Skip to main content

ग़ज़ल

नीरज गोस्वामी


सीधी बातें सच्ची बातें
भूले सारी अच्छी बातें

ठंडे मन से गर कर लो तो
हो जाती सब नक्की बातें

जीवन में लज्जत ले आती
उसकी मीठी खट्टी बातें

बढ़ जाती है उसकी पीड़ा
दिल में जिसने रख्खी बातें

मत ले लेना दिल पर अपने
उसकी पक्की कच्ची बातें

हासिल क्या होता है करके
बे मतलब की रद्दी बातें

जीवन जीना सिखलाती है
माँ की लोरी,पप्पी,बातें

सीखी हमने जो पुरखों से
अब लगती हैं झक्की बातें

उलझें तो ना सुलझें नीरज
ज्यूँ धागे की लच्छी बातें
द्वारा - चाँद शुक्ला हदियाबादी
www.radiosabrang.com

Comments

Popular posts from this blog

सवाल उर्दू का -राही मासूम रज़ा

चित्र पर क्लिक करें और पढ़े ।

हिन्दी साक्षात्कार विधा : स्वरूप एवं संभावनाएँ

डॉ. हरेराम पाठक हिन्दी की आधुनिक गद्य विधाओं में ‘साक्षात्कार' विधा अभी भी शैशवावस्था में ही है। इसकी समकालीन गद्य विधाएँ-संस्मरण, रेखाचित्र, रिपोर्ताज, आत्मकथा, अपनी लेखन आदि साहित्येतिहास में पर्याप्त महत्त्व प्राप्त कर चुकी हैं, परन्तु इतिहास लेखकों द्वारा साक्षात्कार विधा को विशेष महत्त्व नहीं दिया जाना काफी आश्चर्यजनक है। आश्चर्यजनक इसलिए है कि साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा साक्षात्कार विधा ही एक ऐसी विधा है जिसके द्वारा किसी साहित्यकार के जीवन दर्शन एवं उसके दृष्टिकोण तथा उसकी अभिरुचियों की गहन एवं तथ्यमूलक जानकारी न्यूनातिन्यून समय में की जा सकती है। ऐसी सशक्त गद्य विधा का विकास उसकी गुणवत्ता के अनुपात में सही दर पर न हो सकना आश्चर्यजनक नहीं तो क्या है। परिवर्तन संसृति का नियम है। गद्य की अन्य विधाओं के विकसित होने का पर्याप्त अवसर मिला पर एक सीमा तक ही साक्षात्कार विधा के साथ ऐसा नहीं हुआ। आरंभ में उसे विकसित होने का अवसर नहीं मिला परंतु कालान्तर में उसके विकास की बहुआयामी संभावनाएँ दृष्टिगोचर होने लगीं। साहित्य की अन्य विधाएँ साहित्य के शिल्पगत दायरे में सिमट कर रह गयी...

aadaba