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प्रेमी की गली

फ़ैज़ अहमद फैज़



कब
याद में तेरा साथ नहीं, कब हात में तेरा हात नहीं
सद-शुक्र कि अपनी रातों में, अब हिज्र1 की कोई रात नहीं

मुश्किल हैं अगर हालात वहां, दिल बेच आएँ, जाँ दे आएँ
दिल वालों कूचा-ए-जानाँ2 में क्या ऐसे भी हालात नहीं

जिस धज से कोई मक़तल में गया, वो शान सलामत रहती है
ये जान तो आनी-जानी है, इस जाँ की तो कोई बात नहीं

मैदान-वफ़ा दरबार नहीं, याँ नामो नसब3 की पूछ कहाँ
आशिक़ तो किसी का नाम नहीं, कुछ इश्क़ किसी की ज़ात नहीं

गर बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है, जो चाहो लगा दो डर कैसा
गर जीत गए तो क्या कहना, हारे भी तो बाज़ी मात नहीं

1. वियोग2. प्रेमी की गली3. नाम व वंशावली

Comments

seema gupta said…
गर बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है, जो चाहो लगा दो डर कैसा
गर जीत गए तो क्या कहना, हारे भी तो बाज़ी मात नहीं
"very touching words"
regards
वर्षा said…
बहुत ही सुंदर
नववर्ष की हार्दिक ढेरो शुभकामना

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