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Showing posts from April, 2010

विभाजनोपरान्त मुस्लिम रचनाकारों की अनुभूतिजन्य अभिव्यक्ति

डॉ. मो. फिरोज़ अहमद


रचनाकार द्वारा निर्मित पात्र, उसका आचार-विचार सामाजिक प्राणी जैसा ही होता है। रचनाकार इसे अपने अनुभवों के आधार पर निर्मित करता है। किसी भी पात्र से जुड़ी आत्मीयता, संवेदना तथा अपनत्व रचनाकार के मानस से जुड़ना होता है। उपन्यास, कहानी, निबंध एवं नाटक आदि रचनाकार की अनुभूतिगत कलात्मक अभिव्यक्ति है। वह घटनायें एवं परिस्थितियाँ जिससे रचनाकार प्रभावित हुआ तथा उसे अभिव्यक्ति देने हेतु प्रेरित हुआ जो कि रचना के सृजन हेतु यह तथ्य विशेष रूप से महत्तवपूर्ण है। रचनाकार की सफलता उसकी समसामयिक संदर्भों से जुड़ी सशक्त अभिव्यक्ति में निहित है। भारत विभाजन की घटना, देश के लिये सबसे बड़ी त्रासदी थी जिसने पूरे देशवासियों के जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया, स्वातंत्र्योत्तर उपन्यासों में उपन्यासकारों द्वारा विभाजन का भोगा गया तिक्त अनुभव जीवन्त रूप से चित्रित किया गया है। इस त्रासदी ने सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था को ही नहीं साथ में सम्पूर्ण जनसामान्य की मानसिकता को भी प्रभावित किया जिसे सर्जक ने गहराई से अनुभव किया है और उसे अपनी कृति में अभिव्यक्ति प्रदान की है।


राही मासूम रज़ा ने विभाजनोपरान्त…