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द्वंद्व

रवींद्र्र कुमार खरे
न जाने कितनी संगोष्ठियॉं हो चुकी हैं
नारी सशक्तिकरण के लिये़
कितनों ने अपने वक्तव्य पढ़ डाले
कितने प्रबुद्धों ने अपने भारी भरकम
विचार थोप डाले दूसरों के ऊपर।
स्वच्छंदता की लड़ाई़
अस्मिता की लड़ाई़
आजादी का आंदोलऩ
विचारों की आजादी
भूखे भेड़ियों से युद्ध़
संबंधों में खुलापऩ
खुले आसमान में विचरण़
और आत्मसत्ता की बात़
मर्यादाओं की बलि चढ़ाना।
पर
नग्नता का चटखारापऩ
नवांकुरों पर भेड़ियों की
भूखी नजर
पिंजरे में कैद मैना़
आंखों में बलात्कारी नजर का
तीखापऩ
उपेक्षा की शिकाऱ
हर समय मर्यादाओं का बोझ लादे़
घूंघट में स्त्री़
नहीं बदल रहा है समाज।
मानसिक पक्षाघात है
यह।
हम सिर्फ गोष्ठियों तक ही
सीमित रह सकते हैं।
पुरूष सत्ता अभी भी काबिज
स्त्री पुरूष समानता
क्या यह द्वंद्व
कभी खत्म नहीं हो सकता
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