उतरकर यह साक्षात्कार किया है और उसे कथारस से किंचित भी विरत नहीं होने दिया यह तो विलक्षण है ही साथ ही यह भी कम चकित करने वाला तथ्य नहीं है कि शुरू हो जाने पर कहीं विराम की जरा भी परवाह न करने वाले काजी साहब से वह सब कुछ निकाल लिया है जो उर्दू लेखन का बड़ा हासिल तो है ही - काजी की चतुर चितेर क्रूर' की छवियों का भी दुर्लभ एलबम है।

जोगिन्दर पाल के नजरिए से वही रचनाशीलता रेखांकित होती है जो सन्दर्भ बदल जाने पर नए प्रसंगों में भी अर्थ नहीं खोती। बहुत शोर मचाने वाली की जगह शब्दों में मितव्ययी रचना सच्चे अर्थों में सार्थक होती है। खामोशी गहरी हो जाने से मौन की भाषा स्वयंमेव व्यक्त होने लगती हैः जब आप दुख के शिकार हों या गहरे सोचते हों तो शोर नहीं मचाते... चुप होते हैं...

जोगिन्दर पाल मानते हैं कि एक सच्चे लेखक का विस्तार एक सतह यानी अपने समय के धरातल पर भी होता है और वह दूसरे वक्तों के धरातल पर भी प्रासंगिक होने की स्थिति में रहता है। रचना का असली स्वरूप रचना के भीतर से पैदा होना चाहिए न कि सतही किस्म के भाष्यों से।

कला की समस्या वहाँ पैदा होती है जहाँ लयात्मकता खंडित होती है। जोगिन्दर पाल के यह शब्द उल्लेखनीय हैं: शिव ने गाया विष्णु ने सुना यानी शिव को सुनने के लिए विष्णु बनना पड़ता है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि लेखक के मर्म में स्वयं को आत्मलीन करने वाले पाठक को समीक्षक की सलाहियत की कोई दरकार नहीं है।

डॉ० गोपीचंद नारंग का साक्षात्कार एक सही ढंग से पढे- लिखे और विचारधारा के मामले में सुलझे हुए अदीब की बातचीत का विस्तार है।

गोपीचंद नारंग साहित्य की दुनिया में कई स्तरों पर एक विवादास्पद व्यक्तित्व हैं इसलिए हमें उनके गुण दोषों पर विचार करने के बजाय उनकी विचारधारा को जानने समझने का प्रयास करना चाहिए।

यह पूरा साक्षात्कार जानकारियों और साहित्य के वैश्विक सरोकारों को इतनी सहजता से सामने रख देता है कि पाठक उसके प्रवाह में अनायास बहता चला जाता है। एक बहुपठित सर्जक रचनाशीलता के कितने आयामों को एक साथ अन्वेषित करता है - इस साक्षात्कार में यह तथ्य पूरी तरह निरूपित हुआ है।

शहरयार से प्रेमकुमार का लम्बा वार्तालाप साहित्य तथा संस्कृति की अनेकमुखी धाराओं के सिकुड़ते चले जाने की चिन्ता व्यक्त करता है। उर्दू काव्य जगत में शहरयार का अपना एक महत्त्वपूर्ण और गरिमापूर्ण स्थान तो है ही - साथ ही वैचारिक स्तर पर भी वह एक सुलझे हुए विचारक के रूप में परिलक्षित होते हैं। बड़े-बड़े विचारक, समाजशास्त्री, संस्कृतिकर्मी और साहित्यकार वर्तमान के चर्तुमुखी हा्रस को जिस तीव्रता से अनुभव कर रहे हैं - वह सब शहरयार के काव्य में पूरी शिद्दत से अभिव्यक्त होता है।

शहरयार का पक्का विश्वास है कि एक स्वस्थ समाज की स्थापना, साहित्य, कला, संस्कृति में विकास तभी सम्भव है जब कोई एब्सोल्यूट वैल्यू हो। इस सन्दर्भ में उनका यह कथन एक बड़े बयान के रूप में रेखांकित होना चाहिएः बड़ी शायरी जिस जमाने में पैदा होती है उसमें कुछ वैल्यूज को सब मानते हैं...। बहुत से शायर मिलकर शायद एक परछाईं हों बड़ी शायरी की, ये जो जल्दी-जल्दी चेंज आ रहे हैं वे किसी वैल्यू पर नहीं रुकने देते सोसायटी को, अच्छा, बुरा, हसीन, बदसूरत अब एव्सोल्यूट फार्म में नहीं हैं। जब तक एव्सोल्यूट वैल्यू न हो बड़ा कहाँ?

शहरयार अपने समकालीनों की अपेक्षा एक बिलकुल अलग तरह के शायर हैं। उनके प्रतीक भी दूसरे से अलग हटकर हैं। उनकी शायरी में रात, एकांत, अंधेरा खूब घने होकर आते हैं: जिधर अंधेरा है, तंहाई है, उदासी है, सफर का हमने वो सिम्त क्यों मुक़र्रिर की है। वह जागती आँखों से स्वप्न देखने के विश्वासी है। उनके प्रतीकों का अर्थ हमेशा एक- सा नहीं होता। परिवेश के अनुसार बिम्बों के स्वरूप और अर्थ में भी परिवर्तन होता है।

अहमद फराज पाकिस्तान और हिन्दुस्तान में एक ऐसे मकबूल शायर हैं (थे) जिनसे प्रेमकुमार ने उनकी मृत्यु से पहले उनकी पचहत्तर वर्ष की आयु में यह साक्षात्कार किया था।

भारत की प्रजातंत्र प्रणाली की अहमद फराज ने प्रशंसा की है पर साथ ही यहां की अनियंत्रित होती जनसंख्या पर उन्होंने चिन्ता भी व्यक्त की है। पाकिस्तान की खुले शब्दों में आलोचना करने में उन्होंने कोई झिझक नहीं दिखाईः हमारे यहाँ तो पूरी सोसायटी करप्ट कर दी गई है। अदालत, जनरल पुलिस थाना, कचहरी अस्पताल।

काव्य में वस्तु और उसके स्वरूप की अदायगी पर अहमद फराज की दृष्टि स्पष्ट है। वह मानते हैं कि विचार अपना फार्म स्वयं खोज लेता है। थाट कण्टेन्ट फार्म से ज्यादा महत्त्व रखता है, इमोशन अपने लिए कंटेनर खुद ढूंढते हैं। इसीलिए मुख्तलिफ फार्मस्‌ में मुख्तलिफ जज्बात ढल सकते हैं।

भाषा और शब्दों के महत्व पर उनके विचार हैं -शायर को लफ्जों में इंतखाब में एहतियात की जरूरत होती है।

शऊर की दहलीज हाथ में लेने पर मेरे मन में जो पहला सवाल उठा था वह यह था कि मैं इसे क्यों पढूँ? मैंने उर्दू साहित्य का कभी विधिवत्‌ अध्ययन नहीं किया। लम्बे समय से उर्दू के कुछ बड़े नामों से सिर्फ इसलिए परिचित हूँ कि वह बार-बार सामने आते रहे हैं। आज तो उर्दू लिपि से वह भी अनभिज्ञ हो चुके हैं जिन्हें पारिवारिक विरासत के रूप में उर्दू और उर्दू अदब मिला था - फिर बाकी का तो कहना ही क्या? ऐसी अधूरी और अधकचरी समझ के चलते उर्दू अदब की शऊर की दहलीज में झाँकना अनाधिकार चेष्टा ही कही जाएगी।

पर चूँकि पुस्तक नागरी लिपि में है इसलिए पढ़ने की गुंजाइश तो बनती ही थी और मैंने गहरी दिलचस्पी महसूस करते हुए पूरे साक्षात्कार पढ़ डाले। मैंने इन साक्षात्कारों को पढ़ने के बाद अनुभव किया कि भले ही मैंने उर्दू के अदीबों का साहित्य नहीं पढ़ा पर उनके विराट स्वरूप से एक अंतरंग परिचय तो इन साक्षात्कारों के माध्यम से पा ही लिया।

प्रेमकुमार ने गहरी जानकारी और असीम धीरज के बुलबूते उर्दू के उन सभी श्रेष्ठ साहित्यकारों से सार्थक संवाद स्थापित किया है जो आज हिन्दी के असंख्य पाठकों के लिए अपरिचित नहीं रह गए हैं। संवाद शैली और सहज भाषा में प्रेमकुमार ने सभी नौ साहित्यकारों की सामर्थ्य और सीमाओं को रेखांकित किया है, रचनात्मकता और रचना प्रक्रिया के सूक्ष्मातिसूक्ष्म बिन्दुओं की तलाश की है और यह भी कि वह अपने समकालीनों के बारे में क्या राय रखते हैं।

कुल मिलाकर यह सभी साक्षात्कार हमारे समय के जीवन्त दस्तावेज हैं और अपनी आत्यन्तिकता में अनोखे हैं। इनका अन्दाज और तेवर इनकी एक अलग तरह की विशेषता को रेखांकित करते हैं।

समीक्षक- से. रा. यात्री

एफ/ई. ७ , नया कवि नगर, गाजियाबाद





Sunday, November 1, 2009

किस्मत का उपहास

SEEMA GUPTA



हर बीता पल इतीहास रहा,
जीना तुझ बिन बनवास रहा


ये चाँद सितारे चमके जब जब
इनमे तेरा ही आभास रहा


चंचल हुई जब जब अभिलाषा,


तब प्रेम प्रीत का उल्लास रहा,


तेरी खातिर कण कण पुजा


पत्थरों में भगवन का वास रहा


विरह के नगमे गूंजे कभी
कभी सन्नाटो का साथ रहा


गुजरे दिन आये याद बहुत


"किस्मत" का कैसा उपहास रहा.