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इस गवार को !

कवि कुलवंत सिंह
हो भूख से बेजार बढ़ाकर जब कोई हाथ
उतारता स्वर्ण मुद्रिका जल रही चिता के हाथ
तो इस गवार को भी यह बात समझ आती है ।

लेकिन रहने वाले ऊँची अट्टारिकाओं में
सेकते हैं रोटियां जब जल रही चिताओं में
तो इस गवार को भी यह बात गवारा नही है ।

भरसक मेहनत के बाद जब एक श्रमिक के हाथ
जुटा पाते न रोटी दो वक्त की एक साथ
चुराना एक रोटी का मुझे समझ आता है ।

माँ, पत्नी की लाश पर कर रहे हैं जो नग्न नृत्य
जमीन जायदाद खातिर कर रहे जो भर्त्स कृत्य
यह बात इस गवार को नागवार गुजरती है ।

गाँवों में साधन नहीं, कमाई का ठौर नही
शहरों में भाग आते चार पैसे मिलें कहीं
बदहाल सा जीना उनका समझ आता है ।

लेकिन शहरों से जा खेतों पर कब्जा करना
एक साथ सैकड़ों किसानों की जमीन छिनना
मुझे क्या किसी भी गवार को समझ आता नही ।

कलेजे पर रख पत्थर भेज विदेश बच्चों को
स्वर्णिम भविष्य देने की चाहत लाडलों को
बुढ़ापे में खुद को ढ़ोना समझ आता है ।

लेकिन उन लाडलों का क्या जो छीन कर सब कुछ
बेघर कर देते बूढ़े माँ बाप को समझ तुच्छ
गवार को लगता खूब सयाने वो लाडले हैं ।

पिता का हाथ बंटाता बचपन खेत खलिहान में
माँ का हाथ बंटाता बचपन घरों के काम में
गवार को क्या समझदार को भी समझ आता है ।

लेकिन बचपन खुद को कांधों पर धर जीता है
होटलों, दुकानों, सड़कों, फैक्ट्रियों में पलता है
लगता गवार को हुई बेमानी जिंदगी है ।

कायर बन जो जीते हैं, शांति शांति जपते हैं
कातर बोल रखते हैं, अपमान भी सहते हैं
दमन इन जातियों का एक दिन समझ आता है ।

किंतु ब्याघ्र बन जो छोटे राष्ट्र निगल जाते हैं
दूसरे देशों की भी बागडोर चलाते हैं
इस गवार के पल्ले तो कुछ भी नही पड़ता है ।

नेता बनने से पहले वह खाना खाते हैं
राजनीति में जमने पर बस पैसा खाते हैं
नेताओं का करोड़पति बनना समझ आता है ।

लेकिन आम जनता त्रस्त, अपमान सहती रहे
भूख, गरीबी, जुल्म, भ्रष्टाचार से भिड़ती रहे
देश को बेचें नेता, गवार समझ पाता नही ।

अरे समझदारों ! इस गवार को भी समझा दो
ऊट पटांग हरकतों को भेजे में घुसवा दो
गर नही तो इस गवार को मूर्ख ही बतला दो ।

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