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कर्ज का बोझ

- सिद्धेश्वर
रीतेश सख्त बीमार था। दो दिनों तक बेहोश रहा। आज उसकी तबीयत कुछ सुधरी। उसके रिश्तेदारों-मित्रों को, जैसे-जैसे, उसके बीमार होने की खबर मिलती गयी, उससे मिलने-जुलने के लिए, लोग अस्पताल पहुँचने लगे।
आज तीसरे दिन रीतेश के बाबूजी सोच रहे थे - भगवान की कृपा है, उनके रिश्तेदार-मित्र तन-मन-धन से उसे सहयोग दे रहे हैं। वरना उसके पास तो केवल पाँच हजार रुपये थे। अब तक १२ हजार रुपये खर्च हो गए, इन तीनों के इलाज में। सरकारी अस्पताल तो बस नाम का है। एक्स-रे से लेकर दवा तक बाजार से करनी पड़ती है। पता नहीं गरीब मरीजों का कैसा इलाज होता होगा। ...
इतना आर्थिक सहयोग मिलने के बाद भी वह किसी भार से दबा कराह रहा था। इन दो दिनों में २०-२२ रिश्तेदार और मित्र आएं। सभी ने यही कहा - पैसे की जरूरत पड़े तो आप बेझिझक बोलियेगा, श्यामजी! आखिर हम आपके कब काम आएंगे?
रीतेश के बाबूजी श्याम को बिना मुँह खोले बीस हजार रुपये तक का उधार मिल गया था। किस्मत अच्छी थी। वरना आज के जमाने में वक्त आने पर उधार भी कौन देता है? ... वह मुँह खोलकर उधार मांगे तो १५-२० हजार रुपये और मिल जाए। ..
लेकिन, आखिर कितना रुपया उधार मांगे वह? सिर्फ उधार तो लेने से, उसकी चिंता खत्म नहीं हो जाएगी न! जितना कर्ज बढ़ेगा, चिंता भी उतनी ही बढ़ेगी। जितना अधिक कर्ज, उतनी अधिक चिंता। ... अब तक जितना कर्ज ले चुका हूँ, उससे उबरने में ही, न जाने कितने साल लगेंगे!
वह हाथ-पांव बांधकर खर्च कर रहा था। न जाने कब, कौन-सी दवाएँ लानी पड़े, एक्स-रे करवाना पड़े। ...
आज के दिन जब श्यामल और संतोष उसके बेटे का हालचाल लेने अस्पताल आया, तो न जाने क्यों, उसके दिल को बहुत तसल्ली मिली। अब तक जिन्होंने रुपये-पैसे से सहयोग देने की बात कहकर चले गए और उन लोगों से और अधिक रुपये-पैसे कर्ज लेने की हिम्मत जुटा नहीं सका, न मांग सका। उनसे कहीं बेहतर ये दोनों मित्रा लगे, श्याम को। उनके सहयोग से न तो दबा जा रहा था, न तो मानसिक तनाव में बढ़ोत्तरी हो रही थी। क्योंकि उसके मित्रा श्यामल दो किलो वजन का हॉर्लिक्स और संतोष एक-एक किलो सेब, अनार का पैकेट लेता चला आया था।
यह ऐसा सहयोग था जिसके बदले उधार लौटाने की पीड़ा नहीं झेलनी पड़ रही थी। ... अब तक तो वह, उधार देने की चिंता में, यह भूल ही गया था कि अपने बीमार बच्चे के लिए, दवा-दारू के अतिरिक्त, हॉर्लिक्स और फलों की भी जरूरत होती है।

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