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विक्षोभ

डा. महेंद्र भटनागर

इच्छाएँ हमारी —
त्रस्त हैं,
उद्विग्न हैं,
आकार पाने के लिए !
.
आसंग इच्छाएँ —
जिन्हें हमने
बड़े ही यत्न से
गोपन-सुरक्षित स्थान पर रक्खा सदा
वांछित अनागत की प्रतीक्षा में !
.
विविक्षित भावनाएँ
आकुलित हैं,
आक्रमित हैं,
वास्तविक अनुभूति का
आधार पाने के लिए !
.
पर,
वायुमण्डल में
न जाने किस तरह की
अश्रुवाही वाष्प है परिव्याप्त ;
जिससे हम विवश हैं
मूक रोने के लिए,
आक्रोश तृष्णा भार ढोने के लिए !

Comments

अच्छी रचना है।बधाई।
vandana gupta said…
bahut hi badhiya......adbhut

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