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तुम्हारे पत्र

- डॉ0 भगवतशरण अग्रवाल
मन की भाषा
भाग्य की लिपि में लिखे -
तुम्हारे पत्र।
बरसते भादों की रात में
जीर्ण हुआ सूत्र तोड़
अचानक ही खोल बैठा
और अचकचा गया।
तुम्हारी रजनीगंधा सी श्वासों से सुवासित वे पत्र
जगह जगह धुँधिया गये हैं;
यकीन ही नहीं होता?
पतझर के पत्तों से
विभिन्न रंग ले बैठे हैं कागज
और अक्षर -
कहीं है,
कहीं नहीं!
कहीं मेरी नजर ही तो कमजोर नहीं पड़ गई?
पत्रों में रखे फूल;
छोटी छोटी अन्य वस्तुयें
जन्म-दिन की याद दिलाता रेशमी रूमाल;
मोर के पंख का चन्द्र;
बालों की चिमटी
और उसमें अब भी फँसे किशोर-बाल;
जीवन के सुनहरे खण्ड के मार्मिक इतिहास के जीवंत चित्र!
वर्षा से भीगे बोझिल अंधकार में
बोलने नहीं, चीखने चिल्लाने लगे हैं मोर
घूँघट खोलने लगी है चंचला
बेसुध दौड़ा, भागा चला जा रहा है पवन
मन के दरवाजे पर दस्तकें दे रहा है अतीत...
दुखी होने के लिये
किसी अन्य द्वारा सताया जाना
जरूरी तो नहीं?

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