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ग़ज़ल

डॉ० अनिल गहलौत
देखकर तुमको हृदय बादल हुआ है
तुम मिले तब प्राण गंगाजल हुआ है
मुख हुआ सूरजमुखी देखा तुम्हें जब
स्वच्छ मन उगता हुआ शतदल हुआ है
मत करो श्रृंगार आगे और अब तुम
उर तुम्हारी आँख का काजल हुआ है
जब कभी तुम रूठ कर बैठे अलग हो
जिस्म मेरी रूह का घायल हुआ है
दूर तुम क्या, हो गये अजगर हुए क्षण
मूक पर्वत-सा कठिन हर पल हुआ है
जिस घड़ी जीना पड़ा तुमसे बिछुड़कर
राजपथ जैसा समय दलदल हुआ है
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