Skip to main content

क्लासरूम के अंदर

सी.आर.राजश्री
मेरे प्रिय छात्रों,
जिन्दगी की ढ़लती उम्र में,
जब मैं रहूँगीं तन्हा,
सदैव याद दिलाती रहेगी,
हमारे तुम्हारे बीच का वो हसीन लमहा,
पूस की सुहावनी ठंड़ में,
मुझे उर्जा देकर तपतपाती रहेगी,
जेठ की असहनीय गर्मी में भी,
जो बर्फ सी शीतलता प्रदान करेगी,
और रिमझिम बरसने वाली बरखा,
मिट्टी की, खुशबू के साथ मिलकर,
मेरी सांसों की गति को तीव्र करेगी,
नये आनन्द की बौछार करेगी।
जानू न मैं तुम सबका अता-पता,
सालों बीतने पर भी लेकिन,
मेरे स्मृति-पटल में अंकित रहेंगे,
तुम्हारे ये मासूम प्यार भरे चेहरे,
शायद तुमको नहीं है ये पता।
तुम्हारी शरारत और फुसफुसाहट,
मन में सदैव तरोताजा रहेंगे,
मेरे दिलों से शब्द रूपी फुहार बनकर,
हमेशा कविता का रूप देती रहेंगे,
तुम्हारी बातें नटखट अदाएँ,
मुझे आश्चर्य चकित करते रहते,
तुम्हारे मन के कई रहस्यमयी सवाल,
आखों में झलकते जो दिखाई दिए,
ज्वाला बन मुझे कई पाठ पढ़ाते गए,
सिखाते गए।
अपने खुशियों और गमों के पल को
इस कक्षा के भीतर हमने बाँटें,
पठन-पाठन के साथ-साथ, बातों में उलझाकर,
तुमने मुझे भी बातूनी ही बना डाला,
लेकिन मुझे इसका कतई है न अफसोस,
आनेवाले भविष्य के प्रति जिज्ञासु होकर,
राह के काँटों को दूर करते हुए,
सपने को साकार करने वाले
मेरे प्रिय छात्रों, मेहनत जरूर रंग लाएगी।
कल्पना की उड़ान में,
सृजनात्मक उड़नखटोले में,
दुनिया की नियति को तोड़ दो,
अपना एक नया संसार तुम रचो।
तुममें से कई छात्रों ने मुझे अपना मानकर,
अपनी अंतरंग की बातें कहकर,
अपनेपन से मुझे संबोधित कर,
मेरी बातों की ओर ध्यान देकर,
मेरी सलाह मानकर,
स्नेह के पथ प्रर्दशक बन गए है।
हाँ यह सच है कि मैंने कभी तुम्हें डाटा, कभी फटकारा,
न चाहते हुए भी नियम का पालन किया उल्लंघन किया,
पर जरा सोचा कि, मैंने ऐसे क्यों किया?
तुम्हारी भलाई के सिवा क्या और कोई कारण हो सकता है भला?
इस कक्षा के भीतर हमारे बीच होने वाले नोक जोंक,
मुझे सदा हँसातीं रहेंगे, पठन पाठन के अतिरिक्त,
गपशप के अनमोल पल, यादगार बन मन में सजीव रहेंगे,
मन-मस्तिष्क को जो सदैव सालती रहेगी।
हिन्दी के प्रति मेरी गहरी आस्था,
देश के प्रति मेरा लगाव,
नारी की अस्मिता और मानवकल्याण,
साहित्य में मेरी रुचि,
साहित्य की ओर मुझे खिंचता चला गया,
अहिन्दी प्रान्त में हिन्दी का विरोध,
हमारा सुनिचित व्यवस्थित पाठ्यक्रम,
आपको साहित्य पढाने पर रोकने के बावजूद भी
मेरा अध्ययन जारी है, यह कभी न रुकेगा,
और हाँ शायद मुझे कोई रोक भी नहीं सकता।
मेरे अर्जित ज्ञान को कोई चोर चुरा नहीं सकता,
यदि आप इच्छुक हो तो,
मेरी कक्षा में आकर,
मेरे ज्ञान और अनुभव की चोरी कर सकतें हैं।

मेरी हाजिरी में ही ---।
कितने ही अनगिनत छात्र-छात्राएँ जो
सारे मेरे लिए बहुत प्रिय है,
हमारे तुम्हारे बीच हुई कितनी बातें,
कुछ सार्थक, कुछ निरर्थक लगे शायद,
पर अवश्य जीवन में होंगे ये प्रेरणादायक।
मेरी प्रशंसा हो या न हो,
मुझे इसकी कोई परवाह नहीं
प्यार मिले या मिले दुत्कार
मुझे इसका कोई गम नहीं, गिला नहीं,
बिना किसी भेद भाव के विद्या प्रदान करने वाले,
हर सत्र में, हर रोज, आपका स्वागत है।
अपने घरेलू काम काज और परिवार की देख-रेख,
थका देती है अधिकांश मुझे, परन्तु कक्षा में,
तुम सभी को देखकर दिल खुश हो जाता है,
नई स्फूर्ति जाग उठती है,
दिलोदिमाग तरोताजा हो जाता है।
मेरे प्रिय छात्रों,
जीवन एक पहेली है, सुख-दुख जिसकी सहेली है,
असफलता के बीच जहाँ सफलता छिपी हुई है,
पर न करो अपना ये दिल छोटा, जिन्दगी है बहुत बड़ी,
और समय की भी जहाँ नहीं है कोई कमी,
व्यर्थ में लेकिन न अपना समय गवाँओ,
उक्त समय पर दूर मंजिल को पा लो,
अरे हाँ! इस छोटी सी, प्यारी दुनिया में,
मैं भी तो तुमसे दूर नहीं हूँ,
जब चाहो तुम मुझसे मिलने आ सकते हो, धीरज धरो !!!
मैंने तो अपने लिए पढ़ना, सीखना सब छोड़ दिया है,
सिफॅ तुम्हारे लिए ही तो -
श्रम से, ज्ञान के इस भंड़ार में लगे हुए ताला को तोड़ा है,
तुम्हारी जिन्दादिली ही मुझे सदैव आगे पढ़ने की प्रेरणा देती है और,
उल्लास भरे मेरे उस विद्यार्थी जीवन की ओर मुझे आकर्षित करती है।
अपने अर्जित शिक्षा से एक सुखी जीवन तुम बनाओ,
उस उपवन में महकते हुए रंग-बिरंगे फूलों की जहाँ क्यारियाँ हो,
नित वहाँ भौरों की गुंजन, और तितलियों की रौनक रहे,
उसमे विचरण करते हुए मकरन्द के हर बूँदों का आनन्द ले लो,
रसास्वादन करो,
जिन्दगी के उल्झनों को सुलझाओ,
सकारात्मक सोचो, प्रसन्न रहो, वैर त्यागो,
स्नेह की बाँह पसारो, माता-पिता और बड़ों का आदर करो,
फिर देखो दुनिया तुम्हारी मुट्ठी में होगी।
तुम्हारे चेहरे की मुस्कुराहट सदा बनी रहे,
सारे गमों के बादल विलीन हो जाए,
खुशियों के सैलाब में, उमंगों की तरंगें उठे,
मैं उस भगवान से यही प्रार्थना करती हूँ,
तुम जहाँ भी रहो सलामत रहो
खूब तरक्की करो,
हमने कई कुछ और विषयों पर बातें कहनी-सुननी चाही होगी,
काश हम वे सारी बातें कर पाते,
पर मर्यादा और संस्कृति एक लक्ष्मण-रेखा बनकर गई,
हम उन के बीच उलझ कर चुप ही रह गए,
और शायद वे बातें, अनछुए ही रहे गए,
फिर भी तुम्हारे संग बिताए उन लम्हों को
मैने संजोकर दिल में कैद कर रख लिए है,
जिन्दगी के जंग में,
हौसला कम होने पर,
निराशा के वक्त,
जो बैसाखी-सा मुझे सहारा देगा।
******************************************

Comments

Kavi Kulwant said…
इतनी लम्बी कविता.. लेकिन मजा आ गया.. बहुत खूब

Popular posts from this blog

सवाल उर्दू का -राही मासूम रज़ा

चित्र पर क्लिक करें और पढ़े ।

हिन्दी साक्षात्कार विधा : स्वरूप एवं संभावनाएँ

डॉ. हरेराम पाठक हिन्दी की आधुनिक गद्य विधाओं में ‘साक्षात्कार' विधा अभी भी शैशवावस्था में ही है। इसकी समकालीन गद्य विधाएँ-संस्मरण, रेखाचित्र, रिपोर्ताज, आत्मकथा, अपनी लेखन आदि साहित्येतिहास में पर्याप्त महत्त्व प्राप्त कर चुकी हैं, परन्तु इतिहास लेखकों द्वारा साक्षात्कार विधा को विशेष महत्त्व नहीं दिया जाना काफी आश्चर्यजनक है। आश्चर्यजनक इसलिए है कि साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा साक्षात्कार विधा ही एक ऐसी विधा है जिसके द्वारा किसी साहित्यकार के जीवन दर्शन एवं उसके दृष्टिकोण तथा उसकी अभिरुचियों की गहन एवं तथ्यमूलक जानकारी न्यूनातिन्यून समय में की जा सकती है। ऐसी सशक्त गद्य विधा का विकास उसकी गुणवत्ता के अनुपात में सही दर पर न हो सकना आश्चर्यजनक नहीं तो क्या है। परिवर्तन संसृति का नियम है। गद्य की अन्य विधाओं के विकसित होने का पर्याप्त अवसर मिला पर एक सीमा तक ही साक्षात्कार विधा के साथ ऐसा नहीं हुआ। आरंभ में उसे विकसित होने का अवसर नहीं मिला परंतु कालान्तर में उसके विकास की बहुआयामी संभावनाएँ दृष्टिगोचर होने लगीं। साहित्य की अन्य विधाएँ साहित्य के शिल्पगत दायरे में सिमट कर रह गयी...

aadaba