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एक किस्सा : एक सवाल

- नदीम अहमद 'नदीम'
महज चौदह साल की अबोध बालिका
किसी की बहन, किसी की बेटी!
किसी की लाड़ली पोती!
या किसी की चुलबुली नातिन!
अपने स्कूल की होनहार छात्रा,
जिसने ढंग से सपने भी
देखने शुरू न किये हों!
हाँ! मगर सपने देखे थे, उसकी माँ ने
ख्वाब देखे थे उसके बाबा ने।
कुछ सोचा होगा उसके दादा ने,
जब बैठी होगी वो उनकी गोद में,
और अपने मासूम रेशम से
हाथों को बढ़ाया होगा उसके चश्में तक!
चहुँ ओर वात्सल्य की वर्षा में भीगी
उस मासूम बिटिया को अचानक इक दिन
'धनंजय' से दरिन्दे की आँखें रूपी
भट्टियों में धधकती वासना की आग,
पलभर में झुलसा कर, कर देगी राख।
यह सोचा भी न था, किसी ने।
उस लाडली बच्ची को बनाकर
अपनी हवस का शिकार और
उसके अहबाब को, ख्वाबों को कुचलने वाला
जालिम फिर भी, चौदह साल की
तवील जिन्दगी जी गया, 'खैरात' में।
जबकि उसे तो हक़ न था एक पल भी
जिन्दा रहने का, उस कमजर्फ दरिन्दे
की मौत के फ़रमान, पे दुख जताने वाली
'महाश्वेता देवी' और उन जैसी
जेहनियत वाले दीगर चन्द लोगों से
करता हूँ एक सवाल?
'क्या तब भी आपका रहता यही ख्याल,
ग़र होता आपके घर परिवार का
कोई फ़र्द इस हादसे का शिकार?''

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