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दलित मुसलमानों की सामाजिक त्रासदी

डॉ० तारिक असलम
भारतीय समाज की यह कैसी विडम्बनापूर्ण त्रासदी है कि यहाँ की बहुसंख्यक जातियां दलितों के रूप में पहचान रखती हैं, जिसमें से कुछ एक जातियों को राज्य एवं केन्द्र के आरक्षण पैनल में विशेष महत्त्व प्रदान किया गया है और बहुत सारी जातियों को नजरअंदाज कर दिया गया है। इस मुद्दे पर मेरी सोच थी कि मुसलमानों के लिए आरक्षण की मांग करना सर्वथा अनुचित है, दूसरे यदि आरक्षण देना अनिवार्य है तो फिर समस्त जातियों में ऐसे परिवारों या व्यक्तियों की पहचान होनी चाहिए जो आर्थिक रूप से पिछड़े हैं और अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान को बनाये रखने में असक्षम सिद्ध हुए हैं।वर्तमान आरक्षण व्यवस्था के अनुसार अनुसूचित एवं जन जातियों को सर्वाधिक सुविधाएं मिली हैं और उन्होंने सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक स्तर पर विकास भी किया है। जिसके बाद होना यह चाहिए था कि जिन जातियों को आरक्षण की सुविधा मुहैया करायी गई और उन परिवारों के सदस्यों ने स्वालम्बन की दिशा में चहुंमुखी प्रगति दर्ज की। उनको आरक्षण से वंचित करते हुए, उसी समूह के अन्य व्यक्तियों को लक्ष्य समूह की सुविधाएं मिलें किन्तु सामाजिक स्तर पर देखने को यही मिल रहा है कि जिन अनुसूचित जातियों एवं जन जातियों को ''विशेष अभियान'' के तहत सरकारी सेवाओं, संस्थानों, पब्लिक सेक्टर कम्पनियों आदि में नियुक्तियां हो रही हैं। वे कुछ परिवार ही नाली के कीड़े सी जिन्दगी छोड़कर विलासितापूर्ण जीवन यापन में संलग्न दिख रहे हैं। ऐसे कई एक परिवारों के मूल्यांकन के बाद में इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि जो अपना जीवन स्तर सुधारने में सफल हो गया। वह व्यक्ति भी अपने परिवार के पीछे रह गए लोगों से कन्नी काटता है और उनके प्रति घोर अन्यायपूर्ण, अनुचित व्यवहार करता प्रतीत होता है।एक ओर देश भर में सरकारी स्तर पर चल रही विकास योजनाओं में विशेषकर गृह निर्माण संबंधी सामान्य इन्दिरा आवास योजना एवं प्रधानमंत्री आवास योजना के अन्तर्गत जिला उप विकास आयुक्त के द्वारा सरकारी निर्देश के आलोक में न्यूनतम ६० प्रतिशत आवास निर्माण एवं मरम्मती कार्य की स्पष्ट अनुशंसा की जाती है और इस प्रतिशत से कम लाभार्थियों के चयन पर दंडित करने संबंधी कार्रवाही का उल्लेख होता है। दूसरी ओर इन्हीं योजनाओं में अत्यंत पिछड़ी जाति को १७ प्रतिशत विकलांग एवं अन्य को ३ प्रतिशत, पिछड़ी जातियों को १० प्रतिशत तथा अल्पसंख्यक को भी १० प्रतिशत लाभ देने का आदेश है। गौरतलब सवाल यह है कि बहुत सारे प्रखंड क्षेत्रों में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जन जातियों की संख्या काफी कम होने के बावजूद मानक प्रतिशत के अनुरूप लक्ष्य प्राप्ति पर जोर दिया जाता है, जिससे पंचायतों के मुखियाओं के समक्ष एक गंभीर समस्या खड़ी हो जाती है क्योंकि उनके पंचायत में अल्पसंख्यकों की जनसंख्या अधिक होती है अब यदि एक पंचायत में कुल दस यूनिटें गृह निर्माण हेतु प्राप्त होती हैं तो उसमें मुसलमानों का हिस्सा मात्र एक यूनिट बनता है। इस संबंध में पंचायत समिति के अलावा प्रमुख द्वारा आयोजित बैठकों में प्रस्ताव पारित कर जिला पदाधिकारी एवं जिला उप विकास आयुक्त को पत्र लिखने के साक्ष्य भी उपलब्ध हैं किन्तु उन कार्यालयों से कभी कोई तर्क संगत उत्तर प्राप्त नहीं हुआ।बिहार राज्य की पिछड़ी एवं अत्यंत पिछड़ी जातियों के वर्णन से पूर्व मैंने यह स्पष्ट करना आवश्यक समझा तो इसके कई कारण हैं जैसे कि बिहार में अल्पसंख्यक वित्त निगम, जिला उद्योग केन्द्र, स्वर्ण जयंती ग्रामस्वरोजगार योजना आदि के अन्तर्गत भी आम मुसलमानों को आर्थिक सहायता अथवा ऋण दाल में नमक के बराबर ही उपलब्ध होता है। मैंने बहुत करीब से देखा है कि यदि कोई मुस्लिम आवेदक किसी कार्य को आरंभ करने के लिए ऋण आवेदन प्रस्तुत करता है तो कार्यालय कर्मियों द्वारा कई प्रकार के अनावश्यक व्यवधान उपस्थित किये जाते हैं। यहां तक मैं स्वयं अनुभव करता हूँ कि उनके नामों को प्रखंड स्तरीय गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों के लक्ष्य समूह सूची में नाम शामिल करने में कोताही बरती जाती है।केवल बिहार में ही नहीं बल्कि मैं पूरे देश के स्तर पर शिद्दत से अनुभव करता हूँ और देखता हूँ कि एक सुनियोजित षड्यंत्र के रूप में मुसलमानों को आर्थिक, सामाजिक एवं शैक्षणिक स्तर पर पिछड़ेपन के साथ जीवन यापन को विवश किया जा रहा है। उस पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के एक नहीं अनेक स्तरों पर प्रयास किये जा रहे हैं जिसमें उनकी दहशतगर्दों, आतंकवादी, उग्रवादी आदि के लेबलों से नवाजने के बाद ''इस्लामी आतंकवादी'' का जामा पहनाया जा चुका है और इसकी सजाएं भी भारतीय मुसलमान भुगतते नजर आ रहे हैं। वह दिन ज्यादा दूर नहीं है जो शिक्षित और बुद्धिजीवी मुसलमान इस भ्रम में पड़े हैं कि इससे उनका क्या नुकसान है? इन आरोपों के दायरे में वह कहीं नहीं आते? यह मुगालता के सिवा कुछ नहीं है? जिन मदरसों में पिछड़ी और अत्यन्त पिछड़ी जातियों की ८० प्रतिशत बच्चे-बच्चियाँ दीनी (धार्मिक) और दुनियावी (सांसारिक) शिक्षाएँ प्राप्त करते हैं। उन मदरसों को इस्लामी आतंकवाद का प्रशिक्षण केन्द्र घोषित करने की विश्व स्तरीय योजनाओं को साकार कर पूरे मुस्लिम वर्ल्ड को ''बारूद'' का ढेर साबित करने की लाबिंग हो रही है। उसके प्रति किसी उच्च जाति के मुसलमान का ध्यान नहीं है। पिछड़े तो अपनी दाल रोटी की जुगाड़ में बेहाल हैं और शिक्षित, नौकरी पेशा, सुविधा संपन्न मुस्लिम जातियाँ अपने महलों में स्वयं को सुरक्षित महसूस कर रही हैं। इसका एक दिन खमियाजा भुगतना होगा।बिहार में मुस्लिम पिछड़ी जातियों के अन्तर्गत कलन्दर, चीक, चुड़िहार, दफाली, धोबी, धुनिया, नट, नालबंद, पामरिया, भठियारा, मदारी, मेहतर, लालबेगी, हलालखोर और भंगी, मिरयासिन, मुकेरी, रंगरेज, राइन, साईं, इदरीसी (दर्जी) इत्यादि को स्थान दिया गया है। यह नाम पिछड़ा वर्ग आयोग के तृतीय प्रतिवेदन के लिए गए हैं जो परिशिष्ट-६ के अन्तर्गत आयोग द्वारा तैयार की गई अन्य पिछड़े वर्गों की सूची में शामिल हैं। उक्त जातियों की जिलेवार जनसंख्या क्या है? मेरी समझ से सरकार या फिर संबंधित आयोग ने सर्वेक्षण कराने का कष्ट उठाना उचित नहीं समझा, यदि इदरीसी जाति और रंगरेज जातियों को पिछड़ी जाति से उठाकर अत्यन्त पिछड़ी जाति के श्रेणी में स्थान दिया गया तो इसके लिए उक्त जातियों के समूहों द्वारा संगठित होकर किये गए प्रयास हैं, जिससे इदरीसी जाति एवं रंगरेज जाति को सामाजिक स्थिति सुधारने में कोई सफलता मिली हो अथवा नहीं। इन जातियों के संगठन संचालकों को पौ बारह अवश्य हुए हैं। इदरीसी जाति के लोगों ने गत दिनों पटना में वार्षिक सम्मेलन का आयोजन किया था, जिसमें महज इस बिरादरी के लोग अपने बच्चों की शादी ब्याह और अपने स्तर के लोगों के चयन में व्यस्त देखे गए। संगठन के रहनुमाओं के पास इनकी शिक्षा-दीक्षा, मान-सम्मान, धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक स्थिति में परिवर्तन के लिए कोई न तो प्रस्ताव सामने आया और न ही विकास योजना की सार्थक रूपरेखा प्रस्तुत की गई। अब यह संगठन एक राजनीतिक दल की छांव में सासें ले रहा है और उसके हाथों दर्जियों को नीलाम करने की घोषणाएं करने में जुटा है।इदरीसी बिरादरी की औरतें और मर्द आर्थिक तंगहाली के कारण सारा दिन मेहनत करती हैं। पुरुष कपड़े की दुकानों, हाट, बाजारों, चबूतरों, घरों में गांव-घर के कपड़े सिलाई करते हैं तो औरतें तीज-त्यौहारों, शादी-ब्याह में देने योग्य गुड्डे, गुड़िया, हाथी, घोड़े, बटुए, काज बटन, तुरपई, औरतों के लिए खुले (एक प्रकार का औरतों का जेबदार कुर्ती) हाथों से तैयार करती हैं।आज से अधिक नहीं बीस-पचीस साल पहले तक दर्जी जो खानदानी होते थे, वे गांव के पूरे कपड़े सिलाई करते थे। कुछ दर्जी स्वर्ण जाति, धनिकों से साल भर की सिलाई के एवज में जजमनिका लेते थे। उनको बड़े किसान साल में एक मुश्त फसल कटाई के समय धान-गेहूं देते थे किन्तु खानदानी दर्जियों के बुरे दिन तब शुरु हुए, जबकि पेंशन का बोलबाला बढ़ा। युवक ''टेलरिंग हाउस'' की ओर रुख करने लगे। इससे चालाक, होशियार और आर्थिक रूप से कुछ समर्थ परिवारों ने अपने लड़कों को पेंशन के अनुसार आधुनिक डिजाइन के कपड़ों की सिलाई के लिए पटना, दिल्ली, लुधियाना भेज कर प्रशिक्षित करा कर शहरों में दुकानें खोल लीं या फिर दूसरे राज्यों के गारमेंट मेन्युफेक्चरिंग कंपनियों में सिलाई-कटाई करने लगे। जबकि उम्र की ढलान पर पहुंच चुके दर्जी दरवाजों पर लंगोटा और महावीरी झंडा सिलाई कर रोटी-प्याज की जुगत में जीवन गंवाते रहे।ऐसे एक नहीं सैंकड़ों परिवारों से मिलने के बाद यह रहस्य खुला है कि दर्जी का कार्य करने वाले खानदानी दर्जियों की संख्या तेजी से घटी है। वह अपने बिरादरी के पेशे से पेट भरने में नाकाम रहे हैं। संभवतः इसी कारण टेंट-शामियाना का काम भी पेशेवराना तौर पर अपनाया। इस पेशे में बड़ी पूंजी की आवश्यकता होती है। अतः यह भी इनके हाथों से निकल कर गैर बिरादरियों के कब्जे में जा चुका है। इन दिनों दर्जी का बड़े पैमाने पर काम करने वाले लोगों में मोमिन, शेख, पठान, सैयद के अलावा अनेक हिन्दू जातियां भी शामिल हो चुकी हैं। इन लोगों का इस पेशे पर एकाधिकार कायम हो चुका है और दर्जी बिरादरी भूखों मरती अथवा सड़कों पर अड़े, प्लास्टिक, साइकिल मरम्मती कार्य करते दिखाई देती है चूंकि ये आर्थिक रूप से पिछड़े हैं। शिक्षा के नाम पर मदरसे की तालीम से आगे नहीं बढ़ा पाते। ये लोग धार्मिक स्तर पर स्वयं को पैगम्बर हजरत इदरीस अलैहिस्सलाम का पैरोकार मानते हैं, जो अपने जीवन काल में लोगों को शिक्षित करने के अलावा जीवन यापन के लिए सिलाई का काम किया करते थे, आज ये बिरादरी आर्थिक रूप से विपन्नता, अर्कमण्यता का शिकार है तो महज इसलिए कि इनको खोज खबर लेने के लिए कोई तैयार नहीं है। इस बिरादरी में शिक्षा का स्तर ५ प्रतिशत से अधिक नहीं है।उक्त स्थितियों की दृष्टिगत रखते हुए सरकार ने बिहार में पदों एवं सेवाओं की रिक्तियों में आरक्षण अधिनियम-१९९१ की अनुसूची-१ में इदरीसी जाति (दर्जी) को जोड़ने के संबंध में कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग द्वारा संकल्प प्रकाशित किया गया। यह निर्णय ''पिछड़े वर्गों के लिए राज्य आयोग'' द्वारा की गई अनुशंसा के आलोक में बिहार अधिनियम-३, १९९२ की पिछड़े वर्गों की सूची (अनुसूची-२) के क्रमांक-३२ पर अंकित इदरीसी (दर्जी) जाति को विलोपित कर अत्यन्त पिछड़ी जाति की सूची (अनुसूची-२) के क्रमांक १०७ पर अंकित किया गया। लेकिन यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि सरकार द्वारा आरक्षण दे देने मात्र से इस बिरादरी की समस्याओं का अन्त नहीं होगा, बल्कि इसके लिए ईमानदार, कौमपरस्त, कर्तव्यपरायण, निस्वार्थ भाव से सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए सुनियोजित तरीके से सामाजिक नेताओं और दिगर रहनुमाओं को भी कोशिश करनी होगी।इसी प्रकार राज्य सरकार ने रंगरेजों की सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक स्तर पर एक सर्वेक्षण प्रखंड स्तर पर निर्गत किया तो मैंने देखा कि कई कार्यालयों में उस सर्वेक्षण प्रतिवेदन का नजरअंदाज कर दिया गया। दोबारा पुनः यही सर्वेक्षण पत्र कार्यालयों को उपलब्ध कराया गया। जिसकी वास्तविक स्थितियों का आकलन के अनुरूप प्रतिवेदन सरकार को भेजवाने में स्वयं दिलचस्पी लेनी पड़ी। मुझे यह कहते हुए कोई हिचक नहीं कि बिहार भर से प्राप्त प्रतिवेदनों का निष्कर्ष सार्थक रूप में सामने आया और कपड़े रंगने के पेशेवर बिरादरी जो अपना पेशा छोड़कर कई दूसरे पेशों को अपनाये हुए थी, उसे पिछड़े वर्ग के लिए गठित राज्य आयोग द्वारा अन्य पिछड़े वर्गों की अनुसूची-२ के क्रमांक २४ से विलोपित कर अत्यन्त पिछड़ी जाति की अनुसूची-१ में सम्मिलित किया गया। यह संकल्प, बिहार सरकार के कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग के ज्ञापांक-११/वि २-पि०व०आ०-०४/२००० का० २११/पटना १५.१०.२००१ के माध्यम से जारी हुआ था।प्रख्यात लेखक एवं विद्वान जाबिर हुसेन ने अपनी एक पुस्तिका ''बिहार में पिछड़ी मुस्लिम आबादियाँ'' में एक विचारणीय प्रश्न उठाया है कि, खासतौर से इस बात का खुलासा होना चाहिए कि मुस्लिम समाज के पिछड़े एवं अत्यंत पिछड़े पेशागत समूहों के सार्वजनिक हितों से जुड़ी संस्थाओं में रोजगार अवसरों की बंदरबांट में इन उत्पीड़ित मुस्लिम आबादियों को किस हद तक नुमाइंदगी मिली है?''इस पुस्तिका में दक्षिण बिहार में आबाद जातियों को विशेष रूप से चर्चा करते हुए कुलहयया, विभिन्न नामों से जाने जाने वाले शेरशाहाबादी समुदाय, चूड़िहार, इदरीसी, जुलाहा, राईन अथवा कुंजड़ा, गद्दी, धुनिया आदि की सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक एवं धार्मिक स्थिति की चर्चा की है, जिस पर नये सिरे से चर्चा की आवश्यकता महसूस करता हूं मैं। कारण कि क्या किसी बिरादरी को केवल आरक्षण सुविधा प्रदान कर देने से ही उसकी आर्थिक विपन्नता, सामाजिक संकीर्णता और शैक्षणिक पिछड़ेपन से मुक्त स्वीकार किया जाना चाहिए? वास्तव में ऐसा नहीं है इसलिए धूम फिर कर कहीं काफिले के रूप में खेमाजन कलन्दर जाति, खस्सों या मुर्गे का गोश्त बेचने वाले चीक, संभ्रान्त परिवार से लेकर निर्धन बहू-बेटियों के हाथों में चूड़ियां डालने वाली चूड़िहारिनों, सिर पर टोकरे में औरतों की जरूरत की चीजें घूम-घूमकर बेचने वाली दफालिनों, सबके गन्दे कपड़े साफ करने और गधों के साथ जिन्दगी जीने वाले मुस्लिम धोबियों, हजामत बनाने के लिए ईंट लगा कर बैठे या दरवाजे-दाढ़ी साफ करने, बाल बनाने के काम में जुटे नाइयों, जिसे बतौर मेहनताना एक-दो रुपये मिलते हैं। जबकि सैलून में पांच-दस रुपये जाड़े के दिनों में रुई धुनकर तोश्क-रजाई तैयार करने में महारथ रखने वाले धुनिया, नाच, गाकर और कई दूसरे काम करके जीवन यापन करने वाले पामरिया, कभी रस्सियों पर, कभी बन्दरों के साथ तमाशा दिखाते मदारी वालों, शादी ब्याह के अवसर पर औरतों के बीच गीत गाने वाली मिरयासिनों, गली-मुहल्ले से लेकर बाजार तक सब्जि+यां बेचने वाले सब्जी फरोशों, भीख मांगकर गुजर करने वाले साई जातियों को आरक्षण की सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो सकी हैं।इसकी अनेक वजहें हैं। सर्वप्रथम तो इन जातियों में अशिक्षा का स्तर शत-प्रतिशत शून्य है। ये अपने को सामाजिक स्तर पर संगठित नहीं कर पाये हैं। इनका कोई नेता या रहनुमा नहीं है। सरकार के दरबार में कोई पैरवीकार नहीं है जो पिछड़ी जातियां किसी प्रकार आरक्षण लाभ ले चुकी हैं। वे अपने को किसी-न-किसी सरकार में शामिल राजनीतिक दल का पक्षधर बताते हैं। उनको केवल अपनी बिरादरी का वोट जुटाने में सफलता दिखती है। तात्पर्य यह है कि मुस्लिम उच्च जातियां हों या पिछड़ी जातियां सबने जेबी संस्थाएं बना रखी हैं, जिसमें दूसरी किसी जाति के लिए कोई जगह नहीं है। वास्तव में इन जातियों को हिन्दू दलित जातियों के समकक्ष सुविधाएं मिलनी चाहिए और आज स्वतंत्रा भारत में सही मायने में कोई दलित होने की शर्तें पूरी करता है तो ये केवल भारतीय मुसलमान हैं। ये उच्च जाति के हों या निम्न जाति के, यह सब देखने की अपेक्षा आर्थिक आधार पर आर्थिक एवं आरक्षण सुविधाएं दी जानी चाहिए, जिनके बारे में किसी को कोई चिन्ता नहीं है। जिनके समक्ष अस्तित्व संघर्ष की समस्या सुरक्षा के समान मुंह फाड़े खड़ी है। इन जातियों के प्रति स्वर्ण मुस्लिम जातियों ने अपना रुख परिवर्तित नहीं किया तो निश्चित रूप से एक दिन ये लोग किसी और धर्म को स्वीकारेंगे जैसा कि प्रतिदिन हिन्दुओं की एक बड़ी जमात ईसाई धर्म स्वीकार रही है और उत्तर पूर्व भारत का एक बड़ा भाग ईसाईयत की चपेट में आ चुका है।ये मुस्लिम दलित जातियां वास्तव में नाम की मुसलमान हैं। ये धार्मिक रूप से केवल अपने नामों से पहचान रखती हैं। ईद-बकरीद के वक्त मस्जिदों में सज्दे कर लेती है अलावा इसके धार्मिक रूप से पूरे तौर पर ज्ञान शून्य होती हैं। ऐसे ही एक व्यक्ति के नाम के साथ रामायण नट एक आवेदन पत्रा पर पढ़ने को मिला। मैं चौंका। चूंकि उसने अपनी जाति मुस्लिम नट लिखा था। उससे पूछने पर ज्ञात हुआ कि नाम बाप-दादा का रखा है। हम मुसलमान हैं। किन्तु जब पूछा गया कि, ''मुसलमान होने की पहचान क्या है?'' तो उसने कोई प्रतिउत्तर नहीं दिया। तो मेरी समझ और सर्वेक्षणों से यह साफ हो चुका है कि न केवल बिहार में बल्कि देश में नाम भर के मुसलमानों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। मुस्लिम अंगड़ी जाति हो या पिछड़ी जाति यह सबके लिए एक चेतावनी है कि उन्होंने जिस बेरहमी से अपनी मातृभाषा उर्दू, धार्मिक क्रिया-कलापों, संस्कारों, मान्यताओं, परंपराओं आदि को तिलांजलि देने का सिलसिला आरंभ किया है। इसके परिणाम बेहद घातक होंगे।यह एक शगूफा नहीं समझा जाए। ऐसे कई एक मुस्लिम पदाधिकारी नजरों के सामने हैं जो अपने बच्चों को धार्मिक शिक्षा से दूरी बढ़ाते दिख रहे हैं और ऐसे स्कूलों में शिक्षा दिलवा रहे हैं जहां उनकी मातृभाषा की पढ़ाई नहीं होती है, जिसके स्थान पर उनके बच्चे हिन्दी और संस्कृत की पढ़ाई कर रहे हैं। ऐसे शिक्षित मुसलमानों से इस्लामी सभ्यता एवं संस्कृति की क्या रक्षा होगी? यह सोचें और गौर करें? हम किधर जा रहे हैं। भारत की धार्मिक जन सांख्यिकी पर शोध करने वाली संस्था इंडिया फर्स्ट फाउंडेशन, नई दिल्ली ने अपनी पुस्तक में ९६.५ प्रतिशत देशवासियों को हिंदू करार दिया है, जिसमें भारतीय धर्मानुयायी के रूप में मुसलमानों का प्रतिशत गायब है? जबकि इसी पुस्तक के एक अध्याय भावी प्रवृत्तियों का पूर्वानुमान के तौर पर स्पष्ट रूप से पृष्ठ २४ पर लिखा है, ''यदि अंतिम सौ वर्षों की प्रवृत्तियाँ भविष्य में भी बनी रहीं तो भारतीय धर्मानुयायियों का वर्ग निकट भविष्य में भारत में अल्पसंख्यक बन जाएगा।''उक्त संभावना व्यक्त करने के पीछे कई तथ्य सक्रिय रहे हैं। मसलन, देश में मुसलमानों की आबादी तेजी से बढ़ी है और हिंदू दलित जातियों ने बड़े पैमाने पर ईसाई, इस्लाम धर्म स्वीकार किया है और ये अधिक कट्टरता प्रदर्शित करते दिखे हैं, जबकि सदियों से मुसलमान का चोला पहने भारतीय मुसलमान अपनी पहचान खोने लगे हैं। ये अस्तित्व संघर्ष की तीव्रता के कारण संभव हुआ है। असहाय, लाचार, गरीब, मुसलमानों की किसी को सुध लेने की फुर्सत नहीं है, प्रत्येक जाति-बिरादरी ने अलग-अलग खेमे और गुट बना रखे हैं और अपनों को लाभान्वित करने में ही सफलता देख रहे हैं।यह कटु सत्य है कि जो मुसलमान मस्जिद में कांधे से कांधा मिलाये नमाजें अदा करते दिखाई पड़ते हैं। वही मस्जिद की सीढ़ियां उतरे अनेक जातियों का चोला पहन लेते हैं। ऐसे व्यक्ति और संगठन दोनों ही समाज की विकलांगता को बढ़ावा देने के लिए उत्तरदायी कहे जाएगें।जिन दलित मुसलमानों की चिंता सुविधा संपन्न मुसलमानों और उच्च जाति के लोगों को होनी चाहिए। वे ही उनको अपने सामने बराबरी का अधिकार देने से कतराते हैं। निम्नवर्गीय उत्पीड़ित, पद दलित मुसलमानों से भेदभाव और अलगाव का परिणाम यह निकला है कि पिछड़ी जातियां भी दूर से सलाम करने में कोताही बरतने लगी हैं। एक पिछड़ी जाति मोमिन (अंसारी) ने प्रत्येक स्तर पर अपनी सफलता के डे गाढ़ने में कामयाबी हासिल की, तो इसका कारण यह रहा है कि उनको अब्दुल क्यूम अंसारी जैसा रहनुमा मिला और इस बिरादरी ने कांग्रेस का विभाजन के समय साथ दिया, जबकि इदरीसी बिरादरी मोमिनों से अधिक आरक्षण का दावेदार होने के बावजूद उक्त सुविधाओं यानी आरक्षण और छात्रवृत्ति से वंचित रह गई तो महज इसलिए कि उनके पास कोई रहनुमा नहीं था और वे मुस्लिम लीग का समर्थन करने की भूल कर चुके थे। जिसका खमियाजा पचास से अधिक सालों तक भुगतना पड़ा। दूसरी ओर अपने कौम के लोग भी दलित मुसलमानों के लिए अधिक प्रयत्नशील नहीं दिखे। उनके सामाजिक आर्थिक, शैक्षणिक पिछड़ेपन को बरकरार रखने में भलाई देखी ताकि वे उच्च मुस्लिम जातियों के बन्धुआ बने रहें और उनकी जूतियां खाते और रोटियां चबाते रहें। इस सोच ने भी मुसलमानों का बहुत अहित किया है।एक और अपनों की साजिशें दूसरी ओर देश की बहुसंख्यक जाति के एक विशेष वर्ग द्वारा मुसलमानों को आर्थिक रूप से बाजार, व्यापार, कारोबार, उद्योग-धंधों में आगे नहीं निकलने देने की लगातार कोशिशें और ऊपर से दंगे-फसाद। यह दंगा भागलपुर के स्लिक उद्योग, मुम्बई के कारोबारियों और गुजरात के मुस्लिम उद्योगपतियों को काफी कमर तोड़ चुका है। कहने का अर्थ यह कि भविष्य में मुसलमानों को न केवल धार्मिक बल्कि शैक्षणिक एवं आर्थिक, सामाजिक स्तर पर भी एकजुटता दर्शाते हुए प्रयास करने होंगे। आपसी भेदभाव, ऊँच-नीच, जात-पात की लानत से मुक्ति हासिल करनी होगी वरना वह दिन दूर नहीं, जबकि मुसलमान अपने प्रति अपनाये गए अनेक स्तरीय उपेक्षाओं से तंगहाली, गरीबी और भेड़चाल से आजिज आकर कोई और धर्म स्वीकारने लगें। दलित मुसलमानों के आगे उपस्थित इस खतरे को समझना होगा और उनके सामाजिक, आर्थिक शैक्षणिक उत्थान एवं सम्मानजनक स्थिति के लिए प्रयास करने होंगे। तमाम सरकारी योजनाओं का पिछड़े मुसलमानों को शत-प्रतिशत लाभ मिले। यह हम सबको सुनिश्चित करते हुए, दूसरी मांगों की पूर्ति की कोशिश भी करनी पड़ेगी। क्योंकि एक मोमिन जाति को छोड़कर किसी अन्य आरक्षण प्राप्त जाति की स्थिति में अपेक्षित सुधार मुझे नहीं दिख रहा है, जैसा कि दिखाई देना चाहिए पूरे समाज को।उल्लेखनीय है कि बिहार राज्य में मुसलमानों की कुल जनसंख्या १९९१ की जनगणना के अनुसार १४.८१ प्रतिशत है। इस आबादी का अधिकांश हिस्सा दलित, उत्पीड़ित, प्रताड़ित एवं आर्थिक रूप से पिछड़े मुसलमानों की है, जिसके लिए प्रत्येक चुनावी मौसम में प्रत्येक दल आश्वासनों की बरसात करते हैं और चुनाव जीतते ही सावन की बड़ी जेठ के सुखाड़ में तब्दील हो जाती है, चूँकि कुर्सी मिलने के बाद किसी को यह याद नहीं रहता कि उन्होंने जिस सीट पर विजय पताका फहरायी है। वहां के मुस्लिम गरीब मतदाताओं का विशेष योगदान रहा है। बिहार में ऐसे अनेक क्षेत्र हैं, जहां किसी की जीत में मुस्लिम वोटरों की अत्यन्त अहम्‌ भूमिका होती है।गौरतलब है कि एम०वाई० समीकरण को यथार्थ घोषित करते हुए राजद की सरकार ने बरसों पूर्व राजभाषा विभाग, बिहार सरकार अन्तर्गत सहायक उर्दू अनुवादों की नियुक्ति के संबंध में तमाम प्रक्रियाएं पूरी करते हुए, सितम्बर, १९९५ में नियुक्ति की। कुल २५२ सहायक उर्दू अनुवादक राज्य के विभिन्न प्रखंडों से लेकर समाहरणालय तक नियुक्त हुए, जिसमें संभवतः देश के किसी राज्य में पहली बार किसी सरकार ने यह कदम उठाया। इसके साथ उर्दू अनुवादकों की नियुक्तियां भी समाहरणालय, अनुमंडल पदाधिकारी कार्यालय एवं कुछ एक जिलों के प्रखंडों में हुई, लेकिन इसके बाद आज तक इस विभाग के कर्मियों के भाग्य में समय से कभी वेतन मिलना नहीं दिखा। अनेक प्रयासों के बावजूद उर्दू कर्मचारियों के लिए पदोन्नति के मापदंड का निर्धारण नहीं हुआ, केन्द्र के अनुसार अनुवादकों को वेतनमान नहीं मिला। यह जहां गए, उन्हें नकारा, निकम्मा और राजनीतिक अवसरवादिता की देन के रूप में मुफस्सिल के बहुत कम शिक्षित कर्मचारियों ने एक तुच्छ प्राणी के रूप में स्वीकार किया, अब यह अलग प्रश्न है कि आज परिस्थितिवश प्रखंडों में ये स्थापना से लेकर नजारत तक के प्रभार ढो रहे हैं। इस अवसर को अल्पसंख्यक संगठनों, नेताओं एवं मुस्लिम राजनीतिज्ञों ने पुनः भुनाने में गंभीर कोताही बरती। किन्तु मुसलमानों को आरक्षण देने के नाम पर होने वाले लाभों को देखकर ही पहले आंध्र प्रदेश फिर तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने अपने एक बयान में कहा है कि उनकी सरकार मुस्लिमों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण प्रदान करने की संभावनाओं का पता लगाएगी। जबकि बिहार विधान सभा - २००५ के आम चुनाव में एक दल मुस्लिम मुख्यमंत्री की मांग पर अड़ा है तो दूसरे दल अपने चुनावी दौरे पर हैलीकाप्टरों में मुस्लिम मौलानाओं और ओलेमाओं को साथ लिए फिर रहे हैं? अब कोई बताये कि इन ओलेमाओं के आम मुसलमानों ने क्या अपने जमीर का पेश इमाम बनाया है जो मुसलमानों के अधिकारों के संबंध में कहीं कुछ बोलते नहीं देखे जाते, बल्कि बिजूका बने हुए हैं। जाहिर है उनके इस कारनामों से उनको व्यक्तिगत लाभ हासिल हो जाए किन्तु आम मुसलमानों को क्या मिलेगा? क्या इन्हें पता नहीं कि यह माहौल सर्द पड़ते ही वे एक बार फिर हाशिये पर डाल दिये जाएंगे। जिस दुखड़े को गलियों से मस्जिद, हुजरे तक में रोते रहेंगे अगले चुनाव तक। आखिर ओलेमा या मुस्लिम सियासतदां किस मर्ज की दवा हैं? क्या इसके खिलाफ मुस्लिम बुद्धिजीवियों को सामने नहीं आना चाहिए? एक जाबिर हुसेन कितने मोर्चों पर लड़ेंगे? यह वोट बैंक और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का खेल आखिर कब तक?

Comments

Unknown said…
काफ़ी विस्तृत विश्लेषण किया है आपने. मैं एक भारतीय हिन्दू हूँ और यह मानता हूँ कि हर नागरिक को अपना जीवन स्तर सुधारने के समुचित समान अवसर मिलने चाहियें. पर यह अवसर धर्म, जाति, भाषा, स्थान आदि के आधार पर नहीं होने चाहियें.गरीबी और पिछड़ापन ही इस के लिए एकमात्र आधार होना चाहिए. सरकार गरीबों और पिछड़ों को इंसान के रूप में नहीं बल्कि एक वोट के रूप में देखती है. यही रवैया बाकी राजनितिक दलों का भी है. अफ़सोस इस बात का है कि यह गरीब और पिछड़े लोग ख़ुद को भी एक वोट के रूप में ही देखने लगे हैं. वोट लेने के लिए सरकारें और राजनितिक दल इन्हें धर्म, जाति, भाषा के आधार पर बांटते है, सारे कार्यक्रम इसी आधार पर तैयार किए जाते हैं. राजनीतिबाजों के दलाल इन्हें गुमराह करते हैं. मदद का एक बहुत छोटा हिस्सा ही इन तक पहुँच पाता है. इसका एक ही उपाय है. गरीब और पिछड़े स्वयं को धर्म और जाति के पैमाने से नापना बंद कर दें. आरक्षण और किसी अन्य सहायता के लिए वह अपने धर्म और जाति की बात न करें. केवल अपनी गरीबी और पिछड़ेपन की बात करें. पर क्या ऐसा सम्भव है?

Word Verification हटा दीजिये, इस के कारण टिप्प्णी पोस्ट करना काफ़ी मुश्किल हुआ.
Anonymous said…
पता नहीं चला पढ़कर कि आप इदरीसी की चिंता में ड़ो रहे हैं इस्लाम की चिंता में रो रहे हैं। आप पूरी तरह से कन्फ्यूज्ड लगे। आप हैं ओबीसी, लेकिन दलित मुस्लिम का रोना रो रहे हैं, जबकि दलित का मतलब sc होता है और कोई मुस्लिम sc या दलित हो ही नहीं सकता। यह कंफ्यूजन आपको कहीं नहीं ले जाएगा।

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कृष्ण कुमार यादव देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद प्रथम प्रधानमंत्री पं० जवाहर लाल नेहरू इलाहाबाद में कुम्भ मेले में घूम रहे थे। उनके चारों तरफ लोग जय-जयकारे लगाते चल रहे थे। गाँधी जी के राजनैतिक उत्तराधिकारी एवं विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र के मुखिया को देखने हेतु भीड़ उमड़ पड़ी थी। अचानक एक बूढ़ी औरत भीड़ को तेजी से चीरती हुयी नेहरू के समक्ष आ खड़ी हुयी-''नेहरू! तू कहता है देश आजाद हो गया है, क्योंकि तू बड़ी-बड़ी गाड़ियों के काफिले में चलने लगा है। पर मैं कैसे मानूं कि देश आजाद हो गया है? मेरा बेटा अंग्रेजों के समय में भी बेरोजगार था और आज भी है, फिर आजादी का फायदा क्या? मैं कैसे मानूं कि आजादी के बाद हमारा शासन स्थापित हो गया हैं। नेहरू अपने चिरपरिचित अंदाज में मुस्कुराये और बोले-'' माता! आज तुम अपने देश के मुखिया को बीच रास्ते में रोककर और 'तू कहकर बुला रही हो, क्या यह इस बात का परिचायक नहीं है कि देश आजाद हो गया है एवं जनता का शासन स्थापित हो गया है। इतना कहकर नेहरू जी अपनी गाड़ी में बैठे और लोकतंत्र के पहरूओं का काफिला उस बूढ़ी औरत के शरीर पर धूल उड़ाता चला गया। लोकतंत

प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से संबंधित साक्षात्कार की सैद्धान्तिकी में अंतर

विज्ञान भूषण अंग्रेजी शब्द ‘इन्टरव्यू' के शब्दार्थ के रूप में, साक्षात्कार शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसका सीधा आशय साक्षात्‌ कराना तथा साक्षात्‌ करना से होता है। इस तरह ये स्पष्ट है कि साक्षात्कार वह प्रक्रिया है जो व्यक्ति विशेष को साक्षात्‌ करा दे। गहरे अर्थों में साक्षात्‌ कराने का मतलब किसी अभीष्ट व्यक्ति के अन्तस्‌ का अवलोकन करना होता है। किसी भी क्षेत्र विशेष में चर्चित या विशिष्ट उपलब्धि हासिल करने वाले व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व और कृतित्व की जानकारी जिस विधि के द्वारा प्राप्त की जाती है उसे ही साक्षात्कार कहते हैं। मौलिक रूप से साक्षात्कार दो तरह के होते हैं -१. प्रतियोगितात्मक साक्षात्कार २. माध्यमोपयोगी साक्षात्कार प्रतियोगितात्मक साक्षात्कार का उद्देश्य और चरित्रमाध्यमोपयोगी साक्षात्कार से पूरी तरह भिन्न होता है। इसका आयोजन सरकारी या निजी प्रतिष्ठानों में नौकरी से पूर्व सेवायोजक के द्वारा उचित अभ्यर्थी के चयन हेतु किया जाता है; जबकि माध्यमोपयोगी साक्षात्कार, जनसंचार माध्यमों के द्वारा जनसामान्य तक पहुँचाये जाते हैं। जनमाध्यम की प्रकृति के आधार पर साक्षात्कार

हिन्दी साक्षात्कार विधा : स्वरूप एवं संभावनाएँ

डॉ. हरेराम पाठक हिन्दी की आधुनिक गद्य विधाओं में ‘साक्षात्कार' विधा अभी भी शैशवावस्था में ही है। इसकी समकालीन गद्य विधाएँ-संस्मरण, रेखाचित्र, रिपोर्ताज, आत्मकथा, अपनी लेखन आदि साहित्येतिहास में पर्याप्त महत्त्व प्राप्त कर चुकी हैं, परन्तु इतिहास लेखकों द्वारा साक्षात्कार विधा को विशेष महत्त्व नहीं दिया जाना काफी आश्चर्यजनक है। आश्चर्यजनक इसलिए है कि साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा साक्षात्कार विधा ही एक ऐसी विधा है जिसके द्वारा किसी साहित्यकार के जीवन दर्शन एवं उसके दृष्टिकोण तथा उसकी अभिरुचियों की गहन एवं तथ्यमूलक जानकारी न्यूनातिन्यून समय में की जा सकती है। ऐसी सशक्त गद्य विधा का विकास उसकी गुणवत्ता के अनुपात में सही दर पर न हो सकना आश्चर्यजनक नहीं तो क्या है। परिवर्तन संसृति का नियम है। गद्य की अन्य विधाओं के विकसित होने का पर्याप्त अवसर मिला पर एक सीमा तक ही साक्षात्कार विधा के साथ ऐसा नहीं हुआ। आरंभ में उसे विकसित होने का अवसर नहीं मिला परंतु कालान्तर में उसके विकास की बहुआयामी संभावनाएँ दृष्टिगोचर होने लगीं। साहित्य की अन्य विधाएँ साहित्य के शिल्पगत दायरे में सिमट कर रह गयी