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लोग क्या कहेगें

अश्फाक कादरी
बाबूजी गुजर गये। जीवन भर सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष करने वाले बाबूजी के तीये की बैठक में समाज पूरा उमड़ पड़ा था। तीये की बैठक के बाद जब परिवार मिल बैठा तो उनके पीछे मृत्युभोज करने का प्रश्न सभी के सामने खड़ा था।

बाबूजी पूरे समाज से प्यार करते थे, इसलिए उनके पीछे औसर (मृत्युभोज) तो होना चाहिए काकाजी बोल पड़े थे।

मगर बाबूजी इसके खिलाफ थे बडा बेटा अपनी शंका व्यक्त करने लगा। लोग क्या कहेगें ? मंझला बेटा कहने लगा समाज में पैसे और मान सम्मान में हम किसी से कम है क्या ? जो बाप के मरते ही दो पैसे खर्च न कर सके।

तभी छोटे की ऑंखों में चमक उभर आयी तो फिर बाबूजी के नाम पर महाप्रसाद करेगें, छोटा बोल पड़ा औसर से महाप्रसाद अच्छा है, समाज में इसका विरोध नहीं होगा और हमारी शान रह जायेगी।

फिर बाबूजी के महाप्रसाद में सात मिठाईयां, दही बड़े, पकौड़ी, पक्की मंझला चहकते हुए बोला पूरे गांव को बुलाना चाहिए।

तो फिर ओढावणी छोटे बेटे के ससुर ने झिझकते हुए पूछा। मायरा-मौसायरा आप देवें तो आपकी मर्जी है, हम आपको इन्कार नहीं करेगें बड़ा बोल उठा।
मगर बाबूजी तो इसके खिलाफ थे ससुर जी शंकित होकर बोले।

इस मौके पर आप खर्चा नहीं करेंगे तो लोग क्या कहेगें, आप लोगों के पास इस वक्त भी बेटी को देने के लिए कुछ नहीं है.... मंझला बोल उठा ।

सभी लोग बाबूजी की आत्मा की शन्ति के लिए महाप्रसाद की तैयारियों में जुट गये और समधी जी बेटी को इस अवसर पर भारी भरकम ओढावती की व्यवस्था में जुट गये।

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