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खोज सूरज की

डॉ0 आलोक गुप्त
बड़ी विकलता थी
देखने की
सूरज को उगते हुए
कुछ तो ठीक से
सोये भी नहीं थे
जगा दिया गया था उन्हें भी
भिनसारे ही पहुँच गए थे
ईडरिया गढ़ पर
खोज कर रहेंगे
उगते सूरज को
देखेंगे कि
कैसे तोड़ता है वह
रात का इन्द्रजाल
कैसे-कैसे परिवर्तन होते हैं
क्षितिज में
पहली किरन के जादू को
देखना चाहते थे हम
खोज रहे थे ऐसी जगह
देख सकें जहाँ से
उगते हुए सूरज को
वह जो हमारे आँखों में था
देखना चाहते थे
उगते हुए
दौड़ रहे थे सभी साथी
कहीं देर न हो जाए
और सूरज निकल जाए
तभी दिखाई दिया
एक आदमी
चला जा रहा था
अपने में खोया हुआ
सुनो भाई!
हमने आवाज दी
सूरज किधर उगेगा
पता नहीं
उसने अच्छी तरह
सुना या नहीं
चलते-चलते ही बोला
पूरब में
नहीं रहा गया हमसे
हममें से एक
पूछ ही बैठा
पूरब किधर है
अब चौंकने की बारी उसकी थी
तभी पहाड़ी की ओर से
अचानक
हँस पड़ा सूरज
बिखराकर किरनीली हँसी
बोला -
खोज रहा था मैं भी तुम्हें
चलती रहती है
यह खोज
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