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मंहगाई

रवींद्र कुमार खरे

मैंने पूछा मंहगाई रे मंहगाई
तूने कमर तोड़ दी रे बाई
तू कहॉं से आई
आज कल तू हर जगह है छाई।
बोली मैं कहॉं से आई
तुमने ही तो अपने मन में
न जाने कितनी इच्छाऐं जगाईं।
मुझे क्यों दोष देते हो भाई
मैनें पूछा कैसे
बोली जनसंख्या बढ़ाई¸
अशिक्षा बढ़ाई¸
जरूर बढ़ेगी मंहगाई
मैने कहा क्या हो नहीं सकती इसकी भरपाई
बोली वैश्वीकरण की भेड़ चाल में तु़मने
विषमता है बढ़ाई¸
अब क्यों देते हो दुहाई
जरूर बढ़ेगी मंहगाई।
मैंने कहा जरा खुल कर बताओ।
हमारी गल्तियों को गिनाओ।
हंस दी मंहगाई।
यौवन भरा पूरा था उसका
उसने ली ऍंगड़ाई।
बोली जितनी भूख बढ़ाओगे।
उतना मुझे करीब पाओगे।
भोजन के साथ साथ तुम्हे
अच्छे कपडे़¸जो तन भी ढॅक सकते नहीं
तुम्हे चाहिये।
छह फुट के आदमी हो¸
रहने के लिये महल चाहिये।
लंबी लंबी और आलीशान तुमको¸
विदेशी गाड़ियॉं चाहिये।
विषमताऐं चाहिये¸ ताकि तुम्हें
समाज में इज्ज़़्ात मिले।
तुम्हारी प्रसंशा के हर गली
में फूल खिलें।
तुमने न शिक्षा पर जोर दिया¸
न तुमने अज्ञानता दूर किया।
साल दर साल बस बच्चों को
पैदा किया।
जनसंख्या का जो विस्फोट हुआ¸
कि सारे देश को सोख लिया।
तुम्हे मालूम है¸ यह जो भुखमरी है¸
मेरी पुरानी सहचरी है।
पर विडंबना देखो¸
किसी का पेट खराब है¸
और किसी की भूख से¸
हालत खराब है।
अरे खाने की चीजें मिलती नहीं ¸
पर बिकती हर जगह शराब है।
तुम ही मुझे पूजते हो¸
और बाद में मुझसे खीझते हो।
कैसा चरित्र है तुम्हारा
मुझे तो नहीं गवारा।
छोड़ कर मैं तुमको चली जाऊॅंगी¸
जिस दिन तुम्हारे व्यवहार में अंतर पाऊॅंगी।
अपनी आदतें सुधारो¸
अंतर्मन को पुकारो¸
हर समय रोते रहना ¸
अच्छी बात नहीं है।
''मंहगाई हटाओ'' के नारे भर से¸
आंदोलन की होती शुरूआत नहीं है।
कब तक दूसरों को कोसते रहोगे¸
कब तक घुट घुट मरोगे¸
छोड़ दो विदेशी होना¸
सीख लो स्वदेशी होना¸
जरूर चली जाऊॅंगी ¸
वापस नहीं आऊॅंगी।
सुंदरता और माया की देवी ने¸
मेरे गल थपथपाये।
उसके सुंदर होंठ जरा जरा मुस्काये।
मैं मूक होकर खड़ा था।
अंतर से लड़ रहा था।
शायद यही है सच्चाई¸
इसीलिये यह मंहगाई¸
हर जगह है छाई।
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३०७¸ रागास्‌ रेसीडेन्सी¸
हैदराबाद ५०००१९
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