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अनंत खोज

-विजय अग्रवाल


‘‘यह तुमने कैसा वेश बना रखा है ?’’

‘‘तुम भी तो वैसी ही दिख रही हो !’’
‘‘हाँ मैंने अब अपने आपको समाज को सौंप दिया है। उन्हीं के लिए रात-दिन सोचता-करता रहता हूँ।’’
‘‘कुछ ऐसी ही स्थित मेरी भी है। एम.डी. करने के बाद अब मैं आदिवासी इलाकों में मुफ्त इलाज करती हूँ। बदले में वे ही लोग मेरी देखभाल करते हैं। खैर, लेकिन तुम तो आई.ए.एस. बनने की बात करते थे ?’’
‘‘हाँ, करता था। बन भी जाता शायद, बशर्ते कि तुम्हें पाने की आशा रही होती। जब तुम नहीं मिलीं तो आई.ए.एस. का विचार भी छोड़ दिया !’’
‘‘अच्छा !’’ उसके चेहरे पर अनायास ही दुःख की हलकी लकीरें उभर आईं। उसने धीमी आवाज में कहा, ‘‘कहाँ तो आई.ए.एस. के ठाट-बाट और कहाँ गली-गली की खाक छानने वाला ये धंधा ! इनमें तो कोई तालमेल दिखाई नहीं देता।’’
‘‘क्या करता ? यदि तुमने एक बार अपने मन की बात बता दी होती तो आज जिंदगी ही कुछ और होती।’’
‘‘लेकिन तुमने भी तो अपने मन की बात नहीं कही।’’
थोड़ी देर के लिए वातावरण में घुप्प चुप्पी छा गई। दोनों की आँखें एक साथ उठीं, मिलीं और फिर दोनों एक साथ बोल उठे, ‘‘इसके बाद से शायद हम दोनों ही एक-दूसरे को औरों में खोजने में लगे हुए हैं। शायद इसीलिए किसी ने भी अपने मन की बात नहीं कही।’’

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