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तनी हुई मुट्ठी में बेहतर दुनिया के सपने

अशोक तिवारी

ये उस दौर की बात है जब मैं बारहवीं पास कर अलीगढ़ की ऐतिहासिक ज़मीन पर आगे की पढ़ाई करने के लिए आ चुका था। कोर्स की किताबों के अलावा मेरे और जो शौक थे उनमें एक था पत्रिकाएं पढ़ना। इन पत्रिकाओं में साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग, सारिका इत्यादि थे। सारिका पत्रिका के अंकों का मुझे इंतज़ार रहता था। मिलते ही चाट जाता। इन्हीं अंकों में उन दिनों ईरान पर कोई लेख छपा था। पढ़ा मगर बांध नहीं पाया। इसी संदर्भ में कुछ दिन बाद साप्ताहिक हिंदुस्तान में भी एक लेख छपा। पढ़ा। लेख से ज़्यादा ये रिपोर्ताज था। मैंने दोनों को मिलाकर पढ़ा। कुछ-कुछ चीजे़ स्पष्ट हुईं किंतु महज़ इतनी ही कि ईरान में जो हो रहा है, अच्छा नहीं हो रहा है। दोनों ही लेख एक ही लेखक के थे - नासिरा शर्मा। नासिरा शर्मा के साथ ये मेरा पहला साक्षात्कार था। नासिरा भी और शर्मा भी। वाह! बिल्कुल नया नाम - एक ऐसा नाम जिसमें एक ओर जहां चार सौ साल पुरानी दीने-इलाही धर्म की महक आती थी वहीं दूसरी ओर प्रगतिशील सोच की एक जि़दा तस्वीर सामने कौंध जाती थी।

क़रीब 27-28 साल बाद नासिरा शर्मा के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के साथ गहनता से बावस्ता हुआ। नासिरा शर्मा का साहित्य के क्षेत्रा में जितना योगदान है, उतना ही योगदान साहित्येतर लेखन में भी है। समाज के गूढ़ अंतर्विरोधों को आपने न केवल अपनी कहानियों, उपन्यासों में उकेरा है बल्कि आपने साहित्येतर लेखन में भी उल्लेखनीय योगदान दिया है। आपके साहित्य में एक ओर जहां मानवीय मूल्य एवं सरोकारों की गूढ़ संरचना होती है वहीं दूसरी ओर आमजन के पक्ष में खड़ा होकर आवाज़ को बल देने के सूत्रा भी मौजूद होते हैं।

जाॅर्ज डब्ल्यू. बुश की तबाही के मंजर पूरी दुनिया ने देखे हैं - क्या अफ़ग़ानिस्तान, क्या इराक़़़, दुनिया का हर मुल्क उसकी साम्राज्यवादी नीति की मुख़ालफत करता रहा है। (चंद साम्राज्यवादी नीतियों के पोशक देशों की सरकारों को छोड़कर) बुश की नीतियों का असर दुनिया के और देशों पर ही नहीं स्वयं अमरीका पर भी पड़ा है। अमरीका की साम्राज्यवादी पिपासा शांत होती नज़र नहीं आती। इराक़ और ईरान दो ऐसे देश हैं जो मध्य-पूर्व के सांस्कृतिक इतिहास के बनने बिगड़ने के लिए शुरू से ही साक्षी रहे हैं।

साम्राज्यवाद की एक महती ज़रूरत है चीज़ों को तोड़ते चले जाने की और टूटती चीज़ों पर दिखावटी आंसू बहाने और आंसू पोंछने के बहाने संवेदनाआंे पर क़ब्ज़ा कराने की। साम्राज्यवादी देश उन जगहों पर इस सबमें आसानी से सफल हो जाते हैं जहां पर देश में पहले से ही किसी न किसी स्तर पर असंतोष हो। उसी असंतोष का फ़ायदा.............................................शेष भाग पढ़ने के लिए पत्रिका देखिए











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