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हिन्दी कथा साहित्य के सुखद भविष्य का संकेतः ज़िन्दगी 50-50


                                        प्रो. मेराज अहमद

भगवंत अनमोलकृत ज़िन्दगी 50-50 वर्तमान में हिन्दी के बहुत चर्चित उपन्यासों में से एक है। चर्चा के कारणों के संबंध में इसके ‘बेस्ट सेलर’ होने का उल्लेख कदाचित् सर्वाधिक किया जाता है। निश्चित ही बाज़ारवाद के इस दौर में ‘वस्तु’ की महत्ता की वजह उसकी तमाम विशेषताओं को दरकिनार करते हुए उसकी ‘सेल’ अर्थात् बिक्री के द्वारा ही निर्धारित की जाती है। पाश्चात्य संस्कृति में पूर्व की अपेक्षा सबकुछ, यहाँ तक की भावनाएँ, संवेदनाएँ संबंध जैसे मानवीय प्रकृति के नैसर्गिक चरित्रा (गणना करने पर इनकी लम्बी फेहरिस्त हो जाएगी) वस्तु में तब्दील हो चुके हैं। साहित्य का संबंध मनुष्य की विविध प्रवृत्तियों की अभिव्यक्ति से ही होता है। प्रायः साहित्य भी एक सीमा तक वहाँ वस्तु में तब्दील हो चुका है, परन्तु भारतीय परिदृश्य में अभी पाश्चात्य देशों जैसी  स्थिति नहीं है। असल में बेस्ट विशेषण की आवश्यकता तो तभी होगी जब सेल शब्द का अस्तित्व हो। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि भारतीय भाषाओें में खासतौर से हिन्दी में तो रचनाएँ ‘सेलिंग’ से दूर ही होती जा रही हैं। ऐसे में किसी भी रचना का बेस्ट सेलर होना रचना और रचनाकार दोनों ही के लिए गर्व का कारण होगा, लेकिन किसी भी रचना के बेस्ट सेलर या कभी-कभी बहुपठित होने के कतई यह मायने नहीं हैं कि रचना महत्त्वपूर्ण है। संभावना यह बनी रहती है। बाज़ार की माँग के दबाव में त्वरित सफलता के लिए रचनाकार समय-पर बाज़ार में चलने वाले फार्मूले का सहारा लेने लगते हैं ऐसे में हो सकता है कि उसे फौरी सफलता मिल जाय, लेकिन यह सफलता संदिग्ध और लघुकालिक ही रहती है। प्रस्तुत उपन्यास के बेस्ट सेलर होने में भले ही बाज़ार की माँग के अनुसार उसकी प्रस्तुति का आग्रह प्रभावी हो, परन्तु केवल उसकी महत्ता के कारणों में उसकी प्रसिद्धि अथवा अधिकाधिक बिक्री उपन्यास के महत्त्व का प्रमुख कारण है या नहीं? इसी प्रश्न का उत्तर कदाचित् प्रस्तुत आलेख का लक्ष्य है।
उपन्यास का विषय मनुष्य की चिरंतन और स्वाभाविक प्रवृत्ति प्रेम से ही संपृक्त है। कथावस्तु और उसकी प्रस्तुति अवश्य परम्परा से हट कर है। प्रेम में त्याग और बलिदान न केवल मानवीय चरित्रा की प्रवृत्ति है अपितु त्याग और बलिदान में प्रेम का उत्कर्ष भी लक्षित किया जाता है। उपन्यास की कथावस्तु हिन्दी साहित्य में लगभग अप्रचलित और लगभग त्याज्य से विषय के रूप में किन्नर जीवन की अभिव्यक्ति पर आधारित है। परन्तु वास्तविकता यह है कि उपन्यास के मूल में प्रेम ही है। प्रेम मनुष्य की नैसर्गिक प्रवृत्ति है। इसक दायरा इतना विस्तृत है कि न तो उसका सीमांकन किया जा सकता है और न ही उसका वर्गीकरण और न ही उसके लिए किसी विशिष्ट कारक का ही निर्धारण किया जा सकता है। रचना की मुख्य कथा के केन्द्र में नायक और उसकी सहकर्मी अनाया की प्रेम कहानी है, परन्तु उसी के समानान्तर चित्रित नायक का किन्नर पुत्रा सूर्या के लिए प्रेम या फिर नायक के पिता की नफ़रत से जूझते किन्नर के रूप में जन्मे छोटे भाई हर्षा के प्रति स्नेह, हर्षा के लिए माँ का अगाध वात्सल्य और अंत में पिता की इच्छापूर्ति हेतु हर्षा द्वारा जीवनोत्सर्ग में निहित प्रेम, उपन्यास को प्रेम के बहुआयामी और बहुरूपा तथा प्रेम की पराकाष्ठा की अभिव्यक्ति आधारित रचना के रूप में प्रतिष्ठित करता है। 
नायक का अनाया से प्रेम, प्रेम की नैसर्गिक भावना से संचालित है। परन्तु वह सांसारिक है। अपने समय के समाज और समाज की सामान्य और स्वाभाविकता से युक्त मानवीय भाव-भूमि पर ही चित्रित हुआ है। एम.एन.सी. में कार्यरत अनाया के एक तरफ के गाल का जन्म-चिह्न उसके दैहिक सौन्दर्य को विकृत कर देता है। वह अपनी इस शारीरिक कमी के कारण समाज और विशेष रूप से अपने सहयोगियों के बीच चर्चा और सहानुभूति का पात्रा है। नायक भी आरम्भ में उसे देखकर आश्चर्यजनक उत्सुकता की भावना से ही संचालित होता है। उसके मन में भी दूसरे लोगों की भाँति ही उसके प्रति दया और सहानुभूति की भावना ही उत्पन्न होती परन्तु उसे शीघ्र ही इस बात का एहसास हो जाता है कि लोगों की सहानुभूतिजन्य सान्त्वना उसे राहत देने के बजाय आहत करेगी। ऐसे व्यक्ति के लिए, ‘‘सहानुभूति दिखाना बहुत ज़हरीला साबित होता है। पर अक्सर हम विकलांगों या फिर ऐसे लोगों को अलग से सहानुभूति देते हैं और सहायता करते हैं। हमें कभी उनको यह दिखाकर मदद नहीं करनी चाहिए कि वे विकलांग हैं। इससे उनकी विकलांगता मन में अधिक बढ़ती जाती है। वो खुद को आप से कमजोर समझने लगते हैं। वैसे भी शारीरिक विकलांगता से मन की विकलांगता घातक होती है। ऐसे लोगों को हम मन से विकलांग बनाते जाते हैं। शायद ऐसा ही कुछ इस लड़की के साथ भी हो रहा था।’’1 सहानुभूतिजन्य भावनाओें से उत्पन्न नायक का अनाया के प्रति प्रेम उक्त    विचारधारा से संचालित हो करके मानवीय हृदय की उज्ज्वल भावनाओं के प्रवाह में सूक्ष्म से विराट की ओर बढ़ जाता ---
पूरा आलेख थर्ड जेण्डर और ज़िन्दगी 50-50 
में पढ़ सकते है....

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