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नदीम अहमद ‘नदीम’ की लुघकथाएं

एक ही सफ में

सरफराज साहब शहर में आला सरकारी अफसर है। जुमे की नमाज़ ज़रूर पढ़ते है। सोचते हैं सप्ताह में एक बार तो कम से कम मालिक की इबादत मस्जिद में सामूहिक रूप से कर सके। सरफराज साहब अत्यन्त विनम्र एवं सुलझे विचारों के इन्सान है। दिनभर घर कार्यालय में लोगों की जी हुजूरी से परेशान हो जाते हैं। सोचते थे मस्जिद में एक सामान्य आदमी की तरह दो घण्टे सुकून से गुज़ारेंगे। एक दिन तो हद हो गई। सरफराज साहब किसी कारणवश मस्जिद देर से पहुंचे पीछे की पंक्ति में जगह मिली बैठने ही वाले थे कि आगे की सफ (पंक्ति) में बैठे अली ने उन्हें आगे की सफ में आने की दावत दी। लेकिन सरफराज आगे की सफ में नहीं गए जहां मिली वहीं बैठ गए।

नमाज़ के बाद सरफराज साहब मस्जिद के मुख्य द्वार के पास अली की प्रतीक्षा करने लगे। अली बाहर आया। साहब उसके कंधे पर हाथ रखकर दूसरी तरफ ले गए। बोले ‘अली साहब कभी भी आदमी को उसके रूतबे नहीं आंकना चाहिए।’ खासतौर पर मस्जिद में क्या आपने यह शेर नहीं सुना ‘‘एक ही सफ में खड़े हो गए महमूदों अयाज, न कोई बन्दा रहा न बन्दा नवाज़’’ अली शर्मिन्दा था। उनके मँुह से शब्द नहीं निकल रहे थे।

आॅब्लाईज

बैंक मंैनेजर के मृदु व्यवहार से राहुल बहुत खुश था उसकी सारी आशंकाएं निर्मूल सिद्ध हो रही है। मैंनेजर बिल्कुल दोस्त के सदर्श व्यवहार कर रहा था। बैंक से मकान ऋण स्वीकृत हो गया। राहुल को महज हस्ताक्षर या बैंक द्वारा चाहे गए दस्तावेज उपलब्ध करवाने के अतिरिक्त कुछ नहीं करना पड़ा। बैंक के चक्कर लगाने जैसी कोई बात नहीं थी। राहुल तो अपने मिलने वाले हर व्यक्ति से बैंक मैंनेजर की तारीफ कर रहा था।

एक दिन बैंक मंैनेजर का फ़ोन राहुल के मोबाईल पर आया। बोले राहुल के साथ चाय पीना चाहते हैं। राहुल खुश था मैनेजर साहब आए औपचारिक बातों के बाद निजी इंश्योरेंस कम्पनी की योजनाओं की जानकारी देने लगे। बताया कि उनका बेटा के बाद एजेन्ट है और मंैनेजर साहब ने अधिकार पूर्वक एक फाॅर्म राहुल की ओर दस्तख्त के लिए बढ़ा दिया। बैंक मैंनेजर का मृदु व्यवहार अब राहुल के लिए चिन्तन का विषय था।

वक्त-वक्त की बात

शहर के नामी सेठ हजारी की कोठी दुल्हन की तरह सजी थी, अवसर था उनकी बेटी

शेष भाग पत्रिका में..............

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