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मानव

रचना भारती 'गौड़'

दुनिया की दह्ललीज़ पर
नागफनी सी अभिलाषाएं
लोक लाज के भय से
डरी प्रेम अग्नि की ज्वालाएं
सुवासित हु‌ए उपवन फिर
खुल गयी प्रकृति की आबन्धनाएं
उग्र अराजकता से दुनिया की
क्रन्दन करती आज दिशा‌एं
पांव ठ्हर ग‌ए पथ भूल
अन्तर्मन में, नया कोई नया स्तम्भ बनाएं
युगों-युगों तक गूंजें नभ में
पिछली भूलें फिर न दोहराएं
भरी गोद चट्टानों से धरती की
या पत्थर की प्रतिमाएं
भावों की संचरित कविता से
सुप्त जीवन का तार झंकृत कर
चलो, हम मानव को मानव बना‌एं

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