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आँसू

सीमा सचदेव
आँसू इक धारा निर्मल,
बह जाता जिसमें सारा मल
धो देते हैं आँसू मन,
कर देते हैं मन को पावन
हो जाते हैं जब नेत्र सजल,
भर जाती इनमें अजब चमक
बह जाएँ तो भाव बहाते हैं,
न बहें तो वाणी बन जाते हैं
उस वाणी का नहीं कोई मोल,
देती ह्रदय के भेद खोल
उस भेद को जो न छिपाता है,
वह कलाकार कहलाता है
उस कला को देख जो रोते हैं ,
अरे,वही तो आँसू होते हैं

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